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Success Story of Immanuel John: तमिलनाडु के रहने वाले इमैनुएल जॉन ने एक समय नौकरी के ऑफर को ठुकराकर इंटर्नशिप को चुना था...
01/06/2026

Success Story of Immanuel John: तमिलनाडु के रहने वाले इमैनुएल जॉन ने एक समय नौकरी के ऑफर को ठुकराकर इंटर्नशिप को चुना था। तब लोगों ने उन्‍हें बेवकूफ तक कहा था। लेकिन, इसी फैसले ने उनकी बाद में मदद की। वह आज अपनी सफल कंपनी खड़ी कर चुके हैं। यहां जानते हैं कैसे?

इमैनुएल जॉन तमिलनाडु के रहने वाले हैं। उनकी जिंदगी में लगातार ट्विस्‍ट और टर्न आते रहे हैं। बेंगलुरु में कभी 10,000 रुपये की इंटर्नशिप और मैगी खाकर गुजारा करने वाले इमैनुएल आज सफल स्‍टार्टअप कंपनी के मालिक हैं। इसका नाम 'टेकस टेक्नोलॉजीज' है। आइए, यहां इमैनुएल जॉन की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।

साल 2018 की बात है। कॉलेज से पास आउट होने के बाद इमैनुएल जॉन ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने सबको हैरान किया। उनके पास एक सर्विस बेस्ड कंपनी से 25,000 रुपये महीने का अच्छा ऑफर था। लेकिन, उन्होंने उसे ठुकरा दिया।

10,000 रुपये की चुनी इंटर्नशिप
इसके बजाय इमैनुएल ने बेंगलुरु के एक स्टार्टअप में सिर्फ 10,000 रुपये महीने की इंटर्नशिप चुनी। लोगों ने उनके इस फैसले को बेवकूफी भरा बताया। लेकिन, इमैनुएल का तर्क साफ था। उन्हें छह महीने ट्रेनिंग में बर्बाद करने के बजाय पहले ही दिन से असली कोडिंग सीखनी थी।

करियर की शुरुआत में ही आर्थिक सुरक्षा को छोड़ देना अक्सर लोगों को हैरान कर देता है। लेकिन, इमैनुएल के लिए छोटी-मोटी सहूलियतों के बजाय दूर की सोच ज्‍यादा मायने रखती थी। उस फैसले ने आगे आने वाली हर चीज की नींव रख दी।

मैगी खाकर गुजारे दिन, शेयर किया फ्लैट
उनके शुरुआती दिन संघर्षों से भरे थे। 10,000 रुपये की मामूली सैलरी में बेंगलुरु जैसे शहर में गुजारा करना आसान नहीं था। उन्होंने तीन दूसरे दोस्तों के साथ 2BHK फ्लैट शेयर किया।

पैसों की तंगी के कारण वह अक्सर मैगी खाकर दिन काटते थे। उनकी कड़ी मेहनत रंग लाई। 2019 में उसी कंपनी ने उन्हें 25,000 रुपये महीने पर फुल-टाइम जॉब दे दी। फिर उनकी सैलरी में लगातार इजाफा हुआ। साल 2020 में यह बढ़कर 35,000 रुपये हो गई। 2021 में 45,000 महीना।

करियर में आया बड़ा टर्निंग पॉइंट
इमैनुएल के करियर में बड़ा टर्निंग पॉइंट साल 2021 के बाद के हिस्‍से में आया। तब उन्होंने एक नई नौकरी जॉइन की जहां उनकी सैलरी 80,000 रुपये हो गई। लेकिन, वह यहीं नहीं रुके। नौकरी के साथ उन्होंने रात के समय 4-5 महीने तक ब्लॉकचेन जैसी एडवांस टेक्नोलॉजी सीखने में बिताए।

इस नई स्किल के बूते साल 2022 तक उनकी मासिक कमाई सीधे 3,50,000 रुपये महीने पहुंच गई। उन्होंने करीब डेढ़ साल तक वर्क फ्रॉम होम किया। इसी दौरान साइड प्रोजेक्ट के रूप में अपनी कंपनी की नींव रखनी शुरू की।

नौकरी छोड़ने का लिया फैसला
साल 2024 में इमैनुएल ने कर्मचारी से फाउंडर बनने का बड़ा कदम उठाया। उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। तमिलनाडु में अपने स्टार्टअप 'टेकस टेक्नोलॉजीज' (Teckas Technologies) पर पूरा फोकस किया।

आज उनकी कंपनी में 9 लोग काम कर रहे हैं। भारत के साथ यूरोप और अमेरिका में भी उनके क्लाइंट्स हैं। कंपनी पिछले 6 महीनों से लगातार रेवेन्यू ग्रोथ दर्ज कर रही है।

इस सोच ने की मदद
कई लोगों के लिए ज्‍यादा सैलरी वाली नौकरी ही जिंदगी का सबसे बड़ा टारगेट होती है। लेकिन, इमैनुएल के लिए यह मंजिल तक पहुंचने का सिर्फ एक जरिया (सीढ़ी) थी।

अनुभव, आत्मविश्वास और इंडस्ट्री की बेहतर समझ के साथ उन्होंने अपना खुद का सफल बिजनेस खड़ा किया। उनका जोर हमेशा से ही ट्रेंड्स के पीछे भागने के बजाय असल समस्याओं को हल करने पर रहा है।

विश्वसनीयता बनाना, ग्रोथ को संभालना और तेजी से बदलते उद्योग में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना- इन सभी के लिए लगातार प्रयास की जरूरत होती है। लेकिन, वही दृढ़ता, जिसने उन्हें शुरुआती दिनों में मुश्किलों से पार पाने में मदद की थी, आज भी कंपनी को आगे बढ़ा रही है। 🫶❤️‍🩹

Small Business success story :सफलता के लिए बड़े पूंजी या संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती; मजबूत इरादे और मेहनत ही असली कु...
01/06/2026

Small Business success story :सफलता के लिए बड़े पूंजी या संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती; मजबूत इरादे और मेहनत ही असली कुंजी है. गोरखपुर की संगीता पांडेय ने इस सिद्धांत को सच्चाई में बदल दिया है. महज 1500 रुपये से शुरू किया गया उनका छोटा सा बिजनेस आज 3 करोड़ रुपये की कंपनी बन चुका है. इस सफर में उन्होंने न केवल अपने परिवार का भविष्य संवार लिया, बल्कि समाज की कई महिलाओं को भी रोजगार का साधन उपलब्ध कराया है.

संगीता का जीवन संघर्षों से भरा रहा है. करीब एक दशक पहले, जब उनके परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी, उन्होंने सोचा कि कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे अतिरिक्त आय हो सके. गोरखपुर विश्वविद्यालय से ग्रेजुएट होने के बाद उन्होंने नौकरी की कोशिश की, लेकिन अपने छोटे बच्चे की देखभाल के साथ नौकरी करना संभव नहीं हो पाया. अंततः उन्होंने अपने बच्चे को प्राथमिकता दी और नौकरी छोड़ दी.

संगीता ने मिठाई के डिब्बे बनाने का काम शुरू किया. घर में पड़ी एक पुरानी साइकिल के माध्यम से वह बाजार गईं और 1500 रुपये का कच्चा माल खरीदकर लाईं. पहले दिन उन्होंने 100 डिब्बे तैयार किए और खुशी से उन्हें बाजार में बेचने गईं. हालांकि शुरुआती मुश्किलों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. कुछ समय बाद, उन्होंने लखनऊ से सस्ता कच्चा माल खरीदना शुरू किया और धीरे-धीरे मार्केटिंग के गुर सीखे.

संगीता ने अपने गहने गिरवी रखकर 3 लाख रुपये का लोन लिया और अपने बिजनेस को बढ़ाने की शुरुआत की. लखनऊ और दिल्ली से कच्चा माल लाकर उन्होंने अपने उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार किया.

धीरे-धीरे उनका कारोबार बढ़ने लगा, और उन्होंने 35 लाख रुपये का लोन लेकर एक फैक्ट्री खोली. आज उनके पास खुद के वाहन हैं, जिनसे वह सप्लाई करती हैं, साथ ही परिवार के लिए स्कूटी और कार भी खरीद ली हैं.

संगीता अपने साथ कई महिलाओं को भी रोजगार देती हैं. इस दिवाली, वे गोबर के ऑर्गेनिक दिए बना रही हैं, जिनकी डिमांड बाजार में काफी है. संगीता की कंपनी में 100 से अधिक महिलाएं प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार कर रही हैं. कई महिलाएं अपने घरों से ही डब्बे बनाने का काम कर रही हैं ताकि वे अपने बच्चों की देखभाल करते हुए कमाई भी कर सकें. इसके अलावा, दिव्यांग और मूक-बधिर व्यक्तियों को भी रोजगार का अवसर मिला है. 🫶❤️‍🩹

Success Story: बीकॉम करने के बाद सागर गुप्ता ने मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस में अपना हाथ आजमाया और फिर पिता के साथ मिलकर इतनी...
01/06/2026

Success Story: बीकॉम करने के बाद सागर गुप्ता ने मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस में अपना हाथ आजमाया और फिर पिता के साथ मिलकर इतनी बड़ी कंपनी खड़ी कर दी कि इसका टर्नओवर करीब 600 करोड़ रुपये है.

कॉलेज से पढ़ाई के बाद हर युवा नौकरी की तलाश में रहता है लेकिन कुछ यंगस्टर्स ऐसे भी होते हैं जो नौकरी नहीं करते बल्कि जॉब के लिए एक कंपनी खड़ी कर देते हैं. देश में ऐसे कई युवा उद्यमी हैं जिन्होंने कम समय में अपने बिजनेस और कमाई से लोगों को हैरान कर दिया. इस लिस्ट में नोएडा के सागर गुप्ता का नाम भी आता है. इस यंग एन्टरप्रिन्योर ने पिता के साथ मिलकर महज 4 वर्षों में 600 करोड़ का बिजनेस साम्राज्य खड़ा कर लिया.

जिस उम्र में सागर गुप्ता ने यह उपलब्धि हासिल की वह बहुत कम लोगों को नसीब होती है. 22 साल की उम्र में दिल्ली यूनिवर्सिटी के बेहद प्रतिष्ठित श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स से बी.कॉम पूरा करने के 1 साल बाद सागर ने अपने पिता के साथ बिजनेस शुरू किया. शुरुआत में वह सीए बनना चाहता था लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. फिर 2017 में उनके करियर बड़ा टर्निंग प्वाइंट आया.

मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस ने पहुंचाया बुलंदी पर
पढ़ाई के बाद सागर गुप्ता मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस में उतरना चाहते थे. जब उनके पिता ने 3 दशकों से सेमीकंडक्टर ट्रेडिंग के बाद एलईडी टेलीविजन निर्माण की इकाई का शुभारंभ किया, तो यह सागर के लिए एक सुनहरा अवसर था. 2019 में उन्होंने नोएडा में अपनी कंपनी लॉन्च की. हालांकि, यह काम इतना आसान नहीं था लेकिन उन्होंने अपने पिता की मदद से कॉन्टेक्ट बनाए और ब्रांडेड कंपनी सैमसंग, तोशिबा और सोनी जैसे ब्रैंड्स के लिए मैन्युफैक्चरिंग शुरू कर दी. एलईडी निर्माण उद्योग पर चीन का दबदबा रहा लेकिन भारत में भी यह सेक्टर तेजी से उभर रहा है.

100 से ज्यादा विदेशी कंपनियों को सप्लाई
सागर गुप्ता की कंपनी अब 100 से अधिक कंपनियों के लिए एलसीडी टीवी, एलईडी टीवी और हाई-एंड टीवी बनाती है. कंपनी हर महीने 1 लाख से ज्यादा टीवी बनाती है. 2022-23 में उनकी कंपनी का रेवेन्यू 600 करोड़ रुपए का था. सागर गुप्ता अब वाशिंग मशीन, स्पीकर और स्मार्ट वॉच जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स के निर्माण में भी उतरना चाहते हैं.

डीएनए की रिपोर्ट्स के अनुसार, वह इसके लिए नोएडा में 1,000 करोड़ रुपये का निवेश करना चाहते हैं. कंपनी पहले जमीन, उपकरण और सुविधाएं खरीदने के लिए 400 करोड़ रुपये का निवेश करेगी. अब तक, उनका सोनीपत में एक कारखाना है और 1000 से अधिक कर्मचारी हैं. कंपनी आने वाले 3 साल में आईपीओ भी ला सकती है. 🫶❤️‍🩹

अक्सर लोग सोचते हैं कि सफलता रातों-रात मिल जाती हैं. लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता है. सफलता पाने के लिए आपको कड़ी मेहन...
01/06/2026

अक्सर लोग सोचते हैं कि सफलता रातों-रात मिल जाती हैं. लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता है. सफलता पाने के लिए आपको कड़ी मेहनत और संघर्ष करना है. आज हम एक ऐसी ही कहानी लेकर आए हैं, जिसने 6500 रुपये की नौकरी तक की, लेकिन आज करोड़ों का साम्राज्य बना दिया है. इस कहानी से आप भी सीख ले सकते हैं.

कभी की थी 6500 की नौकरी

दिल्ली के रहने वाले योगेश शर्मा मुंबई चले गए थे और वहां साल 2007 में सिर्फ 6500 रुपये का नौकरी की थी. भले ही योगेश ने अपने करियर की शुरुआत छोटी नौकरी की हो, लेकिन उन्होंने सपने हमेशा बड़े ही देखे. उन्हें कुछ बड़े करना का सपना था और उन्होंने उसके लिए संघर्ष किया और आज उनके सफलता भी मिल गई है.

10 लाख रुपये में शुरू किया था बिजनेस

योगेश शर्मा ने नौकरी करने के साथ-साथ साल 2010 में मुंबई में ही 20 सीटों वाला एक छोटा कैफे खोला. हालांकि, कैफे के लिए उन्होंने पिता से 10 लाख रुपये लिए थे और अपने बिजनेस में लगाए थे. योगेश ने कैफे चलाने के साथ-साथ नौकरी भी की.

फिर लौट आए दिल्ली

मुंबई में 20 सीटों वाला कैफे खोलने के बाद योगेश शर्मा दिल्ली वापसी लौट आए. साल 2011 में योगेश ने दिल्ली में ही 70 सीटों एक रेस्तरां शुरू किया. फिर उन्होंने दिल्ली के लक्ष्मी नगर के एक मॉल में आउटलेट शुरू की और देखते ही देखते दो अन्य मॉल्स में भी आउटलेट खुल गई. हालांकि, तीनों रेस्तरां सफल हो गए और खूब चलने लगे. उन्हें 20, 40 और 60 साथ रुपये प्रति महीने का रेवेन्यू भी मिलने लगा.

2021 में आया टर्निंग पॉइंट

योगेश शर्मा की लाइफ 2021 में पूरी तरह बदल गई. उन्होंने साल 2021 में मशहूर शेफ हरपाल सिंह सोखी के साथ मिलकर कारीगरी ब्रांड की नींव रखी. इस ब्रांड के लिए योगेश ने 3 करोड़ रुपये खर्च कर दिए. इसका पहला ब्रांड नोएडा में शुरू किया था. उसके बाद दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद, देहरादून, बेंगलुरु, इंदौर और छत्तीसगढ़ जैसे शहरों में कुल 12 आउटलेट्स भी खोल दिए.

आज बना दिया करोड़ों का साम्राज्य

योगेश शर्मा ने अपनी लाइफ में काफी संघर्ष किया है. उन्होंने जरूरत पड़ने पर बिजनेस के साथ-साथ नौकरी भी की. कहते हैं न कि मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती... रिपोर्ट्स के अनुसार, योगेश की कारीगरी का सालाना टर्नओवर 80 करोड़ रुपये पहुंच गया है 🫶❤️‍🩹

अगर आपके पास कुछ भी करने का हौसला होता है, तो वो आप करके ही दम लेते हैं. आज हम एक ऐसी ही कहानी लेकर आए हैं, जिसने सिर्फ ...
01/06/2026

अगर आपके पास कुछ भी करने का हौसला होता है, तो वो आप करके ही दम लेते हैं. आज हम एक ऐसी ही कहानी लेकर आए हैं, जिसने सिर्फ एक आइडिया से करोड़ों का साम्राज्य बना दिया है. उनके लिए सफलता पाना बिल्कुल भी आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने एक महिला होने के बाद भी अपनी लाइफ में कभी भी हार नहीं मानी.

1.80 हजार में शुरू किया बिजनेस

अहमदाबाद की रहने वाली निष्‍ठा चौहान के पिता इसरो के रिटायर साइंटिस्ट हैं, जबकि मां बीएसएनएल में थीं. उन्होंने एलडी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन में बीटेक किया हुआ है. हालांकि, पढ़ाई के बाद निष्‍ठा ने नौकरी भी की है. फिर उन्होंने नौकरी छोड़कर बिजनेस शुरू किया. उन्होंने जमा-पूंजी 80 हजार रुपये से कारोबार करना का फैसला लिया.

कब रखी कंपनी की नींव?

अहमदाबाद में लोगों को उबला खाना या सलाद पसंद नहीं था. इसी वजह से निष्‍ठा चौहान ने 2021 में आरंभ कैफे (Aarambh Cafe) की नींव रखी. उन्होंने एक छोटी से जगह पर 5 डिशेज के साथ कैफे शुरू किया. फिर देखते ही देखते ये कैफे लोगों के दिलों पर राज करने लगा.
क्या है कैफे की खासियत?

निष्ठा ने मिलेट्स को उन्हीं के स्वाद के अनुसार पेश कर दिया. कैफे में रागी वड़ा पाव, मिलेट मोमोज और मिक्स्ड मिलेट हांडवो जैसे इनोवेशन किए. जंक फूड की बजाय उन्होंने पौष्टिक भोजन को ही स्वादिष्ट बना दिया. 6 से 7 महीने में निष्ठा ने लोगों को अपनी ओर खींच लिया.

निष्ठा ने रोका 47.3 टन कॉर्बन डाईऑक्‍साइड

निष्ठा का कैफे सिर्फ खाने तक सीमित नहीं रहा. उनक कैफे में प्लास्टिक और एयर कंडीशनर का उपयोग नहीं किया. हालांकि, उन्होंने पिछले 4 सालों में 47.3 टन कॉर्बन डाईऑक्‍साइड को रोका है. वहीं अब, उनका अगला टारगेट भारतीय मिलेट्स को इंटरनेशनल स्तर पर ले जाना है.

आज बनाया करोड़ों का साम्राज्य

निष्ठा चौहान की लगन और कड़ी मेहनत से उन्हें करोड़पित बना दिया है. निष्ठा ने अपना इंजीनियरिंग वाला दिमाग अपने बिजनेस में लगाया और उसे सफलता दिलाई. रिपोर्ट्स के अनुसार, आरंभ कैफे का सालाना टर्नओवर 1करोड़ रुपये पहुंच गया है. 🫶❤️‍🩹

Success Story- प्रेसिस्‍टेंट सिस्‍टम्‍स (Persistent Systems) की शुरुआत के बाद आनंद देशपांडे को काफी लंबा संघर्ष करना पड़...
01/06/2026

Success Story- प्रेसिस्‍टेंट सिस्‍टम्‍स (Persistent Systems) की शुरुआत के बाद आनंद देशपांडे को काफी लंबा संघर्ष करना पड़ा. क्योंक उन्हें अपने स्टार्टअप के लिए 10 वर्षों तक फंडिंग नहीं मिली और अपने दम पर ही उन्होंने कंपनी को चलाया. 2019 में प्रेसिस्‍टेंट सिस्‍टम्‍स के स्टॉक शेयर बाजार में लिस्टेड हुए.

देश में बढ़ते स्टार्टअप कल्चर और दिग्गज उद्यमियों की कहानी करोड़ों युवाओं को प्रेरित करने वाली है. अपनी काबिलियत के बल पर कई लोगों ने करोड़ों की नौकरी को छोड़कर अपना बिजनेस शुरू किया और बिजनेस वर्ल्ड में अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिए. इसी कड़ी में नाम आता है जानी-मानी टेक कंपनी प्रसिस्‍टेंट सिस्‍टम्‍स (Persistent Systems) के चैयरमेन और मैनेजिंग डायरेक्‍टर आनंद देशपांडे (Anand Deshpande) का. आईआईटी खड़गपुर के छात्र रहे देशपांडे को अमेरिका में पढ़ाई पूरी करते ही उन्‍हें हेवलेट पैकर्ड (HP) में बड़ी नौकरी मिल गई थी. लेकिन, उनका इरादा नौकरी करने का नहीं बल्कि लोगों को जॉब देने का था इसलिए 6 महीने बाद ही उन्‍होंने कंपनी से इस्‍तीफा दे दिया और भारत आ गए. यहां उन्‍होंने उधार के पैसों से आईटी कंपनी प्रसिस्‍टेंट सिस्‍टम्‍स की नींव रखी.

आनंद देशपांडे जब 1990 में वापस भारत लौटे तो उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे अपनी कंपनी शुरू कर सकें. अपनी कुछ सेविंग के अलावा उन्‍होंने परिवार और दोस्‍तों से उधार लेकर 2 लाख रुपये का जुगाड़ किया और प्रसिस्‍टेंट सिस्‍टम्‍स शुरू कर दी. आज प्रसिस्‍टेंट सिस्‍टम्‍स का बाजार पूंजीकरण (Persistent Systems Market Cap) 85,000 करोड़ रुपये है. ओर एक वक्त था अपने राम पर 2 लाख का जुगाड नहीं कर पाए थे

क्रैक किया था एनडीए एग्‍जाम
आनदं देशपांड का जन्‍म महाराष्‍ट्र के अकोला में हुआ था. उनके पिता भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्‍स लिमिटेड में इंजीनियर थे. उनकी ड्यूटी मध्‍यप्रदेश के भोपाल में थी. देशपांडे का बचपन भोपाल की भेल टाउनशिप में ही गुजरा और भोपाल में ही उनकी स्‍कूलिंग हुई. स्‍कूल के बाद उन्‍होंने नेशनल डिफेंस अकेडमी का एंट्रेस एग्‍जाम पास कर लिया. लेकिन, वो एनडीए नहीं गए और फिर आईआईटी-जीईई क्रैक कर आईआईटी खड़गपुर में दाखिला ले लिया. आईआईटी के बाद उन्‍होंने अमेरिका की इंडियाना यूनिवर्सिटी में उच्‍च शिक्षा के लिए दाखिला ले लिया.

खुद लिखते थे कोड
फोर्ब्‍स को दिए एक इंटरव्‍यू में देशपांडे ने बताया कि वो खुद को एक प्रोग्रामर ही मानते हैं. उन्‍होंने कोड लिखना बहुत पसंद है. प्रेसिस्‍टेंट की नींव रखने के तीन-चार साल तक वे खुद कोड लिखते रहे. इस काम में उन्‍हें बहुत मजा आता था. लेकिन, एक समस्‍या थी. कंपनी में कर्मचारी टिकते नहीं थे. इसका बड़ा कारण यह था कि उनको प्रेसिस्‍टेंट में लॉन्‍ग टर्म में अपना कोई भविष्‍य नजर नहीं आता था. इसके बाद ही देशपांडे ने खुद को कंपनी के सीईओ के रोल में ज्‍यादा ढालने की ठानी

10 साल बाद मिली फंडिंग
स्‍थापना के 10 साल बाद कंपनी को पहली बार 2000 में फंडिंग मिली थी. इंटेल कैपिटल ने 1 मिलियन डॉलर कंपनी को दिए. इसके बाद 2005 में कंपनी को नोर्वेस्‍ट वेंचर्स पार्टनर्स और गैब्रियल वैंचर्स से 20 मिलियन डॉलर की फंडिंग हासिल हुई. 2010 में प्रेसिस्‍टेंट सिस्‍टम्‍स का आईपीओ आया और कंपनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध हो गई. 🫶❤️‍🩹

Success Story: हितेश रांची के बिग बाजार के पास अपना एक छोटा सा आउटलेट लगाते हैं. वह पिज्जा बनाने का काम करते हैं. हितेश ...
01/06/2026

Success Story: हितेश रांची के बिग बाजार के पास अपना एक छोटा सा आउटलेट लगाते हैं. वह पिज्जा बनाने का काम करते हैं. हितेश बताते हैं कि वह मैट्रिक फेल हैं, घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी तो आगे पढ़ नहीं पाए. उसके बाद भैया ने पिज्जा बनाना सिखाया. आज आलम यह है कि लोग कहते हैं कि हम डोमिनोज छोड़कर आपके पास आए हैं. वह हर दिन 200 से अधिक लोग उनके पास पिज्जा खाने के लिए आते हैं. जहां एक पिज्जा की कीमत 70 रुपये से लेकर ₹150 तक होती है.

हितेश बताते हैं कि वह मूल रूप से बिहार के हाजीपुर के रहने वाले हैं. उनका पूरा परिवार काफी समय से रांची में रहता है. शुरू से ही घर में पैसे को लेकर तंगी थी. ऐसे में पढ़ाई ठीक से हो ही नहीं पाती थी. इस वजह से फेल भी हो गए और फिर पढ़ने का मन भी नहीं किया.

फिर लगा अब मुझे कमाना है, अपने दम पर कमाना है, लेकिन बात है कि मैट्रिक फेल को नौकरी कौन देगा. हितेश ने बताया कि उन्होंने पिज्जा बनाना शुरू किया. उनके भैया को बहुत अच्छा पिज्जा बनाना आता था, वह भी यही काम करते हैं. ऐसे में घर पर खूब प्रेक्टिस किया.

इसके बाद बिग बाजार के सामने अपना एक आउटलेट लगाया और यहां पर पिज्जा बनाने का काम करने लगे. आज मुश्किल से 15-20 मिनट में 20 से 25 पिज्जा बना लेते हैं. क्योंकि, इतना डिमांड है और एकदम बड़े ब्रांड के स्टाइल में पैकिंग करके भी लोगों को खिलाते हैं.

हितेश ने बताया कि उनके पिज्जा की खास बात ये है कि उनके पास आपको ऐसी क्वॉलिटी मिलेगी, खाकर आप तारीफ जरूर करेंगे. आप खाने के बाद कहेंगे ये तो डोमिनोएस वाला है, चीज से लेकर मेयोनेज सॉस हर चीज क्वालिटी का होता है और किसको कितनी क्वांटिटी में डालना है.

इस बात की एकदम ट्रेनिंग ले रखी है. क्वालिटी और क्वांटिटी के साथ कोई समझौता नहीं करते हैं. बस इसी को मूलमंत्र बनाया और उनका बिजनेस चल रहा है. हितेश आगे बताते हैं कि हर दिन आराम से 200 से अधिक लोग आ जाते हैं. सैटरडे संडे को तो उससे भी अधिक लोग पहुंचते हैं.

ऐसे में अच्छी खासी हर दिन की 20,000 से ऊपर की कमाई हो जाती है. हालांकि, इसमें लागत भी लगता है. आज उन्होंने अपने कई सपने पुरे किये हैं. अपना घर बनवाया है, कंप्यूटर, लैपटॉप, बाइक सब कुछ ले लिया है और भी सपने हैं. जैसे फॉरेन ट्रिप का यह भी बहुत जल्द पूरा करने वाले हैं 🫶❤️‍🩹

Success Story of Mira Kulkarni: यह कहानी मीरा कुलकर्णी की है। वह उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल की रहने वाली हैं। अपनी काबिलि...
01/06/2026

Success Story of Mira Kulkarni: यह कहानी मीरा कुलकर्णी की है। वह उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल की रहने वाली हैं। अपनी काबिलियत के बूते उन्‍होंने हजारों हजार करोड़ का कारोबारी साम्राज्‍य खड़ा कर दिया है। इसकी शुरुआत उन्‍होंने चंद पैसों से की थी। आखिर क्‍या है मीरा कुलकर्णी का कारोबार?

मीरा कुलकर्णी उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल से हैं। उन्‍होंने कड़ी मेहनत और अपने टैलेंट के बूते 8,300 करोड़ रुपये का आयुर्वेदिक स्किनकेयर ब्रांड खड़ा किया है। इसका नाम 'फॉरेस्ट एसेंशियल्स' (Forest Essentials) है। सिर्फ 2 लाख रुपये से मीरा ने इस कंपनी की शुरुआत की थी। आइए, यहां मीरा कुलकर्णी की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।

मीरा कुलकर्णी का जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जो परंपराओं और संस्कृति को बहुत महत्व देता था। उन्होंने कम उम्र में ही शादी कर ली थी। इस उम्मीद में कि उनकी जिंदगी खुशहाल होगी।

पति की शराब की लत ने बिगाड़ी स्थिति
हालांकि, उनके पति का कारोबार लड़खड़ाने लगा। पति की शराब की लत ने स्थिति को बद से बदतर बना दिया। आखिरकार, मीरा ने अपने पति से तलाक लेने का कठिन फैसला लिया। अपने बच्चों को अकेले (सिंगल मदर के तौर) ही पालने का चुनाव किया।

उन सालों को याद करते हुए मीरा कुलकर्णी ने एक बार कहा था, 'मुझे अपनी जिंदगी बिल्कुल नए सिरे से शुरू करनी पड़ी। जरा भी अंदाजा नहीं था कि भविष्य में क्या होने वाला है।'

फाइन आर्ट्स में किया है ग्रेजुएशन
मीरा की पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो उन्‍होंने चेन्‍नई के 'स्टेला मैरिस कॉलेज' से फाइन आर्ट्स में ग्रेजुएशन किया है। टिहरी गढ़वाल को भारत में आयुर्वेद का बड़ा केंद्र माना जाता है। ऐसे में वह अपनी शुरुआती जिंदगी में ही आयुर्वेदिक लाइफस्‍टाइल से जुड़ गई थीं।

आयुर्वेद में अपनी दिलचस्पी के चलते मीरा ने कई सालों तक वैद्यों और मॉडर्न बायोकेमिस्ट्स के साथ मिलकर कई तरह के प्रोडक्ट्स बनाने पर काम किया।

2 लाख रुपये से कंपनी की शुरुआत
45 साल की उम्र में मीरा ने आयुर्वेद और नेचुरल ट्रीटमेंट के प्रति अपने प्रेम को कुछ ठोस रूप देने का फैसला किया। हाथ में सिर्फ 2 लाख रुपये की रकम लेकर उन्होंने साल 2000 में फॉरेस्ट एसेंशियल्स की नींव रखी। उनकी सोच एकदम साफ थी- ऐसे स्किनकेयर प्रोडक्‍ट तैयार करना जो आयुर्वेदिक परंपराओं पर आधारित हों। लेकिन, जिनकी पैकेजिंग मॉडर्न लक्जरी की तर्ज पर हो।

मीरा ने बहुत छोटे स्तर से शुरुआत की। अपनी रसोई में ही हाथ से बने साबुन और तेलों के साथ प्रयोग किए। ये प्रोडक्‍ट बहुत जल्द ही उन ग्राहकों के बीच लोकप्रिय हो गए, जो प्रामाणिकता और गुणवत्ता को महत्व देते थे।

ऐसे हाथ लगा बड़ा मौका
उनके लिए एक बड़ा मौका तब आया, जब 'हयात रीजेंसी' होटल ग्रुप ने अपने होटलों के लिए उन साबुनों का ऑर्डर दिया। साथ ही यह भी चाहा कि उनके कमरों में सिर्फ 'फॉरेस्ट एसेंशियल्स' के ही साबुन रखे जाएं। धीरे-धीरे, लेकिन लगातार कंपनी को बड़े होटल ग्रुप से ऑर्डर मिलने लगे। उनके दूसरे प्रोडक्ट्स की बिक्री भी तेजी से बढ़ने लगी।

उस छोटी सी शुरुआत से कंपनी लगातार आगे बढ़ती गई। मीरा ने उत्पादों की शुद्धता, पारंपरिक फॉर्मूलों और आकर्षक प्रजेंटेशन पर खास ध्यान दिया। इसने भीड़-भाड़ वाले बाजार में उनके ब्रांड को एक अलग पहचान दिलाई।

लगन और मेहनत लाई रंग
उनकी लगन और मेहनत तब रंग लाई जब कंपनी पर अंतरराष्ट्रीय लक्जरी ब्रांड एस्‍टे लॉडर (Estee Lauder) की नजर पड़ी। इसने मीरा की कंपनी में माइनॉरिटी स्टेक खरीद ली। इस पार्टनरशिप से ब्रांड को ग्‍लोबल स्तर पर पहचान मिली। साथ ही मीरा को अपने ब्रांड की भारतीय मूल-भावना को बनाए रखने का मौका भी मिला।

अब हजारों करोड़ का साम्राज्य
आज, मीरा की कंपनी के भारत भर में 130 से भी ज्‍यादा स्टोर हैं। यह ब्रांड 120 से अधिक देशों में अपने उत्पादों का एक्‍सपोर्ट करता है। इसकी प्रोडक्‍ट कैटेगरी में स्किनकेयर, हेयरकेयर, बॉडी केयर और वेलनेस से जुड़ी चीजें शामिल हैं। इन सभी को आयुर्वेदिक सिद्धांतों के आधार पर ही तैयार किया जाता है।

इस ब्रांड का सालाना रेवेन्‍यू लगभग 432 करोड़ रुपये है। इसका वैल्‍यूएशन बढ़कर 8,300 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। मीरा की इस सफलता ने उन्हें भारत की सबसे अमीर महिला उद्यमियों में से एक बना दिया है।

फॉरेस्ट एसेंशियल्स' भारत के ज्‍यादा बड़े और लग्जरी होटल ग्रुप्स की मुख्य सप्लायर भी है। इनमें मशहूर 'ताज ग्रुप ऑफ होटल्स' और 'द ओबेरॉय होटल्स' भी शामिल हैं।

इतनी है मीरा की अपनी नेटवर्थ
मीरा कुलकर्णी की निजी नेट वर्थ लगभग 1,290 करोड़ रुपये आंकी गई है। आंकड़ों से परे उनकी असली विरासत भारत में सुंदरता के पैमानों को नए सिरे से परिभाषित करने में है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि आयुर्वेद जैसी हमारी अपनी पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां, अगर पूरी ईमानदारी और नएपन के साथ पेश की जाएं तो वे ग्‍लोबल ब्रांडों का मुकाबला कर सकती हैं। यहां तक कि उनसे आगे भी निकल सकती हैं। 🫶❤️‍🩹

भाई-बहन की एक जोड़ी ने कमाल कर दिया है। उनके नाम अशलिन बंसल और सचित बंसल हैं। दिल्‍ली में उन्‍होंने बहुत कम समय में अपना...
31/05/2026

भाई-बहन की एक जोड़ी ने कमाल कर दिया है। उनके नाम अशलिन बंसल और सचित बंसल हैं। दिल्‍ली में उन्‍होंने बहुत कम समय में अपना सफल कारोबार खड़ा कर दिया है। इसकी सालाना कमाई 4 करोड़ रुपये पहुंच गई है। आखिर अशलिन और सचित का बिजनेस क्‍या है?

अशलिन बंसल और सचित बंसल भाई-बहन हैं। वे दिल्‍ली में पले-बढ़े हैं। भाई-बहन की इस जोड़ी ने बहुत कम समय में सफल स्‍टार्टअप खड़ा कर दिया है। इस स्‍टार्टअप की नींव दोनों ने साल 2022 में रखी थी। इसका नाम कॉस्टिफाई (Costify) है। यह रीफर्बिश किए गए होम एप्‍लायंस बेचता है। पिता के व्यापार में उतार-चढ़ाव और संघर्षों से मिली सीख को आधार बनाकर भाई-बहन ने इसकी शुरुआत की। आज यह स्टार्टअप सालाना 4 करोड़ रुपये की कमाई कर रहा है। इसने 8,000 से अधिक ग्राहकों को अपनी सेवाएं दी हैं। आइए, यहां अशलिन और सचित की सफलता के सफर के बारे में जानते हैं।

पिता का संघर्ष बना सबक

अशलिन और सचित के उद्यमी बनने का सफर उनके पिता राजेश बंसल के संघर्षों से प्रभावित है। 2008 के ग्‍लोबल वित्तीय संकट, नोटबंदी और फिर महामारी के दौरान उनके पिता के कई व्यवसाय प्रभावित हुए। लेकिन, उन्होंने हार नहीं मानी। पिता के इसी जुझारू व्‍यक्तित्‍व और 'सेकेंड चांस' की अहमियत को समझकर भाई-बहन ने अपने स्‍टार्टअप की नींव रखी। कड़ी मेहनत और अपनी जड़ों से जुड़े रहने के मूल्य को समझा। इसे उन्होंने अपने स्टार्टअप का आधार बनाया।

ऐसे आया आइडिया

भारत के 25 अरब डॉलर के रीफर्बिश्ड मार्केट में भरोसे और गुणवत्ता की भारी कमी रही है। लोग पुराने सामान को 'जुगाड़' और असुरक्षित मानते हैं। भाई-बहन को यहीं मौका दिखाई दिया। उन्‍होंने इस तस्वीर को बदलने का फैसला किया। उनका स्‍टार्टअप हर प्रोडक्‍ट मल्टी-स्टेज टेस्टिंग और ओरिजिनल पार्ट्स के रिप्लेसमेंट के बाद ही वारंटी के साथ बेचता है। इसके अलावा, भारत में हर साल पैदा होने वाले 17 लाख टन ई-कचरे को कम करने के लिए यह स्टार्टअप पुराने उपकरणों को 5-7 साल की नई लाइफ देता है। इससे पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिल रही है।

युवाओं को मिल रहा रोजगार

अशलिन और सचित ने पुराने ढर्रे पर होने वाली मरम्मत की जगह वैज्ञानिक प्रक्रिया विकसित की है। उन्होंने एआई बेस्‍ड रीफर्बिशमेंट और ट्रेनिंग सिस्टम बनाया है। यह ITI पास लोगों को 8 से 12 हफ्तों में कुशल तकनीशियन बनाता है। इस प्रोग्राम के जरिये स्‍टार्टअप न केवल रिपेयरिंग की क्‍वालिटी को एक समान रखता है। इसके बजाय कमजोर बैकग्राउंड से आने वाले युवाओं को तकनीक के साथ जोड़कर उनकी आय बढ़ाने का काम भी कर रहा है।

बड़ा है आगे का प्‍लान

हाल ही में एंजेल फंडिंग राउंड जुटाने के बाद अशलिन और सचित अब कारोबार का एक्‍सपैंशन कर रहे हैं। 4 करोड़ रुपये के सालाना रेवेन्‍यू के साथ स्टार्टअप अब बड़े ओरिजिनल इक्विपमेंट मैन्युफैक्चरर्स (OEMs) के साथ पार्टनरशिप और फ्रेंचाइजी मॉडल पर विचार कर रहा है। आने वाले दो सालों में कंपनी का टारगेट अपनी वारंटी अवधि को एक साल तक बढ़ाना और टियर-2 शहरों में विस्तार करना है। सचित और अशलिन का विजन केवल एक ब्रांड बनाना नहीं, बल्कि भारत में रिफर्बिश्ड होम एप्लायंसेज के लिए ऐसा प्लेटफॉर्म तैयार करना है जो भरोसे का पर्याय बन जाए। ❤️‍🩹🫶

अनु आगा के पास बेशुमार दौलत है लेकिन उनकी कहानी एक आम औरत की तरह काफी संघर्षमय और दुखभरी रही है. आइये आपको बताते हैं देश...
31/05/2026

अनु आगा के पास बेशुमार दौलत है लेकिन उनकी कहानी एक आम औरत की तरह काफी संघर्षमय और दुखभरी रही है. आइये आपको बताते हैं देश की अमीर महिलाओं में से एक अनु आगा की सक्सेस स्टोरी.

Anu Aga Success Story: भारत में पिछले 20 से 30 वर्षों में लाखों महिलाओं ने बिजनेस और जॉब में बड़ा नाम कमाया है. लेकिन, इनमें से कुछ महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने एक अलग ही मकाम हासिल किया. आपने भारत की 10 सबसे अमीर महिलाओं के बारे में सुना होगा. इनमें टॉप पर सावित्री जिंदल, रेखा झुनझुनवाला, लीना तिवारी, फाल्गुनी नायर समेत कई महिलाएं शामिल हैं. लेकिन, क्या आप अनु आगा का नाम जानते हैं. ये भारत की 8वीं सबसे दौलतमंद महिला हैं, लेकिन इन्हें देखकर इनकी अमीरी का अंदाजा लगाना मुश्किल है. सादगी पसंद अनु आगा ने जिंदगी में कई मुश्किल दौर देखे हैं.

अनु आगा के पास आज की तारीख में भले ही कितना भी पैसा हो, लेकिन उनकी कहानी एक आम औरत की तरह काफी संघर्षमय और दुखभरी रही. देश में ज्यादातर लोग अनु आगा के नाम और पहचान से अनजान हैं. क्योंकि, वे मीडिया की चकाचौंध से दूर रही हैं. आइये आपको बताते हैं देश की अमीर महिलाओं में से एक अनु आगा की सक्सेस स्टोरी.

कौन हैं अनु आगा?
Thermax लिमिटेड की पूर्व चेयरमैन, अनु आगा सक्सेसफुल बिजनेस वुमेन के साथ-साथ अपने सामाजिक कार्यों के लिए जानी जाती हैं. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज से मेडिकल और मनोरोग की पढ़ाई करने के बाद, उन्हें मुश्किल हालात में कंपनी का बिजनेस संभालना पड़ा.

फोर्ब्स के अनुसार, एक बार इंटरव्यू में अनु आगा ने कहा था, “हालांकि, मेरी डिग्रियों ने मुझे जीवन की कठिनाइयों के लिए तैयार नहीं किया, लेकिन जो अनुभव और जिन लोगों से मैं मिली, उनका मुझ पर प्रभाव पड़ा.”

पति और बेटे की मौत से नहीं टूटीं
अनु आगा ने 1965 में उद्यमी रोहिंटन आगा से शादी की. रोहिंटन ने थर्मैक्स कंपनी की शुरुआत की. उनकी लीडरशिप में थर्मैक्स ने बहुत तरक्की की. लेकिन, अनु आगा की जिंदगी में उस वक्त दुखों का पहाड़ टूट गया जब एक के बाद एक उनके पति और 25 साल के जवान बेटे ने उनका साथ छोड़ दिया.

1997 में हार्ट अटैक की वजह से रोहिंटन का निधन हो गया. इसके बाद अनु आगा ने एक सड़क दुर्घटना में अपने 25 साल के बेटे को भी खो दिया. इस मुश्किल घड़ी में अनु आगा को थर्मैक्स कंपनी का नेतृत्व करने के लिए कहा गया, यह वह वक्त था जब कंपनी का बिजनेस गिर रहा था.

बुलंदियों पर पहुंचाया बिजनेस
निजी जीवन में इतना कुछ सहने के बाद अनु आगा ने थर्मैक्स की कमान संभाली और कंपनी को बुलंदियों पर पहुंचाया. फोर्ब्स की रिपोर्ट के अनुसार, अनु 61 साल की उम्र में चेयरपर्सन के पद से सेवानिवृत्त हुईं और कंपनी की बागडोर अपनी बेटी मेहर पुदुमजी को सौंप दी.

फोर्ब्स के अनुसार, अनु आगा की कुल संपत्ति 2.2 बिलियन डॉलर यानी 18,000 करोड़ से ज्यादा है. उनकी यह नेटवर्थ अपनी सूचीबद्ध इंजीनियरिंग फर्म थर्मैक्स में बहुमत हिस्सेदारी से मिली है.

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