28/05/2026
'अग्रणी' के कार्टून से आज के मंच तक: सरदार पटेल और नेताजी की बदलती छवि का सच
Bangbhoomi News
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ पन्ने ऐसे हैं, जो आज की राजनीति में भी बार-बार पलटकर देखे जाते हैं। नाथूराम गोडसे द्वारा संचालित अखबार—'अग्रणी' और बाद में 'हिंदू राष्ट्र'—का इतिहास केवल पत्रकारिता का एक अध्याय नहीं, बल्कि उस दौर के उन गहरे वैचारिक संघर्षों का दस्तावेज़ है, जिसने स्वतंत्र भारत की नींव को प्रभावित किया था।
आज जब इन अखबारों और उनमें छपे कार्टूनों की चर्चा होती है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि इतिहास के 'खलनायक' कैसे आज के 'महानायक' बन गए हैं?
'अग्रणी' और वैचारिक कट्टरता की प्रयोगशाला
1940 के दशक के उत्तरार्ध में, विनायक दामोदर सावरकर के संरक्षण और नाथूराम गोडसे-नारायण आप्टे के संपादन में 'अग्रणी' अखबार कट्टरपंथी विचारधारा का मुख्य स्वर बनकर उभरा था।
आर्थिक और वैचारिक आधार: ऐतिहासिक साक्ष्यों और कपूर आयोग की रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि इस अखबार को सावरकर का सक्रिय सहयोग प्राप्त था। 15,000 रुपये की सुरक्षा राशि जमा करने से लेकर निदेशकों के बोर्ड में शामिल होने तक, सावरकर की भूमिका स्पष्ट थी।
गांधीजी पर तीखे प्रहार: 'अग्रणी' और 'हिंदू राष्ट्र' की संपादकीय नीति में महात्मा गांधी को 'देश विरोधी' के रूप में चित्रित किया गया। अखबार ने गांधीजी के शांति प्रयासों और उपवासों को कमजोर करने के लिए पौराणिक प्रतीकों का उपयोग किया।
अतीत का कार्टून और आज का विरोधाभास
सोशल मीडिया पर 1945 के दौर का 'अग्रणी' का एक कार्टून इन दिनों खासी चर्चा में है। इस कार्टून में महात्मा गांधी के साथ-साथ सरदार वल्लभभाई पटेल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को रावण के शीशों के रूप में चित्रित किया गया था।
यह चित्रण उस समय की विचारधारा का आईना था, जो गांधीजी के साथ खड़े हर उस व्यक्ति को 'खलनायक' मानती थी, जो उनके राष्ट्रवादी ढांचे का हिस्सा था। आज की स्थिति ठीक इसके विपरीत है। जो राजनीतिक दल (बीजेपी और आरएसएस) आज पटेल और बोस को अपना सबसे बड़ा आदर्श मानकर उनका महिमामंडन करते हैं, उसी विचारधारा के अखबारों ने कभी उन्हें अपने विमर्श में 'विभाजनकारी' या 'नकारात्मक पात्र' के रूप में पेश किया था।
वैचारिक अवसरवाद या वास्तविक परिवर्तन?
राजनीतिक विश्लेषक इस 'यू-टर्न' को लेकर दो ध्रुवों में बंटे हुए हैं:
आलोचकों का तर्क: आलोचक इसे 'वैचारिक अवसरवाद' का नाम देते हैं। उनका मानना है कि नेहरू की नीतियों के विरोध में पटेल और बोस को एक ढाल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि इतिहास की अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या की जा सके। यह उन नेताओं की विरासत को 'हथियाने' की कोशिश है, जिन्हें संघ परिवार ने अतीत में कभी अपना नहीं माना था।
समर्थकों का तर्क: दूसरी ओर, समर्थक इसे विचारधारा के विकास के रूप में देखते हैं। उनका तर्क है कि समय के साथ दृष्टिकोण बदलते हैं और आज का भारत उन नायकों को सम्मान दे रहा है, जिन्हें कथित तौर पर पहले की सरकारों ने पर्याप्त स्थान नहीं दिया था।
सरदार पटेल और आरएसएस: 1948 का ऐतिहासिक सच
इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु 4 फरवरी 1948 का वह निर्णय है, जब तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था। यह प्रतिबंध केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह तत्कालीन सरकार और संघ की विचारधारा के बीच का एक बड़ा टकराव था। यह प्रतिबंध इस स्पष्ट शर्त पर हटाया गया था कि संगठन राजनीति से दूर रहेगा और भारत के संविधान व तिरंगे के प्रति पूरी निष्ठा रखेगा।
निष्कर्ष: इतिहास की विरासत का भविष्य
आज जब देश की राजनीति में महापुरुषों की विरासत को लेकर होड़ मची है, तो यह सवाल जरूरी हो गया है कि क्या हम इतिहास को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं?
सरदार पटेल, नेताजी बोस और गांधीजी एक ही राष्ट्रवादी विरासत के अभिन्न अंग थे। उनके बीच के मतभेद लोकतांत्रिक थे, न कि शत्रुतापूर्ण। इतिहासकार आगाह करते हैं कि यदि वर्तमान राजनीतिक विमर्श उसी 'फूट डालो और राज करो' की नीति की ओर मुड़ता है, जिससे देश ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी, तो यह भविष्य की समावेशी राजनीति के लिए एक जटिल स्थिति होगी।
क्या पटेल और नेताजी जैसे महापुरुषों की विरासत को संकीर्ण राजनीतिक विमर्श से ऊपर रखा जा सकेगा? इसका जवाब आने वाले समय और हमारी ऐतिहासिक समझ की परिपक्वता पर निर्भर करेगा।