09/08/2026
विश्व आदिवासी दिवस पर विशेष : जल, जंगल, जमीन और बालाघाट की आदिवासी अस्मिता!
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मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला अपनी हरियाली, घने जंगलों और समृद्ध जैव विविधता के लिए पूरे देश में जाना जाता है। लेकिन इस प्राकृतिक संपदा के असली रक्षक वन विभाग के कानून नहीं, बल्कि बैहर, परसवाड़ा, लांजी और बिरसा के जंगलों में सदियों से बसे आदिवासी हैं। गोंड और विशेष पिछड़ी बैगा जनजाति के लिए जल, जंगल और जमीन केवल एक नारा नहीं है; यह उनके जीवन का दर्शन, उनका धर्म और उनके अस्तित्व की एकमात्र हक़ीकत है।
बालाघाट के आदिवासियों का जंगल से रिश्ता उपभोग का नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का है। जब एक आदिवासी जंगल में जाता है, तो वह केवल उतना ही लेता है जितनी उसे जरूरत होती है—चाहे वह महुआ हो, तेंदूपत्ता हो या जलाऊ लकड़ी। उनके लिए जंगल कोई कमोडिटी नहीं है, बल्कि उनके बड़ादेव - दूल्हादेव का निवास स्थान है। कान्हा नेशनल पार्क से लेकर दक्षिण बैहर के घने वनों तक, अगर आज जंगल बचे हुए हैं, तो इसका सबसे बड़ा कारण आदिवासियों की वह जीवनशैली है जो प्रकृति का दोहन नहीं, बल्कि उसका पोषण करती है।
वैनगंगा, बंजर , देव, सोन और बाघ जैसी नदियों और अनगिनत प्राकृतिक झरनों से सजे बालाघाट में जल-स्रोतों को सहेजने की कला आदिवासियों से बेहतर कोई नहीं जानता। आधुनिक समाज जहां पानी की बर्बादी और प्रदूषण के संकट से जूझ रहा है, वहीं आदिवासी समाज आज भी जल को देवता मानकर उसकी शुद्धता को बनाए रखता है। उनके पारंपरिक पर्व और गोंगो (पूजन) हमेशा प्रकृति और जल स्रोतों के इर्द-गिर्द ही बुने गए हैं।
आदिवासी समाज के लिए जमीन सिर्फ एक प्रॉपर्टी या मुनाफे का साधन नहीं है, बल्कि उनकी मां है। लेकिन विकास के आधुनिक दौर में आदिवासियों का अपनी ही जमीन पर अधिकार सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। बालाघाट में खनन परियोजनाओं, वनों के राष्ट्रीयकरण और विकास के नाम पर होने वाले विस्थापन का सबसे गहरा दंश इसी वर्ग ने झेला है। वन अधिकार कानून (Forest Rights Act) बनने के बावजूद आज भी कई बैगा और गोंड परिवार अपनी पुश्तैनी जमीन के पट्टों और हक के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं।
विश्व आदिवासी दिवस पर जब हम मंचों से सांस्कृतिक कार्यक्रमों का जश्न मनाते हैं, तो हमें यथार्थ के उस आईने को भी देखना होगा जो दक्षिण बैहर जैसे इलाकों में दिखाई देता है। आज भी हमारे कई बैगा समुदाय के मासूम मलेरिया कुपोषण, निमोनिया, गंभीर स्किन डिसीज़ और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में जान गंवा रहे हैं।
जल, जंगल और जमीन के उनके अधिकारों पर बात किए बिना कोई भी आदिवासी दिवस पूरा नहीं हो सकता। विश्व आदिवासी दिवस तब सार्थक होगा, जब बालाघाट के सुदूर जंगलों में बैठे आखिरी आदिवासी व्यक्ति को भी बेहतरीन शिक्षा, स्वास्थ्य और उसकी जमीन का पूरा हक मिलेगा।
आदिवासी समाज हमें सिखाता है कि प्रकृति के बिना मानव का कोई भविष्य नहीं है। आज समय आ गया है कि हम उन्हें पिछड़ा मानना बंद करें और प्रकृति संरक्षण की उनकी उन्नत समझ को अपनाएं। आइए संकल्प लें कि बालाघाट के जल, जंगल और जमीन के असली पहरेदारों के अधिकारों की रक्षा हर हाल में की जाएगी।
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~free_thinker