30/08/2026
आज का दिन रक्षाबंधन के भावनात्मक उदासीनता में बीता। रक्षाबंधन के पुराने फिल्मी गीतों को सुनते हुए.. भाईयों की याद में...
सिर्फ डाक से राखी भेज देने से या राखी बंधवाने पर भाईयों का कुछ सेकेंड का फोन मात्र आ जाने से भाई के लिए मन तृप्त नहीं हो पाता...
"रहीं सिसकती आज बेटियां
जिनका हो मायका नहीं
क्या करना रिश्तों का जिनमें
भावों का ज़ायका नहीं"..
शायद मेरे कुछ ज़्यादा ही भावुक मन का यह उद्गार भी हो सकता है....
"हम बहनों के लिए मेरे भैया, आता है इक दिन.."
"चंदा रे मेरे भैया से कहना बहना याद करे.."
और फिर एक गाना--
"नहीं मैं नहीं देख सकता तुझे रोते हुए...."
ये गीत सुनते हुए मैंने सोचा कि ये भावनात्मक गाने सिर्फ फिल्मों के लिए ही बने हैं। हक़ीक़त में तो सच ऐसा कुछ भी नहीं। फिल्मी गीतों में तो भाईयों में माता-पिता भी देखे गए हैं परन्तु जब माता-पिता ही बेटियों के प्रति बेदर्द रहे हों तो भाई लोग यही सीखते हुए बड़े होते हैं, उनका क्या कसूर?
कुछ सच्चे वाक़यात तो मेरी जानकारी में ऐसे भी हैं कि कभी समृद्ध रही बहन बेटियाँ आवश्यकता पड़ने पर अपनी छोटी बहन या भाई को तन मन धन से मदद करती रही होती है पर अगर वही बहन आर्थिक तंगी में रहती हुई कभी जानलेवा बीमारियों से ग्रसित हो जाती है तो सबसे अपने समझे जानेवाले यही रक्त संबंध बिल्कुल अनजान, पराये होकर कहीं मौन हो जाते हैं कि कहीं आर्थिक या शारीरिक मदद के पचड़े में न पड़ना पड़ जाय। मरती है तो मरे हमें क्या?
एक गीत में यह पंक्ति भी है ----
"ऐसा न हो मैं तड़पूं ऐसे, बुलबुल जैसे जाल में
चले आना वहां हर हाल में..."
पर हाय रे..कितनी बुलबुलें, ससुराल में हिंसा झेलती हुई मर जाती हैं, जला दी जाती हैं। ऐसा नहीं है कि पहले वह जी भरकर अपनों को नहीं पुकारतीं, मार दी जाएंगी...नहीं बतातीं। पर उसके मृत्यु के बाद ही कुछ देर का छाती पीटना रोना होता है बस....
और ये इमोशनल दिखावा भी कि हमें क्या पता था कि मार ही देंगे हमारी बेटी को।
आज तो निजी जिंदगी में जीवन भर रोती बिलखती बहनों की तकलीफ़ से भाईयों के मन में सिहरन भी नहीं होती क्योंकि उन्हें अपने परिवार के साथ की हंसी खुशी में मस्त रहना होता है। भाई ही क्या, जन्म देने वाले माता-पिता भी बेटी से किसी तरह छुटकारा पाकर संवेदनहीन ही रहते हैं।उनका सारा केंद्र बेटों को सुखी समृद्ध करने में ही रहता है।
जबकि लड़कियाँ इन सब उपेक्षाओं को मन ही मन सहते हुए भी मरते दम तक अपने बहन भाईयों के लिए ईमानदारी से प्यार व तड़प महसूस करती हैं बिना किसी अपेक्षा के। कुछ हद तक यह भी कहा जा सकता है कि अपनी भावनाओं में दयनीय बहनें सिर्फ कभी कभार बातचीत का भी नाता बने रहने की वज़ह से चमचागिरी करती रहतीं हैं भाई भाभियों की। बस इसलिए भी कि जिस घर-आंगन में वह जन्मीं हैं वहाँ कभी कभार जाने का रास्ता बना रहे। पर सच तो यह है कि न कभी कोई बुलाना चाहता है न व्यक्तिगत काम के बगैर कोई आना चाहता है। वहीं बेटियां मायके से किसी के आने पर बिछ बिछ जाती हैं कि.. क्या खिला दें, कितना सत्कार करें, क्या क्या दे दें।
अगर मायके के किसी अवसर पर अनगिनत बरसों बाद कभी पारंपरिकता के तौर पर बहनों को बुलाया जाता है तो इसी चमचागिरी में बेवकूफ़ बहनें पुलकित हो अपनी निजी हैसियत से बहुत ज़्यादा लेन-देन भी करती हैं। चाहे चुपचाप अपना कोई गहना बेचकर ही सही। भले वहाँ उन्हें ढंग का न खाना-पीना मिले न रहने सहने की व्यवस्था। अपने ही लोगों में खुसर-पुसर अलग। बदले में एक दो साड़ियों की भीख लेकर लौटती हैं जो जरुरी नहीं होता।
बेटियाँ गरीब हों या समृद्ध मायके प्रेम को सदा लालायित रहती ही हैं।
आज तो प्लास्टिक चेहरे... आर्टिफिशियल रिश्ते।
आज #रक्षाबंधन सिर्फ सोशल मीडिया पर हो हल्ला, दिखावे का पर्व रह गया है। बस और कुछ नहीं। बचपन में तो माँ का दिया एक रुपए का सिक्का भाई देता था ,भले बाद में लड़कर छीन ले।
क्या वो दिन थे। कभी ख्याल भी नहीं आता था कि कभी राखी बांधने को तरसते रह जाएंगे।
भाई बड़ा होता गया, अमीर होता गया, भाभियां आ गईं।
भाईयों का दिल बहुत ही सिकुड़ कर गरीब होता गया अपनी बहनों के प्रति। यह दिल के गरीब रहने की सीख भी माँ के ही द्वारा दी गई होती है।
खैर.. फिर भी बहनें दिल से यही दुआएँ देती हैं गाती हैं...
मेरे भैया मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन
तेरे बदले में ज़माने की कोई चीज़ नहीं
जुग-जुग जियो, सुखी रहो, खुशहाल रहो भाई 🌹 🥰
सभी बहनों, बेटियों की तरफ से...
लोकगायिका #विजया_भारती
28 अगस्त 2026