14/01/2026
संक्रांति 14 या 15 जनवरी को !
'सनातन धर्म ' में ( हिंदू मैं भी नहीं कहूंगा , क्योंकि सनातन अलग है ,हिंदू अलग - मैं हिंदू हूँ, सनातनी नहीं ) किसी ग्रंथ में किसी पर्व और त्योहार का वर्णन नहीं है । पता नहीं क्यों?
अब सरकार की मानें तो हिंदु त्योहार में सबसे बड़ा त्योहार होली है , उसके बाद चैत्र नवमी , दशहरा और दीपावली है । इनका जिक्र किसी ग्रंथ में नहीं आता है । क्यों और कब से मनाई जानी शुरु हुई थी । अपनी - अपनी मनगढ़ंत कहानियां हैं ।
लोकल त्योहार में तरह तरह के व्रत हैं । जैसे सोमवार व्रत ( भगवान शिव के लिए ) , मंगल व्रत ( भगवान हनुमान के लिए ) , बुध ( भगवान बुध के लिए ) , बृहस्पति ( विष्णु या वृहस्पति के लिए ) , शुक्र ( लक्ष्मी या संतोषी मां के लिए ) , शनि ( शनि देवता के लिए ) ,रवि ( सूर्य के लिए )
जिसको जो व्रत रूचे कर लेता है । यह सारे व्रत बिहार और पुर्वांचल की देन हैं । देवताओं को फिक्स करना बाद का काम है । इसके बाद एकादशी, चतुर्दशी, पूर्णमासी के लोग व्रत रहते हैं ।
व्रतों का महापर्व है - छठ व्रत । इसकी भी चर्चा ' सनातनी ग्रंथो मे नहीं है । सनातनी ग्रंथों के पितामह - ऋग्वेद में बिहार को व्रात्य प्रदेश भी कहा गया है और उसकी निंदा की गई है । ये कर्महीन,यज्ञहीन, व्रात्य ( व्रत - त्योहार) मनाने वाले लोग हैं । ये लोग ब्राह्मण को न दान - दक्षिण देते हैं और न सम्मान करते हैं । यज्ञ और हवन तो बिल्कुल नहीं करते हैं । इनसे दूर रहे और आर्य वहां जाने से परहेज़ करें ।
इससे जाहिर होता है कि व्रतधारी ( संकल्प धारी ) त्योहार और तीर्थ की जननी बिहार है , ब्राह्मण नहीं ।
इसी तरह एक त्योहार है - मकर संक्रांति, जिसे चूड़ा - दही और खिचड़ी भी कहते हैं । माघी मेला का प्रचलन है । यह एक astronomical event पर आधारित है ।
👉 Astronomy यह है कि पृथ्वी सूर्य का घूर्णन करती है ,लेकिन सूर्य भी सारे ग्रहों के साथ एक elliptical path पर भ्रमण करता है । इस पाथ के 360⁰ को 12 बराबर राशियों में बांट दिया गया है, हरेक भाग 30⁰ का होता है । इन बारह भाग को राशि कहते हैं , अंग्रेजी में Zodiac. यह एक निश्चित गति का परिक्रमण है । न सूर्य की गति बदल रही है , न पाथ की डिग्री।
👉 बारह राशि - मेष , वृष , मिथुन, कर्क ,सिंह , तुला, कन्या, वृश्चिक, धनु , मकर , कुंभ ,मीन हैं । जिसने भी खोज किया हो ,लेकिन सूर्य के पथ को उसने बड़ी बारीकी से अध्ययन किया होगा । इन सारी राशियों के नाम , रात में बने तारे के आकार पर सुनिश्चित किया गया है । अगर सूर्य धनु राशि में हां तो कुछ तारे धनुष का आकार बनाते हैं ।
👉 यह भी सच है कि ब्राह्मण इसके Originator नहीं है । अगर रहते तो इस विद्या को विकृत नहीं करते ,और पाप - पुण्य , भाग्य - भविष्य का वाचन नहीं करते । इसे आगे बढ़ाते।
👉 ज्योतिष के अनुसार - सूर्य जब धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करता है तो उस दिन मकर संक्रांति का दिवस होता है । सूर्य उत्तरायण होते हैं और यह माना जाता है शिशिर ऋतु समाप्त हो गया , बसंत का आगमन हो गया । इस दिन से लोग ठंड की ठिठुरन से निजात पाते हैं ,इसलिए गंगा स्नान का प्रवधान बनाया गया था / है । इसके बाद तिल + गुड़ + भुने हुए चावल की लाई ( तिलवा ) , तिलकुट और दही - चूड़ा खाने का रिवाज डला होगा । इस सीजन का यहीं उत्पाद हैं । फिर मेला घूमिए, शाम को आकर खिचड़ी खाइए । खिचड़ी इसलिए कि चावल का चूड़ा गरिष्ठ होता है , पेट फूल जाता है । खिचड़ी सुपाच्य । इसमें कोई पाप और पुण्य नहीं है । चावल छुते हैं और किसी भिखमंगे को उस चावल को दान कर देते हैं ।
👉 इस त्योहार को जिसने भी शुरआत की होगी , उसने प्रपंच तो नहीं रचा । लेकिन ब्राह्मण तो सूर्य की गति को रोक देते हैं । वह रुक जाता है और फिर 14 जनवरी नहीं 15 जनवरी को मकर राशि में प्रवेश करता है । इसमें भी घड़ी निश्चित रहती है ,कितने से रुकने बजे तक शुभ है और कितने बजे तक अशुभ । पता नहीं पंडा कौन सा दूरबीन फीट कर रखे हैं , अंतरिक्ष में , उनको सूर्य की गति और दशा साफ - साफ दिखती है । NASA को बिल्कुल नहीं दिखती।
👉 अभी तक खगोल वैज्ञानिक यह तो मानते हैं कि सूर्य अपने पथ पर परिक्रमा करता है ,लेकिन उसे वह काल्पनिक पाथ ही मानते हैं ।
👉 खैर ,इसी तरह का कर्क संक्रांति होती है - जब सूर्य मिथुन से कर्क राशि में प्रवेश करता है । इसका भी खगोलीय डेट फिक्स है - 14 अप्रैल । आज से करीब पांच राशि दूर । एक राशि का सफर सूर्य 28 दिन में पूरा कर लेता है । इस दिन बिहार में "सतुआन ' पर्व मनाया जाता है । सतुआ और आम का टिकोरा का चटनी या आम खाया जाता है । सतू - जौ , गेहूं , खेसारी,चना कुछ का भी हो सकता है । ये भी उस समय का उपलब्ध फसल हैं । हांलांकि इस पर्व को लोग बहुत कम जानते हैं ,इसलिए इसका डेट पर विवाद नहीं होता है न ब्राह्मण वहां घुसपैठ करने की कोशिश करते हैं । क्योंकि वहां दान - दक्षिणा का प्रचलन नहीं हुआ है ।
इतिहास में अगर ज्योतिष शास्त्र की चर्चा हुई है तो कहा गया है कि आजीवक ज्योतिष सरकार को सलाह देते थे कि कब और किस समय कौन काम करना है । मतलब मौसम और जीव विज्ञान का भरपूर ज्ञान था उन्हें । बिंदुसार के दरबार में आजीवक ज्योतिष थे , नंद के दरबार में भी । आजीवक के इस विद्या को ब्राह्मण धर्मियों ने कर्मकांड बना दिया । पाप - पुण्य और शुभ - अशुभ का खेल ।
👉 हांलांकि हमारे बचपन में भी 14 जनवरी और 15 जनवरी पर विवाद होते हुए देखा है । लोग कंफ्यूज होकर दोनों दिन मना लेते थे । इससे सहूलियत और फायदा केवल एक वर्ण को होता है । विवाद अगर फायदे वाली चीज है तो उसे बढ़ावा देने में क्या हर्ज है ?
वैसे सही चीज में जब गलत चीज और स्वार्थ मिक्स होता है तो उसे करप्शन कहते हैं । दर्शन करप्ट हुआ है तो उसे हिंदू ही सुधारेंगे, सनातनी तो करप्शन का बढ़ावा देते हैं ।