28/08/2026
मेरी जेठानी के बच्चों का हर रविवार गली साफ करना एक नाटक था, झाड़ियों में छिपे लिफाफे ने दिखाया कि मुझे घर से निकालने की साजिश महीनों पुरानी थी!
"घर के असली कागज तुमने ही गायब किए हैं, नीलम। अब सीधी मत बनो।"
मेरी जेठानी सुमित्रा ने यह बात पूरे आँगन के सामने ऊँची आवाज में कही।
मेरी सास पूजा घर के दरवाजे पर चुपचाप खड़ी थीं।
मेरे जेठ अशोक कुर्सी पर बैठे थे और मेरे पति विकास हाथ में चाय का कप लिए नजरें झुकाए थे।
मैंने सुमित्रा की तरफ देखा।
"मुझे घर के कागजों की जरूरत क्यों पड़ेगी?"
सुमित्रा का चेहरा तुरंत उतर गया, वह मासूम बनकर बोली, "क्योंकि तुम्हें डर है कि यह घर तुम्हारे नाम नहीं है।"
उसका चेहरा ऐसा बना जैसे वह सिर्फ घर का भला चाहती हो।
यही उसकी सबसे बड़ी चाल थी, बाहर वालों के सामने वह हमेशा समझदार बनती थी।
लेकिन उस सुबह मैंने उसकी असलियत अपनी आँखों से देख ली थी।
हम जयपुर के एक पुराने मोहल्ले के दो मंजिला मकान में रहते थे।
सामने बड़ा आँगन था, कोने में तुलसी का पौधा था और ऊपर तीन कमरे थे।
पिछले 6 महीनों से अशोक इस घर को बेचने का दबाव बना रहे थे।
सुमित्रा सबको समझाती थी, "माँ जी की उम्र 65 साल हो गई है, इतना बड़ा घर इनसे नहीं संभलता। नया फ्लैट ले लेंगे और बाकी के 40 लाख रुपये बच्चों की पढ़ाई में काम आएँगे।"
उसकी बात हर किसी को सही लगती थी।
लेकिन मेरे लिए यह सिर्फ एक मकान नहीं था।
15 साल पहले जब ससुर जी का व्यापार डूबने लगा था, तब मेरे पिता ने 10 लाख रुपये देकर इस घर की नीलामी रुकवाई थी।
ससुर जी ने उसी वक्त नीचे का पूरा हिस्सा मेरे नाम दर्ज करा दिया था।
यह बात परिवार के कम ही लोगों को याद थी।
उस रजिस्ट्री की असल प्रति मेरे ऊपर वाले कमरे के लोहे की तिजोरी में रखी थी।
और आज सुमित्रा दावा कर रही थी कि वह कागज गायब हैं।
सुमित्रा के दो बच्चे, 12 साल की रिया और 9 साल का वरुण, पिछले कुछ महीनों से हर रविवार को एक बड़ा काला थैला लेकर पूरी गली की सफाई करते थे।
पड़ोसी उनकी तारीफ करते नहीं थकते थे।
एक दिन मैंने सुमित्रा से कहा था, "बच्चे बहुत मेहनत करते हैं।"
उस वक्त उसने मुस्कुराने की जगह तुरंत पूछा था, "क्या वे तुम्हारी खिड़की की तरफ भी कचरा उठाते हैं?"
मुझे वह सवाल थोड़ा अजीब लगा था, लेकिन मैंने ध्यान नहीं दिया।
उस रविवार सुबह 7 बजे मैं बरामदे में बैठी थी।
रिया और वरुण काला थैला लिए खिड़की के पास आए।
वरुण ने पीछे मुड़कर देखा।
रिया उसके आगे खड़ी होकर रास्ता ढकने लगी।
वरुण मेरी बैठक की खिड़की के नीचे उगे चमेली के पौधे की तरफ झुका।
उसने कचरा नहीं उठाया।
उसने जेब से एक पारदर्शी प्लास्टिक की थैली निकाली और उसे सूखे पत्तों के नीचे दबा दिया।
सामने पड़ा असली कचरा छोड़कर दोनों आगे बढ़ गए।
उनके जाने के बाद मैं पौधे के पास गई।
थैली के अंदर पीतल की एक छोटी चाबी थी और एक मोड़ा हुआ कागज था।
वह चाबी मेरी लोहे की तिजोरी की डुप्लीकेट चाबी जैसी थी।
मेरी असली चाबी हमेशा मेरी अलमारी के अंदर छोटे डिब्बे में रहती थी।
मैंने कागज खोलकर देखा।
ऊपर लाल मुहर लगी थी और नीचे मेरा नाम लिखा था।
उसमें लिखा था कि मैंने अपने हिस्से के बदले 15 लाख रुपये नकद ले लिए हैं और अपना हक छोड़ रही हूँ।
नीचे मेरे फर्जी दस्तखत थे।
मैंने उस कागज को वापस मोड़ा और रसोई में आटा के डिब्बे के नीचे छिपा दिया।
मैं तुरंत ऊपर कमरे में गई।
तिजोरी का ताला बाहर से बंद था।
लेकिन चाबी घुमाते ही मुझे लगा कि ताला बदला जा चुका है।
अंदर मेरी शादी का जोड़ा और पुराने कागजात रखे थे।
लेकिन रजिस्ट्री की प्रति गायब थी।
उसी दोपहर 2 बजे एक अनजान आदमी फाइल लेकर अशोक से मिलने आया।
सुमित्रा ने मुझे देखते ही कहा, "यह ठेकेदार हैं, घर का नक्शा देखने आए हैं।"
लेकिन जब वह आदमी जाने लगा, तो सुमित्रा ने अशोक से कहा, "खरीदार अगले रविवार तक ही 80 लाख रुपये देने को तैयार है।"
उस शाम मैंने अपने पति विकास से पूछा, "क्या जेठ जी घर बेचने का सौदा कर रहे हैं?"
विकास ने नजरें चुरा लीं।
"बात चल रही है, नीलम। परिवार का फैसला है।"
"मेरे हिस्से का क्या होगा?"
विकास बोला, "हर बात में कानून मत लाओ।"
तभी मेरी नजर विकास की कमीज की जेब पर पड़ी।
उस पर वही नीली स्याही लगी थी, जो उस फर्जी कागज पर दस्तखत के लिए इस्तेमाल हुई थी।
रात 10 बजे मेरी सास मेरे कमरे में आईं।
उन्होंने धीरे से कहा, "अपनी अलमारी की चाबी अपने पास रखा करो।"
मैंने पूछा, "माँ जी, आपको कुछ पता है?"
वह बिना कुछ बोले बाहर चली गईं।
अगले रविवार सुबह 6 बजे मैं पर्दे के पीछे छिपी रही।
रिया और वरुण आए।
उनके काले थैले में 4 बंद लिफाफे थे।
उन्होंने एक लिफाफा पड़ोस के पौधे में छिपाया और दूसरा आगे फेंक दिया।
मेरे घर के पास आकर रिया ने वरुण से कहा, "पापा ने कहा है कि आखिरी लिफाफा आज ही देना है।"
बच्चे थैला गली के मोड़ पर कूड़ेदान के पीछे रखकर चले गए।
मैं तुरंत वहाँ पहुँची।
थैले के अंदर एक पुराना छोटा फोन, घर की तस्वीर और एक पर्ची थी।
तस्वीर के पीछे 5 रविवार की तारीखें लिखी थीं।
मैंने फोन चालू किया, उसमें एक कॉल रिकॉर्डिंग थी।
जैसे ही मैंने रिकॉर्डिंग चलाई, सुमित्रा और एक अनजान आदमी की आवाज सुनाई दी।
आवाज आ रही थी, "नीलम को रविवार तक भनक नहीं लगनी चाहिए, उसके बाद…"
भाग २