06/07/2026
मेगस्थनीज लिखता है —👉👉👉
भारत की युद्ध-परंपरा इतनी सभ्य थी कि दो राजा युद्ध करते थे, पर कोई भी राजा शत्रु देश के किसान, उनके खेत और फसलों को हानि नहीं पहुँचाता था। युद्ध केवल सैनिकों के बीच होता था, निर्दोष जनता सुरक्षित रहती थी। सिकंदर के साथ आए इतिहासकार कर्टियस लिखते हैं कि जब सिंध–पंजाब पर आक्रमण हुआ, तो लगभग 20,000 स्त्रियों और बच्चों ने पराधीनता स्वीकार करने के बजाय मृत्यु को चुना। क्योंकि लोग जानते थे —
यूनानी समाज की नैतिकता कैसी थी, जहाँ 6 वर्ष की बालिका को भी विवाह योग्य माना जाता था, वहाँ हमारी बेटियों की अस्मिता कितनी सुरक्षित रहती?
भारत की परंपरा सदा मर्यादा की रही है —
यहाँ युद्ध में भी धर्म था, शत्रु की नारी को भी माता माना गया।
जबकि आक्रांताओं ने खेत जलाए, नगर उजाड़े और नारी शक्ति का अपमान किया। यह उनकी “सभ्यता” की असली पहचान थी। फिर भी कांग्रेसी और वामपंथी इतिहास में उन्हें “महान” कहा गया, जबकि सच यह है कि महान वही होता है जो मर्यादा, करुणा और धर्म के साथ खड़ा हो।
चंद्रगुप्त मौर्य ने विदेशी आक्रांताओं को पराजित किया, और सिल्यूकस को संधि के लिए विवश होना पड़ा। बिना हार के कोई अपनी पुत्री का हाथ नहीं देता।
इसलिए, अपने इतिहास पर गर्व करें।
सत्य को जानें , पहचानें और आगे बढ़ाएं।
क्योंकि भारत केवल एक देश ही नहीं है—
इसमें सनातन एक सभ्यता है, एक संस्कार है, एक धर्म है। 🇮🇳