07/06/2026
बनारस का इश्क
कहते हैं,
बनारस में मौत भी आए तो इंसान तर जाता है,
पर अगर इश्क हो जाए यहाँ,
तो जीते-जी मोक्ष मिल जाता है।
मैं ठेठ बनारसी था,
जेब में कुछ सिक्के, होठों पर "महादेव",
और अस्सी घाट की सीढ़ियों पर बैठकर
दुनिया भर की बातें करने का शौक।
मुझे लगता था—
गंगा की लहरों से सुंदर कुछ नहीं,
इन गलियों से गहरा कोई रास्ता नहीं,
इन घाटों से पवित्र कोई ठिकाना नहीं।
फिर तुम आई...
दिल्ली की धूप साथ लेकर,
आँखों में अनगिनत सवाल लिए,
दशाश्वमेध की सीढ़ियों पर खड़ी,
गंगा में उतरते दीयों को कैद करने की कोशिश करती हुई।
भीड़ का एक धक्का,
फिसलता हुआ एक कदम,
और मैंने थाम लिया तुम्हारा हाथ।
तुम मुस्कुराईं...
और उस दिन लगा,
जैसे संकटमोचन की सारी घंटियाँ
एक साथ बज उठी हों।
फिर शुरू हुआ सफर—
गोदौलिया की गलियों से लेकर
अस्सी की सुबहों तक।
मैंने तुम्हें बनारस दिखाया,
हींग वाली कचौड़ी का तीखापन,
ब्लू लस्सी की मिठास,
पप्पू की चाय का स्वाद,
और उन गलियों का जादू
जहाँ रास्ते नहीं, कहानियाँ मिलती हैं।
तुम हर दृश्य को कैनवास पर उतारती रहीं,
और मैं तुम्हें अपनी आँखों में।
सुबह की लालिमा में
जब तुम चुपचाप कुछ लिखती थीं,
मैं सोचता था—
शायद मेरा नाम भी कहीं दर्ज कर रही हो।
बीएचयू के पेड़ों तले
जब तुमने पूछा था—
"तुम इतने शांत कैसे रहते हो?"
मैंने हँसकर कहा था—
"यह बनारस है गुरु,
यहाँ वक्त भागता नहीं,
घाट की सीढ़ियों पर बैठकर सुस्ताता है।"
तुमने मेरा हाथ थामा था,
और उसी क्षण
दो अजनबी आत्माएँ
एक ही धड़कन में बदल गई थीं।
फिर एक शाम...
मणिकर्णिका के सामने
नाव गंगा पर तैर रही थी।
चिताओं की लपटें
आकाश को छू रही थीं।
तुमने सिर मेरे कंधे पर रखकर कहा—
"यहाँ जिंदगी और मौत का फासला
कितना छोटा लगता है..."
मैंने मुस्कुराकर कहा—
"यही तो बनारस है,
जहाँ अंत भी आरंभ बन जाता है।"
लेकिन शायद
हमारी कहानी का अंत
वहीं कहीं लिखा जा चुका था।
रामनगर किले के सामने
डूबते सूरज की लालिमा में,
तुम रो रही थीं...
कह रही थीं—
"मैं तुम्हें भूल नहीं पाऊँगी,
पर लौट नहीं सकूँगी।"
और मैं...
अपने भीतर टूटते हुए भी
मुस्कुरा रहा था।
क्योंकि बनारस ने सिखाया था—
प्रेम को बाँधना नहीं,
प्रेम को मुक्त करना होता है।
मैंने कहा—
"जाओ...
बनारस से कोई दूर नहीं जाता।
तुम जहाँ रहोगी,
यह शहर तुम्हारी साँसों में रहेगा।"
और तुम चली गईं...
साल बीत गए।
शायद अब तुम्हारी दुनिया पूरी हो चुकी है,
शायद तुम्हारे आँगन में
नई खुशियाँ उतर आई हों।
लेकिन मैं आज भी
अस्सी घाट की उसी सीढ़ी पर बैठता हूँ।
हाथ में दो कुल्हड़ चाय लिए—
एक अपने लिए,
और एक तुम्हारे नाम का।
फिर वह दूसरा कुल्हड़
धीरे से गंगा को समर्पित कर देता हूँ।
लोग पूछते हैं—
"कब तक इंतज़ार करोगे?"
मैं मुस्कुरा देता हूँ।
पान की हल्की लालिमा होठों पर सजाकर,
बाबा विश्वनाथ की ओर देखकर कहता हूँ—
"अरे गुरु...
ई बनारस का इश्क है।
यहाँ मिलन से ज्यादा
यादें ज़िंदा रहती हैं।
यहाँ प्रेम पाने से नहीं,
निभाने से अमर होता है।
वह मेरे पास नहीं है,
पर गंगा की हर लहर में है,
कचौड़ी की हर महक में है,
लस्सी की हर मिठास में है,
और मेरी हर 'हर-हर महादेव' में
आज भी सिर्फ वही बसी है।"
क्योंकि बनारस में
कुछ प्रेम कहानियाँ पूरी नहीं होतीं,
वे गंगा की तरह
बस बहती रहती हैं... अनंत, अविरल, अमर। ❤️🌻
हर हर महादेव। 🙏🕉️
❤️🕉️