26/06/2026
बुलडोज़र और एनकाउंटर नीति की परीक्षा
उत्तर प्रदेश के बागपत जनपद के खेकड़ा के रहने वाले पंकज धामा दिल्ली मेट्रो में गार्ड की नौकरी करते थे। बीते रोज़ भी वो अपनी ड्यूटी समाप्त करके अपने घर लौट रहे थे। शाहदरा रेलवे स्टेशन पर योगा एक्सप्रेस आई तो पंकज ने उसमें बैठने की कोशिश की, इसी कोशिश के दौरान उनकी ट्रेन में मौजूद सहयात्रियों से कहा सुनी हो गई। चंद मिनट में ही मारपीट शुरू हो गई। पंकज को सहयात्रियों ने बेरहमी से पीटना शुरू कर दिया। वहां मौजूद किसी भी यात्री ने पंकज को बचाने या बीच-बचाव करने की कोशिश तक नहीं की, सब तमाशबीन बने रहे। पंकज काफी देर तक वहीं तड़पते रहे। जब तक उन्हें अस्पताल ले जाया जाता, तब तक देर हो चुकी थी, ज़िंदगी ने पंकज का साथ छोड़ दिया था।
अब दिल्ली पुलिस ने पंकज की हत्या में शामिल रोहित, सागर हर्षित, निशांत, जीवन, प्रिंस, आकाश और रोहित को गिरफ्तार किया है। गिरफ्तारी तो हो चुकी है, अब सवाल पंकज को न्याय का है। क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में न्याय की बुलडोज़र नीति अमल में लाई गई है। दिल्ली का तरुण हत्याकांड हो, ग़ाज़ियाबाद का सूर्या हत्याकांड हो या फिर देहरादून का विनोद कश्यप हत्याकांड। ये वो हत्याकांड हैं जिसमें सरकार ने त्वरित कर्रावाई करते हुए आरोपितों के घरों को बुलडोज़र चलाकर ध्वस्त किया है। और एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि बुलडोज़र की यह ‘न्याय नीति’ सिर्फ उन्हीं मामलों में ‘न्याय’ कर पाई है, जिसमें आरोपी ‘दूसरे’ समुदाय के थे। इसके अलावा जिन ‘सनातनियों’ की हत्या के आरोपी ‘दूसरे’ नहीं थे, उसमें ‘न्याय’ का बुलडोज़र एक इंच भी नहीं खिसक पाया। ग़ाज़ियाबाद में चिराग़ त्यागी के पिता अपने बेटे को इंसाफ दिलाने के लिए सरकार से मांग करते रह गए, कि उनके बेटे के हत्यारों का एनकाउंटर हो, उनके घरों पर बुलडोज़र चले! लेकिन किसी ने भी उनकी इस मांग को नहीं सुना। उत्तराखंड में केतन के घर वाले भी यही मांग करते रह गए, लेकिन सरकार और पुलिस ने बुलडोज़र चलाने या आरोपितों का एनकाउंटर करने की हिम्मत ही नहीं जुटाई।
यहां से सवाल उठता है कि पंकज धामा को इंसाफ मिलेगा या नहीं? इसका सीधा सा जवाब है कि यदि पंकज को मारने वालो में ‘दूसरे’ लोग शामिल होते तो अब तक पुलिस और सरकार पंकज की हत्या का बदला लेकर उसे ‘इंसाफ’ देने की घोषणा कर चुकी होती। लेकिन आरोपी ‘दूसरे’ नहीं हैं, इसलिए खामोशी है, सन्नाटा है। कोई हिन्दुवादी संगठन खेकड़ा स्थित पंकज के घर सांत्वना देने नहीं जाएगा, इसकी भी उम्मीद कम ही है। हाँ! अगर आरोपी ‘दूसरे’ होते तो अब तक बवाल मच चुका होता, हिन्दुवादी संगठनों के अराजक तत्व पंकज धामा को न्याय दिलाने के नाम पर ‘दूसरे’ समुदाय के खिलाफ घृणा, कुंठा, सांप्रदायिकता का नंगा नाच कर रहे होते। कोई जनसंहार का आह्वान कर रहा होता, तो कोई बहिष्कार का आह्वान कर रहा होता। लेकिन अब! अब सब खामोश हैं। क्यों? क्या पंकज सनातनी नहीं थे? क्या वो हिंदू नहीं थे? क्या उनकी लिंचिंग नहीं हुई है? क्या वो इंसाफ के हक़दार नहीं हैं? क्या हिन्दुवादी संगठनों के ये लोग ऐसे लोगों को इंसाफ दिलाने के लिए प्रतिबद्ध नहीं हैं, जिन्हें ‘दूसरों’ ने नही मारा?