13/08/2026
वो एक अजनबी थी…
ना कोई पहचान, ना कोई उम्मीद। बस एक छोटी सी मुलाकात हुई, फिर बातों का सिलसिला शुरू हुआ। धीरे-धीरे बातें आदत बन गईं और आदत कब रिश्ते में बदल गई, पता ही नहीं चला।
समय के साथ दोनों के बीच नज़दीकियां बढ़ती गईं। हंसी, मज़ाक, छोटे-छोटे झगड़े, फिर मनाना—सब कुछ चलता रहा। दोनों ने एक-दूसरे से वादा किया था कि सुख-दुख हर हाल में साथ देंगे। रिश्ता सच्चा था, या कम से कम उसे ऐसा ही लगता था।
लड़की उसी शहर में नौकरी करती थी, जहां लड़का रहता था। लेकिन उसकी कहानी आसान नहीं थी… वो रोज़ 100 किलोमीटर का सफर तय करके आती थी। सुबह 4 बजे घर से निकलती, लंबा सफर तय करती और सुबह 8 बजे जब लड़के से मिलती… तो चेहरे पर थकान नहीं, सिर्फ मुस्कान होती थी। जैसे उसकी सारी थकान उसी एक मुलाकात में खत्म हो जाती हो।
यह सिलसिला यूँ ही चलता रहा। दोनों रोज़ मिलते, बातें करते, साथ समय बिताते। दुनिया से अलग एक छोटी सी दुनिया बस गई थी उनकी।
फिर एक दिन…
सुबह लड़की का मैसेज आया—
“पहली ट्रेन छूट गई, दूसरी से आ रही हूँ।”
लड़के ने बस एक छोटा सा जवाब दिया— “ओके।”
लेकिन शायद उस दिन कुछ बदल चुका था।
करीब एक घंटे बाद लड़का यूँ ही लड़की के काम करने वाली जगह की तरफ निकल गया। वहाँ उसने कुछ लोगों से बात की, कुछ जानकारी ली और फिर अनजाने में, दूसरों के मोबाइल से उसकी कमी की बातें भी कह दीं।
शायद यही उसकी सबसे बड़ी गलती थी… या शायद नहीं।
उसने फोन पर भी लड़की को उसकी कमी बताई, लेकिन उसके बाद… सब कुछ बदल गया।
जो लड़की कभी कहती थी—
“तुम्हारे बिना जिंदगी अधूरी है…”
वही लड़की अब उसके मैसेज का जवाब तक नहीं दे रही थी।
दिन ढलने लगा, लेकिन लड़के की उम्मीद नहीं टूटी।
वो हमेशा की तरह उसी स्टैंड पर पहुंचा, जहां दोनों रोज़ मिलते थे।
हर आती-जाती भीड़ में वो उसे ढूंढता रहा…
हर चेहरे में उसकी झलक तलाशता रहा…
लेकिन वो नहीं आई।
आखिरकार उसने मैसेज किया—
“कहाँ हो?”
और जवाब आया—
“रूम पर।”
बस…
एक छोटा सा जवाब।
ना कोई वजह, ना कोई शिकायत, ना कोई आखिरी बात…
और उसी एक लाइन में, एक पूरा रिश्ता खत्म हो गया।
लड़का वहीं खड़ा रह गया…
हाथ में मोबाइल, आँखों में इंतज़ार, और दिल में हजार सवाल…
कभी जो 100 किलोमीटर की दूरी भी छोटी लगती थी,
आज वही रिश्ता एक “रूम पर हूँ” में इतना दूर हो गया कि शायद अब कभी लौटकर नहीं आएगा।
कुछ रिश्ते शोर से नहीं,
खामोशी से खत्म होते हैं… 💔