अभ्युदय

अभ्युदय !! रामो विग्रहवान धर्म: !!
!!नमस्ते हिन्दू भूमे परम वन्दे मातृभूमे नमो नमः !!
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सनातन धर्म, हिन्दू संस्कृति,परम्पराएँ,इतिहास, प्राचीन जीवन दर्शन, संस्कृत भाषा, संस्कृति, लोक जीवन, लोक उत्सव, मिट्टी के रंग, विरासत : प्राचीन मंदिर,गढ़,किल्ले इत्यादि विषयों के साथ आधुनिक, राजनीतिक, समसामयिक विषय ! कुटुंब, समाज, देश की उत्तरोत्तर प्रगति के, अभ्युदय हेतु प्रयासरत् ! यू ट्यूब चैनल को भी जरूर सब्सक्राइब करें ! ��

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त्रिपुरारी पौर्णिमा, देव दीपावली के पावन पर्व पर त्रिलोक के समस्त 33 कोटि देवी देवताओं, यक्ष,गन्धर्व समेत समस्त ज्ञात अज...
05/11/2025

त्रिपुरारी पौर्णिमा, देव दीपावली के पावन पर्व पर त्रिलोक के समस्त 33 कोटि देवी देवताओं, यक्ष,गन्धर्व समेत समस्त ज्ञात अज्ञात आदरणीय पूर्वजों को माँ गंगा के पावन घाटों पर आमंत्रित और स्वागत करती श्री विश्वेश्वर विश्वनाथ की काशी !

सनातन धर्म में आज के दिन दीपदान का विशेष महत्व है ! भगवान शिव जी ने त्रिपुरासुर नामक दैत्य का आज वध किया था..भगवान श्री हरि विष्णु के मत्स्यावतार का एवं भगवान कार्तिकेय के जन्मोत्सव का ऐसा यह दिन त्रिपुरारी पौर्णिमा सभी के लिए मंगलकारी हो !




#मिट्टी_के_रंग #लोक_उत्सव #त्रिपुरारी_पूर्णिमा #काशी #देव_दीपावली #बनारस

03/11/2025

मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ में अंधेरे से रोशनी की ओर,समाज की मुख्यधारा लौटते हुए इन कदमों को देख कर लगता है निश्चित की #नक्सलवाद_मुक्त_भारत का लक्ष्य जल्दी ही पूरा होगा...🙏💝🇮🇳

02/11/2025

इसलिए बॉलीवुड वाले इनके सामने दूर दूर तक कहीं नहीं टिकते !! 💝👌👌

आज कार्तिकी,भागवत एकादशी निमित्त भु वैकुंठ श्री क्षेत्र पंढरपुर से श्री हरि विठ्ठल भगवंत और आई साहेब रुख्मिनी के विशेष द...
02/11/2025

आज कार्तिकी,भागवत एकादशी निमित्त भु वैकुंठ श्री क्षेत्र पंढरपुर से श्री हरि विठ्ठल भगवंत और आई साहेब रुख्मिनी के विशेष दर्शन !
🌼🙏🚩

जगत के स्वामी अखिल विश्व ब्रम्हांड नायक श्री हरि विष्णु आईसाहेब रुख्मिनी के साथ इसी तरह मनोहारी स्वरूप में सभी भक्तों के मन मंदिर में विराजमान होकर सभी का कल्याण करें...सभी को सुख, समृद्धि, आरोग्य, ऐश्वर्य, स्थैर्य, प्रदान करें, जीवन पथ के संकटों का सामना करने की शक्ति दे, अपना सानिध्य प्रदान करें ये ही कामना रहेगी...

हेचि दान दे ग देवा, तूझा विसर न व्हावा..
न लगे मुक्ति आणि संपदा..संत संग देहि सदा..🙏

जय जय राम कृष्ण हरि..वासुदेव हरि..🙏🚩

गोकुलेश गोविन्द प्रभु, त्रिभुवन के प्रतिपाला। गो-गोवर्धन-हेतु हरि, आपु बने गोपाला।।गोपाष्टमी की आप सभी को हार्दिक बधाई ए...
30/10/2025

गोकुलेश गोविन्द प्रभु, त्रिभुवन के प्रतिपाला।
गो-गोवर्धन-हेतु हरि, आपु बने गोपाला।।

गोपाष्टमी की आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं !!

जय गौमाता !! जय गोपाल !!🙏🌼🚩

#गोपाष्टमी_पर्व
#गोपाष्टमी

छठ!🌹छठ केवल आज नही है। सृष्टि में जिस दिन तक डूबते सूरज को नमन करने वाला एक व्यक्ति भी बचा रहेगा, हर उस दिन तक को छठ समझ...
27/10/2025

छठ!🌹

छठ केवल आज नही है। सृष्टि में जिस दिन तक डूबते सूरज को नमन करने वाला एक व्यक्ति भी बचा रहेगा, हर उस दिन तक को छठ समझिए। इस कृतघ्न दुनिया में विगत के प्रति कृतज्ञ हो जाना छठ होना है। छठ सनातन का छठिहार है।

उगते सूरज मात्र को प्रणाम करने वाले कभी ‘लोग’ नही हो सकते, इसका घोषणा पत्र है छठ। डूबते सूरज के रूप में अपने पितरों को सादर यह आमंत्रण देने का पर्व है छठ। आमंत्रण यह कि कृपया इसी सृष्टि में, इसी धरा पर, इसी वंश में, इसी घर में फिर कल भी आइए। आइये, आज की तरह ही सूरज बन ताकि कल भी आपकी संतति का भोर हो।

छठ यही उद्घोष करता है कि हमें अभिमान है सूरजवंशी होने का। हमारा सूरज जहां हो हम वहीं होंगे सूरजमुखी बन। हमें सूरज से काम है चाहे वे उगें या डूब जायें। हर तरह के कृतघ्नता के ख़िलाफ़ कृतज्ञ होने का, अहसनफ़रामोस इस दुनिया में अहसानमंद होने का, स्वार्थ के उलट परमार्थ, सौदा नही संस्कार का उत्सव है छठ। सम्भावना मात्र के कारण नही अपितु भावनाओं के कारण जुड़ जाने की प्रेरणा का पर्व है छठ।

छठ यानी ऐसी सिंदूरी आभा का त्यौहार जो सदैव हमारी नाक बचाये रखे। शूपनखाओं के ख़िलाफ़ सूप को हथियार बनाने का पावन पाबनि है छठ। समाज की डाल पर अंधेरे के पक्ष में उलटा लटक रहे चमगादरों के ख़िलाफ़ भोर का सुर, प्रभाती की तान है छठ। छठ है यानी हमें भी याद रहे छठी का दूध और याद भी करा पायें अमित्रों-अमानुषों को आवश्यकता अनुसार।

मिट्टी के चूल्हे पर छनते ठकुआ की सुगंध है छठ। प्रणाम सादर।🌺

- पंकज कुमार झा

सामान्यतया शासकीय व्यवस्था, स्वास्थ्य-शिक्षा आदि की आलोचना करना ही फैशन माना जाता है। हर मानस में यह बैठा दिया गया है कि...
26/10/2025

सामान्यतया शासकीय व्यवस्था, स्वास्थ्य-शिक्षा आदि की आलोचना करना ही फैशन माना जाता है। हर मानस में यह बैठा दिया गया है कि सरकारी व्यवस्था होगी तो अच्छी नहीं होगी। किंतु …

किंतु यह समाचार पढ़िये, और सोचिए कि चिकित्सकों को यूं ही भगवान नहीं कहा जाता है। किसी शासकीय अस्पताल में ही यह संभव था जब दीपावली की रात अपना उत्सव छोड़ कर एक मासूम जीवन को बचाने की जद्दोजहद में पूरी टीम जुटी रही और सफल भी हुई।

कल्पना कर सिहर जायेंगे आप कि किस तरह घंटी का लगभग पूरा डंडा बच्ची की आंख में धँस गया था, फिर भी प्रकाश उत्सव की रात्रि प्राण-पण से जुटकर चिकित्सकों और नर्सों की टीम, न केवल बिटिया की प्राण रक्षा में सफल हुई अपितु बिटिया का दिमाग और आंखों की ज्योति भी बचाना संभव हो पाया।

अद्भुत और अशेष साधुवाद। 🙏

- पंकज कुमार झा

 ापर्व कई मायनों में आधिकारिक रूप से पूर्वांचल का सांस्कृतिक हस्ताक्षर है...किंवदंतियों की मानें तो अंगराज कर्ण ने भोजपु...
26/10/2025

ापर्व कई मायनों में आधिकारिक रूप से पूर्वांचल का सांस्कृतिक हस्ताक्षर है...किंवदंतियों की मानें तो अंगराज कर्ण ने भोजपुर के पास (अंग प्रदेश में) विधिवत छठ व्रत सम्पन्न किया। गंगा जी के जल में अर्घ्य दिया। कहा जाता है कि वनवास के दौरान द्रौपदी ने भी पांडवों के राज्य वापसी और राजयोग मिलने की कामना से छठ व्रत किया। यमुना जी के जल में अर्घ्य दिया। सीता माँ ने भी सरयू नदी में अर्घ्य देकर विधिवत छठ व्रत सम्पन्न किया था। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण के प्रपौत्र को जब कुष्ठरोग हुआ तो उन्होंने कलिंग प्रदेश (ओड़िशा) आकर सुवर्णरेखा नदी के किनारे छठ व्रत सम्पन्न किया। बाद में वहाँ सूर्यदेव का मंदिर - कोणार्क - भी स्थापित किया गया। इन दंतकथाओं का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है।

छठ व्रत की सबसे अनूठी बात यह है कि ये महापर्व लोक का पर्व है, श्लोक का नहीं। इसमें ना किसी जाति का बंधन है, ना जातित्व की बंदिशें। छठ व्रत कोई भी विवाहित या विवाहिता कर सकते हैं। कोई भी व्यक्ति इस अखंड व्रत का अनुष्ठान मात्र श्रद्धा और भक्ति से कर सकता है।

इस पर्व में सूर्य की उपासना होती है। बहुत कठिन नियमों के अनुपालन के साथ सूर्य देव और उनकी बहन छठी माँ का आह्वान कर उनकी पूजा अर्चना की जाती है। व्रतियों के शरीर और मन को इतने नियमों में बाँध दिया जाता है कि पंचभूत को महसूस करने के अलावा कोई चेतना नहीं बच पाती। यही इस व्रत की महिमा भी है और उद्देश्य भी। कहते हैं कि इस स्थिति में व्रती सामान्य न होकर स्वयं भी छठी माँ या सूर्य देव का रूप बन जाते हैं। इसलिए छठ में जितना महत्व सूर्योपासना है उतना ही माहात्म्य व्रती का भी होता है। जिनके घरों में छठ होता है वहाँ व्रती के सहायक/सहायिका का महत्व व्रतियों से भी अधिक होता है। पूरे पूजा की रीढ़ होते हैं ये सहायक, सहायिका।

छठ पर्व चार दिनों का मौनी मनन वाला उत्सव होता है। यूँ तो दीपोत्सव के साथ साथ ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती है लेकिन नहाए-खाए से अधिकारिक रूप से व्रतियों का घर बँध जाता है। अरवा चावल के भात, चने की दाल और लौकी की तरकारी के साथ व्रत की विधिवत शुरुआत होती है। नहाए खाए के दिन घी, ज़ीरा, हींग, सेंधा नमक और कुएँ के जल से मिट्टी के चूल्हे पे प्रसाद बनता है।

अगले दिन होता है खरना। इस दिन व्रती पूरे दिन निर्जला व्रत करते हैं। शाम को गन्ने के रस में चावल पकाकर खीर बनायी जाती है। चावल के आटे को चाँड़ कर पिट्ठा बनाया जाता है और बिना चत्ते वाली रोटी या पूरी बनायी जाती है। सारा प्रसाद पुनः कुएँ के जल, दूध, गुड़ और घी से बनाया जाता है। पूजन समाप्त करने के उपरांत व्रती प्रसाद ग्रहण करते हैं और फिर बचे हुए प्रसाद का वितरण केले के पत्ते और पीतल/काँसे/मिट्टी की ढकनी में होता है। इसके बाद व्रती पुनः निर्जला व्रत को संकल्पित होते हैं।

षष्ठी के दिन निर्जला व्रत रखते हुए पूरे दिन पहले अर्घ्य की व्यवस्था की जाती है। ठेकुआ और कसार प्रसाद बनाया जाता है। घी, गुड़, सूखे मेवे, कुएँ के जल, घर पर धोए, सूखे और पिसाए गेहूँ और चावल के साथ प्रसाद बनाया जाता है। डल्ला और सूप सजाया जाता है। सूप में रखे जाने वाले सारे प्रसाद और पूजन सामग्री पर भखरे सिंदूर को लगाया जाता है। बाँस के डल्ले में पूजन की सामग्री इकट्ठी की जाती है। चावल और गेहूँ से बने पकवान, फल में नारियल, ईख, केला, नारंगी और कन्द अवश्य होते हैं। बद्धी, जनेऊ, सिंदूर, आलता और अर्ता चढ़ाया जाता है। उसके अलावा त्रिया और व्रती अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार सूखे मेवे, मिठाई आदि प्रसाद के रूप में चढ़ाते हैं।

अर्घ्य देने के लिए बाँस या पीतल के सूप पर चावल के अईपन और रोली से चित्रकारी कर उसमें प्रसाद सजाया जाता है। सूप के सामने वाले हिस्से पर मिट्टी या पीतल का दीया रखा जाता है। संध्याकाल सूर्यास्त के समय व्रती स्नान के बाद, बिना सीवन के वस्त्र पहन कर, शुद्धावस्था में जल मग्न होकर, हथेली में सिंदूर या अईपन लगवाकर, त्रियायें नाक से माँग तक जोड़े सिंदूर लगाकर सूप हाथ में लेते हैं। सहायक/सहायिका सूप रखे दीये को जलाकर, पृथ्वी पर धूप और दीप जलाकर सूर्यदेव की पूजा अर्चना करते हैं। व्रती घूमती जाती हैं और जल-दूध की कच्ची लस्सी से सूर्यदेव को अर्घ्य दिया जाता है।

षष्ठी के साँझ अर्घ्य के बाद भी निर्जला व्रत चलता है। रात्रि में यथासम्भव जागरण करते हुए सूर्योपासना में मन लीन रखते हुए अगले दिन के सूर्योदय के सूर्यार्घ्य की तैयारी की जाती है। सप्तमी तिथि को अलसुबह, किरण फूटने के पहले पुनः व्रती जलमग्न होकर सूर्यदेव की आराधना करते हैं और उगते सूर्य को अर्घ्य देते हुए अपना अनुष्ठान सम्पन्न करते हैं। प्रसाद खाकर पारण किया जाता है। उसके बाद भोजन ग्रहण किया जाता है।

छठ पर्व में लोकगीतों का बहुत महत्व है। कहते हैं छठ के गीत ही इस महापर्व के महामंत्र हैं। इसलिए इन्हें शांतचित्त से, तल्लीन होकर, स्थिर वाणी में, ठहराव के साथ गाना चाहिए। छठ के गीत अन्य दिन नहीं गाए जाते। छठ पर्व के दौरान ही अभिमंत्रित किए जाते हैं और उन्हीं के साथ अगले एक साल के लिए स्मृति में विसर्जित कर दिए जाते हैं।

प्रकृति से जुड़े और प्रकृति को ही पूजने वाले इस महापर्व में कृत्रिमता का कोई स्थान नहीं है। मानव के चारित्रिक कलुष की कोई जगह नहीं है। बड़े छोटे का कोई बोध नहीं है। मात्र अगाध श्रद्धा, अनुशासन, प्रेम, सात्विक कामनाओं और भक्ति इन्हीं से सूर्यार्घ्य सम्पूर्ण होता है।

सभी को छठ महापर्व की शुभ और मंगलमय कामनायें.... जय छठी मैया....🙏

#छठ ूजा #लोक_संस्कृति #मिट्टी_के_रंग #लोकआस्था #लोक_उत्सव अभ्युदय

मित्रों …. आपने भी सोशल मीडिया पर एक तैर रही एक वीडियो देखी होगी जिसमें किसी फैक्ट्री के बाहर सोन पापड़ी के डिब्बों का ढ...
24/10/2025

मित्रों …. आपने भी सोशल मीडिया पर एक तैर रही एक वीडियो देखी होगी जिसमें किसी फैक्ट्री के बाहर सोन पापड़ी के डिब्बों का ढेर पड़ा है…. बताया जा रहा है कि यह दीपावली गिफ्ट था, जो कर्मचारियों को पसंद नहीं आया…. इसलिए गुस्से में उन्होंने उसे फैक्ट्री के गेट पर फेंक दिया....

अब प्रश्न ये नहीं कि तस्वीर असली है या नकली…. प्रश्न ये है कि क्या दीपावली पर मिला उपहार अगर आपकी अपेक्षा से छोटा निकले तो उसका अपमान कर देना सही है ??

थोड़ा ठहरिए…. सोचिए !

दीपावली पर एम्प्लॉयर से मिलने वाला गिफ्ट क्या आपका “अधिकार” है ??

नहीं…. वह किसी भी कानून में लिखा हुआ अधिकार नहीं है…. यह एक परंपरा है, एक सौहार्द की भावना है, एक छोटे से इशारे के रूप में “थैंक यू” कहने का तरीका है…. एम्प्लॉयर जब अपनी टीम को दीपावली पर कुछ देता है, तो वह अपनी खुशी और आभार का प्रतीक देता है, न कि कोई वेतन वृद्धि या बोनस का विकल्प.

अब दूसरा प्रश्न …. क्या सोन पापड़ी देना कंजूसी है ??
संभव है…. लेकिन यह भी संभव है कि कंपनी की आर्थिक स्थिति ऐसी हो कि उससे ज़्यादा देना संभव न हो…. व्यापार में घाटे, कर्ज़, बकाया पेमेंट, मार्केट स्लोडाउन जैसी बातें फैक्ट्री की दीवारों के भीतर ही रह जाती हैं…. बाहर वालों को सिर्फ मशीनों की आवाज़ सुनाई देती है, तिजोरी की खामोशी नहीं.

कई बार कम्पनी मालिक खुद तंगी में होते हैं, मगर त्योहार के नाम पर अपने कर्मचारियों के चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश फिर भी करते हैं…. वो जानते हैं कि गिफ्ट बड़ा नहीं है, लेकिन शायद उनकी नीयत साफ़ होती है.

पर अफ़सोस…. हम इस दौर में जी रहे हैं जहाँ “गिफ्ट” का माप उसके दाम से होता है, भावना से नहीं.

आप सोचिए …. जिस सोन पापड़ी के डिब्बे को आपने हिकारत से फेंक दिया, वही किसी और के बच्चे के लिए इस दिवाली की मिठास बन सकता था …. कई मज़दूर ऐसे हैं जिन्हें इस बार दीपावली पर तनख्वाह तक नहीं मिली…. कई लोग ऐसे हैं जिनके घर में इस त्योहार पर चूल्हा तक नहीं जला.

तो क्या सच में सोन पापड़ी इतनी बेइज्जती की हकदार थी ??
या फिर हमारी सोच इतनी छोटी हो गई है कि गिफ्ट का मूल्य अब दिल से नहीं, दाम से आँका जाता है ??

कभी सोचिए …. अगर वही मालिक कह देता कि “इस बार घाटा बहुत है, कुछ नहीं दे पाएंगे”… तब क्या होता ?
शायद तब भी लोग नाराज़ होते…. और अब जब उसने अपनी हैसियत के अनुसार कुछ दिया, तब भी हंसी उड़ाई जा रही है.

मित्रों…. यह सिर्फ सोन पापड़ी का मुद्दा नहीं है…. यह हमारे भीतर के संस्कारों की परीक्षा है.

हम कितने भी पढ़े-लिखे क्यों न हों, अगर हमें किसी के दिए उपहार का सम्मान करना नहीं आता, तो शिक्षा व्यर्थ है….
दीपावली का असली अर्थ “प्रकाश” है — अंधकार मिटाना, ईर्ष्या मिटाना, तुलना मिटाना…. और भीतर थोड़ी सी विनम्रता का दीप जलाना.

आपको सोन पापड़ी नहीं चाहिए — मत खाइए….
आपको वो गिफ्ट छोटा लगा — कोई बात नहीं….
लेकिन उसे यूँ सड़क पर फेंक देना, उसका अपमान करना, ये उस अन्न और उस श्रम का अपमान है जिससे वह बना है.

और हाँ…. ये भी याद रखिए —
किसी भी नौकरी का रिश्ता एक “लेन-देन” से ज़्यादा “विश्वास” पर टिकता है….कंपनी को आपकी ज़रूरत होती है, तो आपको भी कंपनी की…. अगर एक ओर से सम्मान कम हो गया, तो यह रिश्ता भी टिक नहीं सकता.

कभी अपने दादा-दादी से पूछिए…. वो बताते थे कि उनके ज़माने में दीपावली पर अगर मालिक एक मिठाई का डिब्बा भी देता था तो उसे देवता का प्रसाद मानकर घर लाया जाता था….
बच्चे झगड़ते नहीं थे कि “क्या मिला”, बल्कि खुश होते थे कि “कुछ तो मिला”.

समय बदल गया, सोच नहीं बदलनी चाहिए…. त्योहार सिर्फ दिए जलाने के लिए नहीं होते, अपने भीतर थोड़ी रोशनी भरने के लिए भी होते हैं…. इसलिए अगले बार जब कोई आपको गिफ्ट दे — चाहे वो सोन पापड़ी हो, एक मिठाई का पीस हो, या सिर्फ एक “हैप्पी दिवाली” का कार्ड — उसे मुस्कान के साथ स्वीकार कीजिए….
क्योंकि असली गिफ्ट वही मुस्कान है जो किसी की नीयत की सच्चाई को समझ सके.

लेख साभार : पारुल_सहगल जी

महामहीम राष्ट्रपती द्रौपदी मूर्मू जी का केरल के सबरीमाला स्थित अयप्पा स्वामी मंदिर में देवस्थान की परंपराओं का पूरे मन स...
23/10/2025

महामहीम राष्ट्रपती द्रौपदी मूर्मू जी का केरल के सबरीमाला स्थित अयप्पा स्वामी मंदिर में देवस्थान की परंपराओं का पूरे मन से पालन करते हुए दर्शन करने जाना तपती धूप में छांव समान है...यह सम्मान है उन सभी सनातन धर्मियों की आस्था का..उन परंपराओं का रीति रिवाजों का..उन रोते हुए छोटे छोटे बच्चों का, माताओं का जो पुलिस की गाड़ियों में अपराधी की तरह ले जाए गए... प्रयास सिर्फ यह था कि इस देवस्थान की पवित्रता और परंपराओं की शुचिता बनी रहे..जिनका दमन करने का भरपूर प्रयास केरल की वामपंथी सरकार और विचारधारा ने अलग अलग तरीकों से किया !!

धन्यवाद महामहिम जी ! स्वामिये शरणम् अयप्पा !!🌼🙏🚩

- अभ्युदय

21/10/2025

ऐसा युगे युगे स्मरणीय सर्वदा, माता पिता सखा शिव भूप तो...🌼🙏🪔

#दीपोत्सव2025 #दीपावली_2025

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