Mubarakpur express

Mubarakpur express علمی، ادبی اور تحقیقی مواد کی اشاعت کی طرف ایک قدم!

18/02/2026

आजमगढ़ कोर्ट ने 27 वर्ष पूर्व मुबारकपुर में शिया सुन्नी दंगे में हुई एक हत्या के मुकदमे में अदालत ने दोषी करार दिए गए सभी 12 आरोपियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। यह फैसला जिला एवं सत्र न्यायाधीश जय प्रकाश पांडेय ने मंगलवार को सुनाया।

बीते शुक्रवार को सभी 12 आरोपियों को दोषी करार दिया गया था।
आजीवन कारावास के साथ ही प्रत्येक आरोपियों पर 50 हजार के आर्थिक दंड का आदेश भी दिया गया है। सजा के ऐलान को लेकर पहले से ही कोर्ट परिसर में गहमा गहमी थी और सुरक्षा व्यवस्था भी चुस्त दुरुस्त थी।

अभियोजन पक्ष के अनुसार वादी मुकदमा नासिर हुसैन ने मुबारकपुर थाने में 30 अप्रैल 1999 को रिपोर्ट दर्ज कराई।

नासिर हुसैन ने अपनी तहरीर में कहा उसके चाचा अली अकबर निवासी पूरा ख्वाजा 27 अप्रैल 1999 से लापता थे। अली अकबर के लड़के जैगम ने 28 अप्रैल को गुमशुदगी की सूचना थाने पर दी थी। अली अकबर की सिर कटी लाश राजा भाट के पोखरे से 30 अप्रैल को बरामद की गई। विवेचना में यह पता चला कि मोहर्रम के जुलूस से लौटते समय अली अकबर को सुन्नी संप्रदाय के लोगों ने मारपीट कर हत्या कर दी थी।

इस मामले में पुलिस ने हुसैन अहमद निवासी हैदराबाद, मोहम्मद अयूब फैजी, हाजी मोहम्मद सुलेमान, फहीम अख्तर, असरार अहमद, मोहम्मद याकूब सभी निवासी दुल्हनपूरा, अली जहीर नजीबुल्लाह इरशाद निवासी पूरासोफी, हमीदुल्लाह उर्फ झीनक, मोहम्मद असद हाजी अब्दुल खालिक अफजल अलाउद्दीन दिलशाद तथा वसीम निवासी हैदराबाद को के विरुद्ध चार्जशीट न्यायालय में प्रेषित किया। दौरान मुकदमा हाजी मोहम्मद सुलेमान, नजीबुल्लाह, हमीदुल्लाह उर्फ झीनक तथा हाजी अब्दुल खालिक की मृत्यु हो गई। अभियोजन पक्ष की तरफ से डीजीसी फौजदारी प्रियदर्शी पियूष त्रिपाठी तथा एडीजीसी दीपक कुमार मिश्रा ने कुल नौ गवाहों को न्यायालय में परीक्षित कराया।

ये है Himalya कंपनी की Liv–52 टेबलेट। लिवर ठीक करने में ये खाई जाती है। सोचिए, इतनी प्रतिष्ठित कंपनी के नाम पर भी नकली द...
09/02/2026

ये है Himalya कंपनी की Liv–52 टेबलेट। लिवर ठीक करने में ये खाई जाती है। सोचिए, इतनी प्रतिष्ठित कंपनी के नाम पर भी नकली दवाई बन रही थी। सोनीपत की फैक्ट्री में दवाई बनती थी। खाली डिब्बी, रैपर मेरठ में बनते थे। मयंक अग्रवाल, अनूप गर्ग, तुषार ठाकुर, आकाश ठाकुर, नितिन त्यागी पकड़े गए हैं।

गाजियाबाद, यूपी

نجی جگہ پر مذہبی اجتماع کے لیے سرکاری اجازت ضروری نہیں ہے! الہ آباد ہائی کورٹ
04/02/2026

نجی جگہ پر مذہبی اجتماع کے لیے سرکاری اجازت ضروری نہیں ہے! الہ آباد ہائی کورٹ

04/02/2026

लखनऊ : राजधानी लखनऊ में भारी बारिश के बीच जियामऊ पुल से एक वीडियो सामने आया है, जिसने लखनऊ पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

तेज़ बारिश से बचने के लिए जैसे ही लोग अपनी गाड़ियाँ सड़क किनारे रोककर खड़े हुए, वैसे ही पुलिस ने राहत देने के बजाय खड़ी गाड़ियों के ऑनलाइन चालान काटना शुरू कर दिया।

वीडियो सामने आने के बाद शहरवासियों में नाराज़गी है। लोगों का कहना है कि वे बारिश से बचने के लिए मजबूरी में रुके थे, लेकिन पुलिस ने इंसानियत दिखाने के बजाय नियमों की सख़्ती दिखाई।

यह घटना यूपी के डीजीपी आवास से महज़ कुछ मीटर की दूरी पर हुई, जिससे मामला और भी संवेदनशील हो गया है।

सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद लखनऊ पुलिस की काफ़ी किरकिरी हो रही है।

UGC Act 2026 का पूरा मसौदा सामने है। इसलिए “कौवा कान ले गया” जैसी अफ़वाहों में पड़ने के बजाय हर व्यक्ति को चाहिए कि खुद ...
29/01/2026

UGC Act 2026 का पूरा मसौदा सामने है। इसलिए “कौवा कान ले गया” जैसी अफ़वाहों में पड़ने के बजाय हर व्यक्ति को चाहिए कि खुद पढ़कर समझे और फिर तय करे कि समर्थन करना है या विरोध।
मैंने यह एक्ट ध्यान से पढ़ा है। इसमें साफ लिखा है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान या दिव्यांगता के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव अपराध माना जाएगा।
इसके अलावा मुझे इसमें कुछ ऐसा नहीं दिखा जो समाज को नुकसान पहुँचाए।
अगर किसी को इसमें कोई और आपत्तिजनक गाइडलाइन दिखती है, तो कृपया तथ्य के साथ बताएं।
एक्ट का मुख्य उद्देश्य (बिंदु-2 के अनुसार) बिल्कुल स्पष्ट है —
SC, ST, OBC, EWS, दिव्यांगजनों सहित सभी वर्गों के खिलाफ भेदभाव खत्म करना और विश्वविद्यालयों में समानता व समावेशन को बढ़ावा देना।
मेरी नज़र में जो भी इंसाफ और बराबरी में विश्वास रखता है, वह यही चाहेगा कि कम से कम शिक्षा संस्थानों में तो जातिगत भेदभाव पूरी तरह खत्म हो।
हाँ, एक बात ज़रूरी है —
इस कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
जैसे दहेज एक्ट, SC/ST एक्ट या तीन तलाक कानूनों में गलत इस्तेमाल की शिकायतें आती रही हैं, वैसे ही इस एक्ट में भी सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए।
बाकी हर व्यक्ति को अपनी राय रखने का अधिकार है।
मैं व्यक्तिगत रूप से UGC Act का समर्थन करता हूँ, क्योंकि यह समानता और भाईचारे की बात करता है।
अजीब बात यह है कि जो लोग “हम सब एक हैं” और “हिंदुत्व” की बात करते हैं, वही बराबरी की बात आते ही असहज हो जाते हैं।
जब समानता की बात हो रही है, तो क्या SC, ST, OBC हिंदू नहीं हैं?
अगर किसी वर्ग को लगता है कि यह एक्ट समाज के खिलाफ है, तो कृपया पूरा एक्ट पढ़कर साफ बताएं — किस बिंदु के आधार पर?
भावनाओं से नहीं, तथ्यों से बात होनी चाहिए। 🙏
Mukesh morya

  कानून डंके की चोट पर लागू होना चाहिए।इसका सबूत सोशल मीडिया में खुद तैर रहे हैं इस पर प्रधानमंत्री जी को गौर करना चाहिए...
29/01/2026

कानून डंके की चोट पर लागू होना चाहिए।

इसका सबूत सोशल मीडिया में खुद तैर रहे हैं इस पर प्रधानमंत्री जी को गौर करना चाहिए पढ़ना चाहिए।
किस तरह सब जातिवादी मानसिकता के लोग खुलकर मैदान में आ गए हैं।

जब देश के प्रधानमंत्री को खुले आम सोशल मीडिया में जाति सूचक गालियां दी जा रही हैं तेलिया पूरे तेली समाज के ओबीसी जाति को अपशब्द कहा जा रहा है।

जब यह लोग प्रधानमंत्री को जाति सूचक गालियां दे रहे हैं तो सोचों Sc St OBC समाज PDA समाज के लोगों के बच्चों के साथ स्कूल कॉलेज में विश्व विद्यालयो में बराबर बैठने देते होंगे नहीं...?

इसी तरह मध्य प्रदेश के सीएम डॉ मोहन यादव ने कुछ समय पहले मात्र कहा था कि ओबीसी को 27% आरक्षण जो मण्डल कमीशन में आरक्षित है उसे डंकी की चोट पर मध्य प्रदेश में लागू करेंगे ।

तब भी यही सवर्ण समाज के जातिवादी मानसिकता के वर्चस्ववादी लोग़ उनको भद्दी भद्दी जाति सूचक गालियां सोशल मीडिया में दे रहे थे। पुतले फूंक रहे थे।

अब जब यह लोग प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को इस तरीके से जातीय कुंठा भरी नजरों से संबोधित करते हुए गालियां बक रहे हैं तो सोचो या Sc St ओबीसी समाज के लोगों को स्कूल कॉलेज विश्व विद्यालयो में किस तरीके से यह लोग अपमानित करते होंगे।

सबसे पहले तो सोशल मीडिया में जो यह जातिवादी मानसिकता के लोग प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को अपशब्द लिख रहे हैं या बोल रहे हैं इसकी जाँच कर उनके ऊपर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।

फिर इसे यूजीसी के तहत उनके ऊपर प्रधानमंत्री जी को जाति सूचक गालियां देने के जुर्म में कारवाई सर्वप्रथम करनी चाहिए और फिर इसी को आधार बनाकर सभी स्कूल कॉलेज में यूजीसी लागू करना चाहिए।

गलत ट्रांजैक्शन से गंवाए पैसे, पुलिस की सक्रियता से वापस मिले 9,200 रुपये​​आजमगढ़ डिजिटल लेनदेन के दौर में छोटी सी चूक भ...
29/01/2026

गलत ट्रांजैक्शन से गंवाए पैसे, पुलिस की सक्रियता से वापस मिले 9,200 रुपये

​आजमगढ़ डिजिटल लेनदेन के दौर में छोटी सी चूक भी भारी पड़ सकती है, लेकिन अगर समय रहते सही कदम उठाया जाए तो नुकसान की भरपाई संभव है। अतरौलिया थाना पुलिस की साइबर हेल्पडेस्क ने तत्परता दिखाते हुए एक पीड़ित को उसके खाते से कटे पैसे वापस दिलाकर राहत पहुंचाई है।
​पुलिस द्वारा साझा की गई जानकारी के मुताबिक चिश्तीपुर (अतरौलिया) निवासी मोहित कुमार पुत्र पथरु के साथ पिछले साल 20 जून 2025 को एक घटना हुई थी। ऑनलाइन पेमेंट के दौरान गलती होने के कारण उनके खाते से कुल 20,200 रुपये डेबिट हो गए थे। घबराए पीड़ित ने तुरंत इसकी सूचना साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर दर्ज कराई थी, जिसे अतरौलिया थाने की साइबर हेल्पडेस्क को हस्तांतरित किया गया।
मामला संज्ञान में आते ही अतरौलिया थाने के साइबर हेल्पडेस्क प्रभारी उपनिरीक्षक अभिषेक यादव और कंप्यूटर ऑपरेटर आशीष कुमार ने बैंक से संपर्क साधा। पुलिस की त्वरित कार्रवाई से ठगी गई रकम में से 9,200 रुपये को 'होल्ड' (Freeze) करा दिया गया था।
रकम होल्ड होने के बाद पुलिस ने विधिक प्रक्रिया पूरी की। माननीय न्यायालय से 'फंड रिलीज ऑर्डर' प्राप्त होने के बाद बैंक के माध्यम से पीड़ित मोहित कुमार के खाते में 9,200 रुपये सकुशल वापस करा दिए गए। अपनी मेहनत की कमाई वापस पाकर पीड़ित ने पुलिस का आभार व्यक्त किया।
जनपद पुलिस ने नागरिकों से अपील की है कि किसी भी प्रकार की साइबर ठगी या गलत ट्रांजैक्शन होने पर तत्काल 1930 नंबर पर कॉल करें। जितनी जल्दी सूचना मिलेगी, पैसा वापस मिलने की संभावना उतनी ही अधिक होगी।


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بھارت کی آئین سازی میں علماء، جمعیت علماء ہند اور مسلم اراکینِ اسمبلی کا کردار(دستور ساز اسمبلی کی بحثوں اور مؤرخین کی ر...
26/01/2026

بھارت کی آئین سازی میں علماء، جمعیت علماء ہند اور مسلم اراکینِ اسمبلی کا کردار
(دستور ساز اسمبلی کی بحثوں اور مؤرخین کی روشنی میں)
مولانا مہدی حسن عینی قاسمی
انڈیا اسلامک اکیڈمی دیوبند

بھارت کا آئین محض قانونی دستاویز نہیں بلکہ مختلف مذاہب اور قومیتوں کے باہمی اعتماد کا معاہدہ ہے،اس کی تشکیل میں جہاں سیاسی قائدین کا کردار نمایاں ہے، وہیں مسلم علماء، جمعیت علماء ہند اور دیگر مسلم اراکینِ دستور ساز اسمبلی کی مدلل جدوجہد کو بھی نظر انداز نہیں کیا جا سکتادستور ساز اسمبلی کی کارروائیاں (Constituent Assembly Debates) اس حقیقت کی گواہ ہیں کہ مذہبی آزادی، اقلیتوں کے حقوق اور سیکولر ریاست کا تصور مسلسل مسلم نمائندوں کے اصرار سے آئین کا حصہ بنا۔
سب سے پہلے مذہبی آزادی کے مسئلے کو لیا جائے تو مولانا حسرت موہانی نے واضح الفاظ میں کہا کہ ریاست کو شہری کے مذہب میں مداخلت کا کوئی اختیار نہیں ہونا چاہیے۔
حوالہ: CAD, Vol. 7, 6 December 1948
اس مطالبے کی اہمیت پر گرانوِل آسٹن لکھتے ہیں:
> “The insistence of minority members ensured that freedom of religion became a fundamental right.”
حوالہ: Granville Austin, The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation, p. 65
اقلیتوں کے تعلیمی و مذہبی اداروں کے تحفظ پر مولانا محمد اسماعیل صدیقی نے کہا کہ مذہبی آزادی اسی وقت بامعنی ہوگی جب اقلیتوں کو اپنے ادارے قائم رکھنے اور چلانے کا حق ہوگا۔
حوالہ: CAD, Vol. 7, 8 December 1948
اسی نکتے پر ایچ۔ ایم۔ سیروائی لکھتے ہیں:

“Articles 29 and 30 are the result of sustained advocacy by minority representatives.”
حوالہ: H.M. Seervai, Constitutional Law of India, Vol. 1, p. 314

مسلم پرسنل لا کے تحفظ پر مولانا تجمل حسین نے واضح کیا کہ مذہبی قوانین میں ریاستی مداخلت مذہبی آزادی کے منافی ہوگی۔
حوالہ: CAD, Vol. 7, 23 November 1948
بی۔ شِوا راو لکھتے ہیں:

> “The debates clearly show anxiety of Muslim members to safeguard personal law.”
حوالہ: B. Shiva Rao, The Framing of India’s Constitution, Vol. 2, p. 451
اسی تناظر میں مجاہد ملت حضرت مولانا حفظ الرحمن سیوہارویؒ نے فرمایا کہ اسلام مسلمانوں کو وطن سے وفاداری سکھاتا ہے،بشرطیکہ مذہبی آزادی محفوظ رہے، اور اگر آئین یہ ضمانت دے تو مسلمان پورے اطمینان سے اسے قبول کریں گے۔
حوالہ: CAD, Vol. 7, 2 December 1948
مساوات کے اصول پر بیگم اعزاز رسول نے کہا کہ کسی شہری کو مذہب کی بنیاد پر کمتر یا برتر قرار دینا جمہوریت کی روح کے خلاف ہے۔
حوالہ: CAD, Vol. 3, 30 April 1947
ڈی۔ ڈی۔ باسو لکھتے ہیں:

“Equality irrespective of religion was shaped by minority intervention in debates.”
حوالہ: D.D. Basu, Introduction to the Constitution of India, p. 112
*ریاست کے سیکولر کردار پر مولانا حسرت موہانی نے کہا کہ ہندوستان کسی ایک مذہب کی ریاست نہیں ہو سکتا بلکہ سب کے لیے برابر ہونا چاہیے۔
حوالہ: CAD, Vol. 1, 15 November 1946
اس پر گرانوِل آسٹن لکھتے ہیں:

“Secularism in India emerged from the fear of religious domination voiced by minorities.”
حوالہ: Granville Austin, Working a Democratic Constitution, p. 39
یہی مولانا حسرت موہانی تھے جنہوں نے سب سے پہلے ہندوستان کو جمہوریہ (Republic) قرار دینے کی تجویز دی۔
حوالہ: CAD, Vol. 1, 15 November 1946
حوالہ: Granville Austin, The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation, p. 53
مزید مسلم اراکین میں ڈاکٹر سید محمود نے کہا کہ اگر آئین میں اقلیتوں کے حقوق کو واضح طور پر محفوظ نہ کیا گیا تو جمہوری نظام کمزور ہو جائے گا،حوالہ: CAD, Vol. 7, 5 December 1948
شیخ عبداللہ (کشمیر) نے کہا کہ مذہبی آزادی اور علاقائی خود مختاری کے بغیر اتحاد محض ایک نعرہ ہوگا۔
حوالہ: CAD, Vol. 10, 17 October 1949
فرینک انتھونی (عیسائی نمائندہ، مگر اقلیتوں کی مشترکہ آواز) کی تائید سے مسلم اراکین کا موقف مضبوط ہوا کہ اقلیتوں کو آئینی ضمانت ضروری ہے۔
حوالہ: CAD, Vol. 7, 8 December 1948
ان عملی کرداروں کے پیچھے دو عظیم علماء کے نظریات بنیادی طور پر کارفرما تھے۔
شیخ الاسلام مولانا حسین احمد مدنیؒ نے متحدہ قومیت کا نظریہ پیش کیا اور کہا:
“فی زمانه قومیں وطن سے بنتی ہیں، مذہب سے نہیں بنتیں۔”
حوالہ: مولانا حسین احمد مدنی، نقشِ حیات، جلد دوم، ص 281
مؤرخ مشیر الحسن لکھتے ہیں:
“Madani’s concept of composite nationalism deeply influenced Muslim participation in constitutional politics.”
حوالہ: Mushirul Hasan, Nationalism and Communal Politics in India, p. 184
اسی طرح مولانا ابوالکلام آزادؒ نے مذہب کی بنیاد پر سیاست کی مخالفت کی اور قومی اتحاد پر زور دیا۔ انہوں نے لکھا:
“If religion is used for politics in India, it will destroy its unity.”
حوالہ: Maulana Abul Kalam Azad, India Wins Freedom, p. 22
گرانوِل آسٹن کے مطابق:
“Azad’s vision of cultural pluralism was reflected in India’s secular Constitution.”
حوالہ: Granville Austin, The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation, p. 52
ان تمام موقفوں کے پیچھے جمعیت علماء ہند کی فکری پشت پناہی نمایاں تھی۔ مشیر الحسن لکھتے ہیں:
“The Jamiat Ulama-e-Hind provided ideological support to composite nationalism which later reflected in constitutional secularism.”
حوالہ: Mushirul Hasan, Nationalism and Communal Politics in India, p. 187
دستور ساز اسمبلی کی بحثوں اور مؤرخین کی شہادت سے یہ حقیقت واضح ہوتی ہے کہ بھارت کے آئین میں مذہبی آزادی،اقلیتوں کے تعلیمی و مذہبی حقوق،
مساوات،سیکولر ریاست اور جمہوریہ کا تصورکسی اتفاق کا نتیجہ نہیں بلکہ مولانا حسرت موہانی،مولانا حفظ الرحمن سیوہاروی،مولانا تجمل حسین،مولانا محمد اسماعیل صدیقی،بیگم اعزاز رسول،ڈاکٹر سید محمود، شیخ عبداللہ اور جمعیت علماء ہند جیسے طبقات کی مسلسل اور مدلل جدوجہد کا حاصل ہے۔یہ کردار محض تاریخی باب نہیں بلکہ آج بھی آئین کی روح کو سمجھنے اور اس کے تحفظ کے لیے رہنمائی فراہم کرتا ہے

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20/02/2022

جن کو لیپ ٹاپ چاہیے وہ قریب قریب ہوجائیں!

جو بارہویں پاس کرکے انٹر میں ایڈمیشن لے گا، اسی کو لیپ ٹاپ ملے گا۔
شری شری امت شاہ کا فرمان

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