8 PM INDIA

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23/03/2026

किससे करें सवाल!
दोस्तों,
सवाल,
सरकार से नहीं,
उन मजदूरों से करो,
जो पत्थर तोड़कर पसीना बहा रहे हैं।
सवाल,
उन किसानों से करो,
जो अनाज पैदा करके मंडियों को पाट रहे हैं।
सवाल,
उन जवानों से करो,
जो जंग लगे पुराने हथियारों के साथ सीमाओं की सुरक्षा कर रहे हैं।
सवाल,
उन माताओं-बहनों से करो, जो घर चलाने को दिन रात एक कर रही हैं।
सवाल,
उन युवाओं से करो,
जो कैरियर के चक्कर में जवानी खपा रहे हैं।
सवाल,
उन बेरोजगारों से करो,
जो बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर चप्पल घिसते फिर रहे हैं।
सवाल,
उन बुजुर्गों से करो,
जो जिम्मेदारियों के निर्वाह के लिए खट रहे हैं।
और सवाल उस आवाम से करो
जो वादों-जुमलों से ठगी जा रही है।
मेरे देश के रहनुमाओं से सवाल करना,
पाप है, गुनाह है।
वे श्रीराम के अवतार हैं।
वे निश्छल, निष्कंलक और निर्दोष हैं।
उनका हर गुनाह माफ है।
-धर्मपाल धनखड़

20/03/2026

नज़रिया
ऊर्जा संकट का स्थाई हल हो

अमरीका-इस्राइल का ईरान के साथ युद्ध जितना लंबा खिंच रहा है भारत में रसोई गैस और पेट्रोलियम पदार्थों का संकट बढ़ रहा है। कमर्शियल एलपीजी की कमी के कारण देश भर में एलपीजी सिलेंडर की कालाबाजारी जारी है। गैस एजेंसियों के बाहर लंबी-लंबी लाइनें लगी हैं। देश में एलपीजी की कमी नहीं होने और गैस आपूर्ति सुधारने के सरकार के तमाम दावों के बावजूद ना लाइनें घटी हैं और ना ही कालाबाजारी थमी है। कमर्शियल एलपीजी की कमी के कारण होटल, रेस्टोरेंट्स और ढाबों से लेकर खाने पीने की छोटी-छोटी दुकानों और हलवाइयों तक का कारोबार ठप हो रहा है। इससे करोड़ों लोगों के रोजगार पर संकट खड़ा हो गया है। सरकार ने एलपीजी की कालाबाजारी रोकने के लिए आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम यानी एस्मा लागू कर रखा है। लेकिन देश भर में लगातार मारे जा रहे छापों से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने बड़े पैमाने पर जमाखोरी और कालाबाजारी हो रही है। सरकार के निर्देश के बाद सभी तेल रिफाइनरी पूरी क्षमता के साथ काम कर रही हैं। इससे चालीस फीसदी तक उत्पादन बढ़ा है। लेकिन एलपीजी के लिए मारामारी बंद नहीं हुई। एलपीजी संकट को देखते हुए लोगों ने बिजली से चलने वाले इंडक्शन चूल्हे को विकल्प के रूप में चुना तो बाजार में उनका भी अकाल पड़ गया। वहीं बिजली की मांग भी बढ़ गयी।
युद्ध शुरू हुए बामुश्किल बीस-इक्कीस दिन हुए हैं तब ये हालत है और यदि ये यूक्रेन-रूस जंग की तरह लंबा चला, तो इसका भारत की अर्थव्यवस्था पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। प्रति व्यक्ति तेल खपत के मामले में अमरीका हमसे सोलह गुणा और चीन तीन गुणा ज्यादा है। लेकिन तेल पर हमारी दूसरे देशों पर निर्भरता बहुत ज्यादा है। ये भारत की कमजोरी भी है। इसलिए देश की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब हम ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनें या फिर आयात के कई विकल्प प्रतियोगी दरों पर उपलब्ध हों। वर्तमान संकट हमारे नीति निर्माताओं के लिए दूसरे देशों पर ऊर्जा निर्भरता को कम करने के बारे में विचार करने का उचित अवसर है। भारत सरकार इस समय एलपीजी की बजाय पीएनजी को बढ़ावा दे रही है। अब तक देश के बड़े शहरों में डेढ़ करोड़ घरों में पीएनजी कनैक्शन हैं, जिन्हें पाइप लाइन के जरिए नेचुरल गैस आपूर्ति की जाती है। इसके अलावा 45 हजार से ज्यादा व्यवसायिक प्रतिष्ठान और लगभग 20 हजार औद्योगिक इकाइयाँ भी पीएनजी का उपयोग कर रही हैं। सरकार का साल 2032 तक साढ़े बारह करोड़ घरों में पीएनजी कनैक्शन देने का लक्ष्य है। देश में पीएनजी की कुल जरूरत का करीब पचास फीसदी हिस्सा विभिन्न देशों से आयात किया जाता है। यानी इसके लिए हम किसी एक देश या रास्ते पर निर्भर नहीं हैं। इसके विपरीत देश में करीब 33 करोड़ एलपीजी कनैक्शन हैं। एलपीजी की जरूरत का साठ फीसदी हिस्सा आयात किया जाता है। उसमें से 90 फीसदी एलपीजी होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते से आती है। इसलिए रणनीतिक रूप से एलपीजी से पीएनजी पर शिफ्ट करना भविष्य में भी फायदेमंद रहेगा।
चीन समेत ज्यादातर देश पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रयोग बहुतायत में करने लगे हैं। भारत में अभी इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने में लोगों की रुचि कम है। इसका मुख्य कारण है चार्जिंग स्टेशनों की कमी और इलेक्ट्रिक वाहनों में आग लगने की घटनाएं होना। अभी बुधवार की सुबह ही इंदौर में एक इलेक्ट्रिक कार में चार्जिंग के दौरान धमाका होने पर इमारत में आग लगने से आठ लोगों की मौत हो गयी। इस तरह की घटनाओं को देखते हुए ये सवाल उठना लाजिमी है कि क्या इलेक्ट्रिक वाहन सुरक्षित हैं। सरकार तेल पर निर्भरता कम करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा जरूर दे रही है, लेकिन उन्हें सुरक्षित बनाने की दिशा में ऐतिहाति कदम उठाने चाहिए। साथ ही चार्जिंग स्टेशनों की संख्या भी बढ़ाई जानी चाहिए। दूसरी तरफ देश में कोयला आधारित बिजली उत्पादन को हतोसाहित करके ज्यादा पनबिजली परियोजनाएं तथा परमाणु बिजली संयंत्र लगाने की और ध्यान देना चाहिए। बेशक सरकार नवीनीकृत ऊर्जा यानी सौर व पवन ऊर्जा को प्रोत्साहित कर रही है। लेकिन इसे ज्यादा लोकप्रिय बनाने तथा इसमें प्रयुक्त होने वाले यंत्रों की कीमत करने की दिशा में काफी काम करना होगा। साथ ही ऊर्जा के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में बड़े नीतिगत व सुधारात्मक कदम उठाने होंगे।

17/03/2026

युद्ध झेलने को अभिशप्त विश्व

पूरी दुनिया दो हफ्ते से अमरीका-इस्राइल और ईरान के बीच जारी एक अनावश्यक युद्ध झेलने को अभिशप्त है। युद्ध के चलते आर्थिक मंदी के साथ ऊर्जा संकट खड़ा हो गया हो गया है। कच्चे तेल के दाम बढ़ने के साथ शेयर बाजार गोते लगा रहा है। भारत समेत पूरी दुनियां महंगाई की मार से परेशान हैं। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मुताबिक युद्ध के चार मकसद थे, पहला ईरान के परमाणु ठिकानों को खत्म करना, ईरानी नैवी को बर्बाद करना, ईरान की मिसाइल क्षमता को सीमित करना और सत्ता परिवर्तन करके कठपुतली सरकार बनाना। विशेषज्ञों के मुताबिक इनमें से तीन उद्देश्य तो युद्ध के पहले चार दिन में ही पूरे हो चुके हैं। अमरीका ने सोचा था कि सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामेनेई की मौत के बाद ईरान में तख्ता पलट हो जायेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
युद्ध की शुरुआत में ही खामेनेई, उसकी बेटी, नाती, रक्षामंत्री और सेना के जनरलों के मारे जाने के बाद बिखरा हुआ ईरान और ज्यादा मजबूती के साथ खड़ा हो गया। वह अमरीका और इस्राइल की संयुक्त ताकत को ललकार रहा है। ये अमरीकी थिंक टैंक की सोच के बिल्कुल उलट हो गया।
अपने सर्वोच्च नेता खामेनेई की हत्या से क्रोधित ईरान ने अरब देशों में स्थित अमरीकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया। इस्राइल पर अपने सहयोगियों के साथ हमले बढ़ा दिये। इतना ही नहीं होर्मुज खाड़ी से चीन को छोड़कर पूरी दुनिया के तेल टैंकरों के गुजरने पर रोक लगा दी। तेल की बिक्री बंद होने और ईरान के हमलों से हलकान अरब देशों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है।‌ ना वे तेल भेज पा रहे और ना ही आवश्यक सामान मंगवा पा रहे हैं। ऐसे में वे युद्ध रोकने का दबाव बनाने के लिए अमरीकी शेयर बाजार से अपना निवेश निकालने पर विचार कर रहे हैं। कतर ने चेतावनी दी है कि खाड़ी देश अब अंतरराष्ट्रीय समझौते में फोर्स मेज्यूर क्लाज का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके तहत युद्ध के कारण वे अपने व्यापार समझौतों और वादों को कानूनी रूप से रद्द कर सकते हैं। ऐसा होता है, तो ये अमरीका के लिए बड़ा झटका होगा।
इस बीच यूरोपियन यूनियन को ऊर्जा संकट से बचाने के लिए भारत को एक महीने के लिए रूस से तेल खरीदने की छूट दे दी है। इससे रूस की इकोनॉमी को बड़ा बूस्टर मिलेगा। अमरीका के ईरान के साथ युद्ध में उलझने से वह यूक्रेन की मदद नहीं कर पा रहा है। वहां रूस को ढील मिल गयी है। खबरों के मुताबिक रूस ने यूक्रेन की 25 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा और बढ़ा दिया है। उधर, भारतीय उद्योगपति मुकेश अंबानी अमरीका में विश्व की सबसे बड़ी और अत्याधुनिक रिफाइनरी लगाने जा रहा है। अमरीका ने इस डील की घोषणा की है। अर्थात अरबों डालर का निवेश अमरीका को मिल गया है। इस युद्ध के जरिए इस्राइल ईरान को इतना कमजोर कर देना चाहता है कि अरब देशों में उसकी कोई पूछ ना रहे और वह उनका सिरमोर बन सके। इस जंग में ईरान लगभग बर्बाद हो चुका है। जंग खत्म होने के बाद उसे वापस उसी स्थिति में आने में दशकों का समय लग जायेगा। इस्राइल के प्रमुख बेंजामिन नेतान्याहू ईरान पर जंग में फतह की घोषणा करके एक बार फिर चुनाव जीत सकते हैं। अब भी यदि वे चुनाव नहीं जीत पाये, तो उनकी बाकी बची सारी उम्र जेल में बीतेगी।
ईरान के स्ट्रेट आप होर्मुज पर जंग को केंद्रित करने के बाद ना केवल पश्चिम एशिया ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में तेल का संकट खड़ा हो गया है। इसके बाद अमरीका काफी दबाव में आ गया है। वहीं ईरान ने युद्ध खत्म करने की पेशकश की है। इसके साथ ही ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने युद्ध रोकने के लिए अमरीका के सामने तीन शर्तें रखी हैं। पेजेशकियन ने कहा है कि अमरीका को ईरान के अधिकारों को मान्यता देने के साथ ये गारंटी भी देनी होगी कि भविष्य में उनके देश पर हमले नहीं होंगे। तीसरी शर्त है युद्ध का हर्जाना देना होगा। अमरीका की ओर से इन शर्तों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आयी है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने ईरान से मध्यपूर्व के देशों पर तत्काल हमले रोकने को कहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने जार्डन और खाड़ी देशों पर ईरान के हमलों की निंदा की है और होर्मुज जलडमरुमध्य समुद्री मार्ग को बाधित नहीं करने की मांग की है। उधर, ट्रंप ने युद्ध जारी रखने के संकेत दिये हैं। उनका कहना है कि तेल संकट से ज्यादा जरूरी है ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना। ईरान ने यूएई व अन्य देशों के तेल संयंत्रों पर हमले बढ़ा दिये है। इराक ने अपने बंदरगाह बंद कर दिये हैं। वहीं इस्राइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों को पर हमले तेज कर दिये हैं। अब सवाल ये उठता है कि पंद्रह दिन के भयंकर युद्ध के बावजूद क्या ईरान के परमाणु ठिकाने बचे हुए हैं? यदि ये सच है, तो अमरीका और इस्राइल के शत्रु देशों के ठिकानों पर सटीक निशाने लगाने की क्षमता भी सवालों के घेरे में आ गयी है। सही मायने में देखा जाए तो ये जंग ट्रंप की दुनिया पर दादागीरी दिखाने की जिद है और इसी के चलते पूरी दुनिया पर जबरन युद्ध थोपा जा रहा है।

16/02/2026

नज़रिया
मिलावट का लाइलाज़ मर्ज

भारत में मिलावटी खाद्य पदार्थों और नकली सामान का धंधा तेजी से फल-फूल रहा है। एक अनुमान के मुताबिक देश में नकली और मिलावटी सामान का कारोबार एक लाख करोड़ से ज्यादा का है। इससे अर्थव्यवस्था को जबरदस्त नुकसान पहुंच रहा है। सरकार को जीएसटी के तौर ही करीबन 58 हजार करोड़ रुपए सालाना का नुक़सान हो रहा है। पिछले कुछ सालों में नकली उत्पादों के मामलों में 24 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। साल 2025-26 में खाद्य पदार्थों के 1.55 लाख नमूने लिये गये। जांच के बाद इनमें से 27,567 असुरक्षित पाये गये। इनमें यूरिया, डिटर्जेंट, कास्टिक सोडा और हानिकारक सिंथेटिक रंग पाये गये हैं। हाल ही में गुजरात के साबरकांठा में मिलावटी दूध और छाछ बनाने की फैक्टरी पकड़ी गयी। इस फैक्टरी में रोजाना मात्र तीन सौ लीटर असली दूध से यूरिया और डिटर्जेंट आदि की मदद से 1700 से 1800 लीटर नकली दूध तैयार करके आसपास के जिलों में भेजा जाता था।
देश के अग्रणी दूध उत्पादक राज्यों गुजरात, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में नकली दूध, मावा और घी बनाने का धंधा तेजी से बढ़ा है। उत्तरप्रदेश, राजस्थान और हरियाणा तीन प्रदेशों में फैला मेवात क्षेत्र नकली दूध, पनीर, घी आदि बनाने का प्रमुख केंद्र बना हुआ हैं। उत्तरप्रदेश में जहां-जहां मीट फैक्ट्रियां हैं, उन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जानवरों की चर्बी से नकली देशी घी बनाने का धंधा बढ़ रहा है। मिलावटखोरों से धार्मिक आस्था के केंद्र भी नहीं बचे हैं। पिछले दिनों तिरुपति मंदिर में प्रसाद के लड्डू मिलावटी घी से बनाने का मामला सामने आया था। भोले बाबा ऑर्गेनिक डेरी पर 5 साल में पाम ऑयल और केमिकल्स से बने 68 लाख किलोग्राम नकली घी की आपूर्ति मंदिर को करने का आरोप है। इसी कड़ी में ईडी ने तिरुपति मंदिर के लड्डू प्रसादम में मिलावटी घी के इस्तेमाल को लेकर मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज किया है। सीबीआई की एसआईटी ने इस मामले में 36 लोगों को आरोपी बनाया है।
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण के मुताबिक पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में 70 फीसदी तक में गड़बड़ी पायी गयी है। मिलावट का ये धंधा शहर से गांव तक पैर पसार चुका है। खाने-पीने की चीजों में दूध उत्पादों के अलावा मसालों और फलों व सब्जियों में भी हानिकारक कैमिकलों का प्रयोग किया जाना आम बात है। इसका सीधा प्रभाव लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसके कारण जहां लीवर और किडनी को स्थाई रूप से नुकसान पहुंचता है, वहीं कैंसर, हृदयरोग, ट्यूमर तथा हड्डियों का विकास रुकने जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं। मिलावटी खाने-पीने से बीमार हुए लोगों की समस्या यहीं खत्म नहीं होती! वे निजी अस्पतालों की मुनाफाखोर प्रवृति का शिकार बनते हैं। यहां भी उन्हें नकली दवाइयों की मार झेलनी पड़ती है। मिलावटी और नकली जीवन रक्षक दवाइयां असामयिक मौतों का कारण बनती हैं। भारत में बने नकली कफ सिरप से देश ही नहीं विदेशों में भी मौतें होने की खबरें सुर्खियों में रही हैं।
मिलावटी और नकली सामान बेचने व बनाने से रोकने के‌ लिए सख्त कानूनी प्रावधान होने के बावजूद ये गोरखधंधा लगातार बढ़ रहा है। इसके पीछे मिलावटखोरों के साथ रिश्वतखोर तंत्र का गठजोड़ है। बड़े परिपेक्ष्य में देखें तो इस गठजोड़ को राजनीतिक संरक्षण की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। मिलावटी और नकली सामान बनाने से रोकने के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। सरकार को अपने नागरिकों के स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को हो रहे नुकसान को रोकने की दिशा में कारगर कदम उठाने चाहिए। विशेष रूप से खाने-पीने की चीजों में मिलावट रोकने के लिए सबसे पहले निगरानी और जांच तंत्र को मजबूत करना जरूरी में। देश में खाद्य पदार्थों की टेस्टिंग सुविधाएं कम होने के कारण नमूनों की जांच रिपोर्ट देर से मिलती है। मिलावटखोरी को रोकना जहां सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, वहीं समाज की भी जिम्मेदारी बनती है कि मिलावटखोरों के खिलाफ कार्रवाई करवाने में कोताही ना बरतें। इसके लिए उपभोक्ताओं को जागरूक करना भी जरुरी है।

14/02/2026

नज़रिया
कृषि को लील रहा कर्ज

आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक विगत एक दशक में लगातार अच्छा प्रदर्शन करने वाला क्षेत्र कृषि है। कृषि क्षेत्र की पिछले पांच साल में 4.4 फीसदी और विगत दस साल में 3.9 फीसदी की वृद्धि दर रही है। इतना ही नहीं, देश में सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला क्षेत्र भी कृषि है। लेकिन विडंबना देखिए कि लगातार बेहतर प्रदर्शन के बावजूद देश का किसान कर्ज में डूबता जा रहा है और खेतीहर मजदूरों की संख्या बढ़ रही है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पिछले दिनों संसद में एक सवाल के जवाब में बताया कि देश के प्रत्येक किसान परिवार पर औसतन 74,121 रुपये का कर्ज है। उन्होंने बताया कि देश में सबसे ज्यादा कर्ज आंध्रप्रदेश के किसानों पर है। वहां प्रति किसान परिवार 2.45 लाख रुपए का कर्ज है, तो दूसरे नंबर पर केरल के हर किसान परिवार पर 2.42 लाख रुपए का कर्ज हैं। वहीं केंद्रीय अन्न भंडार में सबसे ज्यादा योगदान देने वाले पंजाब और हरियाणा में क्रमशः 2.03 लाख रुपए और 1.83 लाख रुपए प्रत्येक किसान परिवार पर कर्ज का बकाया है।
कृषि मंत्री के मुताबिक देश में सबसे कम कर्ज नागालैंड के किसानों पर है। यहां प्रत्येक किसान परिवार पर केवल 1,750 रुपये और मेघालय में 2,237 तथा अरुणाचल में 3,581 कर्ज है। पहाड़ी राज्यों में सबसे ज्यादा कर्ज हिमाचल के किसानों पर है। हिमाचल में प्रत्येक किसान परिवार पर 85,835 रुपये, उत्तराखंड में 48,338 रुपये और जम्मू-कश्मीर में 30,435 रुपये का कर्ज बाकी है। इसी तरह राजस्थान में 1.13 लाख रुपए प्रति किसान परिवार तो उत्तरप्रदेश में 51,107 रुपये और बिहार में 23,254 प्रत्येक किसान परिवार पर ऋण है। कहने का तात्पर्य ये है कि कर्ज के इस मर्ज से देश के किसी राज्य के किसान मुक्त नहीं हैं। यहां तक कि केंद्र शासित प्रदेशों के किसान परिवारों पर भी औसतन 25,629 रुपये कर्जा है। कर्ज के बढ़ते दबाव में बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या कर रहे हैं।
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री के संसद में दिये गये आंकड़ों से जाहिर है कि देश में किसानों की स्थिति बेहद चिंताजनक है। किसानों और खेती की बदहाली का सबसे बड़ा कारण किसानों को बाजार में उनकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलना और कृषि लागत का लगातार बढ़ना है। इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पादन में कमी आना तथा बाढ़ और सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाएं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार लगातार किसानों की आय दोगुनी करने के दावे करती आ रही है। लेकिन हकीकत ये है कि कृषि उत्पादन में वृद्धि के बावजूद किसानों की आय नहीं बढ़ रही है, जबकि उन पर कर्ज का बोझ बढ़ता जा रहा है। केंद्र सरकार ने किसानों की मदद के लिए छह हजार रुपए सालाना किसान निधि देना शुरू किया है। वहीं दूसरी तरफ कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली सब्सिडी में साल दर साल कटौती की जा रही है। खाद, बीज, कीटनाशकों के रेट तथा कृषि मजदूरी लगातार बढ़ रही है।
केंद्र सरकार विभिन्न फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य सी-2+लागत की बजाय ए-2+एफ एल लागत पर तय करती है। इससे किसानों को हर साल करीब 40 हजार करोड़ रुपए का नुक़सान होने का अनुमान है। किसानों की सारी फसल समर्थन मूल्य पर नहीं खरीदे जाने तथा बिचौलियों के कारण उन्हें अपनी फसल औने-पौने दामों पर बेचनी पड़ती है। ऐसा नहीं है कि सरकार किसानों की दशा सुधारने के लिए प्रयासरत नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारें किसान कल्याण और कृषि को बढ़ावा देने के लिए कई तरह की योजनाएं चला रहीं हैं, लेकिन उनका कोई सकारात्मक प्रभाव धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा है। इतना ही नहीं अंतराष्ट्रीय मुक्त व्यापार समझौतों के तहत कृषि के विभिन्न सेक्टरों को विदेशी उत्पादों के लिए खोलने से भी किसानों को नुकसान हो रहा है। अभी यूरोप और अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील से भी किसानों में मायूसी है।

09/02/2026

पूरी दुनियां को पांच बड़े बैंक संचालित करते हैं। उनके मालिक यहूदी हैं। ये उतना ही सच है, जितना कि दो-तीन कोरियोग्राफर तय करते हैं कि इस साल पूरा हिंदुस्तान कैसे नाचेगा! और भविष्य में भी उसी पार्टी की सरकार बनेगी, जिसे ये बैंक मालिक चाहेंगे! आप वोट देकर ईवीएम या चुनाव आयोग पर भांडा फोड़ते रहिए। चूंकि ये भी विश्व व्यवस्था के गुलाम हैं।

नज़रिया जो पहले नहीं हुआ...!पिछले कुछ बरसों से देश में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, जो पहले कभी नहीं हुआ। इस कड़ी में काफी कु...
06/02/2026

नज़रिया
जो पहले नहीं हुआ...!
पिछले कुछ बरसों से देश में बहुत कुछ ऐसा हो रहा है, जो पहले कभी नहीं हुआ। इस कड़ी में काफी कुछ ऐसा भी है, जो पहले होता था, लेकिन अब नहीं हो रहा। मसलन देश में आजादी के बाद नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने की परंपरा 1956 में लाल बहादुर शास्त्री ने शुरू की थी। बाद में वे प्रधानमंत्री भी बनें। शास्त्री जी ने अरियालुर रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दिया था। लाल बहादुर शास्त्री जैसी सादगी, ईमानदारी, साफगोई और नैतिकता आज के नेताओं में दुर्लभ है। शास्त्री जी के नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देने के बाद एक परंपरा शुरू हो गयी, जो इक्कसवीं सदी में भी जारी रही। नैतिक आधार पर अंतिम इस्तीफा भी रेल मत्री सुरेश प्रभू का 2017 में हुआ था। वो भी ताबड़तोड़ कई रेल दुर्घटनाओं के बाद लिया गया था। उसके बाद से केंद्र सरकार तो छोड़िए देश के किसी राज्य की सरकार के मंत्री ने भी नैतिक आधार पर इस्तीफा नहीे दिया, चाहे जितने लांछन लगते रहें। ऐसा लगता है मानो देश से 'नैतिकता' का जनाजा ही उठ चुका है।
नैतिकता का आधार और इस्तीफे की परंपरा बेशक धूमिल पड़ गयी हो, लेकिन देश की राजनीति में ऐसा बहुत कुछ नया घटित हो रहा है, जो पहली बार देखने को मिल रहा है। यानी ऐसी परंपरा कभी नहीं रही। पहलगाम में आतंकी हमले के बाद मई, 2025 में पाकिस्तान स्थित आतंकवादी शिविरों को नष्ट करने के लिए आपरेशन सिंदूर चलाया गया। इससे दोनों देशों के बीच अघोषित युद्ध शुरू हो गया। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम की घोषणा दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों की बजाए अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने की। ट्रंप ने कहा कि उसने दोनों देशों को व्यापार बंद करने की धमकी देकर सीज-फायर करवा दिया। पूरा देश ये सुनकर अवाक रह गया। देश की अवाम पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए आर-पार के मूड में थी। लेकिन ट्रंप की घोषणा के कुछ समय बाद दोनों देशों ने विधिवत सीज फायर की घोषणा कर दी। भारत सरकार आज भी इस बात को स्वीकार नहीं करती कि सीजफायर किसी तीसरे देश ने करवाया। देश की जनता सीज-फायर करवाने का श्रेय ट्रंप द्वारा लेने से आज भी उलझन में है।
जनता की ये उलझन उस समय और बढ़ गयी जब तीन-चार दिन पहले बड़बोले ट्रंप ने भारत के साथ व्यापार समझौता होने की घोषणा कर दी। उन्होंने भारत पर टैरिफ घटाकर 18 फीसदी करने तथा अमरीकी सामान पर जीरो टैरिफ लगाये जाने के साथ रूस से तेल खरीद बंद करके वेनजुएला से तेल लेने और अमरीकी प्रौद्योगिकी व कृषि उत्पादों समेत पांच सौ अरब डालर की खरीद के लिए भारत के प्रतिबद्ध होने का दावा किया। हैरानी की बात है कि इसके कुछ देर बाद ही भारत सरकार ने भी डील होने की बात स्वीकार की। डील को लेकर तमाम 'किंतु-परंतु' को दरकिनार कर दें, तो भी एक सवाल तो उठता है कि देशवासियों को व्यापार समझौता होने की सूचना दिल्ली की बजाय वाशिंगटन से कैसे दी जा रही है? ऐसी घटनाएं स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार देखने को मिल रही है।
ऐसी ही एक विचित्र घटना दो दिन पहले देशवासियों को पहली बार देखने-सुनने को मिली। जब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर पर दलील देने पहुंच गयी। मुख्यमंत्री ममता ने सर्वोच्च न्यायालय की पीठ से पांच मिनट का समय उनकी दलील सुनने के लिए देने की अपील की और सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पांच नहीं पंद्रह मिनट का समय दिया। ममता बनर्जी ने तेरह मिनट में एसआईआर को लेकर अपना पक्ष रखा। ये देश में पहली बार हुआ कि मतदाता सूचियों के गहन पुनरीक्षण की रूटीन कार्रवाई में गड़बड़ियों से राज्य के लोगों को हो रही परेशानी बताने को खुद कोई मुख्यमंत्री सुप्रीम कोर्ट पहुंचा हो। एसआईआर में जितनी बड़ी संख्या में नाम काटे और जोड़े जा रहे हैं, ये भी देश में पहली बार ही हो रहा है।

नज़रियासूचना छुपाने की मंशाकेंद्र सरकार सूचना का अधिकार कानून यानी आरटीआई में कुछ नये प्रावधान करने की जरूरत बड़ी शिद्दत...
03/02/2026

नज़रिया
सूचना छुपाने की मंशा
केंद्र सरकार सूचना का अधिकार कानून यानी आरटीआई में कुछ नये प्रावधान करने की जरूरत बड़ी शिद्दत के साथ महसूस कर रही है। ये जानकारी बजट सेशन के दौरान संसद में पेश आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में दी गयी। रिपोर्ट में कहा गया कि सूचना का अधिकार कानून का अध्ययन किया जाना चाहिए। और इसमें कुछ ऐसे प्रावधान होने चाहिए जिससे गोपनीय रिपोर्ट और मसौदों की जानकारी सार्वजनिक करने से छूट मिल सके। एक लंबे संघर्ष के बाद 2005 में आम आदमी को सूचना का अधिकार मिला था। सूचना के अधिकार कानून का मुख्य मकसद सरकारी काम-काज में पारदर्शिता लाना और जवाबदेही तय करना है। इस कानून से देश के लोगों को सरकारी कामकाज की जानकारी लेने का अधिकार मिला है। जिससे लोकतंत्र की नींव मजबूत हुई है।
इस कानून के‌ लागू होने के बाद सरकारी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों को कानून के कठघरे में खड़ा करने में अहम सफलता मिली है। सही मायने में देखा जाए तो सूचना के अधिकार कानून से जनता में सरकारी कामकाज को लेकर विश्वास बढ़ा है। अब सवाल ये उठता कि सरकार एक तरफ तो भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टालरेंस की नीति अपनाने और कामकाज में पार्दर्शिता लाने के दावे करती है। दूसरी तरफ जिस कानून ने भ्रष्टाचार को रोकने और कम करने तथा पार्दर्शिता लाने में अहम भूमिका निभाई है, उसी को गोपनीयता के बहाने कमजोर करना चाहती है।
गौरतलब है कि सूचना का अधिकार कानून-2005 के तहत आम तौर पर गोपनीय या निजी रिपोर्ट साझा नहीं की जाती हैं। क्योंकि धारा 8(1) के तहत व्यक्तिगत निजता, सामरिक सुरक्षा, व्यापारिक गोपनीयता, या विदेशी सरकारों से प्राप्त गोपनीय जानकारी के बारे में पहले ही छूट है। हां, यदि सक्षम अधिकारी को लगता है कि वास्तव में जनहित निजी हित से बड़ा है, तो ऐसी जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है। कुछ मामलों में 20 साल से ज्यादा पुरानी गोपनीय फाइलें भी उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इतने सबके बावजूद सूचना का अधिकार कानून लागू होने के दो दशक बाद अब सरकार को एक बार फिर गोपनीय रिपोर्ट्स और मसौदों की जानकारी सार्वजनिक करने से छूट पाने के लिए और प्रावधान किये जाने की जरूरत महसूस हो रही है। ये हैरान करने वाली बात है।
समीक्षा रिपोर्ट में ये भी कहा गया है कि सूचना का अधिकार कानून का मकसद फिजूल की जिज्ञासा का जरिया बनाने अथवा बाहर बैठ कर सरकारी कामकाज में दखल देने अथवा नियंत्रित करने का नहीं था। निसंदेह कुछेक ऐसे मामले भी सामने आये हैं, जिनमें कानून की आड़ में सरकारी कामकाज में बाधा डालने की अनधिकार चेष्टा की गयी। लेकिन ये इतनी बड़ी संख्या में नहीं है कि इसके लिए कानून में अतिरिक्त प्रावधान करने की जरूरत पड़े। विगत कुछ सालों में देखा गया है कि आरटीआई कानून के तहत सूचना देने में सरकारी तंत्र अनावश्यक देरी करने और जानबूझकर जानकारी छुपाने के प्रयास करता रहा है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक बड़ी संख्या में आरटीआई कार्यकर्ताओं की अपील सूचना आयुक्तों के पास लंबे समय से अटकी हुई हैं। यहां तक कि सरकारी तंत्र जानकारी देने की बजाय छुपाने के लिए ज्यादा प्रयासरत रहता है। इससे सूचना का अधिकार कानून का प्रभाव कम हुआ है।
यदि सरकार वास्तव में भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना और सरकारी कामकाज में पारदर्शिता चाहती है तो आरटीआई कानून को सख्ती से लागू करने के निर्देश सभी विभागों को देने चाहिए। कानून की आड़ में सरकारी कामकाज में अनावश्यक बाधा डालने वाले शरारती तत्वों पर रोक लगाने के लिए कुछ और प्रावधान जोड़े जाते हैं तो पहले से ही विभिन्न हथकंडे अपनाकर भोथरा किया जा चुका कानून बराय नाम रह जायेगा। सूचना को दबाने-छुपाने की प्रवृत्ति सरकार की मंशा पर भी संदेह पैदा करती है। सरकार को इस तरह के किसी भी प्रयास से बचना चाहिए।

नज़रिया देवभूमि में बढ़ती असहिष्णुता! उत्तराखंड के कोटद्वार में बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने 'बाबा क...
02/02/2026

नज़रिया
देवभूमि में बढ़ती असहिष्णुता!
उत्तराखंड के कोटद्वार में बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं ने 'बाबा कलेक्शन' नामक एक दुकान का नाम बदलने की मांग को लेकर शनिवार को फिर प्रर्दशन किया। देहरादून से पहुंचे हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं का कहना है कि मुस्लिम व्यापारी की दुकान का नाम धार्मिक आस्था से जुड़ा है। इसलिए वे इसे बदलना चाहते हैं। प्रदर्शनकारियों ने खूब नारेबाजी की। इससे पहले 26 जनवरी को भी हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने इसी दुकानदार पर नाम बदलने के लिए मुस्लिम व्यापारी पर दबाव बनाया और मारपीट की। उस समय दीपक कुमार नामक एक जिम ट्रेनर ने बीच-बचाव किया, तो प्रदर्शनकारी उसके साथ भी उलझ गये। दीपक के ललकारने पर देहरादून से आये हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं को वापस लौटना पड़ा था। इस बात के लिए दीपक को खूब वाहवाही मिल रही है। लेकिन बजरंग दल और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं को ये वाक्या नागवार गुजर रहा है।
गौरतलब है कि 'बाबा कलेक्शन' नाम की ये दुकान पिछले तीस साल से है और किसी को कभी इसके नाम से दिक्कत नहीं हुई। अचानक हिन्दू संगठनों के कार्यकर्ताओं के हंगामे से क्षेत्र में सांप्रदायिक तनाव का माहौल है। पुलिस मामले को सुलझाने की कोशिश कर रही है। पिछले कुछ सालों में उत्तराखंड में सांप्रदायिक असहिष्णुता बढ़ी है। एपीसीआर संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में 2021 के बाद मुसलमानों के खिलाफ हिंसा, धमकी और विस्थापन की घटनाएं बढ़ी हैं। बीते हफ्ते ही देहरादून के विकास नगर इलाके में दो कश्मीरी युवकों के साथ भी धर्म के आधार पर मारपीट की गयी। पिछले साल यानी दिसंबर, 2025 में देहरादून में पढ़ रहे त्रिपुरा के 24 वर्षीय छात्र एंजेल चकमा की हत्या का मामला सुर्खियों में रहा था। कथित रूप से नस्लीय टिप्पणियों का विरोध करने पर एंजेल को कुछ स्थानीय युवकों ने बेरहमी से पीटा था। इलाज के दौरान अस्पताल में उसकी मौत हो गयी थी। इस मामले में राज्य सरकार की तो किरकिरी हुई ही, साथ ही केंद्र सरकार को भी सांसत में डाल दिया।
24 जनवरी, 2026 की रात को हिंदू रक्षा दल के कट्टरपंथियों द्वारा मसूरी के विनबर्ग-एलन स्कूल में स्थित सूफी संत बुल्लेशाह की मजार को तोड़ने का मामला भी सामने आया था। इसी तरह नवंबर, 2025 में दून स्कूल में स्थित सौ साल पुरानी एक मजार को कट्टरपंथी समूह ने तोड़ दिया था। माना जा रहा है कि राज्य में 2021 में हरिद्वार में हुई धर्म संसद के बाद इस तरह की घटनाएं बढ़ी हैं। उल्लेखनीय है कि कथित धर्म संसद में कई संतों ने धर्म विशेष के खिलाफ खुलकर जहर उगला था। उत्तराखंड में टारगेटिड धार्मिक हिंसा का बढ़ना बेहद चिंताजनक है।
यहां एक बात गौर करने लायक है कि ये कट्टरपंथी तत्व कोटद्वार जैसी अनावश्यक बातों को तूल देने में सबसे आगे रहते हैं। लेकिन आम आदमी के समक्ष दरपेश समस्याओं को लेकर कभी धरना प्रदर्शन नहीं करते। इनके लिए बढ़ती बेरोज़गारी और बढ़ते अपराध कभी चिंता का विषय नहीं रहे। यहां तक कि अंकिता भंडारी जैसे दिल दहला देने वाले हत्याकांड के विरोध में भी ये कभी सड़कों पर नहीं उतरे। जबकि समूचे उत्तराखंड की जनता अंकिता भंडारी हत्याकांड में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर सड़क से अदालतों तक संघर्ष कर रही है। लेकिन इन तथाकथित हिंदुत्ववादी कट्टरपंथी संगठनों को जघन्य हत्याकांड से भी कोई लेना-देना नहीं है। प्रदेश सरकार को सांप्रदायिकता फैलाने वाले शरारती तत्वों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए ताकि परस्पर सौहार्द और भाईचारा बना रहे। राज्य में विधर्मियों और अन्य प्रदेशों के लोगों के प्रति असहिष्णुता का दुष्प्रभाव पर्यटन उद्योग पर भी पड़ेगा।

नज़रिया यूजीसी नियमों पर सियासत जारी रहेगी...आजादी के बाद भारत सरकार का सदैव ये प्रयास रहा है कि नया अंसतुलन खड़ा किये ब...
31/01/2026

नज़रिया
यूजीसी नियमों पर सियासत जारी रहेगी...

आजादी के बाद भारत सरकार का सदैव ये प्रयास रहा है कि नया अंसतुलन खड़ा किये बिना सामाजिक समानता लायी जाए! लेकिन ऐसा असंभव नहीं, तो कठिन जरूर है। चूंकि भारतीय समाज में जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं। इस हकीकत को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। जब भी सरकार सामाजिक समानता के लिए कोई नया प्रावधान लेकर आयी है, तो उसका जबरदस्त विरोध हुआ। एक बार फिर यूजीसी समता विनियम- 2026 के लागू करने को लेकर वैसा ही विरोध हुआ। अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए नये नियम पर फिलहाल रोक लगा दी है। इससे भले सरकार को कुछ समय के लिए राहत जरूर मिल गयी है। लेकिन सामाजिक समानता का प्रश्न सरकार, समाज, राजनीतिक दलों और सुप्रीम कोर्ट के सामने शास्वत खड़ा है।
गौरतलब है कि यूजीसी ने ये नये नियम सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका आधार पर दिये आदेश के तहत बनाये थे। ये याचिका रोहित वेमुला और पायल ताड़वी की माताओं ने दायर की थी। रोहित वेमुला ने 2016 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी और पायल ताड़वी ने 2019 में मुंबई के एक कालेज में पढ़ने के दौरान जातिसूचक टिप्पणियों और प्रताड़ना से तंग आकर आत्महत्या की थी। इन दोनों दुखद घटनाओं ने भारतीय शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव और प्रताड़ना की भयावह सच्चाई को सामने ला दिया। उक्त याचिका के सुनवाई के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार और यूजीसी को शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव और प्रताड़ना को रोकने के लिए सख्त नियम बनाने का निर्देश दिया। केंद्र सरकार की कमेटी की सिफारिशों के तहत यूजीसी ने समता विनियम-2026 लागू किया, तो सवर्ण समाज को इन नियमों में खुद की प्रताड़ना नजर आयी। उनका सबसे महत्वपूर्ण संशय है कि सवर्ण समाज के छात्रों को फर्जी शिकायत करके फंसाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी माना है कि नियम अस्पष्ट हैं और इनका दुरुपयोग हो सकता है। अदालत ने सुनवाई के दौरान जो टिप्पणियां की वो सवर्ण समाज की आशंकाओं की पुष्टि करती हैं।
इस मामले में सर्वोच्च अदालत ने केंद्र और यूजीसी से जवाब मांगा है और एक्सपर्ट कमेटी गठित करने का सुझाव दिया है। सुप्रीम कोर्ट की चिंता साफ है कि हमें समतामूलक समाज बनाने की दिशा में आगे बढ़ना है ना कि पीछे लौटना। सही मायने में देखा जाएं तो यूजीसी विनियम पर ये रोक इसमें सुधार का एक मौका है। इसलिए ये किसी पक्ष की हार या जीत नहीं है। इस बात को समाज के दोनों ही वर्ग मानने को तैयार नहीं हैं। सवर्ण समाज महज रोक लगाने से संतुष्ट नहीं है। वे इन्हें वापस करवाने तक संघर्ष करने की हुंकार भर रहे हैं। दूसरी तरफ एसटी/एससी और पिछड़े तबके भी सड़कों पर संघर्ष करने की तैयारी में हैं। हालांकि, प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस समेत समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट की रोक का स्वागत किया है।
बेशक विपक्षी दलों ने फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के यूजीसी नियमों में सुधार करने के निर्णय का स्वागत किया है। लेकिन इस मामले को लेकर राजनीति यहां खत्म नहीं होती, बल्कि पलटकर आगे बढ़ती है। यहां विरोधी दलों की भरसक कौशिश रहेगी कि एसटी/एससी और पिछड़े वर्गों की सहानुभूति बीजेपी को किसी भी तरह ना मिल पाये और सवर्ण समाज जो उसका कट्टर समर्थक माना जाता है, में व्याप्त रोष और नाराजगी का फायदा उन्हें मिले। दूसरी तरफ सत्तारूढ़ दल बीजेपी की जान सांसत में फंसी है। यदि वो यूजीसी नियमों को अदालत में स्टे करवाने का श्रेय खुद लेती है, तो इन नियमों को लागू करवाकर जिस एसटी/एससी और पिछड़े तबकों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है, वो छिटक जायेगा। वहीं यदि इन नियमों को सही ठहराती है, तो सवर्ण समाज की भारी नाराजगी का जोखिम उठाना पड़ेगा। भारतीय जनता पार्टी का भरसक प्रयास रहेगा कि मसले का समाधान ऐसा निकाला जाएं जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे। यानी उसे एसटी/एससी और पिछड़े वर्गों की सहानुभूति भी मिले और सवर्ण समाज का आधार भी उसके साथ बना रहे। इसलिए इस मुद्दे पर पक्ष-विपक्ष की राजनीति जारी रहेगी। और सरकार के प्रयास रहेंगे कि उसे हर स्थिति में लाभ मिले!

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