07/07/2018
बुद्ध जब निकलते हैं-अगर किसी ठूंठ के पास से निकल जाएं, तो ठूंठ हरा हो जाता है। और किसी बांझ के पास से निकल जाएं, जिसमें फल न लगते हों, तो फल लग जाते हैं। असमय में फूल खिल जाते हैं।
कथा है कि एक गांव में बुद्ध ठहरे हैं। सुबह-सुबह एक शूद्र उसका नाम था, सुदास, वह उठा; अपने घर के पीछे गया। काम-धाम में लगने का वक्त हो गया। घर के पीछे उसका पोखर था, छोटी सी तलैया। चर्मकार था; गांव में उसे कोई पानी भरने न दे, तो अपनी ही तलैया से अपना गुजारा करता था।
देख कर उसकी आंखें ठगी रह गई! बेमौसम कमल का फूल खिला। उसने अपनी पत्नी को पुकारा, सुन। यह क्या हुआ! यह कभी नहीं हुआ! मेरी जिंदगी हो गई। यह कोई मौसम है! यह कोई समय है! कली भी न थी रात तक और सुबह इतना बड़ा फूल खिला! इतना बड़ा फूल कि कभी खिला नहीं देखा! यह कैसे हुआ?
उसकी पत्नी ने कहाः हो न हो बुद्ध के पास से गुजरे होंगे। क्योंकि मैंने सुना है, जब बुद्ध गुजरते हैं, तो असमय फूल खिल जाते हैं।
सुदास हंसने लगा। उसने कहा कि पागल! यहां कहां बुद्ध गुजरेंगे! इस चमार के झोपड़े के पास से कहां बुद्ध गुजरेंगे! उसने आस-पास खबर की। पता चला कि यह सच है; सांझ ही बुद्ध का आगमन हुआ है। वे इसी रास्ते से गुजरे हैं। और आगे जाकर एक अमराई में रुके हैं।
तो सुदास ने कहा कि फिर क्या करूं इस फूल का? यह तो बड़ा शुभ अवसर है। इस फूल को तो तोड़ कर मैं सम्राट को बेच दूं। सौ-पचास रुपये जरूर इनाम में मिल जाएंगे क्योंकि असमय का कमल।
तो वह फूल को तोड़ कर राजमहल की तरफ जाता था। चकित हुआ। राजा का रथ ही आ रहा था! अभी सूरज उग रहा था और राजा का रथ, स्वर्ण-रथ सूरज में यूं चमक रहा था जैसे दूसरा सूरज उग रहा हो। वह ठिठक कर राह पर ही खड़ा हो गया।
माजरा क्या है? रात इस गरीब के झोपड़े के सामने से बुद्ध गुजरे; सुबह सम्राट का स्वर्ण रथ आ रहा है! इस रास्ते पर कभी आया ही नहीं। यह चमारों की बस्ती, यहां सम्राट आएं किसलिए! ठिठक कर खड़ा रह गया। हिम्मत ही न पड़ी कहने की कि मैं फूल लेकर राजमहल की तरफ आ रहा था। लेकिन रथ खुद ही रुका। सम्राट ने सारथी को कहाः रुको। इस सुदास को बुलाओ।
सुदास सम्राट के जूते बनाता था। सुदास का नाम सम्राट को मालूम था। सुदास डरते हुए गया और कहा कि फूल लेकर आपकी तरफ ही आ रहा था। असमय का फूल है, मैंने सोचा, किसको भेंट करूं। आपके ही योग्य है।
सम्राट ने कहा! मांग, क्या मांगता है? जो मांगेगा इसके बदले में दूंगा।
सुदास ने कहा कि जो आप दे देंगे।
नहीं; सम्राट ने कहाः तू मांग। क्योंकि यह फूल मैं बुद्ध को चढ़ाने ले जाऊंगा। तू जो मांगेगा, दूंगा। बुद्ध के प्रसन्न होंगे देख कर-ऐसे असमय का फूल! इतना सुंदर! इतना बड़ा फूल कमल का!
सुदास के गरीब मन में भी एक अमीर चाह उठी कि क्यों नहीं मैं ही न चढ़ा दूं जाकर फूल! रोटी-रोजी तो चल ही जाती है। मगर लालच भी मन में उठा कि आज सम्राट कहता है--जो मांगना हो, मांग ले!
लेकिन इसके पहले कि वह कुछ कहे, वह सोच रहा था कि कहूं-एक हजार स्वर्ण अशर्फियां; हिम्मत नहीं बंध रही थी कि एक हजार स्वर्ण अशर्फियां मांग रहा हूं, एक फूल के लिए! तो थोड़ा झिझक रहा था। तभी सम्राट के रथ के पीछे ही उसके वजीर का रथ आ कर रुका। और वजीर ने कहा; बेच मत देना; मैं भी खरीददार हूं। मैं चढ़ाऊंगा बुद्ध को। और सम्राट तो औपचारिकतावश जा रहे हैं। इनको बुद्ध से कुछ लेना-देना नहीं है। जाना चाहिए, इसलिए जा रहे हैं। मैं बुद्ध का प्रेमी हूं। इसलिए सम्राट को कहां कि देखें, आप बीच में न आएं। आप प्रतिस्पर्धा में न पड़े। निश्चित ही मैं कैसे आपसे जीतूंगा, अगर प्रतिस्पर्धा हो जाए। मगर आप बीच में न आएं, क्योंकि आपके लिए तो सिर्फ औपचारिक है जाना; मेरे हृदय की बात है। सुदास, तू मांग, जो मांगेगा दे दूंगा।
और तभी नगरसेठ का भी रथ आकर रुका। उसने कहाः सुदास, बेचना मत। मैं भी खरीददार हूं। नगरसेठ तो इतना बड़ा सेठ था कि सम्राट को भी खरीद सकता था। सम्राट को जब जरूरत पड़ती थी, तो उससे ही उधार मांगता था। और इस अकेले सम्राट को ही नहीं, आस-पास के और बड़े सम्राट भी इस नगरसेठ से धन उधार लेते थे। कहते थे कि इस नगरसेठ के पास धन तौला जाता था-गिना नहीं जाता था। क्योंकि गिनने की फुर्सत किसको थी! तो फावड़े से भर-भर कर टोकरियों मैं अशर्फियां गिनी जाती थीं, कि कितनी टोकरियां! कौन गिने एक-एक दो-दो! ऐसे गिनती करने की फुर्सत किसको थी!
उस सेठ ने कहा कि तू जो कहेगा, लाख अशर्फियां मांगना हो, लाख अशर्फियां मांग। लेकिन फूल मैं चढ़ाऊंगा।
सुदास ठिठका खड़ा रह गया। उसने कहा कि फूल बेचना नहीं है।
उन तीनों ने एक साथ पूछाः क्यों!
सुदास ने कहा कि जिस फूल के लिए एक लाख अशर्फियां देने के लिए कोई तैयार हो, गरीब आदमी हूं, मगर मेरे मन में भी गहन भाव उठा कि फिर मैं ही क्यों न इस फूल को बुद्ध के चरणों में चढ़ा दूं। जरूर उन चरणों में चढ़ाने का मजा लाख अशर्फियों से ज्यादा होगा। नहीं तो तुम एक अशर्फी न देते, नगरसेठ से उसने कहा, मुझे एक लाख अशर्फियां दे रहे हो! सम्राट राजी है; वजीर राजी है; तुम राजी हो। और मुझे ऐसा लगता है कि अगर गांव में जाऊं तो और भी लोग राजी हो जाएंगे। मुझे इसके जितने दाम चाहिए, उतने मिल सकते हैं। लेकिन अब बेचना ही नहीं है।
नगरसेठ ने कहाः दो लाख अशर्फियां देता हूं। तू जो मांग-मुंहमांगा।
उसने कहाः अब बेचना ही नहीं। सुदास गरीब है, मगर इतना गरीब नहीं। चमार है। काम तो चल ही जाता है मुझ गरीब का जूते सीने से ही। यह मौका मैं नहीं छोडूंगा। यह फूल मैं ही चढ़ाऊंगा।
और सुदास ने जाकर वह फूल बुद्ध के चरणों में स्वयं चढ़ाया। और बुद्ध ने उस सुबह अपने प्रवचन में कहा कि सुदास ने आज इतना कमाया है, जितना कि सदियों में सम्राट नहीं कमा सकते। पूछो इस सम्राट से, पूछो इस वजीर से, पूछो इस नगरसेठ से! आज इन सबको हरा दिया सुदास ने। आज इस शूद्र ने अपने को परम श्रेष्ठ सिद्ध कर दिया। आज लात मार दी धन पर। आज इसका अपरिग्रही रूप प्रकट हुआ है। यह धन्यभागी है।
और सुदास पर ऐसी वर्षा हुई उस दिन अमृत की कि फिर लौटा नहीं। उसने कहाः अब जाना क्या! जब फूल चढ़ाने से इतना मिला, तो अपने को भी चढ़ाता हूं। सुदास भिक्षु हो गया। फूल ही ही नहीं चढ़ा; खुद भी चढ़ गया।
यूं कहानियां हैं कि असमय, बुद्ध के पास से गुजरने से फूल खिल जाते हैं। ऐसा होता हो, न होता हो...हो नहीं सकता ऐतिहासिक अर्थों में। क्योंकि समय कोई नियम नहीं बदलता। होना चाहिए, मगर होता नहीं है। प्रकृति तो निरपवाद रूप से चलती है। कुछ भेद नहीं करती। लेकिन प्रतीकत्मक हैं ये बातें। बुद्धों की मौजूदगी में सदियों से निष्प्राण पड़े धर्म में पुनः प्राण की प्रतिष्ठा होती है।