VSK Devgiri

VSK Devgiri “संवादात सौहार्दम्”

02/09/2026

If we try to create a happy society, individuals have to be current. What is the way? There has to be a third way, and this new third way is ancient very old way of Hindustan

नेपाल में आपदा पीड़ितों की सेवा व सहायता में जुटे हिन्दू स्वयंसेवक संघ नेपाल, विश्व हिन्दू परिषद नेपाल, सेवा इंटरनेशनल न...
02/09/2026

नेपाल में आपदा पीड़ितों की सेवा व सहायता में जुटे हिन्दू स्वयंसेवक संघ नेपाल, विश्व हिन्दू परिषद नेपाल, सेवा इंटरनेशनल नेपाल, जनजाति कल्याण आश्रम नेपाल, एकल अभियान नेपाल के कार्यकर्ता.....

“भारत का उदय अर्थात् अधिक एकजुट एवं और जागृत मानवता”-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ‘हिंदू विश्व...
01/09/2026

“भारत का उदय अर्थात् अधिक एकजुट एवं और जागृत मानवता”

-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ‘हिंदू विश्व बंधु: एम्ब्रेस द वर्ल्ड इन फ्रेंडशिप’ (हिंदू विश्व बंधु: मैत्री में विश्व को अपनाएँ) कार्यक्रम में
सभी राष्ट्र फलें-फूलें, समृद्ध हों और मानव प्रगति में योगदान दें, यही हिंदुओं का स्वप्न है।
टोरंटो, कनाडा: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने 31 अगस्त को कनाडा के टोरंटो में ‘हिंदू विश्व बंधु – एम्ब्रेस द वर्ल्ड इन फ्रेंडशिप’ (हिंदू विश्व बंधु: मैत्री में विश्व को अपनाएँ) कार्यक्रम को संबोधित किया। यह कार्यक्रम कॉर्ड (सीएचओआरडी—कनाडियन हिंदूज़ फॉर आउटरीच रिलेशंस एंड डायलॉग) द्वारा आयोजित किया गया था। कनाडा के सभी 10 प्रांतों से 175 मेजबान संगठनों के 2,000 से अधिक प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में भाग लिया।
समागम को संबोधित करते हुए डॉ. मोहन भागवत जी ने बिना किसी भेदभाव के दूसरों की सहायता करने की भारत की परंपरा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम, ईसाई, यहूदी और पारसी समुदायों ने ऐतिहासिक रूप से भारत में बिना उत्पीड़न के भय के शांतिपूर्ण आश्रय पाया है।
उदाहरणों से स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, “द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पोलैंड के निवासी, जिनमें से अनेक शरणार्थी बन गए थे, समुद्र पार करके भारत आए। उस समय भारत स्वतंत्र नहीं था। उस समय भारत में ब्रिटिश शासन था और उन्होंने शरण देने से इनकार कर दिया। उस समय जामनगर एक रियासत था। जामनगर के राजकुमार ने उन्हें बुलाया और कहा, ‘यहाँ आइए, यहाँ बस जाइए। जब तक आपका देश फिर से आपके लिए स्वतंत्र नहीं हो जाता और आप यहाँ से जाने के लिए स्वतंत्र नहीं होते, तब तक मैं आपकी रक्षा करूँगा।’ और यह चलता आ रहा है।”
उन्होंने आगे कहा, “कुछ वर्ष पहले जब मध्य-पूर्व में युद्ध हुआ और लोग वहाँ फँस गए थे, तब भारत के सैन्य विमान वहाँ गए और लोगों को बचाकर लाए। केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि सात देशों के नागरिकों को वहाँ से बचाया गया। जब भी विश्व में कहीं संकट आया और भारत से सहायता माँगी गई, भारत ने कभी मना नहीं किया। बल्कि बिना मदद के लिए पुकार किए भी वह सहायता करता है। यही परंपरा है। यही भारत का डीएनए (मूल स्वभाव) है।”
भारत की परंपरा—केवल विविधता में एकता नहीं, बल्कि एकता की विविधताएँ भी
भारत की एकता की परंपरा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, “हमारी भारत की परंपरा हमें केवल यूनिटी इन डायवर्सिटी (विविधता में एकता) ही नहीं बताती, बल्कि डायवर्सिटीज ऑफ यूनिटी (एकता की विविधताएँ) भी बताती है। सभी विविधताएँ एकता की अभिव्यक्ति हैं।”
उन्होंने कहा, “इसलिए हम, जिन्हें इस पृथ्वी पर कुछ वर्षों तक जीना है, ऊबना नहीं चाहिए। हमें इस विविधता की सेवा करनी है, इसे स्वीकार करना है, इसका सम्मान करना है, क्योंकि यह एकता की अभिव्यक्ति है। यह इसे सुंदर बनाती है। यह इसकी शोभा है। हम इसका उत्सव मनाते हैं। हम हमेशा एकता को देखते हैं।”
उन्होंने कहा, “भारत में अनेक जातियाँ, अनेक पंथ, अनेक भाषाएँ रही हैं। सब कुछ अनेक है। कुछ भी अकेला नहीं है। कुछ भी एकल नहीं है किन्तु यह सब एक ही है। हम यह नहीं कहते कि सभी एक हैं बल्कि हम कहते हैं कि सब एक ही है।”
भारत का उदय अर्थात् अधिक एकजुट, अधिक मुक्त मानवता
डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा, “जब भारत बड़ा बना—वह कभी सुपरपावर (विश्व महाशक्ति) नहीं बना। वह एक गौरवशाली देश बना। हाँ, कोई उस समय के भारत को महाशक्ति कह सकता है। किन्तु वह महाशक्ति नहीं था। वह एक गौरवशाली देश था। जब भारत बड़ा बना, तब उसने विश्व की सेवा की।”
उन्होंने कहा, “अपने चरित्र के कारण वह विश्वगुरु बना, महाशक्ति नहीं। इसलिए भारत का उदय अर्थात् अधिक एकजुट, अधिक मुक्त मानवता।”
उन्होंने कहा कि भारत ने यह कार्य बहुत पहले किया था, जब न सड़कें थीं, न नावें, न हवाई जहाज, न मोटर वाहन—केवल बैलगाड़ियाँ और घोड़े थे।
उन्होंने कहा, “हमारे पूर्वज मैक्सिको से साइबेरिया तक के क्षेत्रों में गए और उन्हें समस्त ज्ञान दिया। वे पैदल हिमालय पार करके चीन गए, साइबेरिया गए, मंगोलिया गए, छोटी नावों से गए। वे दक्षिण-पूर्व एशिया गए। उस समय की ज्ञात विश्व तक वे पहुँचे।”
उन्होंने कहा, “और उन्होंने क्या किया? उन्होंने किसी देश पर विजय प्राप्त नहीं की। उन्होंने किसी को धर्मांतरित नहीं किया। वे जहाँ भी गए, उन्होंने ज्ञान दिया, गणित दिया, ज्योतिष दिया, आयुर्वेद दिया और सभ्यतागत मूल्यों का प्रसार किया।”
भारत की विविधता और ‘हिंदू’ की व्यापक अवधारणा
भारत की विविधता के संदर्भ में सरसंघचालक जी ने कहा, “जब मैं हिंदू कहता हूँ, तो ‘हिंदू’ शब्द को किसी विशिष्ट भाषा, किसी विशिष्ट उपासना या किसी विशिष्ट जीवन-शैली के माध्यम से परिभाषित नहीं किया जा सकता। हिंदू सभी का सम्मान करते हैं। हिंदू सभी को स्वीकार करते हैं। उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं होती।”
उन्होंने कहा, “हम कहते हैं कि हमारी सभी प्रार्थनाएँ भारत कहलाने वाली भूमि से उत्पन्न हुई हैं, किन्तु वे कभी केवल भारत के लिए नहीं थीं। वे उस पूरे ब्रह्मांड के लिए थीं, जिसे हम जानते हैं।”
उन्होंने कहा, “मैं आपको कोई नई बात नहीं बता रहा हूँ। मैं वही बता रहा हूँ, जो आप परंपरागत रूप से सीखते आए हैं, जिसे आप परंपरागत रूप से जपते और गाते आए हैं। किन्तु आप इस पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। अब समय आ गया है कि हिंदुओं को इस पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि विश्व को इन सभी बातों की आवश्यकता है।”
उन्होंने कहा, “हमें वह सृजित करना है, जिसकी विश्व को आवश्यकता है और फिर उसे देना है। किन्तु हम उसे कैसे दें? हम किसी पर दबाव नहीं डालते। हमारे पूर्वज हर देश में गए। उन्होंने कभी किसी पर कुछ थोपा नहीं। हम ऐसे नेता हैं, जो भीतर से नेतृत्व करते हैं और उदाहरण के द्वारा नेतृत्व करते हैं।”
हिंदू समाज की भूमिका—दिशा देना और उदाहरण प्रस्तुत करना
हिंदू समाज की भूमिका पर डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा, “हिंदू समाज दिशा प्रदान करता है। वह दिशा मूल्यों की है, एक विशेष ज्ञान की है—ऐसे ज्ञान की, जो अत्यंत प्रासंगिक और शाश्वत है।”
उन्होंने कहा, “हम एक हैं और उस आधार पर जीवन कैसे जीना है? हिंदू समाज को इसका उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। भारत में भी यदि कोई व्यक्ति हिंदू समाज के बीच ऐसा आदर्श जीवन देखना चाहता है, तो उसे ऐसे जीवन के उदाहरण मिलेंगे। किन्तु हमें इसे और अधिक व्यापक अनुपात में करना होगा।”
उन्होंने कहा, “ताकि लोग देख सकें, राष्ट्र देख सकें और अपनी-अपनी विशिष्ट प्रवृत्ति तथा अपने-अपने आधार पर, इसे ध्यान में रखते हुए अपने जीवन का पुनर्निर्माण कर सकें।”
उन्होंने कहा, “सभी राष्ट्र फलें-फूलें, समृद्ध हों, सहयोग करें, मानव प्रगति और सृष्टि की प्रगति में योगदान दें। यही वह स्वप्न है, जो हिंदुओं के मन में है।”
उन्होंने कहा, “हमें स्वयं का विकास करना है। हमें एक फूल की तरह बनना है और अपनी सुगंध पूरे वातावरण में फैलानी है। इस प्रकार हम विकसित हों और मानवता के उद्देश्य के प्रति समर्पित तथा निष्ठावान बनें। यही हिंदू का जीवन है।”
भारत-कनाडा संबंधों में नई गति का स्वागत
कनाडा के पूर्व रक्षा मंत्री और अल्बर्टा के पूर्व प्रीमियर जेसन केनी ने भारत और कनाडा के बीच बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों की सराहना की।
उन्होंने कहा, “कनाडा-भारत संबंधों में नए सिरे से गति पकड़ते देखना बहुत सुखद है। इसका प्रतिनिधित्व इस वर्ष के अंत में प्रधानमंत्री मोदी की कनाडा की दूसरी यात्रा से भी होगा।”
वसुधैव कुटुंबकम् का संदेश
ग्रेटर टोरंटो एरिया (जीटीए) के हिंदू सभा मंदिर के राजिंदर प्रसाद ने कहा, “डॉ. मोहन भागवत जी की यात्रा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का संदेश लेकर आई है। हमें अपनी संस्कृति के मूल्यों का संदेश विश्व तक पहुँचाना चाहिए। हम मोहन भागवत जी का स्वागत करते हैं।”
हिंदू-सिख साझा विरासत और सेवा की भावना
खालसा दीवान सोसाइटी और ऐतिहासिक रॉस स्ट्रीट गुरुद्वारे का प्रतिनिधित्व कर रहे, कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि कश्मीर सिंह धालीवाल ने कहा कि आज टीयूएसएचए (द यूनाइटेड स्टेट्स एंड हिंदू एसोसिएशन ऑफ नॉर्थ अमेरिका) की ओर से बोलना उनके लिए सौभाग्य की बात है।
उन्होंने कहा, “हिंदू और सिख अलग-अलग धर्मों और परंपराओं का पालन कर सकते हैं, किन्तु हम एक अत्यंत मूल्यवान चीज साझा करते हैं। हम भाषाएँ, भोजन, संगीत, पारिवारिक परंपराएँ, त्योहार, मूल्य और सबसे बढ़कर समुदाय तथा सेवा की भावना साझा करते हैं।”
उन्होंने कहा, “आज हिंदू और सिख समुदाय कनाडा के बहुसांस्कृतिक समाज में सबसे अधिक योगदान देने वाले समुदायों में सम्मिलित हैं। हमें वास्तव में गर्व है कि हमारा जन्म विश्व के सबसे पुराने बहुसांस्कृतिक देश भारत में हुआ है और हम विश्व के सबसे युवा बहुसांस्कृतिक देश कनाडा में रह रहे हैं।”

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01/09/2026

"Whenever help from Bharat was sought from anywhere in the world, it has never refused and extended a helping hand even without being asked. This is our tradition, the DNA of Bharat"

01/09/2026
01/09/2026

“Diversity is natural, and unity is the reality.”
,Canada

स्वदेशी व्यापारी मंच की दो दिवसीय राष्ट्रीय बैठक (30-31 अगस्त) भोपाल में संपन्न हुई।बैठक में स्वदेशी जागरण मंच के अखिल भ...
01/09/2026

स्वदेशी व्यापारी मंच की दो दिवसीय राष्ट्रीय बैठक (30-31 अगस्त) भोपाल में संपन्न हुई।

बैठक में स्वदेशी जागरण मंच के अखिल भारतीय संगठक कश्मीरी लाल जी, अ. भा. सह संगठक सतीश कुमार जी, भारत सरकार व्यापारी कल्याण बोर्ड के चेयरमैन सुनील सिंघी जी, स्वदेशी व्यापारी मंच के राष्ट्रीय संयोजक बी.सी. भरतिया जी, प्रवीण खण्डेलवाल जी का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।

बैठक में 15 राज्यों का प्रतिनिधित्व रहा, देशभर में संचालित व्यापारी संगठनों से चयनित सैकड़ों प्रमुख कार्यकर्ताओं ने सहभागिता की।

बैठक में तय हुआ कि यह कोई नया संगठन नहीं, बल्कि सभी व्यापारिक संगठनों को एकजुट कर व्यापारी और राष्ट्र हित में आवाज उठाने वाला एक संयुक्त मंच होगा, जिसमें CAIT, अखिल भारतीय उद्योग व्यापार मंडल, भारतीय उद्योग व्यापार मंडल, हॉकर्स ज्वाइंट एक्शन कमेटी, ... जैसे व्यापारिक संगठन सहभागी होंगे।

अमेरिका में हिन्दू दर्शन – जन्मभूमि के मूल्यों के साथ कर्मभूमि में कार्य करेंप्रशांत पोळ29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैनहटन ...
01/09/2026

अमेरिका में हिन्दू दर्शन – जन्मभूमि के मूल्यों के साथ कर्मभूमि में कार्य करें

प्रशांत पोळ

29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैनहटन स्थित मेडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित कार्यक्रम विराट था, भव्य था, दिव्य था, अद्भुत था, अवर्णनीय था..!
प्रस॔ग था, 'एक विश्व - एक मानवता उत्सव' (Universal Oneness Celebration)। मेडिसन स्क्वायर गार्डन के इंफोसिस थिएटर की अधिकतम आसन क्षमता 5,570 है। यह विशाल सभागार पूरा भरा हुआ था। अनेक आगंतुक/आमंत्रित बाहर खड़े थे। कार्यक्रम में भारतीय समुदाय के प्रमुख तो सारे थे ही, किंतु 30 देशों के, 16 विभिन्न धर्मों के प्रतिनिधि भी सम्मिलित हुए थे। 180 से अधिक आध्यात्मिक / धार्मिक गुरु, आचार्य थे। विश्व के अनेकों चैनलों से, सोशल मीडिया अकाउंट्स से यह कार्यक्रम लाइव प्रसारित हो रहा था।

Spread the loveप्रशांत पोळ 29 अगस्त को न्यूयॉर्क के मैनहटन स्थित मेडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित कार्यक्रम विराट था, भव्य ...

न्यूयॉर्कच्या मॅडिसन स्क्वेअर येथे   या कार्यक्रम दरम्यान न्यूयॉर्क शहरातील काही सकारात्मक दृश्य.
01/09/2026

न्यूयॉर्कच्या मॅडिसन स्क्वेअर येथे या कार्यक्रम दरम्यान न्यूयॉर्क शहरातील काही सकारात्मक दृश्य.

हिंदुत्वाचा वैश्विक सिंहनाद!( शिकागो ते न्यूयॉर्क मार्गे नागपूर.)रवींद्र मुळे.अहिल्यानगर.मागील शतकात सर्वधर्मीय परिषद शि...
01/09/2026

हिंदुत्वाचा वैश्विक सिंहनाद!

( शिकागो ते न्यूयॉर्क मार्गे नागपूर.)

रवींद्र मुळे.अहिल्यानगर.

मागील शतकात सर्वधर्मीय परिषद शिकागो येथे झाली त्यावेळी ख्रिश्चन धर्माच्या पुढाकाराने भरवलेल्या त्या परिषदेत स्वामी विवेकानंद ह्यांनी बंधुंनो आणि भगिनींनो ही साद इतक्या नैसार्गिक भावाने घातली की लोकांना खूप आश्चर्य वाटले कारण, परस्पर सामंजस्य आणि सद्भाव भावना इतक्या कमी शब्दात आणि इतक्या हृदयाच्या आतून कधी त्यांनी ऐकल्या नव्हत्या.

अर्थात हिंदुत्वाचा जो प्रवाह हजारो वर्षापासून जगभर प्रवाहित झाला होता त्याचा तो नैसर्गिक आविष्कार होता.
तो प्रवाह आमच्या ऋषी मुनींच्या अनेक वचनातून आलेला प्रवाह होता. एकं सत् विप्रःबहूदा वदन्ति! किंवा आकाशात् ,पतितं तोयं , यंदा गच्छति सागरः, सर्व देव नमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति! हाच तो प्रवाह होता आणि आहे.

त्या वेळी भारत देश पारतंत्र्यात होता. पण स्वामीजींच्या बोलण्यात कुठलाही न्यूनगंड नव्हता आणि आत्मविश्वास तसूभरही कमी नव्हता , हे आपण जे वाचत आलो आहोत , त्या भाषणाचे वर्णन ऐकले त्या वरून कळते.

प्रत्यक्ष स्वातंत्र्य लढ्यात भले स्वामीजी उतरले नव्हते पण त्यांच्या ऐतिहासिक कामगिरीने भारतात एक प्रचंड सकारात्मक लाट आणि स्वातंत्र्य आंदोलनाला नवीन ऊर्जा निर्माण झाली. स्वामीजी लवकर गेले पण एक कायमस्वरूपी प्रेरणा देऊन गेले. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघाची स्थापना करणारे पूजनीय डॉक्टर ह्यांना स्वामीजी ह्यांच्या वैश्विक विचाराची आणि शिवरायांच्या शौर्याची प्रेरणा होती.

पूजनीय गुरुजी ह्यांनी अनेक वेळा संघाच्या कार्याची मांडणी करताना संघाच्या , हिंदुत्वाच्या वैश्विक दायित्वाचा उच्चार केला होता. त्यासाठी मागील संदर्भ इतिहासाचे ते देत असत हे त्यांच्या जुन्या बौद्धिक वर्गांवरून सहज लक्षात येते. पूजनीय डॉक्टर , पूजनीय गुरुजी आणि पूजनीय बाळासाहेब तिघेही बंगालशी, तेथील सामाजिक जीवनाशी आणि रामकृष्ण मठाच्या कार्याशी अवगत होते. पूजनीय गुरुजी तर विवेकानंद ह्यांचे गुरुबंधू अखंडानंद ह्यांचे शिष्यत्व पत्करून सन्यासी होण्याच्या मार्गावर होते.

संघाने गेल्या १०० वर्षात आपला प्रवास पूर्ण करताना अनेक विरोधाचे टप्पे पार पाडले. गेल्या काही वर्षांचा अपवाद वगळला तर संघ सातत्याने राजकीय सत्तेच्या रोषाला तोंड देत राहिला. स्वयंसेवक , कार्यकर्ते आणि समाज ह्यांच्या समोर संघाची प्रासंगिकता समजावून सांगताना संघाच्या द्रष्ट्या महापुरुषांनी वेळोवेळी हिंदू समाजाचे संघटन उभे केल्यानंतर आपल्याला संपूर्ण विश्वाच्या कल्याणाचे उद्दिष्टाकडे जायचे आहे पण त्यासाठी आधी आपले घर आपण नीट करू असे म्हटले आणि त्या दिशेने एक निर्दोष समाज निर्मितीसाठी निर्दोष संघटन उभे करू असे सांगितले.

अलीकडील काळात तपश्चर्येचे स्वाभाविक परिणाम म्हणून चमत्कार वाटावा असे वातावरण , सरकारी पातळीवर मिळणारी अनुकूलता , समाजातून मिळणारा सन्मान , वाढलेली प्रतिष्ठा ह्या मुळे अनेक लोक नव्याने हिंदुत्वाच्या विचाराकडे झुकायला लागले आहेत. अशा वेळी आपला अंतिम उद्देश हा मोक्षाकडे जाण्याचा आहे हे विसरून चमत्कारात अडकणाऱ्या तमाम योगी पुरुषांना म्हणजेच स्वयंसेवक , कार्यकर्ते आणि हिंदुत्वाचे आजचे तथाकथित भाष्यकार ह्यांना भानावर आणणारे संपूर्ण जगाला हिंदुत्वाचा योग्य निर्देश देणारे भाषण पूजनीय सरसंघचालक मोहन जी भागवत ह्यांनी काल अमेरिकेत केले आहे. मोक्षाची कल्पना भौतिक नसून अध्यात्मिक आहे हे ही भौतिक सुखाच्या जागतिक राजधानीत त्यांनी स्पष्ट केले आहे.

त्यावर उलट सुलट प्रतिक्रिया आल्या आहेत. प्रामाणिक चिकित्सक अभ्यासकांनी त्याचे स्वागत केले आहे . काही घोर विरोधकांनी त्याला नाटकी , फसवे संबोधले आहे. नव हिंदुत्ववादी ह्याला अनुनयवादी म्हणत आहेत.
पण जर बारकाईने आणि खोलात जाऊन विचार केला तर जागतिक राजकीय , धार्मिक आणि आर्थिक शक्तींच्या सर्व प्रकारच्या कट कारस्थानांचा वेध घेताना थेट त्यावर प्रहार न करता हिंदू विचार हा त्या पलीकडचा आहे ह्याची जाणीव करून देणारी मांडणी सरसंघचालकांनी केली आहे असे म्हटल्यास अतिशयोक्ती ठरणार नाही.

आपली आपली कर्मभूमी हीच आपली भूमी मानून त्याच्याशी एकनिष्ठ राहण्याचे आवाहन त्यांनी जमलेल्या सगळ्या हिंदू समाजाला केले आहे. त्याच बरोबर प्रत्येक देशाचे वैशिष्ट्य आहे तसेच भारताचे वैशिष्ट्य हे विविधतेत एकात्मता आहे हे सांगताना भारताने अद्वैत सिद्धांताचा केलेला पुरस्कारच जणू त्यांनी आधुनिक परिभाषेत मांडला आहे.

खरे तर पंडित दीनदयाळ जी ह्यांच्या निधनानंतर त्यांनी मांडलेला एकात्म मानव दर्शन हा समस्त विश्वाला गवसणी घालणारा विषय एका अर्थाने पुन्हा एकदा वैश्विक पटलावर मांडण्याचा ऐतिहासिक प्रयत्न पूजनीय सरसंघचालकांनी न्यूयॉर्क येथील कार्यक्रमात केला आहे हे समजून घेण्याची गरज आहे. त्यांच्या बोलण्यातून एका अर्थाने पसायदानात जसे माउली आता विश्वात्मके देवो ही साद त्या ईश्वराला घालतात त्याचीच आठवण करून दिली गेली आहे. जो जे वांछील तो ते लाहो प्राणिजात ! ह्या कल्पनेतील सर्वज जीव मग त्यात माणूस अपरिहार्य पणे आहेच ही व्यापक भूमिका पूजनीय मोहनजी अधोरेखित करत आहेत.

देशाच्या अंतर्गत रामजन्मभूमी लढा , ३७० कलम, काश्मीरचा प्रश्न, मुस्लिम कट्टरता , विस्तारवादी चर्च दृष्टिकोन आणि मनुष्याला मनुष्यत्वापासून दूर नेणारे असंस्कृतिक विचार ह्या बद्दलच्या भूमिका आणि न्यूयॉर्क
येथील भाषण ह्याची सरमिसळ करण्याची काहीही आवश्यकता नाही . स्वयंसेवक , कार्यकर्ते ह्यांचा संभ्रम वाढवणाऱ्या काही स्वतःला अती उजव्या , अती हिंदुत्ववादी समजणाऱ्यांनी आणि हिंदुत्वाचे अती राजकीयकरण करणाऱ्यांनी संयम आणि आक्रमण म्हणजे काय ह्याचे धडे गिरवण्याची पण गरज आहे. सगळे विषय सत्ता कारण आणि संघटनेच्या अभिनिवेशाचे नसतात .

मनुष्यत्व आणि विश्व कल्याण ह्याचा विचार करण्यासाठी जन्म घेतलेल्या समाजाचे जे प्रतिनिधी असतात त्यांना कसा विचार करायचा असतो ह्याचे भान असणारे संघाचे नेतृत्व आहे. त्याची वक्तव्ये संदर्भ सोडून मांडायचे , संदर्भ सोडून ऐकायचे राजकीय मंडळींनी त्याचे हवे ते अर्थ काढायचे आणि भाबड्या मंडळींनी अस्वस्थ होऊन जायचे हे थांबले पाहिजे.

संघ स्वयंसेवक , स्वतःला हिंदुत्व विचाराचे समजणारे आणि त्याचे राजकीय प्रगटन करणारे ह्यांच्या कडून अधिक जबाबदार आणि परिपक्व भूमिकेची गरज आहे. ४६/५७ सालची फाळणी परिस्थिती, ४८ साली झालेले खोटे आरोप , त्यानंतर ७५ साली आलेली विनाकारण बंदी ह्या सगळ्या वेळेस संघाच्या शीर्ष नेतृत्वाने जी भूमिका घेतली त्याला संघस्वसेवक , कार्यकर्ते ह्यांनी निष्ठेने साथ दिली. म्हणून त्या संकटातून संघ बाहेर पडला . समाजाला सावरू शकला.

आज काळ बदलला आहे. मानवी संस्कृतीपुढे आणि अस्तित्वापुढे खूप आव्हाने उभी आहेत ह्या आव्हानांना तोंड देण्यासाठी जागतिक स्तरावर व्यासपीठ उभे राहवे लागेल. दुसऱ्या महायुद्धानंतर निर्माण झालेल्या युनो सारख्या , युनेस्को किंवा तत्सम संस्था मानवी हिताचे रक्षण करण्यात कुचकामी ठरल्या आहेत . अशावेळी पूजनीय सरसंघचालकांनी एक व्यापक भूमिका जगासमोर मांडली आहे . सर्व जागतिक सत्तानी त्याचा नीट विचार केला तर कदाचित पुढच्या शतकात होणारा विनाश टळेल. अन्यथा मानवी जीवन मूल्ये नष्ट होऊन पृथ्वीचा विनाश अटळ आहे.

भारताच्या ऋषी मुनींनी वसुधैव कुटुंबकम् ! ही भूमिका मांडली होती ती जगाला पुन्हा सांगण्याची गरज आहे कारण बळी तो कान पिळी ! Survivhal of the fittest! ह्या घातक विचाराने जगात अनेक समस्या निर्माण झाल्या आहेत. त्याला सर्वे भवन्तु सूखीनः ! हा विचारच तारु शकतो आणि हा विचार जगात दृढ होण्यासाठी भारतात हिंदू संघटन आणि भारत बलशाली होणे ही पण अपरिहार्य गरज आहे.

पूजनीय सरसंघचालक ह्यांच्या बोलण्यातून संघाचे पुढच्या १०० वर्षाचे कार्य जणू अधोरेखित झाले आहे ह्यात कुठेही U टर्न नसून निवडलेल्या ध्येय मार्गाला अधिक प्रशस्त करण्याचा प्रयत्न आहे. हा ध्येयमार्ग १९२५ साली जेव्हढा कंटकाकीर्ण होता तेव्हढाच आज आहे. त्यावेळी अनेकांना डॉक्टर समजले नाही .पूजनीय गुरुजी कळले नाहीत. आज निदान पूजनीय मोहनजी ह्यांना समजावून घेऊ. तूर्त इतकेच.

श्रावण कृष्ण चतुर्थी.
३१/८/२६
भ्रमणध्वनी : ९४२२२२१५७०

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Aurangabad
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