Astrologer Sarvesh Kant Shukla

Astrologer Sarvesh Kant Shukla ज्योतिषाचार्य,वास्तुशास्त्र विश्लेषक एवं साधक
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आप सभी को होली के पावन पर्व की हार्दिक बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएं।रंगों का यह त्यौहार आप सभी के जीवन को सुख, समृद्धि और अ...
25/03/2024

आप सभी को होली के पावन पर्व की हार्दिक बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएं।

रंगों का यह त्यौहार आप सभी के जीवन को सुख, समृद्धि और अपार खुशियाँ के रंग से भर दें।
सभी के लिए मंगलकामनाएं।
🙏जय श्री महाकाल 🙏

🚩🚩🚩 हनुमान अवतार 🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩🚩ग्यारहवें रुद्र अवतार हनुमान जी :-बजरंगबली भगवान शिव के ग्यारहवें रूद्र अवतार माने जाते ह...
21/03/2024

🚩🚩🚩 हनुमान अवतार 🚩🚩🚩
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ग्यारहवें रुद्र अवतार हनुमान जी :-

बजरंगबली भगवान शिव के ग्यारहवें रूद्र अवतार माने जाते हैं। यही वजह है कि उनके पास असीमित शक्तियां हैं। भगवान शिव ने भगवान विष्णु के मानव अवतार श्री राम के साथ समय व्यतीत करने और उनकी सहायता करने के लिए अपने एकादश रूद्र के अवतार में हनुमान जी के रूप में अंशावतार लिया।

हनुमान जी असीमित शक्तिशाली हैं और अपने भक्तों पर सहज ही प्रसन्न हो जाते हैं।
जो कोई भी भगवान श्री राम का नाम लेता है , हनुमान जी की सहज कृपा उन्हें प्राप्त हो जाती है।
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।

जो मन जितने तीव्र और पवन जितने वेगवान हैं, जो जितेंद्रिय हैं और जिन्होंने अपनी इंद्रियों को वश में किया हुआ है, जो बुद्धिमान हैं, विद्या और बुद्धि में श्रेष्ठ हैं, जो पवन देव के पुत्र हैं और वानरों में श्रेष्ठ हैं। श्रीराम जी के दूत ( श्री हनुमान जी ) की मैं शरण लेता हूं।

हनुमान चालीसा की चौपाई –

शंकर सुवन केसरी नंदन तेज प्रताप महा जग वंदन
अर्थात भगवान शंकर के पुत्र केसरी नंदन अत्यंत तेजवान और प्रताप वाले जिनका समस्त जग वंदन करता है भगवान शिव के अवतार होने के साथ–साथ हनुमान जी पवन देव के पुत्र भी माने जाते हैं और वानरों के राजा केसरी के पुत्र होने से केसरी नंदन और अंजनी पुत्र अर्थात अंजना माता के पुत्र भी हैं।

सूर्य देव के परम शिष्य बजरंगबली और शनि देव के मित्र भी :-
हनुमान जी ने विद्या अध्ययन के लिए भगवान सूर्य देव से प्रार्थना की तो भगवान सूर्य ने उनसे कहा कि मैं तो निरंतर ही गतिमान रहता हूं तो तुम मुझसे कैसे विद्या ग्रहण कर पाओगे तो हनुमान जी ने कहा कि मैं भी आपके साथ सदैव गतिमान रहकर शिक्षा ग्रहण कर लूँगा।सूर्य देव ने कहा कि शिष्य गुरु के सामने रहकर शिक्षा ग्रहण करता है। तब हनुमान जी उल्टे गतिमान होकर सूर्य देव से शिक्षा ग्रहण करने की बात की। इस पर सूर्यदेव ने उनकी विनती को स्वीकार कर लिया और उन्हें अपने शिष्य के रूप में विद्या देना प्रारंभ किया। इस प्रकार सूर्य देव ने बजरंगबली को गुरु बनकर अनेक प्रकार की शिक्षाएँ प्रदान की।

🔸अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहम् दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् |
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम् रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ||

जिनका अतुलित बल है, जो सोने के पर्वत के समान अत्यंत कांतियुक्त शरीर वाले हैं, जो दैत्य रूपी वन को ध्वंस करने वाले हैं और ज्ञानी जनों में सबसे आगे हैं। जो समस्त गुणों के निधान हैं, वानरों के स्वामी हैं, भगवान श्री रघुनाथ जी के प्रिय भक्त तथा पवन देव के पुत्र श्री हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूं।

भगवान सूर्य देव के पुत्र हैं शनि देव और इस कारण अपने गुरु के पुत्र शनिदेव से हनुमान जी की मित्रता भी है। यही वजह है कि शनिदेव हनुमान जी के भक्तों को कभी कोई क्षति नहीं पहुँचाते और हनुमान जी भी अपने प्रिय मित्र के भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं। जहां शनि देव कर्म का पाठ पढ़ाते हैं।
वहीं हनुमान जी भक्ति का मार्ग दिखाते हैं। कहा जाता है कि एक बार युद्ध में शनि देव को चोट आई जिसकी वजह से उन्हें काफी पीड़ा हो रही थी। उस पीड़ा से बचाने के लिए हनुमान जी ने उन्हें सरसों_का_तेल लगाया था। तभी से शनिदेव ने हनुमान जी को अपना मित्र विशेष रूप से माना और उनके भक्तों को कभी भी हानि ना पहुंचाने का वचन दिया था और कहा कि जो कोई भक्त शनि देव को सरसों का तेल चढ़ाएगा, शनिदेव उसपर सदैव कृपा करेंगे।

🔸 चारों जुग परताप तुम्हारा है प्रसिद्ध जगत उजियारा
इस प्रकार हनुमान जी का प्रताप चारों युगों और दसों दिशाओं में फैला हुआ है। ये बजरंगबली की महिमा थी कि उन्होंने स्वर्ण नगरी लंका को जला दिया था लेकिन उनके मित्र शनिदेव से वो सोने की लंका काली पड़ गयी थी।

विवाहित होकर भी ब्रह्मचारी हैं बजरंगबली :-

बजरंगबली को ब्रह्मचारी भी कहा जाता है क्योंकि उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का पालन किया। लेकिन हनुमानजी विवाहित भी हैं और उनकी पत्नी भी हैं। इस संदर्भ में एक विशेष कथा है जिसके अनुसार जब बजरंगबली सूर्य देव से शिक्षा ग्रहण कर रहे थे तो उन्होंने एक के बाद एक अनेक विद्याओं को शीघ्रता के साथ प्राप्त कर लिया लेकिन कुछ विद्या ऐसी थीं जो केवल विवाहित होने के उपरांत ही सीखी जा सकती थीं। इस कारण से हनुमान जी को असुविधा हुई क्योंकि वे तो ब्रह्मचारी थे, तो उनके गुरु सूर्य देव ने इसका एक उपाय निकाला। सूर्य देव की अत्यंत तेजस्वी पुत्री थीं सुवर्चला।
सूर्य देव के कहने से हनुमान जी ने केवल शिक्षा ग्रहण करने के उद्देश्य से अपने गुरु सूर्य देव की पुत्री सुवर्चला से विवाह किया।
इस विवाह का उल्लेख पराशर संहिता में भी दिया गया है, जिसके अनुसार सूर्य देव ने 9 दिव्य विद्याओं में से 5 विद्याओं का ज्ञान हनुमान जी को दे दिया था, लेकिन 4 विद्याओं के लिए हनुमान जी का विवाहित होना आवश्यक था। सुवर्चला परम तपस्वी और तेजस्वी थीं। सूर्य देव ने हनुमान जी से कहा था कि विवाह के उपरांत भी तुम सदा बाल ब्रह्मचारी ही रहोगे क्योंकि सुवर्चला तपस्या में लीन हो जाएगी और ऐसा ही हुआ। इस प्रकार हनुमान जी ने शेष विद्या भी अर्जित कर ली और फिर बाल ब्रह्मचारी भी बने रहे। भारत के तेलंगाना राज्य के खम्मम जिले में आज भी हनुमानजी की मूर्ति है जिसमें वे अपनी पत्नी सुवर्चला के साथ विराजमान हैं और यहां दर्शन करने से वैवाहिक जीवन में सुख की प्राप्ति होती है और समस्त प्रकार के कष्टों का अंत होता है।
अष्ट सिद्धि और नव निधियों के दाता हैं बजरंगबली :-
सूर्य देव से शिक्षा प्राप्त करके हनुमान जी अष्ट सिद्धि और नव निधियों के स्वामी बन चुके थे।
अणिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व।
यह कुल 8 सिद्धियां हैं।
अणिमा सिद्धि अपने शरीर को अणु जितना छोटा कर लेने की क्षमता प्रदान करती है।
लघिमा शरीर को इतना हल्का कर सकती है कि हवा से भी तेज गति से उड़ सकते हैं।
गरिमा सिद्धि प्राप्त करने के बाद शरीर का भार असीमित रूप से बढ़ाया जा सकता है और उसे कोई हिला नहीं सकता।
प्राप्ति सिद्धि से किसी भी स्थान पर अपनी इच्छा अनुसार अदृश्य रूप से जहां जाना चाहें वहां जा सकते हैं।
प्राकाम्य सिद्धि किसी के भी मन की बात को बहुत सरलता से समझा सकती है।
महिमा सिद्धि की सहायता से जब चाहें, अपने शरीर को असीमित रूप से विशाल बना सकते हैं और किसी भी सीमा तक उसका विस्तार कर सकते हैं।
ईशित्व सिद्धि ईश्वर का रूप प्रदान करती है अर्थात यह भगवान की एक उपाधि है जिससे व्यक्ति ईश्वर स्वरूप हो जाता है और दुनिया पर आधिपत्य स्थापित कर सकता है।
वशित्व सिद्धि प्राप्त करने के बाद किसी को भी अपने वश में करके उसे अपना दास बना सकते हैं अथवा पराजित कर सकते हैं।
किरीट, केयूर, नुपूर, चक्र, रथ, मणि, भार्या, गज, पद्म नव निधियाँ हैं।
कुबेर के पास भी नव निधियां थी लेकिन वे इन निधियों को किसी को देने में असमर्थ थे।
माता सीता के आशीर्वाद से हनुमान जी यह सभी किसी को भी प्रदान कर सकते हैं।
माता सीता ने भी उन्हें अष्ट सिद्धि और नव निधियां मानव मात्र के कल्याण हेतु प्रदान करने का आशीर्वाद दिया था।
🔸 अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता अस बर दीन जानकी माता
दिव्यास्त्र और ब्रह्मास्त्र से भी अजेय हैं बजरंगबली।
हनुमान जी इतने शक्तिशाली हैं कि किसी प्रकार का अस्त्र शस्त्र उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। एक बार जब हनुमान जी बालपन में अपनी लीला रचा रहे थे तो उन्होंने उगते हुए सूर्य को फल समझा और उसे खाने के लिए पवन वेग से उड़ते हुए सूर्य के समीप पहुँच गए। जब वे वहाँ पहुंचे ठीक उसी समय राहु सूर्य देव को ग्रसित करने आ रहा था, लेकिन हनुमान जी से डरकर वह भाग गया और इंद्र देव से बजरंगबली जी की शिकायत की।
तब इंद्र देव ने हनुमानजी को रोका लेकिन वे बालक थे और नटखट भी इसलिए नहीं माने तो देवराज इंद्र ने उनकी ठोढ़ी पर अपने वज्र का प्रहार किया जिससे वह अचेत होकर धरती पर गिर पड़े। चूंकि वे वायु देव के पुत्र थे इसलिए पवन देव ने समस्त संसार की प्राणवायु को रोक लिया और सभी त्राहिमाम करते हुए ब्रह्म देव के पास पहुंचे। उनकी बात सुन कर ब्रह्म देव ने हनुमान जी को पूर्णतः स्वस्थ कर दिया और सभी देवी देवताओं ने उन्हें अपने दिव्य अस्त्र और शस्त्र भेंट किये और अपनी दिव्य शक्तियां भी प्रदान कीं। इसके पश्चात् ब्रह्म देव ने उन्हें वरदान दिया कि कभी भी कोई ब्रह्मास्त्र भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। हनु का अर्थ होता है ठोढ़ी, इसलिए इसी दिन से उन्हें हनुमान कहा जाने लगा।
जब हनुमान जी लंका पहुंचे तो मेघनाद ने उन पर परम शक्ति अर्थात ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।
उस समय यदि हनुमान जी चाहते तो उस अस्त्र से प्रभाव से बच सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
ब्रह्म अस्त्र तेहि साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।

जब मेघनाद ने हनुमान जी पर परम शक्तिशाली ब्रह्मास्त्र का संधान किया तब हनुमानजी ने मन में विचार किया कि यदि मैं इस ब्रह्मास्त्र को नहीं स्वीकार करता हूं तो इसकी महिमा मिट जाएगी। इसलिए और उन्हें रावण की सभा में भी जाना था, इसलिए भी उन्होंने उस ब्रह्मास्त्र का प्रहार स्वयं पर लिया। इस प्रकार मेघनाद के ब्रह्मास्त्र को निष्फल भी कर दिया, जिसका प्रयोग वह युद्ध में कर सकता था।

चिरंजीवियों में से एक हैं बजरंगबली :-
अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।

जो कोई भी व्यक्ति उपरोक्त मंत्र का जाप करता है और इन चिरंजीवियों का स्मरण करता है उन्हें दीर्घायु प्राप्त होती है। उनके जीवन से समस्याओं का अंत हो जाता है। हनुमान जी भी इन चिरंजीवियों में से एक हैं और त्रेता युग में वे श्री राम के साथ थे तो द्वापर युग में श्री कृष्ण के साथ अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान थे। उन्होंने ही भीम का घमंड चूर चूर किया था। श्री राम ने ही उनसे इस पृथ्वी पर रहकर धर्मात्माओं की रक्षा और सहायता करने के लिए कहा था।
सुंदरकांड और बजरंगबली :-
हनुमान जी को सुंदरकांड सबसे अधिक प्रिय है क्योंकि इसमें उन्हें उनकी खोई हुई शक्ति का परिचय दिया गया है। उन्हें उनकी शक्तियां दिलाई गई हैं और इस सुंदरकांड में ही हनुमान जी ने अपने प्रभु श्री राम और माता सीता को मिलाने के लिए मुख्य कार्य किए हैं। इसका वर्णन सुनकर हनुमान जी अत्यंत ही प्रसन्न हो जाते हैं और इसीलिए यह सुंदरकांड बहुत प्रभावशाली और शक्तिशाली माना जाता है। जब भी आपका कोई कार्य ना बन रहा हो या जीवन में आप अनेक कठिन समस्याओं से दुखी हों तो बजरंगबली की प्रतिमा या तस्वीर के समक्ष सुंदरकांड का पाठ करने से बजरंगबली की कृपा आप को सहज रूप से प्राप्त हो जाती है और वे आपकी रक्षा करते हैं।

कलयुग के जाग्रत देवता हैं बजरंबली :-
हनुमान जी को कलयुग का जाग्रत देवता भी कहा जाता है और वर्तमान समय में हनुमान जी शीघ्र अति शीघ्र प्रसन्न होकर अपने भक्तों को जीवन दान देते हैं और उनकी रक्षा करते हैं। भगवान श्री राम का नाम जपने वाले की सदैव हनुमान जी रक्षा करते हैं। कलयुग के जाग्रत देवता होने के कारण हनुमान जी शीघ्र ही फल प्रदान करने वाले देवता हैं। उनकी पूजा पवित्रता के साथ और श्रद्धा के साथ करनी चाहिए क्योंकि उग्र होने के कारण वे अपवित्रता से नाराज़ भी हो सकते हैं, इसलिए पूरे मन से और सात्विकता तथा पवित्रता के साथ हनुमान जी की उपासना करनी चाहिए।
🙏 धन्यवाद

ज्योतिषाचार्य पंडित सर्वेश कान्त शुक्ला
व्हाट्सएप नंबर 9918779096

🙏 जय श्री महाकाल 🙏🪔 दिपावली की हार्दिक शुभकामनाएं 🪔
12/11/2023

🙏 जय श्री महाकाल 🙏
🪔 दिपावली की हार्दिक शुभकामनाएं 🪔

शुभम करोति कल्याणम, अरोग्यम धन संपदा, शत्रु-बुद्धि विनाशायः, दीपःज्योति नमोस्तुते ! 🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔आपको सपरिवार पंचदिवसीय प्...
10/11/2023

शुभम करोति कल्याणम,
अरोग्यम धन संपदा,
शत्रु-बुद्धि विनाशायः,
दीपःज्योति नमोस्तुते !
🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔🪔
आपको सपरिवार पंचदिवसीय प्रकाश पर्व:-
धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भाईदूज
की अनन्त हार्दिक शुभकामनाएं...
दीपोत्सव सपरिवार आपके जीवन को
सुख, समृद्धि, सुख-शांति, सौहार्द
एवं अपार खुशियों की रोशनी से जग-मग करे.।

🙏 जय श्री महाकाल 🙏      🙏जय मां 🙏सभी मित्रों को शारदीय नवरात्रि 2023 की हार्दिक शुभकामनाएं
15/10/2023

🙏 जय श्री महाकाल 🙏
🙏जय मां 🙏
सभी मित्रों को शारदीय नवरात्रि 2023 की हार्दिक शुभकामनाएं

24/09/2023

अष्टमेश लग्न में हो तो शरीर रोगी रहे।

24/09/2023

यदि सातवें घर में बृहस्पति हो तो जातक की स्त्री पति पारायण होती है।

गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं
19/09/2023

गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएं

27/08/2023

मैं फेसबुक या फेसबुक से जुड़ी किसी भी इकाई को अपने अतीत और भविष्य के चित्रों, सूचनाओं, संदेशों या प्रकाशनों का उपयोग करने की अनुमति नहीं देता।
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अतः मैं साफ-साफ शब्दों में फेसबुक और फेसबुक से जुडी समस्त इकाई को इस पोस्ट के माध्यम से ज्ञापन और सूचित कर रहा हूं।

07/06/2023

श्री राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम राम जय श्री राम

07/06/2023

चाह गयी चिंता मिटी मनुवा बेपरवाह।
जिसको कछू न चाहिये सो है शाहनशाह।।

03/06/2023

तूने जो कमाया है दूसरा ही खायेगा।
खाली हाथ आया था खाली हाथ जाएगा ।।

निर्जला एकादशी 31 मई 2023 विशेष~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~एकादशी व्रत हिन्दुओ में सबसे अधिक प्रचलित व्रत माना जाता है। वर्ष ...
31/05/2023

निर्जला एकादशी 31 मई 2023 विशेष
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एकादशी व्रत हिन्दुओ में सबसे अधिक प्रचलित व्रत माना जाता है। वर्ष में चौबीस एकादशियाँ आती हैं, किन्तु इन सब एकादशियों में ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी सबसे बढ़कर फल देने वाली समझी जाती है क्योंकि इस एक एकादशी का व्रत रखने से वर्ष भर की एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त होता है। निर्जला-एकादशी का व्रत अत्यन्त संयम साध्य है। इस युग में यह व्रत सम्पूर्ण सुख भोग और अन्त में मोक्ष दायक कहा गया है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है।

निर्जला एकादशी का महत्त्व
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ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी का व्रत किया जाता है। निर्जला यानि यह व्रत बिना जल ग्रहण किए और उपवास रखकर किया जाता है। इसलिए यह व्रत कठिन तप और साधना के समान महत्त्व रखता है। हिन्दू पंचाग अनुसार वृषभ और मिथुन संक्रांति के बीच शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी कहलाती है। इस व्रत को भीमसेन एकादशी या पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक मान्यता है कि भोजन संयम न रखने वाले पाँच पाण्डवों में एक भीमसेन ने इस व्रत का पालन कर सुफल पाए थे। इसलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी भी हुआ।

हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत का मात्र धार्मिक महत्त्व ही नहीं है, इसका मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य के नज़रिए से भी बहुत महत्त्व है। एकादशी का व्रत भगवान विष्णु की आराधना को समर्पित होता है। इस दिन जल कलश, गौ का दान बहुत पुण्य देने वाला माना गया है। यह व्रत मन को संयम सिखाता है और शरीर को नई ऊर्जा देता है। यह व्रत पुरुष और महिलाओं दोनों द्वारा किया जा सकता है। वर्ष में अधिकमास की दो एकादशियों सहित 26 एकादशी व्रत का विधान है। जहाँ साल भर की अन्य 25 एकादशी व्रत में आहार संयम का महत्त्व है। वहीं निर्जला एकादशी के दिन आहार के साथ ही जल का संयम भी जरुरी है। इस व्रत में जल ग्रहण नहीं किया जाता है यानि निर्जल रहकर व्रत का पालन किया जाता है।

ऐसी धार्मिक मान्यता है कि कोई भी व्यक्ति मात्र निर्जला एकादशी का व्रत करने से साल भर की पच्चीस एकादशी का फल पा सकता है। यहाँ तक कि अन्य एकादशी के व्रत भंग होने के दोष भी निर्जला एकादशी के व्रत से दूर हो जाते हैं। कुछ व्रती इस दिन एक भुक्त व्रत भी रखते हैं यानि सांय दान-दर्शन के बाद फलाहार और दूध का सेवन करते हैं।

निर्जला एकादशी पूजा विधि
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इस व्रत में एकादशी तिथि के सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी तिथि के सूर्योदय तक जल और भोजन का त्याग किया जाता है। इसके बाद दान, पुण्य आदि कर इस व्रत का विधान पूर्ण होता है। धार्मिक महत्त्व की दृष्टि से इस व्रत का फल लंबी उम्र, स्वास्थ्य देने के साथ-साथ सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है। एकादशी के दिन सर्वप्रथम भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा करें। पश्चात् 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करे। इस दिन व्रत करने वालों को चाहिए कि वह जल से कलश भरे व सफ़ेद वस्त्र को उस पर ढककर रखें और उस पर चीनी तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दान दें। तदोपरान्त नियमानुसार नारायण कवच का पाठ करें। पाठ के बाद भगवान नारायण की आरती करें।

विधि – उत्तर दिशा में मुख करके बैठ जाएं। तत्पश्चात 3 बार आचमन करके आसन एवं देह की शुद्धि करके ॐ ॐ नमः पादयोः। ॐ नं नमो जान्वोः। ॐ मों नमः ऊर्वो:। ॐ नां नमः उदरे। ॐ रां नमो हृदि। ॐ यं नमो उरसि। ॐ णां नमो मुखे। ॐ यं नमः शिरसि।

ॐ ॐ नमो दक्षिणतर्जन्यां, ॐ नं नमो दक्षिणमध्यमायां ,ॐ मों नमो दक्षिणानामिकायां, ॐ भं नमो दक्षिणकनिष्ठिकायाम् ॐ गं नमो वामकनिष्ठिकायाम्, ॐ वं नमो वामानामिकायाम्, ॐ तें नमो वाममध्मायाम्, ॐ वां नमो वामतर्जन्याम्, ॐ सुं नमः दक्षिणांगुष्ठोर्ध्वपर्वणि, ॐ दें नमो दक्षिणांगुष्ठाधःपर्वणि, ॐ वां नमो वामान्गुष्ठोर्ध्वपर्वणि, ॐ यं नमो वामान्गुष्ठाधः पर्वणि –

इन मंत्रो से तत्तदंगों में न्यास करके निम्नलिखित मन्त्र से दिग्बन्धन करें –

ॐ मः अस्त्राय फट् प्राच्याम् ,ॐ मः अस्त्राय फट् आग्नेय्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् दक्षिणस्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् नैर्ऋत्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् प्र्तीच्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् वायव्याम्, ॐ मः अस्त्राय फट् कौबेर्याम्,ॐ मः अस्त्राय फट् ईशान्याम्, ॐ मः अस्त्राय फट् ऊर्ध्वायाम्,ॐ मः अस्त्राय फट् अधरायाम्,

इसके बाद पूजा पाठ कथा स्तोत्र जो करना हो आरंभ करें

निर्जला एकादशी के दान
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इस एकादशी का व्रत करके यथा सामर्थ्य अन्न, जल, वस्त्र, आसन, जूता, छतरी, पंखी तथा फलादि का दान करना चाहिए। इस दिन विधिपूर्वक जल कलश का दान करने वालों को वर्ष भर की एकादशियों का फल प्राप्त होता है। इस एकादशी का व्रत करने से अन्य तेईस एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाएगा तथा सम्पूर्ण एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलेगा। इस प्रकार जो इस पवित्र एकादशी का व्रत करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर अविनाशी पद प्राप्त करता है। भक्ति भाव से कथा श्रवण करते हुए भगवान का कीर्तन करना चाहिए।

निर्जला एकादशी व्रत की कथा
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निर्जला एकादशी व्रत का पौराणिक महत्त्व और आख्यान भी कम रोचक नहीं है। जब सर्वज्ञ वेदव्यास ने पांडवों को चारों पुरुषार्थ- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देने वाले एकादशी व्रत का संकल्प कराया था।

युधिष्ठिर ने कहा- जनार्दन! ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष में जो एकादशी पड़ती हो, कृपया उसका वर्णन कीजिये।

भगवान श्रीकृष्ण ने कहा हे राजन् ! इसका वर्णन परम धर्मात्मा सत्यवती नन्दन व्यासजी करेंगे, क्योंकि ये सम्पूर्ण शास्त्रों के तत्त्वज्ञ और वेद वेदांगों के पारंगत विद्वान हैं|

तब वेदव्यासजी कहने लगे- कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों पक्षों की एकादशी में अन्न खाना वर्जित है। द्वादशी के दिन स्नान करके पवित्र हो और फूलों से भगवान केशव की पूजा करे। फिर नित्य कर्म समाप्त होने के पश्चात् पहले ब्राह्मणों को भोजन देकर अन्त में स्वयं भोजन करे।

यह सुनकर भीमसेन बोले- परम बुद्धिमान पितामह! मेरी उत्तम बात सुनिये। राजा युधिष्ठिर, माता कुन्ती, द्रौपदी, अर्जुन, नकुल और सहदेव, ये एकादशी को कभी भोजन नहीं करते तथा मुझसे भी हमेशा यही कहते हैं कि भीमसेन एकादशी को तुम भी न खाया करो परन्तु मैं उन लोगों से यही कहता हूँ कि मुझसे भूख नहीं सही जायेगी।

भीमसेन की बात सुनकर व्यासजी ने कहा- यदि तुम नरक को दूषित समझते हो और तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति अभीष्ट है और तो दोनों पक्षों की एकादशियों के दिन भोजन नहीं करना।

भीमसेन बोले महाबुद्धिमान पितामह! मैं आपके सामने सच कहता हूँ। मुझसे एक बार भोजन करके भी व्रत नहीं किया जा सकता, तो फिर उपवास करके मैं कैसे रह सकता हूँ। मेरे उदर में वृक नामक अग्नि सदा प्रज्वलित रहती है, अत: जब मैं बहुत अधिक खाता हूँ, तभी यह शांत होती है। इसलिए महामुनि ! मैं पूरे वर्षभर में केवल एक ही उपवास कर सकता हूँ। जिससे स्वर्ग की प्राप्ति सुलभ हो तथा जिसके करने से मैं कल्याण का भागी हो सकूँ, ऐसा कोई एक व्रत निश्चय करके बताइये। मैं उसका यथोचित रूप से पालन करुँगा।

व्यासजी ने कहा- भीम! ज्येष्ठ मास में सूर्य वृष राशि पर हो या मिथुन राशि पर, शुक्लपक्ष में जो एकादशी हो, उसका यत्नपूर्वक निर्जल व्रत करो। केवल कुल्ला या आचमन करने के लिए मुख में जल डाल सकते हो, उसको छोड़कर किसी प्रकार का जल विद्वान पुरुष मुख में न डाले, अन्यथा व्रत भंग हो जाता है। एकादशी को सूर्योदय से लेकर दूसरे दिन के सूर्योदय तक मनुष्य जल का त्याग करे तो यह व्रत पूर्ण होता है। तदनन्तर द्वादशी को प्रभातकाल में स्नान करके ब्राह्मणों को विधिपूर्वक जल और सुवर्ण का दान करे। इस प्रकार सब कार्य पूरा करके जितेन्द्रिय पुरुष ब्राह्मणों के साथ भोजन करे। वर्षभर में जितनी एकादशियाँ होती हैं, उन सबका फल निर्जला एकादशी के सेवन से मनुष्य प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान केशव ने मुझसे कहा था कि ‘यदि मानव सबको छोड़कर एकमात्र मेरी शरण में आ जाय और एकादशी को निराहार रहे तो वह सब पापों से छूट जाता है।’

एकादशी व्रत करने वाले पुरुष के पास विशालकाय, विकराल आकृति और काले रंगवाले दण्ड पाशधारी भयंकर यमदूत नहीं जाते। अंतकाल में पीताम्बरधारी, सौम्य स्वभाव वाले, हाथ में सुदर्शन धारण करने वाले और मन के समान वेगशाली विष्णुदूत आख़िर इस वैष्णव पुरुष को भगवान विष्णु के धाम में ले जाते हैं। अत: निर्जला एकादशी को पूर्ण यत्न करके उपवास और श्रीहरि का पूजन करो। स्त्री हो या पुरुष, यदि उसने मेरु पर्वत के बराबर भी महान पाप किया हो तो वह सब इस एकादशी व्रत के प्रभाव से भस्म हो जाता है। जो मनुष्य उस दिन जल के नियम का पालन करता है, वह पुण्य का भागी होता है। उसे एक-एक प्रहर में कोटि-कोटि स्वर्णमुद्रा दान करने का फल प्राप्त होता सुना गया है। मनुष्य निर्जला एकादशी के दिन स्नान, दान, जप, होम आदि जो कुछ भी करता है, वह सब अक्षय होता है, यह भगवान श्रीकृष्ण का कथन है। निर्जला एकादशी को विधिपूर्वक उत्तम रीति से उपवास करके मानव वैष्णवपद को प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का भोजन करता है। इस लोक में वह चाण्डाल के समान है और मरने पर दुर्गति को प्राप्त होता है।

जो ज्येष्ठ के शुक्लपक्ष में एकादशी को उपवास करके दान करेंगे, वे परम पद को प्राप्त होंगे। जिन्होंने एकादशी को उपवास किया है, वे ब्रह्महत्यारे, शराबी, चोर तथा गुरुद्रोही होने पर भी सब पातकों से मुक्त हो जाते हैं।

कुन्तीनन्दन! निर्जला एकादशी के दिन श्रद्धालु स्त्री पुरुषों के लिए जो विशेष दान और कर्त्तव्य विहित हैं, उन्हें सुनो- उस दिन जल में शयन करने वाले भगवान विष्णु का पूजन और जलमयी धेनु का दान करना चाहिए अथवा प्रत्यक्ष धेनु या घृतमयी धेनु का दान उचित है। पर्याप्त दक्षिणा और भाँति-भाँति के मिष्ठानों द्वारा यत्नपूर्वक ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करना चाहिए। ऐसा करने से ब्राह्मण अवश्य संतुष्ट होते हैं और उनके संतुष्ट होने पर श्रीहरि मोक्ष प्रदान करते हैं। जिन्होंने शम, दम, और दान में प्रवृत हो श्रीहरि की पूजा और रात्रि में जागरण करते हुए इस ‘निर्जला एकादशी’ का व्रत किया है, उन्होंने अपने साथ ही बीती हुई सौ पीढ़ियों को और आने वाली सौ पीढ़ियों को भगवान वासुदेव के परम धाम में पहुँचा दिया है। निर्जला एकादशी के दिन अन्न, वस्त्र, गौ, जल, शैय्या, सुन्दर आसन, कमण्डलु तथा छाता दान करने चाहिए। जो श्रेष्ठ तथा सुपात्र ब्राह्मण को जूता दान करता है, वह सोने के विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो इस एकादशी की महिमा को भक्तिपूर्वक सुनता अथवा उसका वर्णन करता है, वह स्वर्गलोक में जाता है। चतुर्दशीयुक्त अमावस्या को सूर्यग्रहण के समय श्राद्ध करके मनुष्य जिस फल को प्राप्त करता है, वही फल इसके श्रवण से भी प्राप्त होता है। पहले दन्तधावन करके यह नियम लेना चाहिए कि "मैं भगवान केशव की प्रसन्नता के लिए एकादशी को निराहार रहकर आचमन के सिवा दूसरे जल का भी त्याग करुँगा।" द्वादशी को देवेश्वर भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। गन्ध, धूप, पुष्प और सुन्दर वस्त्र से विधिपूर्वक पूजन करके जल के घड़े के दान का संकल्प करते हुए निम्नांकित मंत्र का उच्चारण करे।

संसारसागर से तारने वाले हे देव ह्रषीकेश! इस जल के घड़े का दान करने से आप मुझे परम गति की प्राप्ति कराइये।

भीमसेन! ज्येष्ठ मास में शुक्लपक्ष की जो शुभ एकादशी होती है, उसका निर्जल व्रत करना चाहिए। उस दिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य भगवान विष्णु के समीप पहुँचकर आनन्द का अनुभव करता है। तत्पश्चात् द्वादशी को ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करे। जो इस प्रकार पूर्ण रूप से पापनाशिनी एकादशी का व्रत करता है, वह सब पापों से मुक्त हो आनंदमय पद को प्राप्त होता है। यह सुनकर भीमसेन ने भी इस शुभ एकादशी का व्रत आरम्भ कर दिया। तबसे यह लोक में ‘पाण्डव द्वादशी’ के नाम से विख्यात हुई।

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ज्योतिषाचार्य पंडित सर्वेश कान्त शुक्ला
व्हाट्सएप नंबर 9918779096

🙏 जय श्री महाकाल 🙏गंगा दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं
30/05/2023

🙏 जय श्री महाकाल 🙏
गंगा दशहरा की हार्दिक शुभकामनाएं

30/05/2023

मनुस्मृति अनुसार:-
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गर्भाष्टमेऽब्दे कुर्वोत ब्राह्मणस्योपनायनम् ।
गर्भादेकादशे राज्ञो गर्भात्तुं द्वादशे विशः ।।

अर्थात -👉 ब्राह्मण बालक का उपनयन संस्कार गर्भ से आठवें वर्ष में , क्षत्रिय का गर्भ से ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य के शिशु का गर्भ से बारहवें वर्ष में सम्पन्न कराना चाहिये ।
🌹🙏 जय श्री महाकाल 🙏🌹

28/05/2023

बिन मांगे अमृत पिए, राहु कटाए शीश।
मान सहित जब विष पिए शंभू भये जगदीश।।

प्रयास करें कि ये सूत्र अपने जीवन में उतार सकें। इस सूत्र को अपने जीवन में गांठ बांध लो,हमेशा सर्वदा सुखी रहोगे।

23/05/2023

सोना का कारक ग्रह गुरु है और यह मुसीबत के समय काम भी आता है l आजकल गुरु राहु युति में राहु ,गुरु को ऊंचाई पर पहुंचा देगा अर्थात सोने का दाम भी आसमान पर पहुंचेगा लेकिन थोड़े ही दिनों के लिए

23/05/2023

ज्यादा राहु की शांति करने से या उपाय करने से भी नुकसान हो सकते है राहु दिमाग है जब सोचना ही बंद हो जायेगा तो जीवन में क्या करोगे राहु की स्थिति कुंडली में कैसी है कितना डिग्री है कितना दान कितना जाप करना है सोच समझ के करें वरना और नुकसान झेल जाओगे

13/05/2023

राहु के संपूर्ण महादशा काल में व्यक्ति को तीन में से किसी न किसी एक चीज से जरूर जुझना होता है।
1-गंभीर बीमारी से।
2-स्त्री पीड़ा या स्त्री विनाश से।
3-पुत्र विनाश से।

13/05/2023

दूसरे घर में मंगल हो तो जातक तर्कशास्त्र का पंडित होगा।

13/05/2023

कुंडली में सूर्य अगर मजबूत है तो जातक मर्यादित जीवन जीता है। और चंद्रमा अगर मजबूत है तो ऐसा जातक हर कला में निपुण होता है साम, दाम, दंड, भेद, सब अपनाता है।।

शनि उपाय और शनि जयंती 2023 :--🔰➖🔰➖🔰➖🔰➖🔰वैदिक ज्योतिष के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को शनि देव का जन्म हुआ था। जो कि ...
13/05/2023

शनि उपाय और शनि जयंती 2023 :--
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वैदिक ज्योतिष के अनुसार ज्येष्ठ मास की अमावस्या को शनि देव का जन्म हुआ था। जो कि इस वर्ष 19 मई 2023 को शनि जयंती है। इस दिन शनि से जुड़ा उपाय करना बड़ा ही प्रभावशाली होता है। जिन जातकों पर शनि की साढ़े साती, शनि की ढैया चल रही ,या शनि की महादशा, अंतर्दशा चल रही और शनि का बुरा प्रभाव नजर आ रहा हो तो अपनी कुंडली विश्लेषण करा कर अपनी शनि के अनुसार इस दिन विशेष उपाय, पूजन, शान्ति,दान इत्यादि करके शनिदेव की विशेष कृपा प्राप्त कर सकते है।
धन्यवाद 🙏

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ज्योतिषाचार्य पंडित सर्वेश कान्त शुक्ला
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कुण्‍डली मिलान में नाड़ी दोष का महत्त्व🕉️➖🕉️➖🕉️➖🕉️➖🕉️➖🕉️विवाह के लिए कुण्डली और गुण मिलान करते समय नाड़ी दोष को नजरअंदाज...
12/05/2023

कुण्‍डली मिलान में नाड़ी दोष का महत्त्व
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विवाह के लिए कुण्डली और गुण मिलान करते समय नाड़ी दोष को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

विवाह में वर-वधू के गुण मिलान में नाड़ी का सर्वाधिक महत्त्व को दिया गया है। 36 गुणों में से नाड़ी के लिए सर्वाधिक 8 गुण निर्धारित हैं। ज्योतिष की दृष्टि में तीन नाडियां होती हैं - आदि , मध्य और अन्त्य। इन नाडियों का संबंध मानव की शारीरिक धातुओं से है। वर-वधू कीसमान नाड़ी होने पर दोषपूर्ण माना जाता है तथा संतान पक्ष के लिए यह दोष हानिकारक हो सकता है।

शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि नाड़ी दोष केवलब्रह्मण वर्ग में ही मान्य है। समान नाड़ी होने पर पारस्परिक विकर्षण तथा असमान नाड़ी होने पर आकर्षण पैदा होता है। आयुर्वेद केसिद्धांतों में भी तीन नाड़ियाँ – वात (आदि ), पित्त (मध्य) तथा कफ (अन्त्य) होती हैं। शरीर में इन तीनों नाडियों के समन्वय के बिगड़ने से व्यक्ति रूग्ण हो सकताहै।

भारतीय ज्योतिष में नाड़ी का निर्धारण जन्म नक्षत्र से होता है। प्रत्येक नक्षत्र में चार चरण होते हैं।

नौ नक्षत्रों की एक नाड़ी होती है। जो इस प्रकार है।

आदि नाड़ी👉 अश्विनी, आर्द्रा, पुनर्वसु, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, ज्येष्ठा, मूल, शतभिषा, पूर्व भाद्रपद ।

मध्य नाड़ी👉 भरणी, मृगशिरा, पुष्य, पूर्वाफाल्गुनी, चित्रा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा और उत्तराभाद्रपद

अन्त्य नाड़ी👉कृतिका, रोहिणी, आश्लेषा, मघा, स्वाति, विशाखा, उत्तराषाढ़ा, श्रवण तथा रेवती।

नाड़ी के तीनों स्वरूपों आदि, मध्य और अन्त्य आदि नाड़ी ब्रह्मा विष्णु और महेश का प्रतिनिधित्व करती हैं। यही नाड़ी मानव शरीर की संचरना की जीवन गति को आगे बढ़ाने का भी आधार है।

सूर्य नाड़ी, चंद्र नाड़ी और ब्रह्म नाड़ी जिसे इड़ा, पिंगला, सुषुम्णा के नाम से भी जानते हैं। कालपुरुष की कुंडली की संरचना बारह राशियों, सत्ताईस नक्षत्रों तथा योगो करणों आदि के द्वारा निर्मित इस शरीर में नाड़ी का स्थान सहस्रार चक्र के मार्ग पर होता है। यह विज्ञान के लिए अब भी पहेली बना हुआ है कि नाड़ी दोष वालों का ब्लड प्राय: ग्रुप एक ही होता है। और ब्लड ग्रुप एक होने से रोगों के निदान चिकित्सा उपचार आदि में समस्या आती हैं।

इड़ा, पिंगला, और सुसुम्णा हमारे मन मस्तिष्क और सोच का प्रतिनिधित्व करती है। यही सोच और वंशवृद्धि का द्योतक नाड़ी हमारे दांपत्य जीवन का आधार स्तंभ है। अत: नाड़ी दोष को आप गंभीरता से देखें। यदि एक नक्षत्र के एक ही चरण में वर कन्या का जन्म हुआ हो तो नाड़ी दोष का परिहार संभव नहीं है। और यदि परिहार है भी तो जन मानस के लिए असंभव है। ऐसा देवर्षि नारदने भी कहा है।

एक नाड़ी विवाहश्च गुणे: सर्वें: समन्वित:
वर्जनीभ: प्रयत्नेन दंपत्योर्निधनं।

अर्थात वर -कन्या की नाड़ी एक ही हो तो उस विवाह वर्जनीय है। भले ही उसमें सारे गुण हों, क्योंकि ऐसा करने से पति -पत्नी के स्वास्थ्य और जीवन के लिए संकट की आशंका उत्पन्न हो जाती है।

पुत्री का विवाह करना हो या पुत्र का, विवाह की सोचते ही कुण्‍डली मिलान की सोचते हैं जिससे सब कुछ ठीक रहे और विवाहोपरान्‍त सुखमय गृहस्‍थ जीवन व्‍यतीत हो. कुंडली मिलान के समय आठ कूट मिलाए जाते हैं, इन आठ कूटों के कुल अंक 36 होते हैं. इन में से एक कूट नाड़ी होता है जिसके सर्वाधिक अंक 8 होते हैं. लगभग 23 प्रतिशत इसी कूट के हिस्‍से में आते हैं, इसीलिए नाड़ी दोष प्रमुख है।

ऐसी लोक चर्चा है कि वर कन्या की नाड़ी एक हो तो पारि‍वारिक जीवन में अनेक बाधाएं आती हैं और संबंधों के टूटने की आशंका या भय मन में व्‍याप्‍त रहता है. कहते हैं कि यह दोष हो तो संतान प्राप्ति में विलंब या कष्‍ट होता है, पति-पत्नी में परस्‍पर ईर्ष्या रहती है और दोनों में परस्‍पर वैचारिक मतभेद रहता है. नब्‍बे प्रतिशत लोगों का एकनाड़ी होने पर ब्लड ग्रुप समान और आर एच फैक्‍टर अलग होता है यानि एक का पॉजिटिव तो दूसरे का ऋण होता है. हो सकता है इसलिए भी संतान प्राप्ति में विलंब या कष्‍ट होता है।

चिकित्सा विज्ञान की आधुनिक शोधों में भी समान ब्लड ग्रुप वाले युवक युवतियों के संबंध को स्वास्थ्य की दृष्टि से अनपयुक्त पाया गया है। चिकित्सकों का मानना है कि यदि लड़के का आरएच फैक्टर पॉजिटिव हो व लड़की का आरएच फैक्टर निगेटिव हो तो विवाह उपरांत पैदा होने वाले बच्चों में अनेक विकृतियाँ सामने आती हैं, जिसके चलते वे मंदबुद्धि व अपंग तक पैदा हो सकते हैं। वहीं रिवर्स केस में इस प्रकार की समस्याएँ नहीं आतीं, इसलिए युवा अपना रक्तपरीक्षण अवश्य कराएँ, ताकि पता लग सके कि वर-कन्या का रक्त समूह क्या है। चिकित्सा विज्ञान अपनी तरहसे इस दोष का परिहार करता है, लेकिन ज्योतिष ने इस समस्या से बचने और उत्पन्न होने पर नाड़ी दोष के उपाय निश्चित किए हैं। इन उपायों में जप-तप, दान पुण्य व्रत अनुष्ठान आदि साधनात्मक उपचारों को अपनाने पर जोर दिया गया है।

शास्त्र वचन यह है कि-एक ही नाड़ी होने पर गुरु और शिष्य मंत्र और साधक, देवता और पूजक में भी क्रमश: ईर्ष्या अरिष्ट और मृत्यु जैसे कष्टों का भय रहता है।

देवर्षि नारद ने भी कहा है-वर कन्या की नाड़ी एक ही हो तो वह विवाह वर्जनीय है. भले हीउसमें सारे गुण हों, क्योंकि ऐसा करने से तो पति-पत्नी के स्वास्थ्य और जीवनके लिए संकट की आशंका उत्पन्न हो जाती है।

वेदोक्त श्लोक
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अश्विनी रौद्र आदित्यो, अयर्मे हस्त ज्येष्ठयो।
निरिति वारूणी पूर्वा आदि नाड़ी स्मृताः॥

भरणी सौम्य तिख्येभ्यो, भग चित्रा अनुराधयो।
आपो च वासवो धान्य मध्य नाड़ी स्मृताः॥

कृतिका रोहणी अश्लेषा, मघा स्वाती विशाखयो।
विश्वे श्रवण रेवत्यो, अंत्य नाड़ी स्मृताः॥

आदि नाड़ी के अंतर्गत 1, 6, 7, 12, 13,18,19,24,25 वें नक्षत्र आते हैं।

मध्य नाड़ी के अंतर्गत 2, 5, 8, 11, 14, 17, 20, 23, 26 नक्षत्र आते हैं।

अन्त्य नाड़ी के अंतर्गत 3, 4, 9, 10, 15, 16, 21, 22, 27 वें नक्षत्र आते हैं।

गण
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अश्विनी मृग रेवत्यो, हस्त: पुष्य पुनर्वसुः।
अनुराधा श्रुति स्वाती, कथ्यते देवतागण॥

त्रिसः पूर्वाश्चोत्तराश्च, तिसोऽप्या च रोहणी।
भरणी च मनुष्याख्यो, गणश्च कथितो बुधे॥

कृतिका च मघाऽश्लेषा, विशाखा शततारका।
चित्रा ज्येष्ठा धनिष्ठा, च मूलं रक्षोगणः स्मृतः॥

देव गण- नक्षत्र 1, 5, 27, 13, 8, 7, 17, 22, 15,।

मनुष्य गण- नक्षत्र 11, 12, 20, 21, 25, 26, 6, 4।

राक्षस गण- नक्षत्र 3, 10, 9, 16, 24, 14, 18, 23, 19।

स्वगणे परमाप्रीतिर्मध्यमा देवमर्त्ययोः।
मर्त्यराक्षसयोर्मृत्युः कलहो देव रक्षसोः॥

संगोत्रीय विवाह को कराने के लिए कर्म कांडों में एक विधान है, जिसके चलते संगोत्रीय लड़के का दत्तक दान करके विवाह संभव हो सकता है।

इस विधान में जो माँ-बाप लड़के को गोद लेते हैं। विवाह में उन्हीं का नाम आता है। वहीं ज्योतिष के वैज्ञानिक पक्ष के अनुरूप यदि एक ही रक्त समूह वाले वर-कन्या का विवाह करा दिया जाता है तो उनकी होने वाली संतान विकलांग पैदा हो सकती है।

अत: नाड़ी दोष का विचार ही आवश्यक है. एक नक्षत्र में जन्मे वर कन्या के मध्य नाड़ी दोष समाप्त हो जाता है लेकिन नक्षत्रों में चरण भेद आवश्यक है.

ऐसे अनेक सूत्र हैं जिनसे नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है। जैसे दोनों की राशि एक हो लेकिन नक्षत्र अलग-अलग हों. वर कन्या का नक्षत्र एक हो और चरण अलग-अलग हों. उदाहरण वर-ईश्वर (कृतिका द्वितीय), वधू उमा (कृतिका तृतीया) दोनों की अंत्य नाड़ी है। परंतु कृतिका नक्षत्र के चरण भिन्नता के कारण शुभ है।

एक ही नक्षत्र हो परंतु चरण भिन्न हों – यह निम्न नक्षत्रों में होगा।

आदि नाड़ी👉 वर- आर्द्रा, (मिथुन), वधू- पुनर्वसु, प्रथम, तृतीय चरण (मिथुन), वर उत्तरा फाल्गुनी (कन्या)- वधू- हस्त (कन्या राशि)

मध्य नाड़ी👉 वर- शतभिषा (कुंभ)- वधू- पूर्वाभाद्रपद प्रथम, द्वितीय, तृतीय (कुंभ)

अन्त्य नाड़ी👉 वर- कृतिका- प्रथम, तृतीय, चतुर्थ (वृष)- वधू- रोहिणी (वृष)

वर- स्वाति (तुला)- वधू-विशाखा- प्रथम, द्वितीय, तृतीय (तुला)
वर- उत्तराषाढ़ा- द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ (मकर)- वधू- श्रवण (मकर) —-

एक नक्षत्र हो परंतु राशि भिन्न हो
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जैसे वर अनिल- कृतिका- प्रथम (मेष) तथा वधू इमरती- कृतिका- द्वितीय (वृष राशि)। दोनों की अन्त्य नाड़ी है परंतु राशि भिन्नता के कारण शुभ

पादवेध नहीं होना चाहिए. वर-कन्‍या के नक्षत्र चरण प्रथम और चतुर्थ या द्वितीय और तृतीय नहीं होने चाहिएं.

उक्त परिहारों में यह ध्यान रखें कि वधू की जन्म राशि, नक्षत्र तथा नक्षत्र चरण, वर कीराशि, नक्षत्र व चरण से पहले नहींहोने चाहिए। अन्यथा नाड़ी दोष परिहार होते हुए भी शुभ नहीं होगा। उदाहरण देखें-

वर- कृतिका- प्रथम (मेष), वधू- कृतिका द्वितीय (वृष राशि)-

शुभ वर- कृतिका- द्वितीय (वृष), वधू-कृतिका- प्रथम

(मेष राशि)- अशुभ

वैसे तो वर कन्या के राशियों के स्वामी आपस में मित्र हो तो वर्ण दोष, वर्ग दोष, तारा दोष, योनि दोष, गण दोष भी नष्ट हो जाता है.

वर और कन्या की कुंडली में राशियों के स्वामी एक ही हो या मित्र हो अथवानवांश के स्वामी परस्पर मित्र हो या एक ही ही हो तो सभी कूट दोष समाप्त हो जातेहैं.

नाड़ी दोष हो तो महामृत्युञ्जय मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए. इससे दांपत्य जीवन में आ रहे सारे दोष समाप्त हो जाते हैं.

नाड़ी दोष का उपचार:
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पीयूष धारा के अनुसार स्वर्ण दान, गऊ दान, वस्त्र दान, अन्न दान, स्वर्ण की सर्पाकृति बनाकर प्राण प्रतिष्ठा तथा महामृत्युञ्जय जप करवाने से नाड़ी दोष शान्त हो जाता है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर वर और कन्या की राशि समान हो तो उनके बीच परस्पर मधुर सम्बन्ध रहता है.दोनों की राशियां एक दूसरे से चतुर्थ और दशम होने पर वर वधू का जीवन सुखमय होता है. तृतीय और एकादश राशि होने पर गृहस्थी में धन की कमी नहीं रहती है.ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि वर और कन्या की कुण्डली में षष्टम भाव,अष्टम भाव और द्वादश भाव में समान राशि नहीं हो.।
वर और कन्याकी राशि अथवा लग्न समान होने पर गृहस्थी सुखमय रहती है परंतु गौर करने की बात यह है कि राशि अगर समान हो तो नक्षत्र भेद होना चाहिए अगर नक्षत्र भी समान हो तो चरण भेद आवश्यक है.अगर ऐसा नही है तो राशि लग्न समान होने पर भी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आती है।

कुण्डली में दोष विचार
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विवाहके लिए कुण्डली मिलान करते समय दोषों का भी विचार करना चाहिए. कन्या की कुण्डली में वैधव्य योग , व्यभिचार योग, नि:संतान योग, मृत्यु योग एवं दारिद्र योग हो तो ज्योतिष की दृष्टि से सुखी वैवाहिक जीवन के यह शुभ नहीं होता है.इसी प्रकार वर की कुण्डली में अल्पायु योग, नपुंसक योग,व्यभिचार योग, पागलपन योग एवं पत्नी नाश योग रहने पर गृहस्थ जीवन में सुख का अभाव होता है.

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार कन्या की कुण्डली में विष कन्या योग होने पर जीवन में सुख का अभाव रहता है.पति पत्नी के सम्बन्धों में मधुरता नहीं रहती है.

हालाँकि कई स्थितियों में कुण्डली में यह दोष प्रभावशाली नहीं होता है अत: जन्म कुण्डली के अलावा नवमांश और चन्द्र कुण्डली से भी इसका विचार करके विवाह किया जा सकता है।

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ज्योतिषाचार्य पंडित सर्वेश कान्त शुक्ला
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