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बेलेघाटा में कार्यकर्ता की हत्या पर भड़के अभिषेक बनर्जी, बोले- 'दोषियों को सजा दिलाकर ही रहेंगे'Bangbhoomi News ​कोलकाता...
30/05/2026

बेलेघाटा में कार्यकर्ता की हत्या पर भड़के अभिषेक बनर्जी, बोले- 'दोषियों को सजा दिलाकर ही रहेंगे'
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​कोलकाता: पश्चिम बंगाल में चुनावी परिणामों के बाद राजनीतिक हिंसा का दौर जारी है। इस बीच, उत्तर कोलकाता के बेलेघाटा इलाके में एक कार्यकर्ता, विश्वजीत पटनायक की नृशंस हत्या की घटना ने राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने इस घटना को 'लोकतंत्र के लिए कलंक' बताते हुए तीखी प्रतिक्रिया दी है।
​अभिषेक बनर्जी ने क्या कहा?
अभिषेक बनर्जी ने सोशल मीडिया पर इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए इसे भाजपा की 'प्रतिशोधात्मक राजनीति' करार दिया है। उन्होंने अपने पोस्ट में कहा, "चुनाव के बाद की हिंसा का नग्न रूप दिखाते हुए, भाजपा समर्थित बदमाशों के एक दल ने बेलेघाटा के निर्भीक और निष्ठावान कार्यकर्ता विश्वजीत पटनायक की हत्या कर दी। मैं इस कायरतापूर्ण और बर्बर हत्याकांड की कड़ी निंदा करता हूँ।"
​परिवार से मिले अभिषेक बनर्जी
घटना के बाद अभिषेक बनर्जी पीड़ित परिवार से मिलने पहुँचे। उन्होंने शोक संतप्त परिजनों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि, "अपनों को खोने के इस असीम दुख के लिए कोई सांत्वना पर्याप्त नहीं है, लेकिन हम संकल्पबद्ध हैं कि फासीवाद के खिलाफ दिए गए इस बलिदान को हम व्यर्थ नहीं जाने देंगे।"
​'नैतिक दिवालियेपन का प्रमाण'
सांसद ने भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा कि हार-जीत लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जीत के बाद इस तरह का रक्तपात करना पार्टी के 'नैतिक और चारित्रिक दिवालियेपन' को दर्शाता है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, "हम इस जघन्य हत्याकांड के लिए कानूनी न्याय लेकर रहेंगे। जब तक दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा नहीं मिल जाती, तब तक हमारी लड़ाई जारी रहेगी।"
​अभिषेक बनर्जी ने अंत में यह भी जोड़ा कि बंगाल की संस्कृति के विरुद्ध काम करने वाली और हिंसा को बढ़ावा देने वाली भाजपा की राजनीति का अंत अब तय है।

'अन्नपूर्णा भंडार' योजना के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू, फॉर्म में मांगी जा रही विस्तृत जानकारीBangbhoomi News ​रिपोर्ट: बं...
29/05/2026

'अन्नपूर्णा भंडार' योजना के लिए आवेदन प्रक्रिया शुरू, फॉर्म में मांगी जा रही विस्तृत जानकारी
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​रिपोर्ट: बंगभूमि न्यूज़ डेस्क
​आसनसोल/कोलकाता: पश्चिम बंगाल सरकार की महत्वाकांक्षी 'अन्नपूर्णा भंडार' योजना के लिए आवेदन प्रक्रिया को लेकर राज्य भर में हलचल तेज हो गई है। सरकार ने इस योजना के तहत राज्य के परिवारों का एक व्यापक डेटाबेस तैयार करने की कवायद शुरू कर दी है। योजना का लाभ लेने के लिए आवेदकों को एक विस्तृत 12-पन्नों का फॉर्म भरना होगा, जिसमें परिवार की आर्थिक स्थिति से लेकर नागरिकता संबंधी विषयों तक की जानकारी मांगी गई है।
​आवेदन फॉर्म में क्या-क्या जानकारी है जरूरी?
​योजना का लाभ लेने के लिए आवेदकों को पारदर्शी तरीके से निम्नलिखित विवरण प्रदान करने होंगे:
​पारिवारिक और व्यक्तिगत विवरण: परिवार के प्रत्येक सदस्य का नाम, आयु, लिंग, जन्मतिथि और आधार कार्ड से जुड़ा मोबाइल नंबर अनिवार्य है।
​पहचान और निर्वाचन विवरण: आधार नंबर, वोटर आईडी (EPIC) और डिजिटल राशन कार्ड की जानकारी के साथ-साथ, आवेदक के संबंधित विधानसभा क्षेत्र और भाग संख्या (Part Number) का उल्लेख करना आवश्यक है।
​आर्थिक और व्यावसायिक स्थिति: सरकार ने आवेदकों से उनकी वार्षिक आय, आयकर (Income Tax) भरने की स्थिति, पेशे का विवरण, और परिवार के स्वामित्व वाली भूमि व पक्के मकान (कमरों की संख्या) का विवरण मांगा है।
​बैंक विवरण: प्रत्येक वयस्क सदस्य के बैंक खाते की जानकारी, जो आधार से लिंक (DBT सक्षम) होनी चाहिए, फॉर्म का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
​शिक्षा और स्वास्थ्य: सदस्यों की शैक्षणिक योग्यता, बच्चों के टीकाकरण का विवरण, और स्वास्थ्य बीमा की स्थिति भी दर्ज की जानी है।
​नागरिकता संबंधी प्रश्न: फॉर्म में विशेष रूप से यह पूछा गया है कि क्या किसी सदस्य ने नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) के तहत नागरिकता के लिए आवेदन किया है, या क्या किसी का मामला मतदाता सूची संशोधन के चलते ट्रिब्यूनल में लंबित है।
​कौन है अपात्र?
​प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि यह योजना केवल पात्र लाभार्थियों के लिए है। निम्नलिखित श्रेणी के लोग इस योजना के लिए आवेदन नहीं कर सकते:
​आयकर दाता (Income Tax Payers)।
​सरकारी कर्मचारी और पेंशनभोगी।
​सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में कार्यरत शिक्षक या गैर-शिक्षक कर्मचारी।
​प्रशासन की अपील
​स्थानीय प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे आवेदन करते समय सभी आवश्यक दस्तावेज—जैसे आधार कार्ड, बैंक पासबुक और शैक्षणिक प्रमाण पत्र—साथ लेकर आएं। आवेदन के लिए ऑनलाइन पोर्टल के अलावा स्थानीय स्तर पर जनकल्याण शिविरों की भी व्यवस्था की गई है।
​विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रक्रिया राज्य में लाभार्थियों का एक सटीक डिजिटल डेटाबेस तैयार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, जिससे भविष्य में सरकारी योजनाओं का लाभ बिना किसी बिचौलिये के सीधे लोगों तक पहुँचाया जा सके।

पुलिस की 'अमानवीय' कार्यशैली पर उठा बड़ा सवाल; मानवाधिकार आयोग पहुंचा मामलाBangbhoomi News कोलकाता। ​पश्चिम बंगाल में पु...
29/05/2026

पुलिस की 'अमानवीय' कार्यशैली पर उठा बड़ा सवाल; मानवाधिकार आयोग पहुंचा मामला
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कोलकाता। ​पश्चिम बंगाल में पुलिस की कार्यशैली को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्य के विभिन्न पुलिस थानों द्वारा आरोपियों को सरेआम सार्वजनिक रूप से केवल अंतर्वस्त्रों (बनियान और अंडरवियर) में घुमाने की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद अब यह मामला राज्य के मानवाधिकार आयोग (WBHRC) तक पहुँच गया है।
​मानवाधिकार संगठनों ने जताई कड़ी आपत्ति
प्रमुख नागरिक अधिकार संगठन 'एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स' (APDR) ने इस कृत्य को मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन करार दिया है। संगठन ने हाल ही में हुई घटनाओं, विशेषकर गोलाबाड़ी और संकराईल पुलिस स्टेशन के मामलों का उल्लेख करते हुए आयोग को पत्र सौंपा है। APDR ने अपनी शिकायत में तर्क दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अनुसार, कानून किसी भी नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है, और पुलिस को यह कतई अधिकार नहीं है कि वह किसी आरोपी को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाए या अमानवीय व्यवहार करे।
​'कानून के शासन' बनाम पुलिस का 'तमाशा'
इस मुद्दे पर राजनीतिक हलकों में भी तीव्र प्रतिक्रिया देखने को मिली है। सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ नेता और सांसद कल्याण बनर्जी ने भी इस कार्यशैली की तीखी आलोचना की है। उन्होंने पुलिस द्वारा अपनाए गए इस तरीकों को "सर्कस जैसा व्यवहार" बताते हुए कहा है कि पुलिस को संवैधानिक दायरे में रहकर काम करना चाहिए, न कि सरेआम तमाशा बनाकर कानून के शासन का मजाक उड़ाना चाहिए।
​प्रशासनिक तर्क बनाम सच्चाई
सूत्रों के अनुसार, पुलिस प्रशासन इसे "क्राइम सीन रीकंस्ट्रक्शन" (अपराध स्थल का पुनर्निर्माण) और अपराध पर नियंत्रण के लिए अपनाई गई "जीरो टॉलरेंस" नीति बताकर बचाव करने का प्रयास कर रहा है। हालांकि, कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे अपराध कितना भी गंभीर क्यों न हो, एक आरोपी की मानवीय गरिमा का उल्लंघन करना 'प्रक्रिया की उचित प्रक्रिया' (Due Process of Law) के सिद्धांतों के विरुद्ध है।
​अब क्या?
पश्चिम बंगाल में पुलिस द्वारा अपनाई जा रही यह दंडात्मक शैली अब सवालों के घेरे में है। एक तरफ जहां स्थानीय नागरिक समाज और मानवाधिकार कार्यकर्ता पुलिस सुधारों और कड़े प्रशिक्षण की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर यह घटना यह भी दर्शाती है कि राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभा रहे तंत्र में संवेदनशीलता का भारी अभाव है।
​अब सबकी निगाहें पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग की ओर टिकी हैं कि क्या वह इस मामले में राज्य सरकार से जवाब तलब करेगा और दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ क्या दिशा-निर्देश जारी करेगा।

आरोपी को सार्वजनिक रूप से अंतर्वस्त्रों में घुमाकर उड़ाई कानून की धज्जियांBangbhoomi News कोलकाता। हाल ही में सामने आई एक...
29/05/2026

आरोपी को सार्वजनिक रूप से अंतर्वस्त्रों में घुमाकर उड़ाई कानून की धज्जियां
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कोलकाता। हाल ही में सामने आई एक घटना ने कानून व्यवस्था और पुलिस के कार्यशैली पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। एक मामले में आरोपी को पुलिस द्वारा सार्वजनिक रूप से केवल बनियान और अंडरवियर में घुमाने का वीडियो सामने आया है, जो न केवल पुलिस प्रशासन की असंवेदनशीलता को दर्शाता है, बल्कि मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन भी है।
​गरिमा के अधिकार का हनन
कानूनी विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस कृत्य की कड़ी निंदा की है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 हर नागरिक को सम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है। कानून के जानकारों का कहना है कि किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह आरोपी ही क्यों न हो, सार्वजनिक रूप से अपमानित करने या अर्धनग्न अवस्था में परेड कराने का अधिकार पुलिस को नहीं है। 'कानून के शासन' (Rule of Law) में पुलिस का काम साक्ष्य जुटाना और आरोपी को अदालत के समक्ष पेश करना है, न कि उसे सरेआम दंडित करना या उसकी गरिमा को ठेस पहुँचाना।
​न्यायपालिका के निर्देशों की अवहेलना
सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर स्पष्ट किया है कि गिरफ्तारी के दौरान किसी भी व्यक्ति के साथ अमानवीय व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए। पुलिस द्वारा आरोपियों को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाने की यह प्रथा "कानून की उचित प्रक्रिया" (Due Process of Law) के सिद्धांतों के पूरी तरह विपरीत है। जब तक किसी व्यक्ति पर अदालत द्वारा दोष सिद्ध नहीं हो जाता, उसे अपराधी के रूप में अपमानित करना न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।
​नागरिक समाज और मानवाधिकार आयोग में रोष
इस घटना ने क्षेत्र में चर्चा का विषय बना दिया है। स्थानीय बुद्धिजीवियों का तर्क है कि यदि रक्षक ही कानून के दायरे से बाहर जाकर कार्य करेंगे, तो समाज में न्याय की व्यवस्था पर से भरोसा उठ जाएगा।
​इस घटना के बाद अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या संबंधित पुलिस अधिकारियों पर उच्च अधिकारियों द्वारा कोई कार्यवाही की जाएगी? क्या पुलिस प्रशासन अपने बल के लिए मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशीलता और प्रशिक्षण के कड़े मानक सुनिश्चित करेगा? यह घटना एक गंभीर चेतावनी है कि सभ्य समाज में पुलिसिया बर्बरता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

'अग्रणी' के कार्टून से आज के मंच तक: सरदार पटेल और नेताजी की बदलती छवि का सचBangbhoomi News भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के...
28/05/2026

'अग्रणी' के कार्टून से आज के मंच तक: सरदार पटेल और नेताजी की बदलती छवि का सच
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भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ पन्ने ऐसे हैं, जो आज की राजनीति में भी बार-बार पलटकर देखे जाते हैं। नाथूराम गोडसे द्वारा संचालित अखबार—'अग्रणी' और बाद में 'हिंदू राष्ट्र'—का इतिहास केवल पत्रकारिता का एक अध्याय नहीं, बल्कि उस दौर के उन गहरे वैचारिक संघर्षों का दस्तावेज़ है, जिसने स्वतंत्र भारत की नींव को प्रभावित किया था।
​आज जब इन अखबारों और उनमें छपे कार्टूनों की चर्चा होती है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि इतिहास के 'खलनायक' कैसे आज के 'महानायक' बन गए हैं?
​'अग्रणी' और वैचारिक कट्टरता की प्रयोगशाला
​1940 के दशक के उत्तरार्ध में, विनायक दामोदर सावरकर के संरक्षण और नाथूराम गोडसे-नारायण आप्टे के संपादन में 'अग्रणी' अखबार कट्टरपंथी विचारधारा का मुख्य स्वर बनकर उभरा था।
​आर्थिक और वैचारिक आधार: ऐतिहासिक साक्ष्यों और कपूर आयोग की रिपोर्ट से स्पष्ट होता है कि इस अखबार को सावरकर का सक्रिय सहयोग प्राप्त था। 15,000 रुपये की सुरक्षा राशि जमा करने से लेकर निदेशकों के बोर्ड में शामिल होने तक, सावरकर की भूमिका स्पष्ट थी।
​गांधीजी पर तीखे प्रहार: 'अग्रणी' और 'हिंदू राष्ट्र' की संपादकीय नीति में महात्मा गांधी को 'देश विरोधी' के रूप में चित्रित किया गया। अखबार ने गांधीजी के शांति प्रयासों और उपवासों को कमजोर करने के लिए पौराणिक प्रतीकों का उपयोग किया।
​अतीत का कार्टून और आज का विरोधाभास
​सोशल मीडिया पर 1945 के दौर का 'अग्रणी' का एक कार्टून इन दिनों खासी चर्चा में है। इस कार्टून में महात्मा गांधी के साथ-साथ सरदार वल्लभभाई पटेल और नेताजी सुभाष चंद्र बोस को रावण के शीशों के रूप में चित्रित किया गया था।
​यह चित्रण उस समय की विचारधारा का आईना था, जो गांधीजी के साथ खड़े हर उस व्यक्ति को 'खलनायक' मानती थी, जो उनके राष्ट्रवादी ढांचे का हिस्सा था। आज की स्थिति ठीक इसके विपरीत है। जो राजनीतिक दल (बीजेपी और आरएसएस) आज पटेल और बोस को अपना सबसे बड़ा आदर्श मानकर उनका महिमामंडन करते हैं, उसी विचारधारा के अखबारों ने कभी उन्हें अपने विमर्श में 'विभाजनकारी' या 'नकारात्मक पात्र' के रूप में पेश किया था।
​वैचारिक अवसरवाद या वास्तविक परिवर्तन?
​राजनीतिक विश्लेषक इस 'यू-टर्न' को लेकर दो ध्रुवों में बंटे हुए हैं:
​आलोचकों का तर्क: आलोचक इसे 'वैचारिक अवसरवाद' का नाम देते हैं। उनका मानना है कि नेहरू की नीतियों के विरोध में पटेल और बोस को एक ढाल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है ताकि इतिहास की अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या की जा सके। यह उन नेताओं की विरासत को 'हथियाने' की कोशिश है, जिन्हें संघ परिवार ने अतीत में कभी अपना नहीं माना था।
​समर्थकों का तर्क: दूसरी ओर, समर्थक इसे विचारधारा के विकास के रूप में देखते हैं। उनका तर्क है कि समय के साथ दृष्टिकोण बदलते हैं और आज का भारत उन नायकों को सम्मान दे रहा है, जिन्हें कथित तौर पर पहले की सरकारों ने पर्याप्त स्थान नहीं दिया था।
​सरदार पटेल और आरएसएस: 1948 का ऐतिहासिक सच
​इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु 4 फरवरी 1948 का वह निर्णय है, जब तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया था। यह प्रतिबंध केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह तत्कालीन सरकार और संघ की विचारधारा के बीच का एक बड़ा टकराव था। यह प्रतिबंध इस स्पष्ट शर्त पर हटाया गया था कि संगठन राजनीति से दूर रहेगा और भारत के संविधान व तिरंगे के प्रति पूरी निष्ठा रखेगा।
​निष्कर्ष: इतिहास की विरासत का भविष्य
​आज जब देश की राजनीति में महापुरुषों की विरासत को लेकर होड़ मची है, तो यह सवाल जरूरी हो गया है कि क्या हम इतिहास को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं?
​सरदार पटेल, नेताजी बोस और गांधीजी एक ही राष्ट्रवादी विरासत के अभिन्न अंग थे। उनके बीच के मतभेद लोकतांत्रिक थे, न कि शत्रुतापूर्ण। इतिहासकार आगाह करते हैं कि यदि वर्तमान राजनीतिक विमर्श उसी 'फूट डालो और राज करो' की नीति की ओर मुड़ता है, जिससे देश ने आजादी की लड़ाई लड़ी थी, तो यह भविष्य की समावेशी राजनीति के लिए एक जटिल स्थिति होगी।
​क्या पटेल और नेताजी जैसे महापुरुषों की विरासत को संकीर्ण राजनीतिक विमर्श से ऊपर रखा जा सकेगा? इसका जवाब आने वाले समय और हमारी ऐतिहासिक समझ की परिपक्वता पर निर्भर करेगा।

23/05/2026

शनिवार 23 मई 2026 को दैनिक आवाज़ में प्रकाशित

रामदूत मेटालॉयस फैक्ट्री के प्रदूषण से त्रस्त महेशपुर; क्रेशर हटाने की मांग को लेकर ग्रामीणों का जोरदार प्रदर्शनBangbhoo...
22/05/2026

रामदूत मेटालॉयस फैक्ट्री के प्रदूषण से त्रस्त महेशपुर; क्रेशर हटाने की मांग को लेकर ग्रामीणों का जोरदार प्रदर्शन
Bangbhoomi News
सालानपुर: सालानपुर स्थित 'रामदूत मेटालॉयस प्राइवेट लिमिटेड' कारखाने से फैल रहे अत्यधिक प्रदूषण के खिलाफ स्थानीय महेशपुर के ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा है। प्रदूषण से बदहाल स्थिति और प्रशासन द्वारा किए गए वादों के पूरा न होने से नाराज ग्रामीणों ने शुक्रवार सुबह कारखाने के गेट पर जमकर हंगामा और प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों के हाथों में भाजपा के झंडे थे।
​क्या है पूरा मामला?
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, कारखाने में लगे क्रेशर मशीनों से निकलने वाली धूल और प्रदूषण ने इलाके का जनजीवन नर्क के समान बना दिया है। इससे पहले, 18 अप्रैल को भी ग्रामीण इस मुद्दे को लेकर मुखर हुए थे। उस समय पुलिस, पंचायत प्रधान और कारखाना प्रबंधन के बीच एक त्रिपक्षीय बैठक हुई थी, जिसमें सर्वसम्मति से क्रेशर को अन्यत्र हटाने का निर्णय लिया गया था।
​प्रबंधन पर लगा वादाखिलाफी का आरोप
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि चुनाव के दौरान कारखाना प्रबंधन ने शांति बनाए रखने के लिए क्रेशर हटाने का वादा किया था, लेकिन जैसे ही चुनाव प्रक्रिया संपन्न हुई, प्रबंधन ने अपने वादे से किनारा कर लिया और चुपके से दोबारा क्रेशर मशीनें चालू कर दीं। प्रदूषण का स्तर पूर्व की तुलना में और भी अधिक बढ़ जाने के बाद, आक्रोशित ग्रामीण सुबह-सुबह ही लामबंद होकर कारखाने के मुख्य द्वार पर पहुंच गए।
​पुलिस का आश्वासन और ग्रामीणों की चेतावनी
घटना की सूचना मिलते ही सालानपुर थाने की कल्याणेश्वरी फाड़ी की पुलिस मौके पर पहुंची। प्रदर्शनकारियों के उग्र रुख को देखते हुए पुलिस ने ग्रामीणों के साथ लंबी वार्ता की। अंततः, पुलिस द्वारा मामले के समाधान के लिए सोमवार तक का समय मांगे जाने के बाद ग्रामीणों ने फिलहाल अपना प्रदर्शन समाप्त किया।
​हालांकि, ग्रामीणों ने स्पष्ट कर दिया है कि यह आंदोलन केवल एक चेतावनी है। यदि सोमवार तक प्रशासन और कारखाना प्रबंधन इस प्रदूषणकारी क्रेशर को हटाने का कोई स्थायी समाधान नहीं निकालते हैं, तो वे आने वाले दिनों में और भी व्यापक और उग्र आंदोलन शुरू करेंगे।

सालानपुर: एलक्वेंट स्टील कारखाने में 12 घंटे काम के विरोध में श्रमिकों का जोरदार प्रदर्शन, कामकाज ठपBangbhoomi News ​साल...
22/05/2026

सालानपुर: एलक्वेंट स्टील कारखाने में 12 घंटे काम के विरोध में श्रमिकों का जोरदार प्रदर्शन, कामकाज ठप
Bangbhoomi News
​सालानपुर: सालानपुर ब्लॉक के देंदुआ कल्यानेश्वरी स्थित 'एलक्वेंट स्टील प्राइवेट लिमिटेड' में आज सुबह से ही भारी तनाव व्याप्त हो गया। लंबे समय से चल रहे शोषण और नियमों की अनदेखी के खिलाफ लामबंद होते हुए श्रमिकों ने कार्य बहिष्कार कर कारखाने के मुख्य प्रवेश मार्ग पर जोरदार प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस आंदोलन के चलते कारखाने का कामकाज पूरी तरह से ठप हो गया है।
​अवैध तरीके से 12 घंटे काम का आरोप
प्रदर्शनकारी श्रमिकों का मुख्य आरोप है कि कारखाना प्रबंधन श्रम नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहा है। श्रमिकों के अनुसार, उन्हें 8 घंटे की निर्धारित ड्यूटी के बजाय प्रतिदिन 12 घंटे काम करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। साथ ही, उन्हें उनकी योग्यता और सरकारी प्रावधानों के अनुसार न्यूनतम वेतन भी नहीं दिया जा रहा है। इसके अलावा, कारखाने के अंदर श्रमिकों के स्वास्थ्य और सुरक्षा से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं का भी घोर अभाव है।
​प्रबंधन के आश्वासन के बाद भी नहीं निकला हल
श्रमिकों ने बताया कि एक सप्ताह पूर्व उन्होंने गंगाजल हाथ में लेकर एक प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शन किया था। तब प्रबंधन ने समस्याओं के समाधान के लिए 7 दिनों का समय मांगा था, लेकिन तय समय सीमा बीत जाने के बाद भी कोई सकारात्मक पहल नहीं हुई। इससे आक्रोशित होकर श्रमिकों ने आज सीधे सड़कों पर उतरकर आंदोलन का रुख अख्तियार किया।
​नेताओं और प्रशासन की भूमिका
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे स्थानीय नेता अमर महतो ने कहा, "इन कारखानों में लंबे समय से 'सिंडिकेट राज' का बोलबाला रहा है। चुनाव के दौरान भाजपा के विजयी विधायक ने श्रमिकों को उनके अधिकारों के लिए साथ खड़े होने का भरोसा दिया था। अब चुनाव परिणाम आने के बाद, श्रमिक अपने वाजिब हक को पाने के लिए एकजुट हुए हैं।"
​पुलिस की मौजूदगी और गोपनीयता पर सवाल
स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सालानपुर थाने की पुलिस मौके पर पहुंची। गतिरोध खत्म करने के लिए प्रबंधन ने 10 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को बातचीत के लिए अंदर बुलाया है। हालांकि, इस बैठक को लेकर पारदर्शिता न बरतने के आरोप लग रहे हैं। जब पत्रकारों ने खबर कवरेज के लिए अंदर जाने का प्रयास किया, तो पुलिस ने उन्हें रोक दिया। मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारी ने केवल इतना कहा, "अभी अंदर जाना संभव नहीं है।"
​फिलहाल, क्षेत्र में चर्चा का विषय यही है कि क्या वार्ता के माध्यम से कोई सकारात्मक परिणाम निकल पाएगा या यह आंदोलन आने वाले दिनों में और विकराल रूप धारण करेगा।

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