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बैंक फ्रॉड केस में CBI ने लिया बड़ा एक्शन, अनिल अंबानी की कंपनी के खिलाफ पहली चार्जशीट दाखिल https://feeds.abplive.com/o...
30/05/2026

बैंक फ्रॉड केस में CBI ने लिया बड़ा एक्शन, अनिल अंबानी की कंपनी के खिलाफ पहली चार्जशीट दाखिल
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Gold Import Duty: भारत में सोने की खरीदारी को बड़ा झटका लगा है. हाल ही में सरकार द्वारा सोने पर आयात शुल्क बढ़ाने के बाद देशभर में इसकी मांग में करीब 70% तक गिरावट दर्ज की गई है. ज्वेलर्स और बुलियन कारोबारियों का कहना है कि बढ़ी हुई ड्यूटी, महंगाई और कमजोर उपभोक्ता मांग के कारण लोग नया सोना खरीदने से बच रहे हैं. भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में शामिल है. ऐसे में मांग में इतनी बड़ी गिरावट को बाजार के लिए बड़ा संकेत माना जा रहा है.
सरकार के किस फैसले से बदला पूरा खेल?
सरकार ने मई में सोने पर आयात शुल्क 6% से बढ़ाकर 15% कर दिया. इस फैसले का मकसद सोने के आयात को कम करना और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घटाना बताया गया. लेकिन इसका सीधा असर सोने की कीमतों पर पड़ा और घरेलू बाजार में सोना पहले से ज्यादा महंगा हो गया. ड्यूटी बढ़ने के बाद सोने पर कुल टैक्स बोझ काफी बढ़ गया है, जिससे खरीदारों की दिलचस्पी कम होती दिख रही है.
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25 टन से घटकर 7.5 टन रह गई मांग
उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, 27 मई को समाप्त हुए पखवाड़े में देश की सोने की मांग घटकर करीब 7.5 टन रह गई, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह लगभग 25 टन थी. यानी खरीदारी में भारी गिरावट दर्ज की गई है. इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि ड्यूटी बढ़ने के बाद बाजार में मांग लगभग 70% तक घट गई है.
कौन है जिम्मेदार?
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो सोने की मांग में गिरावट के पीछे सिर्फ आयात शुल्क बढ़ना ही वजह नहीं है. पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतें, खाद्य महंगाई और घरेलू बजट पर बढ़ता दबाव भी लोगों को सोना खरीदने से रोक रहा है. जब परिवारों का बड़ा हिस्सा जरूरी खर्चों में जाने लगे तो लोग सोने जैसी बड़ी खरीदारी को टालना पसंद करते हैं. यही वजह है कि बाजार में ग्राहकों की संख्या कम होती दिखाई दे रही है.
हल्के गहने की मांग
ज्वेलर्स के अनुसार ग्राहक अब भारी और महंगे गहनों की जगह हल्के वजन की ज्वेलरी खरीद रहे हैं. कई लोग अपने पुराने गहने बेचकर नकदी जुटा रहे हैं, जबकि नए गहनों की खरीदारी को टाल रहे हैं. दक्षिण भारत समेत कई बड़े बाजारों में ग्राहकों का रुझान कम कीमत वाले और हल्के आभूषणों की तरफ बढ़ा है.
किसपर हो रहा है सबसे ज्यादा असर?
सोने की मांग में आई इस गिरावट का सबसे ज्यादा असर छोटे और स्थानीय ज्वेलर्स पर पड़ा है. बड़े ब्रांड्स के पास स्टॉक और मजबूत ग्राहक आधार होने के कारण वे कुछ हद तक स्थिति संभाल पा रहे हैं, लेकिन छोटे कारोबारियों के लिए बिक्री में गिरावट बड़ी चुनौती बन गई है. बुलियन कारोबारियों का यह भी मानना है कि ज्यादा ड्यूटी से तस्करी बढ़ने का खतरा भी पैदा हो सकता है, क्योंकि वैध और अवैध बाजार के बीच कीमत का अंतर बढ़ गया है.
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आगे क्या कहता है अनुमान?
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल का अनुमान है कि आयात शुल्क बढ़ने के कारण 2026 में भारत की सोने की मांग 50-60 टन तक कम हो सकती है. यह पिछले साल के मुकाबले करीब 10% की गिरावट होगी. अगर सोने की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और महंगाई का दबाव जारी रहता है, तो आने वाले महीनों में भी बाजार में सुस्ती बनी रह सकती है.

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30/05/2026

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8th Pay Commission: 8वें वेतन आयोग को लेकर केंद्रीय कर्मचारियों और पेंशनर्स के बीच लगातार चर्चा चल रही है. कर्मचारी संगठनों की सबसे बड़ी मांग न्यूनतम वेतन में बढ़ोतरी को लेकर है. इसी बीच एक ऐसा फॉर्मूला चर्चा में आ गया है, जिसका सीधा संबंध कर्मचारियों की खाने की थाली से है. दरअसल, राष्ट्रीय संयुक्त परामर्श तंत्र ने सरकार को दिए अपने ज्ञापन में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के 3490 कैलोरी फॉर्मूले को वेतन निर्धारण का आधार बनाने की मांग की है. कर्मचारी संगठनों का कहना है कि अगर सरकार वास्तव में कर्मचारियों के जीवन स्तर को बेहतर बनाना चाहती है तो न्यूनतम वेतन तय करते समय उनकी जरूरतों को ध्यान में रखना होगा और इनमें सबसे पहली जरूरत भोजन और पोषण की है.
क्या है ICMR का 3490 कैलोरी फॉर्मूला?
ICMR देश की प्रमुख स्वास्थ्य अनुसंधान संस्था है, जो समय-समय पर लोगों की पोषण संबंधी जरूरतों पर ध्यान देती है. इसके अनुसार एक औसत कामकाजी व्यक्ति को प्रतिदिन लगभग 3490 कैलोरी ऊर्जा की आवश्यकता होती है. यह कैलोरी सिर्फ पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि शरीर को स्वस्थ रखने, काम करने की क्षमता बनाए रखने और पोषण की जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी मानी जाती है. कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि जब सरकार न्यूनतम वेतन तय करती है तो उसे यह देखना चाहिए कि कर्मचारी अपने परिवार के लिए पर्याप्त और पौष्टिक भोजन खरीद पाने में सक्षम है या नहीं. अगर वेतन इतना कम हो कि परिवार की बुनियादी जरूरतें भी पूरी न हों, तो वेतन वृद्धि का मकसद अधूरा रह जाता है.
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खाने की थाली से सैलरी का क्या संबंध?
पहली नजर में यह सवाल अजीब लग सकता है कि खाने की थाली का सैलरी से क्या लेना-देना है. लेकिन वेतन आयोगों के इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि न्यूनतम वेतन तय करने में कर्मचारियों की बुनियादी जरूरतों को हमेशा आधार बनाया गया है. इन जरूरतों में भोजन, कपड़े, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और अन्य जरूरी खर्च शामिल होते हैं. कर्मचारी संगठनों का कहना है कि मौजूदा समय में महंगाई पहले की तुलना में काफी बढ़ चुकी है. ऐसे में पुराने मानकों से कर्मचारियों के खर्च का सही आकलन नहीं हो सकता. यही वजह है कि अब ICMR के आधुनिक पोषण मानकों को शामिल करने की मांग की जा रही है. इसके जरिए यह पता लगाया जाएगा कि एक परिवार को स्वस्थ जीवन जीने के लिए हर महीने खाने-पीने पर कितना खर्च करना पड़ता है और उसी आधार पर न्यूनतम वेतन तय किया जाए.
69 हजार रुपये न्यूनतम वेतन की मांग क्यों?
JCM ने सरकार को दिए ज्ञापन में केंद्रीय कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन करीब 69,000 रुपये प्रति माह करने की मांग की है. कर्मचारी संगठनों का कहना है कि वर्तमान वेतन संरचना बढ़ती महंगाई के मुकाबले काफी पीछे रह गई है. उनका तर्क है कि आज के समय में सिर्फ राशन और भोजन ही महंगा नहीं हुआ है, बल्कि बच्चों की पढ़ाई, इलाज, किराया, बिजली-पानी, इंटरनेट, मोबाइल और यात्रा जैसे खर्च भी तेजी से बढ़े हैं. ऐसे में कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए अधिक वेतन की जरूरत है.
फिटमेंट फैक्टर पर भी टिकी हैं उम्मीदें
8वें वेतन आयोग की चर्चा में फिटमेंट फैक्टर भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है. फिटमेंट फैक्टर वह गुणांक होता है जिसके आधार पर कर्मचारियों की मौजूदा बेसिक सैलरी को बढ़ाया जाता है. हालांकि अभी सरकार की तरफ से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि फिटमेंट फैक्टर ऐसा हो जिससे न्यूनतम वेतन में बड़ा इजाफा हो सके. माना जा रहा है कि अगर सरकार कर्मचारी संगठनों की मांगों पर विचार करती है तो बेसिक सैलरी में अच्छी बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है.
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कर्मचारियों के लिए क्यों अहम है यह बहस?
सरकारी कर्मचारियों का कहना है कि महंगाई बढ़ने के साथ जीवनयापन का खर्च भी तेजी से बढ़ा है. ऐसे में सिर्फ मामूली वेतन वृद्धि से काम नहीं चलेगा. वे चाहते हैं कि वेतन निर्धारण का तरीका भी समय के साथ बदले. ICMR के 3490 कैलोरी फॉर्मूले को शामिल करने की मांग इसी सोच का हिस्सा है.
सरकार का क्या है रुख?
फिलहाल सरकार की तरफ से ICMR के 3490 कैलोरी फॉर्मूले या 69 हजार रुपये न्यूनतम वेतन की मांग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. 8वें वेतन आयोग से जुड़ी कई सिफारिशों और मांगों पर अभी चर्चा चल रही है. अंतिम फैसला आयोग की सिफारिशों और सरकार की मंजूरी के बाद ही सामने आएगा. इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि कर्मचारियों की सभी मांगें स्वीकार होंगी या नहीं.
लाखों कर्मचारियों की नजर 8वें वेतन आयोग पर
देश के लाखों केंद्रीय कर्मचारी और पेंशनर्स 8वें वेतन आयोग से बड़ी उम्मीदें लगाए बैठे हैं. उन्हें उम्मीद है कि इस बार सिर्फ वेतन बढ़ोतरी ही नहीं, बल्कि उनकी वास्तविक जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाएगा. अगर वेतन निर्धारण में ICMR के पोषण मानकों जैसे आधुनिक पैमानों को शामिल किया जाता है तो यह कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकता है. इससे न केवल उनकी आय बढ़ेगी, बल्कि बढ़ती महंगाई के बीच आर्थिक सुरक्षा भी मजबूत होगी.

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Iran War: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब सिर्फ मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं है. इसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर दिखाई देने लगा है. सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की कीमतों को लेकर है. हाल के दिनों में तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला, जिससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों की मुश्किलें बढ़ गई हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव लंबे समय तक बना रहा तो महंगाई बढ़ सकती है और इसका सीधा असर कंपनियों की कमाई पर पड़ सकता है.
महंगाई क्यों बन रही है बड़ा खतरा?
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है. ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो परिवहन, लॉजिस्टिक्स और उत्पादन की लागत बढ़ जाती है. धीरे-धीरे इसका असर रोजमर्रा के सामानों की कीमतों पर भी दिखने लगता है. पिछले कुछ महीनों में महंगाई नियंत्रण में थी, जिससे कंपनियों को राहत मिली थी. लेकिन अब तेल की कीमतों में आई तेजी ने फिर से महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा कर दिया है. अगर ईंधन महंगा होता है तो कंपनियों का खर्च बढ़ेगा और अंततः इसका बोझ ग्राहकों तक पहुंच सकता है.
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कॉर्पोरेट आय पर कैसे पड़ेगा असर?
किसी भी कंपनी की कमाई सिर्फ बिक्री पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसकी लागत भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है. जब कच्चा माल, ईंधन और परिवहन खर्च बढ़ते हैं तो कंपनियों का मुनाफा घटने लगता है. हालांकि कुछ बड़ी कंपनियां अपने उत्पादों की कीमत बढ़ाकर इस असर को कम कर सकती हैं, लेकिन हर कंपनी के लिए ऐसा करना आसान नहीं होता. खासकर उन सेक्टरों में जहां प्रतिस्पर्धा ज्यादा है, वहां कीमत बढ़ाने से बिक्री प्रभावित हो सकती है. ऐसे में कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है.
इन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा दबाव
तेल की बढ़ती कीमतों का सबसे बड़ा असर एयरलाइंस कंपनियों पर पड़ सकता है. विमानन ईंधन उनकी लागत का बड़ा हिस्सा होता है. ऐसे में ईंधन महंगा होने पर या तो टिकट महंगे होंगे या कंपनियों का मुनाफा घटेगा. पेंट, केमिकल और पेट्रोकेमिकल सेक्टर भी दबाव में आ सकते हैं क्योंकि इनका कच्चा माल सीधे तौर पर कच्चे तेल से जुड़ा होता है. कई विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इन कंपनियों के मार्जिन पर असर दिखाई दे सकता है. इसके अलावा एफएमसीजी कंपनियां, सीमेंट निर्माता, इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियां और उर्वरक उद्योग भी बढ़ती लागत का सामना कर सकते हैं. माल ढुलाई महंगी होने से इनके खर्च बढ़ेंगे और मुनाफा प्रभावित हो सकता है.
शेयर बाजार पर भी दिख सकता है असर
बढ़ती महंगाई और ऊंची तेल कीमतें शेयर बाजार के लिए भी अच्छी खबर नहीं मानी जाती हैं. निवेशकों को डर है कि अगर महंगाई बढ़ती रही तो ब्याज दरों में कटौती की संभावना कम हो सकती है. इससे बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल बाजार पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए है. आने वाली तिमाहियों के नतीजे यह तय करेंगे कि बढ़ती लागत का कंपनियों की कमाई पर कितना असर पड़ा है.
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क्या FY27 में कमाई के अनुमान घट सकते हैं?
अभी तक FY27 के लिए कंपनियों की कमाई को लेकर उम्मीदें सकारात्मक बनी हुई हैं. लेकिन अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो कई सेक्टरों के लिए आय अनुमान में कटौती की जा सकती है. विश्लेषकों का मानना है कि पहली और दूसरी तिमाही के नतीजों में इस दबाव की तस्वीर साफ दिखाई दे सकती है. खासकर उन कंपनियों पर ज्यादा असर होगा जिनकी लागत का बड़ा हिस्सा ईंधन और आयातित कच्चे माल पर निर्भर है.
आगे क्या है सबसे बड़ी चिंता?
फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यही है कि मध्य-पूर्व में तनाव कितना लंबा चलता है. अगर हालात जल्द सामान्य हो जाते हैं तो तेल की कीमतों में राहत मिल सकती है. लेकिन अगर संघर्ष बढ़ता है तो महंगाई, कंपनियों की कमाई और शेयर बाजार तीनों पर दबाव बढ़ सकता है. यही वजह है कि निवेशकों से लेकर कंपनियों तक, सभी की नजर अब कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक घटनाक्रम पर टिकी हुई है. आने वाले कुछ महीने यह तय करेंगे कि बढ़ती इनपुट कॉस्ट सिर्फ अस्थायी परेशानी है या फिर भारत इंक के लिए एक बड़ी चुनौती बनने वाली है.

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8th Pay Commission: इंडियन रेलवे टेक्निकल सुपरवाइजर्स एसोसिएशन (IRTSA) ने 8वें वेतन आयोग (8th Pay Commission) के सामने अपने कर्मचारियों के लिए बड़ी मांग रखी है. इसके तहत, रेलवे ने सभी कर्मचारियों के लिए एक समान के बजाय पे-मैट्रिक्स के आधार पर 5- ग्रेडेड फिटमेंट फैक्टर की मांग की है. यानी कि अलग-अलग स्तर के कर्मचारियों के लिए अलग-अलग फिटमेंट फैक्टर लागू करने की मांग. इस फॉर्मूले के तहत, उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों और टेक्निकल स्टाफ की बेसिक सैलरी में 192% से अधिकतम 338% तक का इजाफा हो सकता है.
क्या है 5-ग्रेडेड फिटमेंट फैक्टर का पूरा कैलकुलेशन?
7वें वेतन आयोग के तहत सभी के लिए एक समान 2.57 का फिटमेंट फैक्टर था. इसके विपरीत, IRTSA ने पदों की जिम्मेदारी के हिसाब से पांच अलग-अलग Multipliers तय करने का प्रस्ताव दिया है.

लेवल 1-5 : 2.92
लेवल 6-8 : 3.50
लेवल 9-12 : 3.80
लेवल 13-16 : 4.09
लेवल 17-18 : 4.38

इतना ही नहीं, IRTSA ने रेलवे टेक्निकल सुपरवाइजर्स के लिए नया कैडर स्ट्रक्चर और शुरुआती वेतन भी सुझाया है. यह कुछ इस प्रकार से है:-

जूनियर इंजीनियर (Level-7) 1,57,400 रुपये
सीनियर सेक्शन इंजीनियर (Gr-B, Level-8) 1,66,800 रुपये
असिस्टेंट मैनेजर (Gr-B, Level-9) 2,01,600 रुपये
मैनेजर (Gr-B, Level-10) 2,13,000 रुपये
सीनियर मैनेजर (Gr-A, Level-11) 2,57,000 रुपये

क्या है रेलवे का तर्क?
रेलवे एसोसिएशन का तर्क है कि पिछले वेतन आयोगों के कारण सीनियर सुपरवाइजर और उनके नीचे काम करने वाले कर्मचारियों के वेतन में अंतर बहुत कम हो गया था. कई बार सुपरवाइजर को अपने अंडर काम करने वाले कर्मचारी के बराबर ही वेतन मिलता है. 4.38% का फिटमेंट फैक्टर इसी विसंगति को दूर करेगा.
इसके अलावा, रेलवे में टॉप लेवल के इंजीनियर्स और दूसरे बड़े पदों के लिए बड़ी सैलरी हाइक का प्रस्ताव इसलिए रखा गया है ताकि सरकारी नौकरी की सैलरी भी प्राइवेट सेक्टर के मुकाबले आकर्षक बना रहे. इसके अलावा, संगठन ने और भी कई मांगे की हैं जैसे कि DA का बेसिक सैलरी में ऑटोमेटिक मर्जर, 5% का एनुअल सैलरी ग्रोथ वगैरह.

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Petrol-Diesel Price Cut: ईरान-अमेरिका में लड़ाई, होर्मुज की नाकेबंदी और पश्चिम एशिया में टेंशन के बीच एक तरफ जहां भारत सहित दुनिया के तमाम हिस्सों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ रही हैं. वहीं, भारत के ही पड़ोसी देश पाकिस्तान में पेट्रोल-डीजल के दाम लगातार घट रहे हैं.
सरकार ने दिया ईद का तोहफा
पाकिस्तान में शहबाज शरीफ की सरकार ने बीते 29 मई को पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल (HSD) की कीमत में भारी कटौती का ऐलान किया है. यहां सरकार ने ईद-अल-अजहा के मौके पर देश की जनता को राहत देते हुए पेट्रोल-डीजल के दाम पहले के मुकाबले और कम कर दिए हैं और इसे 'ईद का तोहफा' बताया है. कल पाकिस्तान में पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल दोनों के दाम सीधे 22 रुपये घटा दिए गए.
लगातार तीसरी बार कम हुई कीमत

सबसे पहले 15 मई को पेट्रोल और हाई-स्पीड डीजल की कीमतों में 5 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गई.
फिर 22 मई को साप्ताहिक समीक्षा के तहत पेट्रोल के दाम 6 रुपये प्रति लीटर और हाई-स्पीड डीजल 6.80 रुपये प्रति लीटर कम किए गए.
ईद के मौके पर 29 मई को तीसरी बार सबसे बड़ी कटौती की गई. सरकार ने दोनों के ही दाम 22 रुपये कम कर दिए.

कुल मिलाकर पाकिस्तान में मई के महीने में पेट्रोल कुल 33 रुपये प्रति लीटर सस्ता हुआ है. वहीं, डीजल के दाम कुल 33.80 रुपये कम किए गए हैं.
क्यों कम किए गए रेट?
पाकिस्तान की आवाम महंगाई से परेशान थी. मार्च और अप्रैल में यहां ईंधन की कीमतें पहली बार 414 रुपये प्रति लीटर के पार चली गई थीं. इसके चलते माल ढुलाई से लेकर ट्रांसपोर्ट बेहद महंगा हो गया था.लोग सड़कों पर उतर आए थे. जगह-जगह विरोध प्रदर्शन होने लगे. अपनी सरकार को बचाने और घरेलू राजनीतिक स्थिरता के लिए सरकार ने दाम कम किए. इस क्रम में सरकार ने ईद के मौके पर अधिकारियों को तेल कंपनियों को होने वाले मुनाफे या टैक्स का कुछ हिस्सा घटाकर सीधे जनता को राहत पहुंचाने के निर्देश दिए.
कीमतें कम करने की एक और वजह भी है. पाकिस्तान इन दिनों अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के नियमों पर चल रहा है. IMF ने प्रति लीटर तेल पर एक निश्चित लेवी वसूलने की शर्त रखी थी. अब चूंकि सरकार चालू वित्त वर्ष के लिए टैक्स कलेक्शन का अपना टारगेट पूरा कर पा रही है इसलिए बंतर्राष्ट्रीय बाजारदमें कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का लाभी टैक्स के रूप में खुद रखने के बजाय उपभोक्ताओं को दे रही है.

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June Bank Holidays 2026: मई का महीना अब खत्म होने वाला और जून दस्तक देने के करीब है. जून 2026 में, पूरे भारत में बैंक कई दिन बंद रहने वाले हैं. इनमें वीकली ऑफ के अलावा रीजनल और नेशनल हॉलिडे की छुट्टियां भी शामिल हैं.
नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कुछ खास छुट्टियां तय की हैं, जो अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हो सकती हैं. ग्राहकों को इन तारीखों की जानकारी होनी चाहिए ताकि वे उसी के अनुसार अपनी बैंकिंग गतिविधियों की योजना बना सकें. इसी क्रम में जून में भी बैंक अलग-अलग राज्यों में कुल मिलाकर 11-13 दिन बंद रहेंगे. इसमें 6 (4 रविवार और 2 शनिवार) की नियमित छुट्टियां रहेंगी और बाकी की छुट्टियां राज्यों व वहां के स्थानीय त्योहरों के हिसाब से अलग-अलग हैं.
कब-कब है वीकली ऑफ‌?
7 जून 2026- रविवार
13 जून 2026- दूसरा शनिवार
14 जून 2026- रविवार
21 जून 2026- रविवार
27 जून 2026- चौथा शनिवार
28 जून 2026- रविवार
दूसरी छुट्टियां कब-कब हैं?
15 जून (सोमवार)- राजा संक्रांति और YMA डे के मौके पर केवल ओडिशा और मिजोरम में बैंक बंद रहेंगे.
17 जून (बुधवार)- महाराणा प्रताप जयंती के उपलक्ष्य में हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान में बैंकों की छुट्टियां रहेंगी.
18 जून (गुरुवार)- गुरु अर्जुन देव के शहीदी दिवस के मौके पर सिर्फ पंजाब में बैंकों का अवकाश रहेगा.
25 जून (गुरुवार)- मुहर्रम के कारण विजयवाड़ा और आंध्र प्रदेश में बैंक बंद रहेंगे.
26 जून (शुक्रवार)- मुहर्रम (आशूरा) के चलते दिल्ली से लेकर मुंबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, भोपाल, पटना जैसे देश के अधिकांश राज्यों में बैंकों की छुट्टी रहेगी.
29 जून (सोमवार)- संत गुरु कबीर जयंती के उपलक्ष्य में हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बैंक बंद रहेंगे.
30 जून (मंगलवार)- रेमना नी (Remna Ni) के मौके पर मिजोरम में बैंक बंद रहने वाले हैं.
डिजिटल सर्विसेज रहेंगी चालू
भले ही जून में बैंक कई दिन बंद रहने वाले हैं, लेकिन इसमें घबराने वाली कोई बात नहीं है क्योंकि इस दौरान आप पैसों के लेनदेन, कैश विदड्रॉल और बिल पेमेंट वगैरह के लिए मोबाइल बैंकिंग, ऑनलाइन नेट बैंकिंग, ATM का चौबीसों घंटे इस्तेमाल कर सकेंगे.

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बैंक फ्रॉड केस में CBI ने लिया बड़ा एक्शन, अनिल अंबानी की कंपनी के खिलाफ पहली चार्जशीट दाखिल https://feeds.abplive.com/o...
30/05/2026

बैंक फ्रॉड केस में CBI ने लिया बड़ा एक्शन, अनिल अंबानी की कंपनी के खिलाफ पहली चार्जशीट दाखिल
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पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा कि राज्य सरकार चाहती है कि टाटा समूह हुगली जिले के सिंगूर में फिर से लौटे. उन्होंने इसे न केवल आर्थिक जरूरत बताया, बल्कि यह भी कहा कि इससे एक मजबूत संदेश जाएगा कि बंगाल फिर से निवेश के लिए तैयार है.
बंगाल बीजेपी चीफ ने पीटीआई को दिए इंटरव्यू में कहा कि टाटा समूह की सिंगूर वापसी से लगभग दो दशक पहले नैनो प्रोजेक्ट के राज्य से बाहर जाने के बाद निवेशकों के बीच गलत संदेश गया और अब उसे मिटाने की जरूरत है. उन्होंने कहा, 'हम चाहते हैं कि टाटा समूह वापस आए और वह भी सिंगूर में.'
बंगाल में किसी भी रूप में लौटे टाटा ग्रुप: भट्टाचार्य
कभी भारत का औद्योगिक केंद्र रहा पश्चिम बंगाल पिछले कई दशकों में लगातार पिछड़ता गया है. सिंगूर से 2008 में टाटा का नैनो प्रोजेक्ट के बाहर जाने और ममता बनर्जी के नेतृत्व में भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के बाद पैदा हुए विवाद का जिक्र करते हुए भट्टाचार्य ने कहा कि टाटा मोटर्स संयंत्र को हटाया जाना बंगाल की उद्योग-विरोधी छवि का प्रतीक बन गया था. जब उनसे पूछा गया कि क्या टाटा की सिंगूर वापसी को पिछली सरकार की गलतियों के लिए ‘प्रायश्चित’ माना जा सकता है तो उन्होंने कहा कि टाटा मोटर्स के जाने से राज्य के निवेश के माहौल को दीर्घकालिक नुकसान पहुंचा है.
उन्होंने कहा, 'हम चाहते हैं कि टाटा समूह सिंगूर या बंगाल में किसी भी रूप में लौटे, चाहे वह ऑटोमोबाइल क्षेत्र हो या कोई अन्य क्षेत्र. वे देश के सबसे पुराने, सम्मानित और भरोसेमंद औद्योगिक समूहों में से एक हैं.'

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नैनो प्रोजेक्ट का विरोध कर सत्ता में आई थीं ममता बनर्जी
टाटा मोटर्स के खिलाफ आंदोलन ने तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी को सत्ता तक पहुंचाने और 34 वर्षों के वाम मोर्चा शासन को समाप्त करने में मदद की थी. दूसरी ओर यह कई निवेशकों की नजर में बंगाल के औद्योगिक पतन का प्रतीक भी बन गया. साल 2008 में नैनो परियोजना के चले जाने और लगभग तैयार कारखाने को बाद में तोड़े जाने से कॉरपोरेट जगत में बड़ा झटका लगा था. इससे राज्य में नीतिगत अनिश्चितता और बड़े औद्योगिक निवेशों के प्रति विरोध की स्थायी धारणा बन गई थी.
करीब दो दशक बाद भाजपा उसी स्थान को उद्योगों के पलायन के प्रतीक से उद्योगों की वापसी के प्रतीक के रूप में स्थापित करना चाहती है. भट्टाचार्य ने कहा कि भूमि अधिग्रहण नीतियों में बुनियादी बदलाव के बिना बंगाल में औद्योगिक पुनर्जागरण संभव नहीं है. उन्होंने कहा, 'हमारे पास कोई व्यापक भूमि नीति नहीं थी. ममता बनर्जी ने घोषणा कर दी थी कि सरकार उद्योगों के लिए एक इंच भूमि भी अधिग्रहित नहीं करेगी और कंपनियों को सीधे जमीन खरीदनी होगी. ऐसी अव्यावहारिक और त्रुटिपूर्ण नीति के तहत उद्योगपति घर-घर जाकर जमीन नहीं खरीद सकते.'
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