09/11/2021
* अधूरा *
कभी कभी खुद को
अधूरा सा महसूस करता हूँ
पर सच तो यह है
कि पूरा तो कभी था ही नहीं ।
जब खुशी थी
तब दर्द नहीं था
और बिन दर्द के
वो खुशी कुछ कम सी थी
दर्द मिला तो
खुशी कहीं खो गयी
जब दोनों मिले एक साथ
तो नाकाफ़ी थे दोनों ही ।
कुछ इच्छाएं हैं
जो कभी पूरी न हो पाईं
कुछ पूरी हो कर भी
अधूरी सी रहीं
हर पूरी हुई तमन्ना ने
एक नई कामना को जन्म दिया
और यह सिलसिला
आज भी जारी है ।
हर पल कुछ खोजता रहा
कभी खुद को
कभी खुदा को
कभी जवाब
तो कभी सवाल
ढूंढता ही रहा कुछ न कुछ
ऐसी ही एक तलाश
दिल को निरंतर
टटोलती रहती है ।
एक तन्हाई है
जो रातों में सताती है
कभी वही तन्हाई
बुलाती है
दो पल गुफ़्तगू करने...
अकेलेपन से
डर सा लगता है
और वही डर
भीड़ से भी ।
कभी दिन कटते हैं
रात की राह तकते
कभी रातें नहीं कटती
सुबह के इंतज़ार में
कभी महीने बीत जाते हैं
एक पल की आस में
कभी एक पल भी
एक अरसा सा लगता है ।
कभी कभी लगता है
पूरेपन की आरज़ू ही
अधूरेपन का
एहसास कराती है
क्योंकि कमियाँ ही तो
प्यास जगाती हैं...
लेकिन शायद अधूरा रहना ही
ज़िन्दगी है
क्योंकि ज़िन्दगी भी तो
मौत के बिन
अधूरी है ।