30/01/2026
यह दृश्य केवल एक व्यक्ति के चले जाने का नहीं था, यह आस्था, अपमान और टूटे हुए विश्वास का दृश्य था। शंकराचार्य अभिमुक्तेश्वरानंद जी के शिष्य स्वामी बालमुकुंदानंद जी महाराज का प्रयागराज से बिना स्नान किए, रोते हुए लौट जाना—अपने आप में एक मौन चीख था। वह मौन, जो शब्दों से नहीं, आँसुओं से बोल रहा था।
कुंभ, संगम और प्रयागराज—जहाँ संतों का स्नान आत्मा की शुद्धि माना जाता है—वहीं एक संत का बिना नहाए लौट जाना किसी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है। यह प्रश्न किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं, बल्कि उस सोच पर है जहाँ साधु-संतों की गरिमा, परंपरा और सम्मान को ठेस पहुँची। पहला दर्द यह था कि उन्हें वह स्थान नहीं मिला, जिसके वे अधिकारी थे। दूसरा दर्द यह कि उनकी बात सुनी नहीं गई। तीसरा दर्द यह कि आस्था को राजनीति और व्यवस्थाओं की भीड़ में हाशिये पर धकेल दिया गया।
उनके आँसू व्यक्तिगत अपमान के नहीं थे, वे उस परंपरा के आँसू थे जो सदियों से भारत की आत्मा रही है। जब एक संत रोता है, तो समझिए समाज की आत्मा कहीं घायल हुई है। जब शिष्य इस हाल में लौटे, तो यह गुरु-शिष्य परंपरा की पीड़ा भी थी—एक ऐसी पीड़ा, जिसे देखकर मौन भी शर्मिंदा हो जाए।
सबसे गहरा दर्द यह था कि संगम के तट पर खड़े होकर भी वे संगम से दूर रहे। पानी सामने था, पर अधिकार नहीं। आस्था भीतर थी, पर सम्मान नहीं। यह दृश्य हमें झकझोरता है—क्या हमने संतों को केवल प्रतीक बना दिया है? क्या परंपराएँ केवल आयोजनों तक सिमट गई हैं?
स्वामी बालमुकुंदानंद जी का बिना स्नान लौटना इतिहास में एक सवाल की तरह दर्ज होगा। यह सवाल पूछेगा—जब संत असुरक्षित हों, अपमानित हों, और रोते हुए लौटें, तब समाज किस दिशा में जा रहा है? उनके आँसू हमें यह याद दिलाते हैं कि धर्म केवल उत्सव नहीं, मर्यादा भी है; केवल भीड़ नहीं, संवेदना भी है।
यह लेख किसी के विरुद्ध नहीं, आत्ममंथन के लिए है। क्योंकि जब संत रोते हैं, तो समझिए—समय हमसे जवाब माँग रहा है।