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सरवेश अग्रवाल: WordPress के छोटे से ब्लॉग से 100 करोड़ रुपये की कंपनी तक का सफरकभी-कभी करोड़ों रुपये की कंपनी बनाने के ल...
03/09/2026

सरवेश अग्रवाल: WordPress के छोटे से ब्लॉग से 100 करोड़ रुपये की कंपनी तक का सफर

कभी-कभी करोड़ों रुपये की कंपनी बनाने के लिए शुरुआत में करोड़ों रुपये की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है किसी समस्या को पहचानने, उसे हल करने का जुनून रखने और लंबे समय तक बिना हार माने काम करते रहने की।

सरवेश अग्रवाल की कहानी इसी सोच की मिसाल है। आज उनका नाम Internshala के साथ जुड़ा है—एक ऐसा प्लेटफॉर्म जिसने भारत के लाखों छात्रों को इंटर्नशिप, ट्रेनिंग और शुरुआती करियर के अवसरों से जोड़ने का काम किया। लेकिन इसकी शुरुआत किसी बड़े ऑफिस, बड़ी टीम या भारी-भरकम निवेश से नहीं हुई थी।

शुरुआत हुई थी एक साधारण ब्लॉग से।

सरवेश अग्रवाल IIT मद्रास से पढ़े सिविल इंजीनियर हैं। पढ़ाई के बाद उन्होंने कॉर्पोरेट दुनिया में काम किया और Capital One, Barclays तथा Aviva जैसी कंपनियों में अनुभव हासिल किया। लेकिन उनके भीतर सिर्फ नौकरी करने की इच्छा नहीं थी। उन्हें कुछ ऐसा बनाने में दिलचस्पी थी, जिसका वास्तविक असर लोगों की जिंदगी पर पड़े। एक पुराने प्रोफाइल में उन्हें ऐसा व्यक्ति बताया गया है जिसे किसी चीज को बिल्कुल शुरुआत से बनाना पसंद था।

एक समस्या ने बदल दी पूरी जिंदगी

2010 के आसपास सरवेश ने देखा कि भारत में कॉलेज के छात्रों के सामने एक बड़ी समस्या थी—इंटर्नशिप और वास्तविक इंडस्ट्री एक्सपोजर की कमी।

उनका एक दोस्त लंदन बिजनेस स्कूल में पढ़ रहा था और भारत में इंटर्नशिप ढूंढ रहा था। लेकिन उसे सही अवसर खोजने में परेशानी हो रही थी। यहीं से सरवेश के दिमाग में एक विचार आया कि क्यों न ऐसी जगह बनाई जाए, जहां छात्रों को एक ही प्लेटफॉर्म पर इंटर्नशिप के अवसर मिल सकें।

लेकिन उन्होंने शुरुआत किसी बड़े स्टार्टअप की तरह नहीं की।

उन्होंने एक WordPress ब्लॉग शुरू किया।

इस ब्लॉग पर शिक्षा, तकनीक, स्किल्स और इंटर्नशिप से जुड़ी जानकारी प्रकाशित की जाने लगी। धीरे-धीरे जब वह अलग-अलग इंटर्नशिप के अवसरों के बारे में लिखने लगे तो छात्रों के सवाल आने लगे। लोगों की जरूरत देखकर उन्हें समझ आया कि यहां सिर्फ ब्लॉग नहीं, बल्कि एक बड़ा प्लेटफॉर्म बनाने की संभावना है। Internshala की आधिकारिक टाइमलाइन भी बताती है कि 2010 में सरवेश ने इसे ब्लॉग के रूप में शुरू किया था।

यही वह मोड़ था, जहां एक साधारण समस्या ने भविष्य के बड़े बिजनेस का रूप लेना शुरू किया।

नौकरी छोड़कर उद्यमिता की राह

सरवेश के लिए सबसे आसान रास्ता था अपनी अच्छी नौकरी जारी रखना।

लेकिन उन्होंने जोखिम उठाया।

अक्टूबर 2011 में उन्होंने Aviva की नौकरी छोड़कर Internshala पर पूरी तरह काम करने का फैसला किया। उस समय उनके पास आज जैसी बड़ी टीम, बड़ा ऑफिस या करोड़ों रुपये का निवेश नहीं था।

एक तरफ सुरक्षित नौकरी थी और दूसरी तरफ ऐसा बिजनेस था जिसका भविष्य निश्चित नहीं था।

लेकिन सरवेश ने उस अनिश्चितता को स्वीकार किया।

यही किसी भी उद्यमी की असली परीक्षा होती है।

किसी आइडिया के बारे में सोचना आसान है। उसके बारे में बात करना भी आसान है। लेकिन जब उस आइडिया के लिए अपनी सुरक्षित नौकरी छोड़नी पड़े, तब असली फैसला लेना पड़ता है।

सरवेश ने वही फैसला लिया।

कंपनी की शुरुआत करोड़ों से नहीं, इंटर्न्स से हुई

आज जब किसी स्टार्टअप की कहानी सुनाई जाती है तो अक्सर निवेश, फंडिंग और बड़ी टीम की चर्चा होती है। Internshala की शुरुआती कहानी इससे बिल्कुल अलग थी।

सरवेश के अनुसार, शुरुआती दो वर्षों में वह Internshala के एकमात्र फुल-टाइम कर्मचारी थे। वेबसाइट, कंटेंट, सेल्स, कस्टमर सर्विस और डिजिटल मार्केटिंग जैसे कामों को अलग-अलग जगहों से काम करने वाले वर्चुअल इंटर्न्स की टीम संभालती थी।

यानी जिस कंपनी ने आगे चलकर करोड़ों रुपये का कारोबार खड़ा किया, उसके शुरुआती दिनों में काम करने का तरीका बेहद साधारण था।

न बड़ा ऑफिस।

न सैकड़ों कर्मचारियों की टीम।

न भारी-भरकम कॉर्पोरेट ढांचा।

बल्कि छोटे संसाधनों में बड़ा काम करने की कोशिश।

सरवेश ने खुद अपने अनुभव में बताया कि Internshala को बनाने में इंटर्न्स की टीम की महत्वपूर्ण भूमिका रही। आगे चलकर कंपनी में काम करने वाले कई इंटर्न्स स्थायी कर्मचारी भी बने।

यह सिर्फ बिजनेस मॉडल नहीं था, बल्कि Internshala के मिशन से भी जुड़ा हुआ था—जिस प्लेटफॉर्म का उद्देश्य युवाओं को इंटर्नशिप देना था, उसी ने अपने शुरुआती काम में इंटर्न्स को अवसर दिया।

ब्लॉग से वेबसाइट तक

शुरुआत में Internshala सिर्फ ब्लॉग था।

लेकिन जैसे-जैसे छात्रों और कंपनियों की संख्या बढ़ती गई, एक व्यवस्थित प्लेटफॉर्म की जरूरत महसूस हुई।

2013 में Internshala की वेबसाइट लॉन्च हुई। कंपनी की आधिकारिक जानकारी के मुताबिक उस समय लक्ष्य था कि भारत के छात्रों को उनके लिए सही इंटर्नशिप अवसर उपलब्ध कराए जाएं।

इसके बाद 2015 में Internshala का Android ऐप आया और 2016 में Internshala Trainings की शुरुआत हुई।

यहां सरवेश की एक महत्वपूर्ण खूबी दिखाई देती है।

उन्होंने केवल एक वेबसाइट बनाकर रुकने के बजाय यह समझने की कोशिश की कि छात्रों की अगली समस्या क्या है।

छात्रों को इंटर्नशिप चाहिए।

लेकिन इंटर्नशिप पाने के लिए स्किल भी चाहिए।

इसलिए कंपनी ने ट्रेनिंग की दिशा में कदम बढ़ाया।

यानी बिजनेस का विस्तार केवल ज्यादा पैसा कमाने के लिए नहीं हुआ, बल्कि उसी समस्या की अगली कड़ी को हल करने के लिए हुआ।

जब लोगों ने समझा कि यह सिर्फ ब्लॉग नहीं है

Internshala धीरे-धीरे छात्रों और कंपनियों के बीच एक महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म बनने लगा।

2013 की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि Internshala विभिन्न विश्वविद्यालयों और संगठनों से इंटर्नशिप के अवसर जोड़ रहा था। उस समय भी सरवेश का फोकस छात्रों और इंडस्ट्री के बीच की दूरी कम करने पर था।

बाद के वर्षों में प्लेटफॉर्म तेजी से बढ़ा।

2018 तक Internshala पर लाखों छात्र और हजारों कंपनियां जुड़ चुकी थीं।

फिर Trainings ने बिजनेस को एक नया आधार दिया।

2021 में कंपनी ने लगभग ₹20 करोड़ का राजस्व दर्ज किया था और वह हर साल अपने कारोबार को आगे बढ़ा रही थी। उस समय भी कंपनी का बड़ा हिस्सा अपनी कमाई को दोबारा बिजनेस के विकास में लगाने पर केंद्रित था।

यहां से एक महत्वपूर्ण सीख मिलती है—

हर सफल कंपनी की शुरुआत बड़ी दिखाई नहीं देती।

कई बार वह एक छोटे प्रयोग की तरह शुरू होती है।

अगर उस प्रयोग से लोगों को फायदा मिलता है, तो वही छोटा प्रयोग धीरे-धीरे बड़ा बिजनेस बन सकता है।

फंडिंग से ज्यादा महत्वपूर्ण था बिजनेस

Internshala की कहानी इसलिए भी अलग है क्योंकि शुरुआती वर्षों में इसका निर्माण काफी हद तक bootstrapped तरीके से हुआ।

2014 में कंपनी को दोस्तों और रिश्तेदारों से लगभग ₹15 लाख का angel investment मिला था। इसके बाद कंपनी ने अपना ऑफिस और दूसरे विस्तार के कदम उठाए।

लेकिन कंपनी की पहचान केवल निवेश जुटाने वाले स्टार्टअप के रूप में नहीं बनी।

उसने अपने बिजनेस मॉडल को मजबूत करने पर ध्यान दिया।

ट्रेनिंग प्रोग्राम, कंपनियों से मिलने वाली फीस और बाद में अलग-अलग सेवाओं के जरिए राजस्व बढ़ाया गया। 2021 में skill training कंपनी के राजस्व का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा बन चुकी थी।

इससे यह समझ आता है कि किसी कंपनी की सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि उसने कितनी फंडिंग उठाई।

असली ताकत होती है—

क्या ग्राहक आपके प्रोडक्ट के लिए पैसे देने को तैयार हैं?

Internshala ने इस सवाल का जवाब अपने बिजनेस मॉडल से दिया।

करोड़ों छात्रों और कंपनियों तक पहुंच

समय के साथ Internshala का नेटवर्क बहुत बड़ा होता गया।

2026 में upGrad द्वारा Internshala के अधिग्रहण के समय कंपनी के पास 3.4 करोड़ से ज्यादा registered users और लगभग 4.5 लाख employers होने की जानकारी सामने आई। करीब 30 लाख सक्रिय आवेदक हर साल प्लेटफॉर्म का उपयोग करते थे और 40 प्रतिशत से ज्यादा उपयोगकर्ता Tier-2 और Tier-3 शहरों से आते थे।

यानी जिस समस्या को एक समय एक ब्लॉग के जरिए हल करने की कोशिश की गई थी, वह समस्या अब करोड़ों युवाओं तक पहुंच चुकी थी।

सरवेश की सोच की सबसे बड़ी सफलता यही थी कि उन्होंने सिर्फ वेबसाइट नहीं बनाई।

उन्होंने education और employment के बीच एक पुल बनाने की कोशिश की।

कॉलेज में पढ़ने वाला छात्र जब पहली बार इंडस्ट्री में कदम रखना चाहता है, तब उसके सामने अनुभव की कमी होती है।

कंपनी कहती है—हमें skilled candidate चाहिए।

छात्र कहता है—मुझे अनुभव चाहिए।

Internshala ने इसी gap को address करने की कोशिश की।

100 करोड़ रुपये की कंपनी तक पहुंच

फोटो में दिखाई गई पोस्ट का सबसे बड़ा दावा है कि WordPress से शुरू हुई यह यात्रा 100 करोड़ रुपये की कंपनी तक पहुंची।

यह दावा अब केवल सोशल मीडिया की कहानी तक सीमित नहीं है।

फरवरी 2026 में upGrad ने Internshala में 90 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल करने की घोषणा की। डील की आधिकारिक राशि सार्वजनिक नहीं की गई, लेकिन Economic Times ने सूत्रों के हवाले से बताया कि इस लेनदेन में Internshala का मूल्यांकन लगभग ₹100 करोड़ था।

यानी जिस प्लेटफॉर्म की शुरुआत एक छोटे ब्लॉग से हुई थी, वह लगभग डेढ़ दशक बाद लगभग ₹100 करोड़ के मूल्यांकन वाले सौदे तक पहुंच गया।

यह सफर किसी एक दिन में नहीं बना।

इसके पीछे 2010 से लगातार किए गए प्रयोग, गलतियां, छोटे-छोटे सुधार, टीम बनाना, छात्रों को समझना, कंपनियों की जरूरत समझना और बिजनेस मॉडल को बदलते रहना शामिल था।

सबसे बड़ी सीख: शुरुआत छोटी होने में कोई शर्म नहीं

सरवेश अग्रवाल की कहानी का सबसे प्रेरणादायक हिस्सा शायद ₹100 करोड़ का आंकड़ा नहीं है।

सबसे प्रेरणादायक हिस्सा है शुरुआत।

एक WordPress ब्लॉग।

एक समस्या।

सीमित संसाधन।

छोटी टीम।

और एक ऐसा व्यक्ति जिसने यह तय किया कि अगर समस्या वास्तविक है तो उसका समाधान भी बनाया जा सकता है।

आज सोशल मीडिया के दौर में बहुत से लोग शुरुआत करने से पहले ही पूछते हैं—

पैसा कितना चाहिए?

ऑफिस कैसा होगा?

टीम कितनी होगी?

निवेशक कौन मिलेगा?

मार्केट कितना बड़ा है?

लेकिन सरवेश की कहानी एक अलग सवाल सिखाती है—

“लोगों की कौन-सी समस्या मैं बेहतर तरीके से हल कर सकता हूं?”

अगर इस सवाल का जवाब मिल जाए, तो बाकी चीजें धीरे-धीरे बनाई जा सकती हैं।

संघर्ष सिर्फ पैसों का नहीं होता

उद्यमिता में संघर्ष हमेशा आर्थिक नहीं होता।

कभी संघर्ष होता है लोगों को अपने विचार पर विश्वास दिलाने का।

कभी सही टीम ढूंढने का।

कभी ग्राहकों को समझने का।

कभी यह तय करने का कि कौन-सा बिजनेस मॉडल काम करेगा।

और कभी खुद से लड़ने का कि क्या यह फैसला सही है।

सरवेश ने भी अपनी यात्रा में यही चरण देखे।

उन्होंने अपने एक लेख में शुरुआती दौर के बारे में लिखा था कि entrepreneurship, investment, company incorporation और VC funding जैसे शब्द उनके लिए कभी दूर और डरावने लगते थे। लेकिन उन्होंने सवाल पूछकर, लोगों से मदद मांगकर और लगातार सीखकर आगे बढ़ना जारी रखा।

यही एक बड़े उद्यमी की पहचान है।

उसे शुरुआत में हर चीज नहीं आती।

लेकिन वह सीखने से डरता नहीं है।

15 साल बाद एक नया अध्याय

2026 में Internshala की कहानी ने एक और बड़ा मोड़ लिया।

upGrad ने कंपनी की 90 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल की। इस सौदे का उद्देश्य education, skilling और employment को एक बड़े ecosystem में जोड़ना था।

इसके बाद सरवेश अग्रवाल ने CEO की भूमिका से हटने की घोषणा भी की। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा कि 15 साल बनाने के बाद वह Internshala में CEO के रूप में अपना आखिरी कार्यदिवस पूरा कर रहे हैं और कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए इसे upGrad के enterprise ecosystem के साथ जोड़ना उचित है।

यह किसी कहानी का अंत नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत है।

एक व्यक्ति जिसने 2010 में ब्लॉग शुरू किया था, उसने उसे ऐसी कंपनी में बदल दिया जिसे लाखों नहीं बल्कि करोड़ों लोग इस्तेमाल करने लगे।

सरवेश अग्रवाल की कहानी हमें क्या सिखाती है?

उनकी यात्रा से कई बड़ी बातें सीखी जा सकती हैं।

पहली—छोटी शुरुआत को कम मत समझिए।
आज का छोटा ब्लॉग कल का बड़ा प्लेटफॉर्म बन सकता है।

दूसरी—समस्या को समझिए।
सिर्फ प्रोडक्ट बनाने से बिजनेस नहीं बनता। लोगों की वास्तविक जरूरत समझनी पड़ती है।

तीसरी—सीखते रहिए।
सरवेश के पास शुरुआत में हर बिजनेस स्किल नहीं थी। लेकिन उन्होंने सवाल पूछे, लोगों से मदद ली और धीरे-धीरे सीखा।

चौथी—कम संसाधन बहाना नहीं हैं।
शुरुआती Internshala में बड़ी टीम या बड़ा ऑफिस नहीं था। इसके बावजूद काम आगे बढ़ा।

पांचवीं—समय सबसे बड़ा हथियार है।
2010 से 2026 तक लगभग डेढ़ दशक तक एक विचार पर काम करना आसान नहीं होता। असली सफलता अक्सर इसी निरंतरता से बनती है।

छठी—सिर्फ पैसा लक्ष्य नहीं होना चाहिए।
जब किसी बिजनेस का समाधान वास्तविक समस्या से जुड़ा हो, तो पैसा उसके परिणाम के रूप में आ सकता है।

आखिर में...

सरवेश अग्रवाल की कहानी सिर्फ “WordPress से 100 करोड़ रुपये तक” पहुंचने की कहानी नहीं है।

यह उस सोच की कहानी है जिसमें एक व्यक्ति ने एक छोटी समस्या देखी और उसे नजरअंदाज करने के बजाय उसका समाधान बनाने का फैसला किया।

एक ब्लॉग से शुरुआत हुई।

फिर वेबसाइट बनी।

फिर ऐप आया।

फिर ट्रेनिंग शुरू हुई।

फिर लाखों छात्र जुड़े।

फिर हजारों कंपनियां जुड़ीं।

और आखिरकार वही छोटा विचार एक ऐसे प्लेटफॉर्म में बदल गया, जिसका मूल्यांकन 2026 के अधिग्रहण सौदे में करीब ₹100 करोड़ बताया गया।

इस कहानी की सबसे बड़ी सीख यही है—

> बड़ी सफलता हमेशा बड़ी शुरुआत से नहीं होती।
कई बार बड़ी सफलता की शुरुआत एक छोटे से विचार, एक लैपटॉप और किसी समस्या को हल करने की जिद से होती है।

और शायद यही वजह है कि सरवेश अग्रवाल की यात्रा उन युवाओं के लिए खास प्रेरणा है, जो आज अपने कमरे, लैपटॉप या छोटे से ऑफिस से कुछ शुरू करना चाहते हैं।

क्योंकि हर बड़ी कंपनी कभी न कभी सिर्फ एक आइडिया थी।

डिस्क्लेमर: इस लेख में उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों और कंपनी/मीडिया रिपोर्टों के आधार पर जानकारी दी गई है। ₹100 करोड़ का आंकड़ा 2026 के upGrad–Internshala लेनदेन के संदर्भ में रिपोर्ट किए गए लगभग मूल्यांकन को दर्शाता है; इसे कंपनी की वर्तमान स्वतंत्र बाजार कीमत या संस्थापक की व्यक्तिगत संपत्ति न समझें।

DailyObjects: दो दोस्तों की छोटी शुरुआत से ₹1,000 करोड़ की कंपनी तक का सफरमोबाइल, लैपटॉप और दूसरे गैजेट्स आज हमारी जिंदग...
03/09/2026

DailyObjects: दो दोस्तों की छोटी शुरुआत से ₹1,000 करोड़ की कंपनी तक का सफर

मोबाइल, लैपटॉप और दूसरे गैजेट्स आज हमारी जिंदगी का हिस्सा हैं, लेकिन करीब डेढ़ दशक पहले इनके अच्छे और स्टाइलिश एक्सेसरीज की भारतीय बाजार में इतनी बड़ी उपलब्धता नहीं थी। इसी कमी को Pankaj Garg और Saurav Adlakha ने एक अवसर के रूप में देखा और 2012 में DailyObjects की शुरुआत की। आज यह कंपनी फोन कवर, लैपटॉप स्लीव, बैग, वॉलेट, चार्जिंग एक्सेसरीज, डेस्क और लाइफस्टाइल प्रोडक्ट्स के लिए जानी जाती है।

छोटे शहर और साधारण शुरुआत

DailyObjects की कहानी के केंद्र में Pankaj Garg हैं। उनका बचपन राजस्थान के अलवर जिले के एक छोटे गांव में बीता और उन्होंने हिंदी माध्यम से पढ़ाई की। आगे उन्होंने कॉमर्स की पढ़ाई की और फिर कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर एप्लीकेशन में मास्टर डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने Patni Computers और Amdocs जैसी कंपनियों में लगभग साढ़े चार साल काम किया।

करियर में आगे बढ़ते हुए उन्हें अमेरिका में काम करने का मौका भी मिला और H1B वीजा मिला, लेकिन उन्होंने अमेरिका जाकर नौकरी करने के बजाय अपना बिजनेस शुरू करने का फैसला किया। यह निर्णय उनके लिए बड़ा जोखिम था, क्योंकि नौकरी छोड़कर स्टार्टअप शुरू करने का मतलब था निश्चित कमाई छोड़कर अनिश्चित भविष्य को चुनना।

पहला प्रयोग और असफलता से सीख

DailyObjects से पहले Pankaj ने SaleDekho.com जैसा ऑनलाइन डील और प्री-शॉपिंग प्लेटफॉर्म बनाया। इसके बाद Pankaj और Saurav ने 2010 के आसपास Lootspot के जरिए कैमरा, मोबाइल और दूसरे गैजेट्स बेचने का प्रयास किया। शुरुआती कारोबार से उन्हें यह समझ आया कि महंगे गैजेट्स बेचने में पूंजी ज्यादा लगती है, प्रतिस्पर्धा बहुत है और मार्जिन अपेक्षाकृत कम हो सकता है।

यहीं से दोनों ने अपना ध्यान एक अलग अवसर की तरफ लगाया।

उन्होंने देखा कि लोग महंगे स्मार्टफोन और लैपटॉप तो खरीद रहे हैं, लेकिन उनके लिए अच्छे डिजाइन और अच्छी क्वालिटी वाले एक्सेसरीज आसानी से उपलब्ध नहीं थे। एक तरफ सस्ते और सामान्य उत्पाद थे, दूसरी तरफ विदेशी ब्रांडों के महंगे विकल्प।

Pankaj को लगा कि भारतीय ग्राहकों के लिए अच्छा डिजाइन + अच्छी क्वालिटी + उचित कीमत वाला ब्रांड बनाया जा सकता है। इसी सोच से 2012 में DailyObjects की नींव पड़ी। शुरुआत मोबाइल कवर और टेक एक्सेसरीज से हुई।

सबसे बड़ा बदलाव: सिर्फ बेचने से ब्रांड बनाने तक

शुरुआती दौर में कंपनी दूसरे ब्रांडों के उत्पाद भी बेचती थी। लेकिन समय के साथ संस्थापकों को समझ आया कि अगर वास्तव में बड़ा ब्रांड बनना है तो सिर्फ दूसरे लोगों के उत्पाद बेचने से काम नहीं चलेगा।

2014-15 के आसपास कंपनी ने अपने उत्पादों, डिजाइन और मैन्युफैक्चरिंग पर ज्यादा नियंत्रण बनाना शुरू किया। जब Amazon और Flipkart जैसे बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म तेजी से बढ़े, तब DailyObjects ने खुद को एक स्वतंत्र D2C यानी Direct-to-Consumer ब्रांड के रूप में मजबूत करने पर ध्यान दिया।

यानी कंपनी का लक्ष्य केवल मोबाइल कवर बेचना नहीं था, बल्कि रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाली चीजों को डिजाइन और ब्रांडिंग के जरिए प्रीमियम बनाना था।

सबसे मुश्किल दौर

आज की सफलता देखकर शायद अंदाजा लगाना मुश्किल है कि DailyObjects भी एक समय बंद होने की कगार पर पहुंच गई थी।

कंपनी के शुरुआती D2C बदलाव के बाद एक समय उसके पास पैसों की कमी हो गई थी। Pankaj Garg के अनुसार कंपनी पर काफी liabilities थीं, मुनाफा नहीं था और मासिक बिक्री करीब ₹50 लाख के आसपास थी। स्थिति इतनी मुश्किल हो गई थी कि कारोबार बंद होने का खतरा पैदा हो गया था।

लेकिन यहीं दोनों संस्थापकों ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया।

उन्होंने सिर्फ तेजी से बिक्री बढ़ाने के बजाय survival, unit economics और brand building पर ध्यान दिया। खर्चों को नियंत्रित किया गया, कई ऐसे बिजनेस तरीकों से दूरी बनाई गई जिनमें कंपनी को पर्याप्त फायदा नहीं मिल रहा था और अपने ब्रांड पर ज्यादा फोकस किया गया।

यही रणनीति आगे चलकर DailyObjects की पहचान बनी।

डिजाइन बना सबसे बड़ा हथियार

DailyObjects ने कम कीमत पर सबसे ज्यादा सामान बेचने की रणनीति अपनाने के बजाय डिजाइन को अपनी पहचान बनाया।

मोबाइल कवर, बैग, वॉलेट, डेस्क एक्सेसरीज और दूसरे उत्पादों को केवल उपयोगी वस्तु नहीं बल्कि lifestyle product के रूप में पेश किया गया। कंपनी ने भारतीय उपभोक्ताओं के लिए ऐसा डिजाइन तैयार करने की कोशिश की जो आधुनिक भी हो और रोजमर्रा की जिंदगी में काम भी आए।

कंपनी ने धीरे-धीरे मोबाइल कवर से आगे बढ़कर लैपटॉप एक्सेसरीज, बैग, वॉलेट, चार्जिंग सॉल्यूशन, होम-ऑफिस और अन्य कैटेगरी में विस्तार किया।

निवेशकों का भरोसा

कंपनी की क्षमता देखकर समय के साथ निवेशकों का भरोसा भी बढ़ा। शुरुआती निवेशकों में Seedfund, Peyush Bansal, Unilazer Ventures और Phanindra Sama जैसे नाम शामिल रहे। 2024 में DailyObjects ने 360 ONE Asset की अगुवाई में लगभग $10 मिलियन यानी करीब ₹83 करोड़ की फंडिंग जुटाई। इस पूंजी का इस्तेमाल वितरण, प्रोडक्ट इनोवेशन, टीम और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाने के लिए किया जाना था।

कंपनी की वैल्यूएशन कितनी है?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।

पोस्ट में ₹1,000 करोड़ की कंपनी लिखा गया है। 11 मई 2026 की Economic Times रिपोर्ट के मुताबिक DailyObjects लगभग ₹300 करोड़ की नई फंडिंग के लिए Xponentia Capital के साथ advanced talks में थी और इस संभावित डील के बाद कंपनी की वैल्यूएशन करीब ₹1,000 करोड़ होने की बात सामने आई थी। इससे पहले कंपनी की पिछली फंडिंग के समय वैल्यूएशन लगभग ₹400 करोड़ बताई गई थी।

इसलिए ₹1,000 करोड़ को फिलहाल रिपोर्ट की गई संभावित/प्रस्तावित वैल्यूएशन के रूप में देखना ज्यादा सही है, न कि बिना शर्त पक्की मौजूदा वैल्यूएशन के रूप में।

कंपनी की ग्रोथ भी उल्लेखनीय रही है। FY25 में DailyObjects का ऑपरेशनल रेवेन्यू लगभग ₹111 करोड़ रहा, जो FY24 के लगभग ₹84 करोड़ से करीब 32% अधिक था।

2026 में कंपनी ने इससे भी बड़े लक्ष्य रखे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक FY26 में कंपनी का रेवेन्यू करीब ₹200-220 करोड़ रहने का अनुमान बताया गया और उसका annualised revenue run-rate लगभग ₹300 करोड़ तक पहुंच गया। कंपनी अगले कुछ वर्षों में ₹1,000 करोड़ रेवेन्यू और 150 तक स्टोर्स का लक्ष्य भी रख रही है।

असली सफलता क्या है?

Pankaj Garg और Saurav Adlakha की कहानी सिर्फ ₹1,000 करोड़ की संभावित वैल्यूएशन की कहानी नहीं है। असली सफलता यह है कि उन्होंने एक ऐसे बाजार में ब्रांड बनाया जहां शुरुआत में उनके सामने बड़े ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और स्थापित कंपनियां थीं।

उन्होंने नौकरी छोड़ने का जोखिम लिया, शुरुआती बिजनेस प्रयोगों से गलतियां सीखीं, कंपनी को मुश्किल आर्थिक दौर से निकाला और फिर कीमत के बजाय डिजाइन, क्वालिटी और ब्रांड को अपनी पहचान बनाया।

एक छोटे गांव से निकलकर टेक इंडस्ट्री में नौकरी करने वाला व्यक्ति अगर अपनी सुरक्षित नौकरी छोड़कर ऐसा ब्रांड बना सकता है जो आज सैकड़ों करोड़ रुपये का कारोबार कर रहा है, तो यह कहानी बताती है कि बड़ा बिजनेस हमेशा बड़े निवेश से शुरू नहीं होता।

कई बार शुरुआत केवल एक समस्या को पहचानने, सही अवसर देखने और लंबे समय तक उस विचार पर टिके रहने से होती है।

Pankaj Garg और Saurav Adlakha की DailyObjects कहानी इसी बात का उदाहरण है—छोटा आइडिया, लगातार प्रयोग, मुश्किल समय में धैर्य और डिजाइन पर भरोसा मिलकर एक बड़े भारतीय consumer brand को जन्म दे सकते हैं।

डिस्क्लेमर: इस लेख में कंपनी की वैल्यूएशन और वित्तीय आंकड़े सार्वजनिक मीडिया रिपोर्टों एवं उपलब्ध कंपनी संबंधी स्रोतों पर आधारित हैं। ₹1,000 करोड़ की वैल्यूएशन को मई 2026 में रिपोर्ट हुई प्रस्तावित/बातचीत वाली फंडिंग के संदर्भ में समझना चाहिए; यह निवेश सलाह नहीं है।

₹30 हजार की नौकरी छोड़कर ₹15 लाख से खड़ी की क्रेन कंपनी, आज ACE बनी हजारों करोड़ की कंपनीकभी-कभी बड़ी सफलता की शुरुआत कि...
03/09/2026

₹30 हजार की नौकरी छोड़कर ₹15 लाख से खड़ी की क्रेन कंपनी, आज ACE बनी हजारों करोड़ की कंपनी

कभी-कभी बड़ी सफलता की शुरुआत किसी बड़े ऑफिस, करोड़ों की पूंजी या विरासत में मिले कारोबार से नहीं होती। इसकी शुरुआत होती है एक भरोसे, एक विचार और जोखिम उठाने के साहस से। विजय अग्रवाल की कहानी इसका एक शानदार उदाहरण है। उन्होंने एक स्थिर नौकरी और अच्छी सैलरी को छोड़कर अपना कारोबार शुरू करने का फैसला किया और आगे चलकर Action Construction Equipment Ltd. (ACE) को भारत की प्रमुख निर्माण उपकरण कंपनियों में शामिल कर दिया।

₹30 हजार की नौकरी से उद्यमिता की ओर

विजय अग्रवाल ने दिल्ली के Faculty of Management Studies (FMS) से पढ़ाई की और बाद में Escorts में काम किया। 1995 में उन्हें करीब ₹30,000 प्रति माह वेतन मिलता था। उस समय यह एक अच्छी और सुरक्षित नौकरी मानी जा सकती थी, लेकिन उनके मन में अपना व्यवसाय खड़ा करने की इच्छा थी। आखिरकार उन्होंने नौकरी छोड़ने का कठिन फैसला लिया।

सबसे खास बात यह थी कि उन्होंने शुरुआत किसी बड़े औद्योगिक परिसर से नहीं की। जनवरी 1995 में उन्होंने फरीदाबाद में एक साधारण टेंट के नीचे अपने कारोबार की शुरुआत की। उनके पास शुरुआत के लिए लगभग ₹15 लाख थे, जो उनकी बचत और Provident Fund से आए थे।

आज जब हम ACE के बड़े प्लांट, भारी मशीनरी और विशाल कारोबारी पैमाने को देखते हैं, तो यह कल्पना करना मुश्किल है कि इसकी शुरुआत इतनी छोटी पूंजी और सीमित संसाधनों से हुई थी।

पहला लक्ष्य था—उत्पाद बनाना, भरोसा कमाना

व्यवसाय शुरू करना आसान नहीं था। खासकर भारी मशीनरी के क्षेत्र में जहां बड़ी कंपनियां पहले से मौजूद थीं। लेकिन विजय अग्रवाल ने अपने अनुभव, तकनीकी समझ और पुराने व्यावसायिक संबंधों का इस्तेमाल किया।

शुरुआती दौर में उन्होंने कारोबार से होने वाले पैसे को व्यक्तिगत खर्चों में निकालने के बजाय दोबारा व्यवसाय में लगाया। यही कारण था कि उन्हें अपनी मेहनत का व्यक्तिगत आर्थिक लाभ पाने के लिए कई वर्षों तक इंतजार करना पड़ा।

उनकी सबसे बड़ी ताकत केवल पैसा नहीं, बल्कि विश्वास और रिश्ते थे। शुरुआती दिनों में कई vendors ने उन्हें भुगतान की तत्काल क्षमता न होने के बावजूद इंजन, स्टील, गियर और दूसरे components उपलब्ध कराए। उनके लिए विजय अग्रवाल की बात और पुराने कारोबारी संबंध काफी मायने रखते थे।

यह किसी भी entrepreneur के लिए बड़ा सबक है—बिजनेस केवल पूंजी से नहीं, reputation और relationships से भी बनता है।

शुरुआत में ही मिली बड़ी चुनौती

ACE की यात्रा हमेशा आसान नहीं रही। कंपनी को अपने शुरुआती वर्षों में कानूनी विवाद का सामना भी करना पड़ा। उनके पूर्व employer Escorts की ओर से copyright, drawings, technology और intellectual property से जुड़े आरोप लगाए गए और ACE की बाजार में बिक्री पर रोक लगाने वाली कानूनी कार्रवाई हुई।

ऐसे समय में कोई नया entrepreneur शायद अपना कारोबार बंद करने के बारे में सोच सकता था। लेकिन विजय अग्रवाल पीछे नहीं हटे। उन्होंने कानूनी लड़ाई लड़ी और लगभग दो वर्षों तक इस चुनौती का सामना किया। 1997 में ACE के खिलाफ लगी injunction हट गई और कंपनी ने फिर अपने विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाया।

यहीं उनकी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सामने आता है—मुश्किल आने पर रास्ता बदलना और लक्ष्य छोड़ देना दो अलग-अलग बातें हैं।

छोटे कारोबार से बड़े उद्योग तक

ACE ने धीरे-धीरे cranes के साथ अपनी product range बढ़ाई। कंपनी ने tower cranes, loaders, forklift trucks, pick-and-carry cranes और अन्य construction equipment के क्षेत्र में विस्तार किया। समय के साथ कंपनी ने export market में भी कदम बढ़ाया।

2006 में ACE का IPO आया, जिसने कंपनी को आगे विस्तार के लिए पूंजी जुटाने में मदद की। उस समय तक कंपनी का कारोबार शुरुआती दौर की तुलना में कई गुना बढ़ चुका था।

आज Action Construction Equipment एक listed company है और cranes के साथ-साथ material handling, road construction तथा agriculture equipment जैसे क्षेत्रों में भी काम करती है। कंपनी के उत्पादों में hydraulic mobile cranes, tower cranes, forklifts, backhoe loaders, tractors और agricultural equipment शामिल हैं।

आज कितनी बड़ी है ACE?

यहां इमेज में लिखे ₹1,360 करोड़ के आंकड़े को वर्तमान कंपनी valuation समझना सही नहीं होगा। उपलब्ध सितंबर 2026 के बाजार आंकड़ों के अनुसार Action Construction Equipment की market capitalisation लगभग ₹13,000 करोड़ के आसपास है और शेयर की कीमत लगभग ₹1,090–₹1,120 के स्तर पर रही है। Market cap शेयर की कीमत के साथ लगातार बदलती रहती है।

कंपनी की मौजूदा स्थिति इस बात को दिखाती है कि 1995 में ₹15 लाख से शुरू हुई यात्रा ने कितना बड़ा आकार लिया है। ACE आज भारत में Pick & Carry cranes की प्रमुख निर्माता कंपनियों में है और उपलब्ध कंपनी/बाजार आंकड़ों के अनुसार mobile cranes में इसकी घरेलू हिस्सेदारी 63% से अधिक तथा tower cranes में 60% से अधिक बताई जाती है।

FY26 में कंपनी ने लगभग ₹3,280 करोड़ का revenue और ₹415 करोड़ का net profit दर्ज किया था; जून 2026 की तिमाही में revenue करीब ₹786 करोड़ और net profit करीब ₹119 करोड़ रहा।

सफलता का असली रहस्य

विजय अग्रवाल की कहानी में सबसे प्रेरणादायक बात करोड़ों की valuation नहीं है। असली प्रेरणा यह है कि उन्होंने नौकरी की सुरक्षा के बदले अपने vision को चुना।

उन्होंने शुरुआत में यह नहीं सोचा कि कंपनी कितने हजार करोड़ की बनेगी। उनका पहला लक्ष्य था—एक अच्छा product बनाना, ग्राहक का विश्वास जीतना और कारोबार को धीरे-धीरे आगे बढ़ाना।

उनकी यात्रा हमें बताती है कि entrepreneurship में केवल पैसा लगाना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए चाहिए—

सही अनुभव, जोखिम उठाने का साहस, लंबे समय तक धैर्य, ग्राहक का विश्वास और कठिन परिस्थितियों में टिके रहने की क्षमता।

₹15 लाख से शुरुआत करने वाला व्यक्ति आज एक ऐसी listed company से जुड़ा है जिसकी market value हजारों करोड़ रुपये में है। यही वजह है कि विजय अग्रवाल की कहानी उन लोगों के लिए प्रेरणादायक बनती है जो मानते हैं कि सफल होने के लिए शुरुआत से ही बहुत बड़ी पूंजी जरूरी है।

कभी-कभी शुरुआत छोटी होती है, लेकिन सोच बड़ी हो तो वही छोटी शुरुआत भविष्य में बड़ा उद्योग बन सकती है।

डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध सार्वजनिक स्रोतों और कंपनी/बाजार से संबंधित प्रकाशित जानकारी के आधार पर तैयार किया गया है। Market capitalisation, शेयर मूल्य और अन्य वित्तीय आंकड़े समय के साथ बदलते रहते हैं। इसे निवेश सलाह या किसी कंपनी के शेयर खरीदने/बेचने की सिफारिश न माना जाए।

🇮🇳 भारत से अफ्रीका तक प्रतीक सूरी की कहानीसंघर्ष, जोखिम और अरबों डॉलर के साम्राज्य तक पहुंचने का सफरकभी-कभी किसी बिजनेस ...
03/09/2026

🇮🇳 भारत से अफ्रीका तक प्रतीक सूरी की कहानी

संघर्ष, जोखिम और अरबों डॉलर के साम्राज्य तक पहुंचने का सफर

कभी-कभी किसी बिजनेस की शुरुआत बड़ी पूंजी, मजबूत नेटवर्क या किसी बड़े कारोबारी परिवार से नहीं होती, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के सपने से होती है जो बाजार की जरूरत को बाकी लोगों से पहले पहचान लेता है। प्रतीक सूरी की कहानी भी इसी तरह की महत्वाकांक्षा और अफ्रीकी बाजार को समझने की कोशिश से जुड़ी हुई है।

भारत में जन्मे प्रतीक सूरी ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने नौकरी और कारोबार के शुरुआती अनुभव हासिल किए। लेकिन उनका लक्ष्य केवल एक अच्छी नौकरी करना नहीं था। वे ऐसा कारोबार खड़ा करना चाहते थे जिसका विस्तार भारत से बाहर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक हो।

शुरुआती दौर में उन्हें भी आसान रास्ता नहीं मिला। बिजनेस में पूंजी, बाजार की समझ, सही ग्राहक और भरोसेमंद नेटवर्क बनाना किसी नए उद्यमी के लिए बड़ी चुनौती होती है। सूरी ने इसी दौरान अफ्रीकी बाजार की ओर अपना ध्यान केंद्रित किया।

अफ्रीका में दिखाई बड़ा अवसर

अफ्रीका लंबे समय से दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिए एक उभरता हुआ बाजार रहा है। यहां तेजी से बढ़ती युवा आबादी, बढ़ती शहरीकरण दर और टेक्नोलॉजी की बढ़ती मांग ने नए कारोबार के लिए अवसर पैदा किए हैं।

प्रतीक सूरी ने इसी अवसर को पहचाना। वर्ष 2012 के आसपास उन्होंने Maser Group की शुरुआत की और अफ्रीकी बाजार के लिए किफायती इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों पर ध्यान केंद्रित किया। शुरुआत में कंपनी का फोकस स्मार्ट टीवी और दूसरे कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों पर था।

उनकी रणनीति साधारण लेकिन प्रभावी थी—ऐसे उत्पाद उपलब्ध कराना जो अफ्रीकी ग्राहकों की जरूरत और उनकी खरीद क्षमता के अनुरूप हों।

यहीं से उनकी कारोबारी यात्रा ने रफ्तार पकड़नी शुरू की।

छोटी शुरुआत से बड़ा कारोबार

सूरी ने केवल उत्पाद बेचने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि धीरे-धीरे अपने कारोबार को अलग-अलग बाजारों में फैलाने की कोशिश की। Maser ने टेलीविजन के अलावा घरेलू इलेक्ट्रॉनिक्स और टेक्नोलॉजी से जुड़े दूसरे क्षेत्रों में विस्तार किया।

कुछ रिपोर्टों के अनुसार कंपनी ने अफ्रीका में 8 लाख से अधिक टेलीविजन यूनिट बेचने का दावा किया और कारोबार का विस्तार कई अफ्रीकी देशों तक हुआ।

यह सफर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अफ्रीका जैसे विविध और चुनौतीपूर्ण महाद्वीप में किसी ब्रांड के लिए अलग-अलग देशों के बाजार, वितरण व्यवस्था और ग्राहकों की जरूरतों को समझना आसान नहीं होता।

सूरी ने इसी चुनौती को अवसर में बदलने की कोशिश की।

टेक्नोलॉजी से आगे बढ़कर निवेश की दुनिया

Maser Group के विस्तार के बाद प्रतीक सूरी ने अपना ध्यान केवल कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने MDR Investments के जरिए अफ्रीका के भविष्य से जुड़े क्षेत्रों में निवेश की दिशा में कदम बढ़ाया।

इनमें इंफ्रास्ट्रक्चर, AI, डेटा सेंटर, लॉजिस्टिक्स, शिपिंग और माइनिंग जैसे क्षेत्र शामिल बताए जाते हैं।

इससे उनकी कहानी एक इलेक्ट्रॉनिक्स कारोबारी से आगे बढ़कर एक विविध कारोबारी समूह बनाने वाले उद्यमी की कहानी बन गई।

$5 बिलियन की वैल्यूएशन का दावा

प्रतीक सूरी से जुड़ी कई मीडिया रिपोर्टों में Maser Group की वैल्यूएशन $5 बिलियन से अधिक बताई गई है। भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग ₹44,000–45,000 करोड़ के आसपास बैठती है, इसलिए वायरल पोस्टों में ₹45,000 करोड़ के साम्राज्य जैसी बातें दिखाई देती हैं।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है—कंपनी की वैल्यूएशन और किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत संपत्ति एक ही चीज नहीं होती।

इसी तरह सूरी की व्यक्तिगत नेटवर्थ को लेकर भी अलग-अलग रिपोर्टों में अलग-अलग आंकड़े प्रकाशित हुए हैं। 2026 की कुछ मीडिया रिपोर्टों में उनकी अनुमानित संपत्ति करीब $1.9 बिलियन बताई गई है।

इसलिए ₹45,000 करोड़ को सीधे उनकी व्यक्तिगत संपत्ति कहना सही नहीं होगा।

सफलता के पीछे सबसे बड़ा सबक

प्रतीक सूरी की कहानी का सबसे बड़ा सबक केवल करोड़ों या अरबों डॉलर की संपत्ति नहीं है।

उनकी कहानी यह दिखाती है कि किसी नए बाजार को समझना भी अपने आप में एक बड़ी कारोबारी ताकत हो सकती है।

जहां कई कंपनियां अफ्रीका को केवल एक उभरते हुए बाजार के रूप में देख रही थीं, वहीं सूरी ने वहां की स्थानीय जरूरतों को समझकर किफायती इलेक्ट्रॉनिक्स के जरिए अपना स्थान बनाने की कोशिश की।

एक उद्यमी के लिए यही सबसे महत्वपूर्ण चीज होती है—दूसरों की नकल करने के बजाय यह समझना कि ग्राहक वास्तव में क्या चाहता है।

आज कहां खड़े हैं प्रतीक सूरी?

आज प्रतीक सूरी को अफ्रीका से जुड़े कारोबारी जगत में एक चर्चित भारतीय मूल के उद्यमी के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है। उनका नाम टेक्नोलॉजी, निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर और माइनिंग जैसे अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी रिपोर्टों में सामने आता है।

हालांकि उनके बारे में प्रकाशित कई बड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि हर जगह उपलब्ध नहीं है। मई 2026 में Billionaires.Africa ने उनकी अरबपति स्थिति, Maser Group के कथित $5 बिलियन सौदे और कंपनी से जुड़े कई दावों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठाए थे। उस रिपोर्ट के अनुसार कुछ दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी।

इसलिए प्रतीक सूरी की कहानी को पढ़ते समय सफलता की प्रेरणा के साथ-साथ फैक्ट और प्रचार के बीच अंतर समझना भी जरूरी है।

निष्कर्ष

प्रतीक सूरी की यात्रा भारत से शुरू होकर अफ्रीका के कारोबारी बाजार तक पहुंचने वाली कहानी है। एक नए बाजार में अवसर तलाशना, टेक्नोलॉजी को स्थानीय जरूरतों से जोड़ना और फिर कारोबार को निवेश तथा दूसरे क्षेत्रों तक ले जाने की कोशिश उनकी यात्रा की प्रमुख विशेषताएं हैं।

उनकी कहानी से युवा उद्यमियों को यह सीख मिलती है कि बड़ा सपना देखने के साथ बाजार को समझना, जोखिम उठाना, लगातार सीखना और सही अवसर पर दांव लगाना भी जरूरी है।

लेकिन किसी भी वायरल सफलता की कहानी में दिखाई जाने वाली वैल्यूएशन या नेटवर्थ को अंतिम सत्य मानने से पहले स्वतंत्र और विश्वसनीय स्रोतों से उसकी पुष्टि करना उतना ही जरूरी है।

डिस्क्लेमर: यह पोस्ट उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों और सार्वजनिक स्रोतों पर आधारित है। प्रतीक सूरी, Maser Group की वैल्यूएशन, राजस्व, अधिग्रहण और व्यक्तिगत नेटवर्थ से जुड़े आंकड़ों में विभिन्न स्रोतों के बीच अंतर पाया जाता है तथा कुछ दावों पर स्वतंत्र मीडिया रिपोर्टों ने सवाल भी उठाए हैं। इसलिए ₹45,000 करोड़ की वैल्यूएशन या अरबों डॉलर की नेटवर्थ को यहां प्रमाणित व्यक्तिगत संपत्ति के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। यह पोस्ट केवल जानकारी और प्रेरणात्मक उद्देश्य से है, निवेश या वित्तीय सलाह नहीं।

राजीव बैद: किशनगंज स्टेशन पर चाय बेचने से लेकर चाय उद्योग के बड़े कारोबारी बनने तकराजीव बैद की कहानी उन उद्यमियों में शा...
03/09/2026

राजीव बैद: किशनगंज स्टेशन पर चाय बेचने से लेकर चाय उद्योग के बड़े कारोबारी बनने तक

राजीव बैद की कहानी उन उद्यमियों में शामिल है, जिनकी शुरुआत किसी बड़े ऑफिस, करोड़ों की पूंजी या पारिवारिक कारोबारी विरासत से नहीं हुई। बिहार के किशनगंज में रेलवे स्टेशन और बस स्टॉप पर चाय बेचने वाले एक किशोर ने आगे चलकर चाय के पूरे कारोबार को समझने की कोशिश की और इसी अनुभव को अपना बिजनेस बनाने की नींव बनाया। आज वे Chai Chun के Founder & Managing Director, Evergreen Group से जुड़े कारोबारी और दार्जिलिंग के प्रसिद्ध Okayti Tea Estate के मालिक हैं।

राजीव बैद का बचपन आर्थिक रूप से आसान नहीं था। वे नौ भाई-बहनों में पांचवें थे और परिवार की जिम्मेदारी मुख्य रूप से उनके पिता पर थी। किशोरावस्था में ही उन्हें महसूस हो गया था कि अगर जीवन में आगे बढ़ना है तो खुद कुछ करना होगा। करीब 13-14 वर्ष की उम्र में उन्होंने किशनगंज के रेलवे स्टेशन और बस स्टॉप पर चाय बेचना शुरू किया।

लेकिन उनकी सोच सिर्फ चाय बेचने तक सीमित नहीं थी।

उन्होंने देखा कि स्टेशन और बस स्टॉप पर चाय की जबरदस्त मांग है। इसके बाद उन्होंने एक अलग तरीका अपनाया। वह केवल कप बेचने के बजाय थोक में चाय खरीदकर रेलवे लाइन और बस स्टैंड के आसपास मौजूद छोटी चाय की दुकानों को सप्लाई करने लगे। इससे उन्हें कम मात्रा में ग्राहकों को बेचने की तुलना में ज्यादा मात्रा में कारोबार करने का अवसर मिला। यही छोटा-सा बदलाव उनके कारोबारी सफर का महत्वपूर्ण मोड़ बना।

चाय बेचने वाले से चाय कारोबारी तक

राजीव ने चाय के कारोबार को सिर्फ खरीद-बिक्री के रूप में नहीं देखा। उन्होंने धीरे-धीरे चाय की गुणवत्ता, उत्पादन और बाजार को समझना शुरू किया।

बिहार में पहली चाय फैक्ट्री स्थापित होने के बाद उन्होंने वहां बनने वाली चाय की बिक्री के लिए सेल्समैन के रूप में काम किया। उनकी बिक्री क्षमता और मेहनत से प्रभावित होकर उन्हें आगे चलकर कंपनी में काम करने के साथ-साथ साझेदारी का अवसर भी मिला। राजीव के मुताबिक, यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण टर्निंग पॉइंट था।

यहीं से उन्होंने चाय उद्योग को जमीन से लेकर फैक्ट्री और बाजार तक समझना शुरू किया।

साल 2002 में उन्होंने M/S Apex Tea Exports Pvt. Ltd. की स्थापना की। इसके बाद 2012 में Evergreen Group की शुरुआत हुई। समूह के कारोबार में Aman Tea से जुड़ी कंपनियां भी शामिल हुईं।

फिर आया Chai Chun का विचार

राजीव बैद ने चाय के कारोबार में काम करते हुए महसूस किया कि चाय बागान से ग्राहक तक पहुंचने में कई स्तर के बिचौलिये और लंबी सप्लाई चेन होती है। इससे चाय की ताजगी, स्वाद और गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

इसी सोच से उन्होंने ऐसा ब्रांड बनाने का फैसला किया जो अलग-अलग क्षेत्रों की प्रीमियम चाय को सीधे ग्राहकों तक पहुंचा सके।

2015 में Chai Chun की शुरुआत हुई। पहला स्टोर सिलिगुड़ी में खोला गया। Chai Chun को पारंपरिक चाय की दुकान के बजाय एक प्रीमियम Tea Boutique के रूप में विकसित किया गया, जहां ग्राहकों को अलग-अलग किस्म की चाय चुनने और उसका अनुभव लेने का अवसर मिलता है।

ब्रांड ने 165 से ज्यादा तरह की चाय और अलग-अलग ब्लेंड उपलब्ध कराने का दावा किया है। इसमें ब्लैक, ग्रीन, व्हाइट, ऊलॉन्ग, हर्बल और फ्लेवर्ड टी जैसी कई श्रेणियां शामिल हैं।

कारोबार को खेत से कप तक ले गए

राजीव की खासियत यह रही कि उन्होंने केवल चाय बेचने वाला ब्रांड नहीं बनाया, बल्कि धीरे-धीरे पूरी वैल्यू चेन में अपनी मौजूदगी बढ़ाई।

Evergreen Group के तहत चाय निर्माण की सुविधाएं विकसित की गईं। कंपनी की वेबसाइट के अनुसार समूह हर साल लगभग 1.25 करोड़ किलोग्राम चाय का उत्पादन करता है। पश्चिम बंगाल और बिहार में उसके चाय उत्पादन से जुड़े कारखाने और चाय बागान हैं।

उनकी यात्रा का एक और बड़ा पड़ाव Okayti Tea Estate रहा।

दार्जिलिंग का Okayti एक ऐतिहासिक चाय एस्टेट है, जिसका इतिहास 19वीं सदी तक जाता है। राजीव बैद ने इसे अपने कारोबार का हिस्सा बनाया और प्रीमियम दार्जिलिंग चाय के बाजार में अपनी स्थिति मजबूत की।

आज उनका कारोबार केवल ग्राहकों को चाय बेचने तक सीमित नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार उनका समूह बड़ी कंपनियों को भी CTC चाय की सप्लाई करता है, जिनमें Tata Tea, Goodricke Group और Hindustan Unilever जैसी कंपनियों के नाम बताए गए हैं।

कितनी बड़ी है उनकी कंपनी?

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

Rajeev Baid की कंपनियां कोई सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनी नहीं हैं, इसलिए शेयर बाजार जैसी रोजाना बदलने वाली आधिकारिक मार्केट कैप उपलब्ध नहीं है। इंटरनेट पर अगर कहीं उनकी कंपनी की कोई निश्चित "₹X करोड़ वैल्यूएशन" दिखाई देती है तो उसे बिना वित्तीय दस्तावेज के प्रमाणित आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा।

लेकिन कारोबार का पैमाना छोटा भी नहीं है। कंपनी के अनुसार Evergreen Group का उत्पादन करोड़ों किलोग्राम चाय सालाना है, उसके पास चाय निर्माण की सुविधाएं और बागान हैं, जबकि Chai Chun ने प्रीमियम रिटेल सेगमेंट में विस्तार किया है।

इसलिए राजीव बैद की सफलता को केवल किसी एक कंपनी की वैल्यूएशन से मापना सही नहीं होगा। उनकी असली कारोबारी ताकत चाय की पूरी वैल्यू चेन—खरीद, निर्माण, बागान, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और रिटेल—में बनाई गई मौजूदगी है।

संघर्ष से मिली सबसे बड़ी सीख

राजीव बैद की कहानी की सबसे बड़ी बात यह नहीं है कि उन्होंने चाय बेचकर बड़ा कारोबार बनाया। असली बात यह है कि उन्होंने चाय बेचते समय ही चाय के बिजनेस को समझना शुरू कर दिया।

जहां दूसरा व्यक्ति स्टेशन पर चाय बेचकर केवल दिन की कमाई देख सकता था, राजीव ने उसी जगह से बाजार की मांग को समझा। फिर उन्होंने खुदरा बिक्री से थोक सप्लाई की ओर कदम बढ़ाया, फैक्ट्री का अनुभव लिया, साझेदारी हासिल की, अपनी कंपनियां शुरू कीं और आखिरकार खुद चाय बागान तक पहुंच गए।

उनकी कहानी यह दिखाती है कि छोटी शुरुआत अपने आप में छोटी मंजिल तय नहीं करती। अगर व्यक्ति लगातार सीखता रहे और अवसरों को पहचानता रहे तो वही छोटा अनुभव भविष्य में बड़े कारोबार की नींव बन सकता है।

आज किशनगंज के रेलवे स्टेशन और बस स्टॉप पर चाय बेचने वाले किशोर से लेकर Chai Chun, Evergreen और Okayti जैसे कारोबारों तक का राजीव बैद का सफर भारतीय उद्यमिता की एक प्रेरणादायक मिसाल है।

डिस्क्लेमर: राजीव बैद या उनके निजी कारोबारी समूह की वर्तमान कुल वैल्यूएशन/नेटवर्थ का कोई विश्वसनीय सार्वजनिक और ऑडिटेड आंकड़ा मुझे उपलब्ध नहीं मिला। इसलिए ऊपर कोई अनुमानित नेटवर्थ या मनगढ़ंत वैल्यूएशन नहीं जोड़ी गई है। उत्पादन क्षमता, कंपनियों और कारोबार से जुड़े आंकड़े उपलब्ध कंपनी/मीडिया स्रोतों के आधार पर दिए गए हैं।

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