04/05/2026
अजीब विडंबना है-
कि कुछ लोग सनातन पर उंगली उठाते हैं,कहते हैं कि इसमें पाखंड,आडम्बर है मैं भी कहता हूं कि आडंबर होंगे - और थे कभी ऐसा नहीं है कि नहीं थे ।
लेकिन आज उन आडंबरों को छोड़कर जब इन लोगों को देखता हु तो यही लगता है कि खुद की पहचान और वजूद को छोड़कर नईं पहचान बना रहे है लेकिन हर चीज वही बस सामग्री बदल गई, वही चीज़ें नए नाम और नए प्रतीकों के साथ दोहराई जाती दिखती हैं।
👉राम कथा को त्यागकर बुद्ध कथा अपनाई गई, लेकिन कथा की परंपरा तो वही रही—बस पात्र बदल गए।
👉राम भोज की जगह बुद्ध भोज हो गया, पर सामूहिक आयोजन और दिखावा जस का तस बना रहा।
👉अग्नि के फेरे छोड़कर संविधान के फेरे की बात होने लगी, पर ‘फेरे’ की अवधारणा तो बनी ही रही—एक प्रतीक गया, दूसरा आ गया।
👉राम की मूर्ति को हटाकर बाबा की मूर्ति स्थापित कर दी गई, लेकिन मूर्ति-पूजा की प्रवृत्ति समाप्त नहीं हुई, केवल उसका रूप बदल गया।
👉राम मंदिर की जगह बुद्ध मंदिर बन गए, पर मंदिर जाने की परंपरा तो कायम रही।
👉लाल भगवा वस्त्र की जगह नीला हो गया मूर्तियों को दूध से नहलाना, उनकी पूजा करना ,बस सामग्री बदल दी - तरीका बदल दिया, आखिर क्या बदला तुमने और क्यों उन्हीं आडंबरों में उलझे हो।।
प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा मार्ग सही है या कौन-सा गलत। असली प्रश्न यह है कि जिस चीज़ को आप पाखंड कहकर छोड़ रहे थे, क्या वही चीज़ आप दूसरे रूप में अपना नहीं रहे? अगर मूर्ति-पूजा गलत थी, तो फिर किसी और मूर्ति के सामने श्रद्धा क्यों? अगर धार्मिक अनुष्ठान आडम्बर थे, तो नए प्रतीकों के साथ वही अनुष्ठान क्यों? ऐसा लगता है जैसे समस्या सिद्धांतों से कम और पहचान से ज्यादा है—पुराने को छोड़ना है, इसलिए उसे गलत ठहराना है, और नए को अपनाना है, इसलिए उसी ढांचे को सही साबित करना है। लेकिन सच यही है कि केवल नाम बदलने से किसी चीज़ का स्वभाव नहीं बदल जाता।अगर वास्तव में पाखंड और आडम्बर से दूरी बनानी है, तो उसके मूल स्वरूप को समझकर उससे ऊपर उठना होगा—न कि केवल प्रतीकों और नामों का अदला-बदली करके खुद को अलग साबित करना।
पाकिस्तानी लोग आज खुद उस Identity क्राइसिस से झुझ रहे है - आज तमाम विवाह समारोह की वीडियो उठाकर देख लो वहीं सनातनी परंपराएं वो आज कर रहे हैं जो कभी कुफ्र समझते थे, वो इसलिए कुफ्र थी क्योंकि वो हिंदू करते थे ।।
और यही हाल इन जैसे भटके हुए इन लोगों का होना है - जिस बाबा साहब को लेकर चले है उन्होंने धर्म को गलत नहीं कहा था सिर्फ धर्म में मौजूद कुरीतियों से तंग थे - गुरु रविदास ने कभी धर्म का त्याग नहीं किया ।।
समाज में कुरीतियों भरी होती है - उन्हें दूर करना होता है - खुद की पहचान और वजूद को नहीं त्यागना होता - और अगर सनातन छोड़ भी दो तो क्या ये कुरीतिया नहीं जो कर रहे हो - आगे इन भविष्य में आंकलन होगा - तो धर्म छोड़कर मिला ही क्या ?
वही मिलेगा जो आज पाकिस्तान को मिल रहा है - वो आज खुद बोलने लगे है तो हम हिंदू ही बस कभी कन्वर्ट हुए तो सब बदल गया - सबसे ज्यादा हिंदू परम्पराओं ही इनके विवाह में देख सकते हो आज ।
खैर - ज्यादा दूर की नहीं कहूंगा - बस इतना कहूंगा कि क्या नया किया इन आडंबरों को छोड़कर - वही चीजें वहीं तरीका बस सामान बदल दिया।।
सिर्फ बोलने भर से चीज़ें सही नहीं होती और न ही सामग्री बदल देने से - जिस दिन इस अंतर को समझोगे उस दिन खुद समझ जाओगे कि करना क्या है और कर क्या रहे थे।।
शोषण जात से नहीं होता बल्कि शोषण शक्ति से होता है - जो ज्यादा ताकतवर है प्रकृति यही है हरकीसी वो शोषण करेगा ।।
आज खुद वंचितों को देखता हु तो अपनी जात से बाहर शादी नहीं करेंगे - अमीर गरीब वंचित को शोषण करता रहता है - ढेरों ऐसे वंचितों को देखता हु जो खुद तंग है अपनी ही जाति के लोगों से।
ये 70 साल की अंग्रेजी मानसिकता का परिणाम है जो आज देख रहे है - खैर सारी बातों को छोड़कर इतना कहूंगा कि मिलना किसी को कुछ नहीं - न तथाकथित स्वर्ण को और न तथाकथित वंचित को - ये सबके अपने अपने एजेंडे है - स्वर्ण अपने दंभ अहंकार से भरे पड़े है - वंचित इस नफरत से कि हमारा शोषण हुआ।।
समाज को सुधारना कि जिनकी चेष्टा हो वो समाज सुधारते है - समाज को सभ्य बनाते है - एजेंडे नहीं चलाते - तथाकथित स्वर्णों के अपने एजेंडे और तथाकथित वंचितों के अपने ।
एक दिन अब यही छोड़कर चले जाएंगे और आपसी मुठभेड़ में लोगों का फायदा होगा - बाकी समय आने पर वास्तविकता हर किसी को समझ आ जाती है - धैर्य रखे और नियति और विश्वास रखे-अब लपेटे जाएंगे।