21/04/2026
आदि शंकराचार्य 🌹🙏🙏 (788-820 ईस्वी) भारत के महान दार्शनिक, संत और अद्वैत वेदांत के प्रचारक थे, जिन्होंने सनातन धर्म को पुनर्जीवित किया। केरल में जन्में शंकराचार्य ने मात्र 8 वर्ष की आयु में संन्यास लिया, वेदों का अध्ययन किया और 32 वर्ष की अल्पायु में भारत के चारों कोनों (द्वारका, पुरी, श्रृंगेरी, बद्रीनाथ) में मठ स्थापित कर राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोया।
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आदि शंकराचार्य का संक्षिप्त जीवन परिचय:
जन्म और स्थान: केरल के एर्नाकुलम जिले के कलाडी (Kalady) गांव में 788 ईस्वी में हुआ।
माता-पिता: पिता शिवगुरु और माता आर्याम्बा, जो भगवान शिव के भक्त थे।
बाल्यकाल: वे बचपन से ही विलक्षण बुद्धि के धनी थे, दो साल की उम्र में संस्कृत बोल सकते थे और 8 साल की उम्र तक सभी वेदों के ज्ञाता बन चुके थे।
संन्यास और गुरु: माता की आज्ञा से 8 साल की उम्र में संन्यास लेकर वे गुरु गोविंद भगवत्पाद की शरण में नर्मदा तट पर गए।
दर्शन (Philosophy): उन्होंने अद्वैत वेदांत (Non-dualism) का प्रचार किया, जिसका अर्थ है कि आत्मा और ब्रह्म (परमात्मा) एक ही हैं।
प्रमुख कार्य और योगदान:
चार मठों की स्थापना: देश में सांस्कृतिक एकता के लिए पूर्व में गोवर्धन मठ (पुरी), पश्चिम में शारदा मठ (द्वारका), दक्षिण में श्रृंगेरी मठ और उत्तर में ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ) की स्थापना की।
भाष्य रचना: उन्होंने उपनिषदों, भगवद गीता और ब्रह्मसूत्र पर भाष्य (टीका) लिखे।
प्रमुख ग्रंथ: 'विवेकचूड़ामणि', 'आत्मबोध', 'मनीषा पंचकम्', और 'भजगोविंदम' स्तोत्र की रचना की।
सुधार: पाखंडवाद और नास्तिकता का खंडन किया।
समाधि: उन्होंने 32 वर्ष की अल्पायु में उत्तराखंड के केदारनाथ/केदारतीर्थ में समाधि ली।
शंकराचार्य को भगवान शिव का अवतार माना जाता है और उन्होंने पूरे भारत में भ्रमण कर ज्ञान व भक्ति का अलख जगाया।