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कहानी शुरू करना हुनर है, लेकिन उसे पूरा करना जुनून। ✍️📖जिस कहानी को आपने दिल से शुरू किया है, उसे अधूरा मत छोड़िए। आपके ...
02/10/2026

कहानी शुरू करना हुनर है, लेकिन उसे पूरा करना जुनून। ✍️📖

जिस कहानी को आपने दिल से शुरू किया है, उसे अधूरा मत छोड़िए। आपके किरदार अपने अंत के इंतज़ार में हैं… और आपके पाठक भी। ❤️

आपकी कहानी अपने मुकाम की हकदार है। ✨

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01/10/2026

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30/09/2026

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यह पत्र उन सभी लेखकों के नाम, जो अपनी लेखनी के ज़रिए इस सफ़र में हमारे साथ हैं।पढ़िए, अपनी बात कहिए और हमारे साथ इस सफ़र ...
29/09/2026

यह पत्र उन सभी लेखकों के नाम, जो अपनी लेखनी के ज़रिए इस सफ़र में हमारे साथ हैं।
पढ़िए, अपनी बात कहिए और हमारे साथ इस सफ़र को आगे बढ़ाइए। ✍️📖

     सुबह का सूरज अभी पूरी तरह उगा भी नहीं था, लेकिन आरव की आँखें खुल चुकी थीं। उसकी आदत थी — सूरज से पहले उठ जाना।घर छो...
27/09/2026


सुबह का सूरज अभी पूरी तरह उगा भी नहीं था, लेकिन आरव की आँखें खुल चुकी थीं। उसकी आदत थी — सूरज से पहले उठ जाना।

घर छोटा था। दीवारों की पपड़ी झड़ चुकी थी। बरामदे में रखी टूटी कुर्सी, जिस पर उसकी माँ कभी बैठकर सब्ज़ी काटा करती थीं, अब खाली थी। माँ को गए तीन साल हो चुके थे।
और पिता…
पिता अभी भी जेल में थे।

आरव ने दीवार पर टंगी उनकी तस्वीर की तरफ देखा।
“आज फिर कोशिश करूंगा, पापा,” उसने धीमे से कहा।
बाहर गली में दूधवाले की आवाज़ गूंजी —
“दूध ले लो…”

और साथ ही कुछ और आवाज़ें — फुसफुसाहटें।
“वो देखो… उसी का घर है…”
“चोर का बेटा…”
आरव सुनता था। हर दिन। लेकिन अब उसने जवाब देना छोड़ दिया था। वो जानता था —
कुछ लड़ाइयाँ चिल्लाकर नहीं जीती जातीं,
बल्कि चुप रहकर जीती जाती हैं।

स्कूल का दिन

आरव शहर के सरकारी स्कूल में हिंदी पढ़ाता था। बच्चों के बीच वो एकदम अलग हो जाता था। जब वो पढ़ाता, तो उसकी आवाज़ में आत्मविश्वास होता। जब वो कविता सुनाता, तो उसकी आँखों में चमक होती।

आज उसने बच्चों से पूछा — “नायक किसे कहते हैं?”
एक बच्चे ने कहा, “जो तलवार चलाए!”
दूसरे ने कहा, “जो दुश्मनों को हरा दे!”
आरव हल्का सा मुस्कुराया। “नायक वो होता है,” उसने कहा,

“जो सही रास्ते पर डटा रहे, चाहे दुनिया उसके खिलाफ क्यों न हो।”

बच्चे चुप हो गए। उन्हें नहीं पता था कि ये सिर्फ किताब का जवाब नहीं था —ये आरव की ज़िंदगी का सच था।

पुरानी डायरी

शाम को जब वो घर लौटा, तो उसने अलमारी खोली।नीचे वाले खाने में एक पुरानी डायरी रखी थी। पिता की डायरी।
उस दिन जब पुलिस उन्हें ले गई थी, तब उन्होंने सिर्फ यही कहा था —
“आरव, इस डायरी को संभालकर रखना। सच इसमें है।”

लेकिन सच कभी सीधे शब्दों में नहीं लिखा गया था। डायरी में बस कुछ नाम थे। कुछ तारीखें। कुछ अधूरे वाक्य।
जैसे —
“अगर कुछ हो जाए, तो…”
“मल्होत्रा पर भरोसा मत करना…”
“15 जून… असली सौदा…”

हर पन्ना एक पहेली था।आरव ने आज फिर 15 जून वाली तारीख पर उंगली फिराई।आज से ठीक दस साल पहले की तारीख।
क्या हुआ था उस दिन? उसी दिन पिता को गिरफ्तार किया गया था। आरोप था — सरकारी फंड की चोरी।
लेकिन आरव जानता था —उसके पिता ऐसा नहीं कर सकते।

पहली मुलाकात

अगले दिन स्कूल में एक नई लड़की आई। साड़ी में, हाथ में फाइल, आँखों में तेज़ी। “मैं मीरा हूँ,” उसने स्टाफ रूम में कहा, “लोकल अखबार से। स्कूल पर एक रिपोर्ट बनानी है।” उसकी नज़रें जब आरव से मिलीं, तो कुछ पल के लिए ठहर गईं।

“आप आरव सर हैं?”

“जी,” उसने हल्के से सिर हिलाया।
मीरा ने फाइल खोली।

“आपके पिता… वही राजेश वर्मा?"

आरव का चेहरा एक पल को सख्त हो गया।

“हाँ,” उसने शांत स्वर में कहा।

मीरा की आँखों में जिज्ञासा थी — लेकिन तिरस्कार नहीं। ये पहली बार था जब किसी ने उनका नाम सुनकर सीधे आरोप नहीं लगाया।

एक सवाल

स्कूल के बाद मीरा बाहर खड़ी थी।
“क्या मैं आपसे कुछ निजी बात कर सकती हूँ?” उसने पूछा।

आरव कुछ पल चुप रहा। फिर बोला — “कहिए।”

“मुझे आपके पिता के केस में कुछ गड़बड़ी लगती है,” मीरा ने धीरे से कहा।

“फाइल में कई चीजें मेल नहीं खा रहीं।"

आरव का दिल तेज़ धड़कने लगा। “आप ये क्यों कर रही हैं?” उसने पूछा।
मीरा ने सीधा जवाब दिया — “क्योंकि सच दबा हुआ दिख रहा है।”

एक झटका

उसी रात आरव के घर के बाहर पत्थर फेंका गया। कागज़ बंधा था उसमें।उस पर लिखा था —

“पुरानी बातें खोदना बंद करो। वरना अगला नंबर तुम्हारा होगा।”

आरव ने कागज़ मोड़ा। डर उसकी नसों में दौड़ा। लेकिन अगले ही पल उसने खुद से कहा — “अगर डर गया, तो पापा सच में हार जाएंगे।”

मीरा का सच

अगले दिन मीरा फिर मिली। उसने धीरे से कहा — “मुझे आपको एक बात बतानी है।”

“क्या?”

“मेरे चाचा… वही अधिकारी थे जिन्होंने आपके पिता को गिरफ्तार किया था।”

कुछ पल के लिए समय थम गया।आरव ने उसकी आँखों में देखा।कोई झूठ नहीं था वहाँ। बस एक भारी सच। “तो?” उसने शांत स्वर में पूछा।

मीरा ने कहा —“तो अगर वो गलत थे, मैं उनके खिलाफ भी जाऊंगी।”

आरव ने पहली बार हल्की सी मुस्कान दी।
“सच किसी का रिश्तेदार नहीं होता,” उसने कहा।
“बस सच होता है।”

मीरा ने महसूस किया —ये आदमी टूटा हुआ जरूर है, लेकिन झुका हुआ नहीं।

रात को आरव छत पर खड़ा था। आसमान में आधा चाँद था।
हवा में ठंडक थी, लेकिन उसके भीतर एक आग थी।
उसने डायरी खोली। 15 जून वाली तारीख के नीचे आज एक नया शब्द लिखा —

“मीरा।"

क्योंकि अब वो अकेला नहीं था।
दूर कहीं कोई परछाई खड़ी थी —उन्हें देखते हुए। और किसी ने फोन पर कहा..
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बदनामी की सुबह सुबह का सूरज अभी पूरी तरह उगा भी नहीं था, लेकिन आरव की आँखें खुल चुकी थीं। उसकी आदत थी — सूरज से पहले उ.....

     शहर की सुबह हमेशा की तरह शोर-शराबे से भरी थी, लेकिन 'इंपीरियल इंस्टिट्यूट ऑफ एक्सीलेंस' की ऊँची प्राचीरों के भीतर क...
27/09/2026


शहर की सुबह हमेशा की तरह शोर-शराबे से भरी थी, लेकिन 'इंपीरियल इंस्टिट्यूट ऑफ एक्सीलेंस' की ऊँची प्राचीरों के भीतर का नज़ारा बिलकुल अलग था। यहाँ की हवाओं में भी एक तरह का अनुशासन था। पुराने बरगद के पेड़ और विक्टोरियन शैली में बनी कॉलेज की इमारतें किसी राजसी महल जैसा अहसास कराती थीं। लेकिन इस भव्यता के पीछे एक ऐसा नाम था जिससे कॉलेज का हर पत्ता थर्राता था— डॉ. समय कपूर।
ठीक सुबह के 7:50 बजे, कॉलेज के गेट पर एक काले रंग की 'रेंज रोवर' धीमी आवाज़ के साथ रुकी। सिक्योरिटी गार्ड्स ने तुरंत सीधा तनकर सलाम ठोका। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और बाहर निकला एक ऐसा व्यक्तित्व, जिसे देखकर राह चलते छात्रों के कदम ठिठक गए।
6 फीट 1 इंच लंबा कद, चौड़े कंधे और एक कसरती शरीर। डॉ. समय कपूर ने गाड़ी से बाहर निकलते ही अपनी कलाई पर बंधी 'रोलेक्स' घड़ी पर नज़र डाली। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था—न गुस्सा, न मुस्कुराहट। बस एक पत्थर जैसी गंभीरता। उन्होंने गहरे नीले रंग की क्रिस्प कॉटन शर्ट पहनी थी, जिसकी आस्तीनें कोहनियों तक बड़े सलीके से मुड़ी हुई थीं। उनकी आँखों पर चढ़ा पतला धातु का चश्मा उनकी बुद्धिमानी को और भी गहरा और डरावना बना रहा था।
वे गलियारे से गुज़रे, तो उनके पॉलिश किए हुए चमड़े के जूतों की 'टक-टक' की आवाज़ पूरे कॉरिडोर में गूँज उठी। जो छात्र आपस में हँस रहे थे, उन्होंने तुरंत अपनी किताबें चेहरे के सामने कर लीं। डॉ. समय कपूर—गणित के विभाग अध्यक्ष। 35 साल की उम्र में उन्होंने वो मुकाम हासिल किया था जिसे लोग रिटायरमेंट तक नहीं पा पाते। लेकिन उनकी शख्सियत एक रहस्य (Mystery) थी। वे किसी से फालतू बात नहीं करते थे, किसी पार्टी में नहीं जाते थे और कॉलेज के बाद उनकी निजी ज़िंदगी कहाँ और कैसी थी, यह कोई नहीं जानता था।

क्लास नंबर 302
ग्रेजुएशन फर्स्ट सेमेस्टर की पहली मैथ क्लास।

कमरे के भीतर साठ छात्र बैठे थे, लेकिन खामोशी ऐसी थी कि अगर सुई भी गिर जाए तो उसकी आवाज़ सुनाई दे। डॉ. समय ने ठीक 8:00 बजे क्लास में कदम रखा। उन्होंने अपनी लेदर की डायरी टेबल पर रखी और बिना छात्रों की तरफ देखे, सीधे ब्लैकबोर्ड की तरफ मुड़ गए।
"गुड मॉर्निंग," उनकी आवाज़ बेस (Base) से भरी और बेहद रसूखदार थी। छात्रों ने कांपते हुए स्वर में जवाब दिया।
बिना किसी औपचारिक परिचय के, उन्होंने हाथ में चौक उठाई और बोर्ड पर एक जटिल 'Calculus' का समीकरण लिखना शुरू कर दिया। उनके हाथ इतनी तेज़ी और सटीकता से चल रहे थे जैसे कोई मशीन काम कर रही हो। गणित के वो कठिन सूत्र, जिन्हें देखकर छात्रों के सिर चकराने लगते थे, डॉ. समय के हाथों से ऐसे बह रहे थे जैसे कोई कविता लिखी जा रही हो।
"मैथमेटिक्स भावनाओं का मोहताज नहीं होता," उन्होंने बोर्ड पर लिखते हुए कहा। "यहाँ या तो आप सटीक हैं, या आप शून्य हैं। और मेरी क्लास में, मैं केवल सटीकता (Precision) पसंद करता हूँ। समय की पाबंदी मेरे लिए पहली शर्त है। अगर मेरी घड़ी में 8:00 बजे हैं, तो आपकी घड़ी में भी वही समय होना चाहिए।"

अभी समय कपूर अपनी बात पूरी कर ही रहे थे कि दरवाज़े पर एक हल्की सी दस्तक हुई। पूरी क्लास की साँसें जैसे एक साथ रुक गईं। सबकी आँखें दरवाज़े पर टिक गईं।
वहाँ 19 साल की निशा वर्मा खड़ी थी। गुलाबी रंग का साधारण सा सूट, कंधे पर लटका एक भारी बैग और चेहरे पर पसीने की बूंदें। वह हाफ रही थी, जैसे मीलों दौड़कर आई हो। उसका चेहरा मासूमियत से भरा था, लेकिन इस वक्त उस पर सिर्फ खौफ था।

"स... सर, क्या मैं अंदर आ सकती हूँ?" निशा की आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुश्किल से सुनाई दे रही थी।
डॉ. समय कपूर धीरे से मुड़े। उनकी बर्फीली नज़रें चश्मे के पीछे से निशा के चेहरे पर आकर ठहर गईं। उन्होंने अपनी घड़ी देखी।
"8:12 मिनट
आप पूरे 12 मिनट की देरी से आई हैं, मिस...?"

"निशा... निशा वर्मा, सर। वो... दरअसल आज मेरा पहला दिन है, बस का रूट समझ नहीं आया और फिर इस बड़े कॉलेज में कमरा ढूँढने में..." वह अपनी सफाई में शब्द जोड़ती जा रही थी, उसे लग रहा था कि शायद प्रोफेसर उसकी मजबूरी समझ जाएंगे।
लेकिन समय कपूर के चेहरे पर एक शिकन तक नहीं आई। "मिस वर्मा, आपके पैर लड़खड़ा रहे हैं और आपकी दलीलें उससे भी ज़्यादा कमज़ोर हैं। गणित में 'लेकिन' और 'शायद' की कोई जगह नहीं होती। 12 मिनट की देरी का मतलब है कि आपने आज के लेक्चर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा खो दिया है। और जो वक्त की कद्र नहीं करता, उसे मेरी क्लास में बैठने का कोई हक नहीं है।"
निशा की आँखों में नमी तैरने लगी। "सर, प्लीज... आज पहला दिन है। मैं अगली बार से..."
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शहर की सुबह हमेशा की तरह शोर-शराबे से भरी थी, लेकिन 'इंपीरियल इंस्टिट्यूट ऑफ एक्सीलेंस' की ऊँची प्राचीरों के भीतर का...

     मुंबई के सबसे बड़े कॉलेज के गेट पर एक कार आकर रुकी। वहाँ काफी सारे स्टूडेंट्स पहले से ही खड़े थे। वो इस कार को देखक...
27/09/2026


मुंबई के सबसे बड़े कॉलेज के गेट पर एक कार आकर रुकी। वहाँ काफी सारे स्टूडेंट्स पहले से ही खड़े थे। वो इस कार को देखकर हैरान हो रहे थे। हर कोई यही सोच रहा था कि, यह कार है किस की? तभी कार से एक आदमी बाहर आया। कार से जो आदमी बाहर आया, वो और कोई नही बल्कि इसी कॉलेज के ट्रस्टी है। उनको देखकर सब खुश भी थे और हैरान भी।

एक स्टूडेंट बोला - अरे यह तो जयशंकर सर है ना....

दूसरा लड़का - हाँ भाई, लेकिन आज कार मे?

जयशंकर प्रसाद ने किसी की ओर देखा तक नहीं। उनका चेहरा गंभीर था, कदम तेज़। वे सीधे मेन बिल्डिंग की ओर बढ़ गए, जैसे उन्हें किसी जरूरी काम की जल्दी हो। कुछ ही मिनटों बाद कॉलेज के स्पीकर से आवाज़ गूंजी - सभी छात्र-छात्राओं से निवेदन है कि तुरंत ऑडिटोरियम में एकत्रित हों। ट्रस्टी सर आप सभी से महत्वपूर्ण बात करना चाहते हैं।

पूरा कॉलेज हलचल में आ गया। क्लासरूम खाली होने लगे। गलियारों में कदमों की आहट और फुसफुसाहट भर गई। ऑडिटोरियम कुछ ही देर में छात्रों से खचाखच भर गया। स्टेज पर कॉलेज का बड़ा सा लोगो चमक रहा था। कुछ प्रोफेसर साइड में खड़े थे। माहौल में उत्सुकता थी, आखिर बात क्या है? तभी जयशंकर प्रसाद स्टेज पर आए। उन्होंने माइक संभाला और कुछ पल तक पूरे हॉल को शांत नजरों से देखा। उनकी निगाहें जैसे हर चेहरे को पढ़ रही थीं।

जयशंकर प्रसाद गंभीर लेकिन संतुलित आवाज़ में बोले - मेरे प्रिय विद्यार्थियों…आज मैं यहाँ किसी शिकायत या नए नियम की घोषणा करने नहीं आया हूँ, एक आज मैं यहाँ एक खुशी की खबर लेकर आया हूँ। हमारा कॉलेज अपने पाँच साल पूरे कर चुका है। यह पाँच साल मेहनत, संघर्ष और उपलब्धियों के।

यह सुनते ही तालियों की गूंज पूरे हॉल में फैल गई। जयशंकर ने हाथ उठाकर सबको शांत किया और आगे बोले - और इसी खास मौके पर हम अपने कॉलेज की पाँचवीं सालगिरह को बड़े ही भव्य तरीके से मनाने जा रहे हैं।

अब उत्साह और बढ़ गया। कुछ स्टूडेंट्स सीट से ही खुश होकर चिल्ला उठे। एक लड़का खड़ा होकर बोला - सर, क्या-क्या होगा प्रोग्राम में?

जयशंकर हल्का सा मुस्कुराए और बोले - इस समारोह में संगीत कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। लड़कियों की एक अलग टीम होगी, जो अपनी प्रस्तुति देगी। लड़कों की टीम भी अपनी संगीत और बैंड परफॉर्मेंस पेश करेगी। डांस, सिंगिंग और कई रचनात्मक कार्यक्रम होंगे।

लड़कियों की तरफ से तालियाँ और खुशियों की आवाज़ें उठीं। हर तरफ सब खुशी से झूम उठे। एक लड़की ने खड़े होकर पूछा - सर, क्या हम भाषण भी दे सकते हैं?

जयशंकर ने सिर हिलाते हुए कहा - बिलकुल बेटा। इस मंच पर सिर्फ मनोरंजन नहीं होगा, बल्कि विचारों की भी आवाज़ होगी। लड़कियाँ और लड़के, दोनों समाज, महिलाओं की सुरक्षा, युवाओं की जिम्मेदारी और अपने सपनों पर भाषण देंगे। हम चाहते हैं कि इस कॉलेज की सोच भी उतनी ही मजबूत हो, जितनी इसकी पहचान है।

दूसरा छात्र बोला - सर, रजिस्ट्रेशन कैसे होगा?

जयशंकर - आज से ही नोटिस बोर्ड पर विवरण लगा दिया जाएगा हर प्रस्तुति का चयन ऑडिशन के आधार पर होगा। अनुशासन और सम्मान हमारी पहली प्राथमिकता है।और मैं साफ शब्दों में कहना चाहता हूँ। इस समारोह के दौरान किसी भी प्रकार की अनुशासनहीनता, खासकर लड़कियों के सम्मान से जुड़ी किसी भी हरकत को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अगर किसी ने भी कॉलेज के माहौल को खराब करने की कोशिश की तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

पूरा हॉल एकदम शांत हो गया। कुछ लड़के एक-दूसरे को देखने लगे। जयशंकर ने माइक से हटते हुए अंतिम शब्द कहे - यह पाँचवीं सालगिरह सिर्फ जश्न नहीं है…यह हमारी पहचान है। मैं चाहता हूँ कि आप सब इसे यादगार बनाएं।

तालियों की गूंज फिर से ऑडिटोरियम में फैल गई। इसके बाद स्टूडेंट्स उत्साह में बातें करते हुए बाहर निकलने लगे। कोई संगीत की तैयारी की सोच रहा था, कोई भाषण की। हर एक स्टूडेंट बस यही सोच रहा था कि आखिर भाषण किस तरह से आखिर स्पीच स्क्रिप्ट कहां से मिलेगी? और वहीं पर लड़कियां यह सोच रही थी कि आखिर किस थीम पर डांस किया जाए और कौन सा गाना होना चाहिए? इसी डिस्कशन में कॉलेज की तरफ से सबको दो दिन का समय दिया गया था। दो दिन ऐसे ही बीत गए। आखिर वह दिन आ ही गया, जिस दिन का कॉलेज के सभी मेंबर्स को इंतजार था।

मुंबई का वही प्रतिष्ठित कॉलेज आज रोशनी से जगमगा रहा था। मेन गेट से लेकर ऑडिटोरियम तक रंग-बिरंगी लाइटें सजी थीं। हर दीवार पर कॉलेज की पाँच साल की उपलब्धियों की तस्वीरें टंगी थीं। बड़े-बड़े पोस्टर पर लिखा था - "पाँच साल विश्वास के, पाँच साल सफलता के"

ऑडिटोरियम के बाहर स्टूडेंट्स पारंपरिक और मॉडर्न ड्रेस में इधर-उधर घूम रहे थे। लड़कियाँ खूबसूरत साड़ियों और गाउन में थीं, लड़के सूट और इंडियन कुर्ते में। अंदर मंच को बेहद भव्य तरीके से सजाया गया था। पीछे एक बड़ी एलईडी स्क्रीन पर कॉलेज का लोगो चमक रहा था। धीरे-धीरे कार्यक्रम शुरू हुआ। एंकर ने मंच संभाला और सभी का स्वागत किया। तालियों की गूंज के बीच सबसे पहले कॉलेज के प्रिंसिपल को बुलाया गया।

प्रिंसिपल ने माइक संभालते हुए कहा - आज का दिन हमारे लिए सिर्फ एक सालगिरह नहीं, बल्कि गर्व का दिन है। पाँच साल पहले जब इस कॉलेज की नींव रखी गई थी, तब सिर्फ एक सपना था। एक ऐसा संस्थान बनाना जो सिर्फ डिग्री न दे, बल्कि चरित्र भी बनाए। आज मैं गर्व से कह सकता हूँ कि आप सब छात्रों ने उस सपने को हकीकत में बदला है। आपने पढ़ाई में नाम कमाया, खेल में नाम कमाया और सबसे बड़ी बात, आपने अपने व्यवहार से इस कॉलेज का नाम ऊँचा रखा है। याद रखिए, इमारतें ईंटों से बनती हैं लेकिन पहचान छात्रों से बनती है।

तालियाँ गूंज उठीं। इसके बाद हिंदी विभाग की प्रोफेसर सीमा मेहरा को बुलाया गया। सीमा मेहरा ने मुस्कुराते हुए कहा - जब मैंने यहाँ पढ़ाना शुरू किया था, तब यह कॉलेज नया था और आप जैसे छात्र भी सपनों से भरे हुए थे। आज पाँच साल बाद मैं देख रही हूँ कि वही सपने अब लक्ष्य बन चुके हैं। शिक्षा सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं होती। शिक्षा हमें यह सिखाती है कि सही क्या है और गलत क्या है। समाज में जब भी अन्याय हो, तो चुप मत रहिए। अपनी आवाज़ उठाइए। आप सभी इस देश का भविष्य हैं और मुझे पूरा विश्वास है कि आप एक बेहतर समाज का निर्माण करेंगे।

लड़कियों की पंक्ति से जोरदार तालियाँ बजीं। फिर मंच पर आए कॉलेज के स्पोर्ट्स हेड, अरविंद सर।

उन्होंने जोश से कहा -जीवन भी एक खेल की तरह है। कभी जीत होगी, कभी हार होगी। लेकिन जो मैदान छोड़ देता है, वही असली हारता है। पिछले पाँच सालों में हमारे कॉलेज ने खेलों में जो उपलब्धियाँ हासिल की हैं, वो आप सबकी मेहनत का नतीजा है। मैं चाहता हूँ कि आप जिंदगी के हर मैदान में इसी जज्बे के साथ उतरें। डर को दिल से निकाल दीजिए और अपने लक्ष्य को सामने रखिए।

अब बारी थी सबसे महत्वपूर्ण भाषण की। एंकर ने घोषणा की - अब मैं आमंत्रित करता हूँ हमारे कॉलेज के ट्रस्टी, आदरणीय जयशंकर प्रसाद जी को।

पूरा ऑडिटोरियम तालियों से गूंज उठा। जयशंकर प्रसाद मंच पर आए। उन्होंने कुछ पल तक छात्रों की भीड़ को देखा। उनकी आँखों में गर्व भी था और गंभीरता भी। उन्होंने माइक पकड़ा और गहरी आवाज़ में कहा - आज जब मैं आप सबके सामने खड़ा हूँ, तो मुझे पाँच साल पहले का वो दिन याद आ रहा है जब इस कॉलेज की पहली ईंट रखी गई थी। तब लोगों ने कहा था कि एक और कॉलेज खुल गया, इससे क्या फर्क पड़ेगा। लेकिन मैंने तब भी कहा था और आज भी कह रहा हूँ, फर्क इमारत से नहीं पड़ता, फर्क सोच से पड़ता है। हमारा उद्देश्य सिर्फ पढ़े-लिखे छात्र बनाना नहीं था, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनाना था। पाँच सालों में हमने बहुत कुछ हासिल किया है। लेकिन असली उपलब्धि तब होगी जब यहाँ से निकलने वाला हर छात्र अपने परिवार का सहारा बने, अपने शहर का गौरव बने और अपने देश का सम्मान बढ़ाए। मैं खास तौर पर एक बात कहना चाहता हूँ। इस कॉलेज में हर लड़की सुरक्षित महसूस करे, यह मेरी जिम्मेदारी है। और हर लड़का इतना संस्कारी हो कि वह सम्मान करना सीखे, यह हमारी शिक्षा का उद्देश्य है। समाज की असली पहचान इस बात से होती है कि वह अपनी बेटियों के साथ कैसा व्यवहार करता है। मैं चाहता हूँ कि इस मंच से निकली हर आवाज़ समाज में सकारात्मक बदलाव लाए।

कुछ क्षणों के लिए उन्होंने रुककर सबकी तरफ देखा फिर बोले - आज का यह समारोह सिर्फ संगीत और रोशनी का नहीं है। यह उन मूल्यों का जश्न है जिन्हें हम जीते हैं। मैं आप सबको आमंत्रित करता हूँ कि इस कार्यक्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें, अपनी प्रतिभा दिखाएँ और यह साबित करें कि यह कॉलेज सिर्फ पढ़ाई में ही नहीं, संस्कार और संस्कृति में भी सबसे आगे है।

पूरा ऑडिटोरियम एक बार फिर से तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इसके बाद संगीत कार्यक्रम शुरू हुआ। पहले लड़कियों की टीम ने देशभक्ति गीत प्रस्तुत किया। फिर लड़कों के बैंड ने जोशीली परफॉर्मेंस दी। बीच-बीच में छात्र-छात्राओं ने प्रेरणादायक भाषण दिए। एक लड़की ने महिला सुरक्षा पर इतना प्रभावशाली भाषण दिया कि हॉल कुछ पल के लिए भावुक हो गया। रात गहराती गई लेकिन उत्साह कम नहीं हुआ। लाइट्स चमक रही थीं, कैमरे फ्लैश कर रहे थे, और हर चेहरा खुशी से दमक रहा था। ऑडिटोरियम में कॉलेज का यह प्रोग्राम अपने चरण पर था, वही कॉलेज के गेट के बाहर एक ब्लैक कलर की एक गाड़ी आकर रुकी। उस गाड़ी में चार लोग बैठे हुए नजर आ रहे थे।
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कहानी : पढ़ें हिंदी कहानियाँ, कवितायें और किताबें. प्रेम के खूबसूरत अहसासों से सराबोर कराती श्रेष्ठ एवं लोकप्रिय प...

     स्थान: नीलकंठपुर, उत्तराखंडसमय: शाम के धुंधलके का प्रहरहिमालय की बर्फीली चोटियों पर जब सूरज अपनी आखिरी लालिमा छोड़त...
27/09/2026


स्थान: नीलकंठपुर, उत्तराखंड
समय: शाम के धुंधलके का प्रहर
हिमालय की बर्फीली चोटियों पर जब सूरज अपनी आखिरी लालिमा छोड़ता है, तो ऐसा लगता है मानो पर्वत देव किसी गहरी समाधि में जा रहे हों। नीलकंठपुर की घाटियों में चीड़ और देवदार के पेड़ों के बीच से गुजरती हवा एक अजीब सी सिहरन पैदा करती है। यहां की हवा में सिर्फ ठंडक नहीं है, यहां की मिट्टी के कण-कण में सदियों पुराने किस्से दबे हुए हैं। लोग कहते हैं कि पहाड़ कभी बोलते नहीं, लेकिन अगर आप गंगा की लहरों के शोर को शांत होकर सुनें, तो ये पहाड़ उन पुरुषों की सिसकियां सुनाते हैं जिन्होंने अपनी पूरी उम्र 'पत्थर' और 'मजबूत' बनने के दिखावे में गुजार दी।

समाज का एक अनलिखा कानून है— "मर्द को दर्द नहीं होता।" यह वाक्य किसी वरदान की तरह नहीं, बल्कि एक अभिशाप की तरह हर पुरुष के गले में लटका दिया जाता है।
बचपन में जब वह गिरता है, तो पिता कहते हैं, "बेटा रोते नहीं, तुम लड़के हो।" जवानी में जब वह टूटता है, तो दोस्त कहते हैं, "कमजोर मत पड भाई, तुझे घर संभालना है।" या फिर आस -पड़ोस के लोग हंसते हैं कि उसे देखो लड़का होकर आंसू बहा रहा है,और बुढ़ापे तक पहुंचते-पहुंचते वह पुरुष भावनाओं को व्यक्त करना ही भूल जाता है। उसके भीतर एक संवेदन शील मन मर जाता है जहां वह अपनी अनकही इच्छाओं, अपने डर और अपनी लाचारी को दफन करता रहता है।

यह कहानी किसी ऐसे महामानव की नहीं है जिसके पास दैवीय शक्तियां हों। यह कहानी है उन पांच दोस्तों की, जो हाड़-मांस के इंसान हैं, जिनके पास अपने हिस्से का अंधेरा है और अपने हिस्से का 'अनकहा दर्द' (The Unspoken Pain)।
पहला तत्व: व्योमकेश - वह गहरा सन्नाटा
गाँव के छोर पर बने एक पुराने पुस्तकालय की खिड़की से बाहर झाँकता व्योमकेश, शांत जल की तरह दिखता है। लेकिन शांत जल की गहराई में कितने मगरमच्छ छिपे होते हैं, यह कोई नहीं जानता। व्योमकेश ने बहुत कम उम्र में ही यह समझ लिया था कि ज्ञान ही वह शस्त्र है जो बिना खून बहाए युद्ध जीत सकता है। उसके पास गीता का ज्ञान है, और आँखों में एक ऐसी स्थिरता जो बड़े-बड़े योद्धाओं को बेचैन कर दे। लेकिन उस शांति के पीछे एक टीस है—समाज का वह दोहरा चेहरा जिसने उसके आदर्शों को बार-बार चुनौती दी है। वह 'पंचतत्व' का वह आकाश है, जो सबको अपने घेरे में तो लेता है, लेकिन खुद हमेशा अकेला रहता है।
दूसरा तत्व: वीर - आहत स्वाभिमान की आग
वीर, जिसका नाम ही उसकी पहचान है। चौड़ी छाती, पत्थर जैसी मांसपेशियाँ और आंखों में दहकता हुआ अग्नि। लेकिन इस लावे के पीछे बचपन की वह याद है जब उसके पिता को चंद पैसों के लिए सरेआम बेइज्जत किया गया था। वह गरीबी का घाव आज भी वीर के सीने में ताजा है। वह हर उस हाथ को मरोड़ देना चाहता है जो किसी गरीब की मजबूरी का फायदा उठाए। उसके हाथ में बंधा 'सिंह' की आकृति वाला चांदी का कड़ा महज एक आभूषण नहीं, बल्कि उसके गुस्से और उसकी वफादारी की जंजीर है। वीर वह 'अग्नि' है जो अगर काबू में रहे तो उजाला देती है, और अगर भड़क जाए तो विनाश कर देती है।
तीसरा तत्व: कबीर - बहती हुई संवेदना
कबीर, जो इन पांचों में सबसे कोमल दिल का है। वह 'जल' के समान है। वह रो सकता है, वह कविताएं लिख सकता है, और वह दूसरों के दर्द को अपनी आंखों से बहा सकता है। लेकिन इसी संवेदनशीलता को समाज कमजोरी' का नाम देता है। कबीर उस हर पुरुष का प्रतिनिधित्व करता है जिसे कोमल होने की सजा दी गई। उसकी आंखों में वह नमी है जो पत्थर से पत्थर दिन को पिघला दे, लेकिन क्या यह दुनिया एक संवेदनशील पुरुष को जीने देगी?
चौथा और पांचवां तत्व: ईशान और अरिंजय - संघर्ष और वायु का वेग
ईशान और अरिंजय, जो वायु और पृथ्वी की तरह इस समूह को स्थिरता और गति देते हैं। ईशान, जिसने अपनी खुशियों को परिवार की ज़िम्मेदारियों की वेदी पर चढ़ा दिया। और अरिंजय, जिसके अतीत के काले साये उसे आज भी चैन से सोने नहीं देते। इन दोनों का साथ इस टोली को पूर्ण बनाता है।

आज नीलकंठपुर की मौसम बदला हुआ है। 'विक्रम प्रताप' जैसे आधुनिक दानव अपनी काली छाया इस पवित्र धरती पर फैला रहे हैं। उनके लिए पहाड़ सिर्फ पत्थर हैं और इंसान सिर्फ मोहरे। वे भूल गए हैं कि जब पाँच तत्व एक मुट्ठी की तरह बंधते हैं, तो वह प्रहार प्रलय लाता है।
विक्रम प्रताप का घमंड आसमान छू रहा है। उसे लगता है कि सत्ता की सीढ़ियां चढ़कर वह ईश्वर से भी ऊंचा हो गया है। उसने वीर के स्वाभिमान को ललकारा है, व्योमकेश की शांति को भंग किया है और गांव की मासूमियत पर वार किया है। वह नहीं जानता कि उसने सोया हुआ शेर नहीं, बल्कि सोया हुआ ज्वालामुखी जगा दिया है।

यह प्रोलॉग उस युद्ध की आहट है जो अब छिड़ने वाला है। यह युद्ध तलवारों से नहीं, बल्कि विचारों से लड़ा जाएगा। यह युद्ध उन 'कड़ों' और लोकेट्स की गवाही में लड़ा जाएगा जो इन पांचों के पास एक दिव्य विरासत की तरह हैं।
जब व्योमकेश गीता का श्लोक पढ़ते हुए अपना शंख फूंकेगा, जब वीर की मुट्ठी विक्रम प्रताप के सिंहासन को हिलाएगी, जब कबीर के आंसू न्याय की पुकार बनेंगे—तब नीलकंठपुर की माटी एक नया इतिहास लिखेगी।
पुरुष होना सिर्फ ताकत का प्रदर्शन नहीं है। पुरुष होना जिम्मेदारी का बोझ उठाना है, अपनी कमजोरियों को स्वीकार करना है और हारकर भी दोबारा खड़े होने का साहस जुटाना है।
"The Unspoken Pain: Panchtattva" केवल एक शीर्षक नहीं है, यह एक क्रांति है। उन तमाम पुरुषों के लिए जो रात के अंधेरे में तकिए के नीचे अपना चेहरा छिपाकर रोते हैं, जो अपनी बेटियों के सामने हारने का नाटक करते हैं ताकि वे जीत सकें, और जो अपनी पूरी जिंदगी अपनों के लिए होम कर देते हैं।
आइए, गवाह बनिए इस गाथा के। जहां पहाड़ों की ऊंचाई और भावनाओं की गहराई एक साथ मिलकर एक ऐसे तूफान को जन्म देंगी, जो अधर्म के हर महल को ढहा देगा।
क्या आप तैयार हैं इस अनदेखी, अनसुनी और अनकही कहानी में डूबने के लिए?
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**********************************___________________________________________ स्थान: नीलकंठपुर, उत्तराखंड समय: शाम के धुंधलके का प्रहर हिमालय की बर्फीली चोटियों प.....

     सपनों की गठरी कंधे पर रखे मुंबई की भीड़ में अकेला खड़ा — गिरा, टूटा, फिर उठा… “द्वंद्व” सिर्फ इस शहर और समाज से नही...
27/09/2026


सपनों की गठरी कंधे पर रखे मुंबई की भीड़ में अकेला खड़ा — गिरा, टूटा, फिर उठा… “द्वंद्व” सिर्फ इस शहर और समाज से नहीं, खुद से था। और यहाँ जीत उसी की हुई जिसने हार मानने से इनकार कर दिया। अनिरुद्ध एक बाईस साल का स्मार्ट नौजवान था, उसका परिवार वाराणसी में रहता था। घर में गरीबी के कारण उसे घर छोड़ बाहर निकलना पड़ा। उसके पिता अखिलेश शर्मा एक प्राइवेट स्कूल में टीचर थे ,वहाँ के आपसी राजनीति में बेचारे अखिलेश शर्मा पिस गए थे तो बीस हजार महीने की नौकरी छूट गई ,यही एक सहारा था उनके परिवार की गाड़ी को खींचने का । कुछ दो तीन ट्यूशन थे वो भी स्कूल छूटते ही छूट गए थे । पुश्तैनी तीन कमरे का मकान था ,इसलिए छत की कमी नहीं थी ,इसलिए जोड़ तोड़ कर के घर चल जाता था। अनिरुद्ध के अलावा एक लड़की थी सौम्या नाम के ही मुताबिक सौम्य और सुंदर । वह भी बीस साल की हो चुकी थी उसके शादी की भी चिन्ता हो रही थी। नौकरी छूट जाने के बाद तो घर में खाने के भी लाले पड़ने लगे तो,मास्टर जी अपने ही मित्र से मिन्नते कर दस हजार रुपए में उनके कोल्ड स्टोरेज में नौकरी पकड़ लिया , इसमें भी उनके मित्र सोमनाथ सिंह ने बड़ा एहसान जताया था,पर गरीब के लिए सम्मान तो तब अच्छा लगता है जब पेट भरा हो । अनिरुद्ध का पोस्ट ग्रेजुएशन हो चुका था, वह भी कम मेहनत नदी करता था,सुबह पांच बजे उठ कर लोगों के घरों में पेपर पहुंचाया करता था,फिर दो घंटे ऐश जिम में जाकर खुद भी जिम करता था और लोगो को ट्रेनिंग भी देता था, इस तरह वह अपने खर्चे निकाल लेता था,वह जब से चौदह वर्ष का हुआ कभी बाप पर बोझ नहीं रहा । घर की गरीबी और समस्याओं से तंग आकर उसने मुंबई जाने का निर्णय ले लिया था, बहुत से लोग उसकी कद काठी और सुंदरता देख कहते कि तुम्हे तो मुंबई में फिल्मों में ट्राई करना चाहिए। पर उसका लक्ष्य तो सिर्फ पैसा कमाना ,इतना पैसा कमाना जिस से वह अपने परिवार को एक अच्छी जिंदगी दे सके । बहन की शादी अच्छे घर में करनी है तो कम से कम पांच दस लाख रुपए चाहिए होंगे । बहुत सी बाते और सपनों की गठरी लिए अनिरुद्ध मुंबई के दादर स्टेशन पर उतरकर चारों ओर देखता है। चारों ओर से गाड़ियों की शोरगुल और लोगो को भगदड़ देख वह थोड़ा घबरा जाता है। वैसे वाराणसी में भी भीड़ कम नहीं होती है,वहां भी शहर में तो हमेशा ही गाड़िया की शोरगुल रहती है,फिर भी यहाँ की तरह नहीं होता, इस शहर की तो बात ही अलग है। वह अपनी जेब से एक पर्ची निकालता है। उस पर
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पुरुषों के लिए कहानियां * *नायक* ⚡द्वंध⚡भाग _1 सपनों की गठरी कंधे पर रखे मुंबई की भीड़ में अकेला खड़ा — गिरा, टूटा, फिर .....

     बारिश का मौसम था, अमावस की काली रात थी, आसमान से गिरते बारिश की तेज आवाज खिड़कियों से टकराकर पूरे कमरे में पहुंच रह...
27/09/2026


बारिश का मौसम था, अमावस की काली रात थी, आसमान से गिरते बारिश की तेज आवाज खिड़कियों से टकराकर पूरे कमरे में पहुंच रही थी। आसमान में बादल की गड़गड़ाहट और बिजली की चमक रुह कपा देने वाली थी।
इस वक्त रात के 2:00 बजे थे, पूरा शहर सो चुका था लेकिन मंजीत नहीं।

उसके कमरे में टेबल पर रखे लैंप की हल्की पीली रौशनी से दीवारों पर पड़ती परछाइयां कांप रही थी। टेबल पर फैले 2 डायरी, एक काफी पुरानी थी और एक डायरी ओपन थी, पेन स्टैंड, जिस पर काफी सारे पेन रखे हुए थे, काॅफी का ठंडा कप, पेपर के बंडल, और अनगिनत अधूरी कहानियां...

खुली हुई डायरी के हर पन्नों पर लिखा हुआ था "मैं लोगों की सच्चाई लिखता हूं या फिर उसकी मौत"
मंजीत 25 साल का, जवान हैंडसम सा लड़का है, लिखना उसका जुनूनी हाॅबी है, उसे सस्पेंस थ्रिलर लिखना बहुत पसंद है, वो हमेशा कहानियों की दुनिया में ही खोया रहता था।
उसकी ज़िंदगी पहले तो संघर्ष में फिर साफ और स्मूथ चल रही थी, पर जब से उसे वो रहस्यमई डायरी मिली है उसकी जिंदगी का रुख ही जैसे बदल गया।

जितनी कहानियां लिखता उतना ही मौत उसकी आंखों के सामने हकीकत में हो जाता। एक नजर वह कभी खुली हुई डायरी पर डालता, तो कभी उस रहस्यमई डायरी पर जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ था, जो लिखोगे वही होगा।
जब उसे वो डायरी मिली थी, वह काफी खुश हो गया था, पर समय के साथ उसकी खुशी निराशा और दुख में बदलने लगी।

उसने एक लंबी गहरी सांस ली, उसने खुद से ही कहा :- अब बस और नहीं । आज मैं कुछ नया लिखूंगा , कुछ अच्छा सा। उसने पेन उठाया और जैसे ही कागज पर लिखने वाला था, कि
तभी उसके कानों में जैसे किसी के हंसने की भारी आवाज आई:-कितना भी कुछ भी कर लो, होगा वहीं जो मैं चाहूंगी।

मंजीत एकदम से ठिठक गया, तभी उसकी नजर खिड़की पर पड़ी, बारिश के पीछे अंधेरे में भी उसे लगा जैसे कि कोई खड़ा है । उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
"कोई नहीं है- कोई नहीं है" यह सिर्फ मेरा डर है, मेरा वहम है ये कहते हुए खुद को समझा ही रहा था, कि तभी आसमान में तेज बारिश में एक बार फिर से जोरदार बिजली चमकी और इस बार उसे एक चेहरा दिखा- एक आदमी का ।

उसकी आंखों में डर था, चेहरा खून से सना हुआ था जैसे वह मदद मांग रहा हो, फिर अचानक जैसे उसने कहा:- तुम खूनी हो, तुम खूनी हो।

नहीं ईईईईई..., चीखते हुए मंजीत अपनी आंखों के सामने अपना हाथ रखकर पीछे हट गया। वह खुद में ही बुदबुदाते हुए बोला :-नहीं- नहीं , ये फिर से नहीं, और उसने जैसे खुद को ही संभालते हुए दिल पर हाथ रखा।
लेकिन वह चेहरा उसके दिमाग में और भी साफ होते गया। फ्लैश... आने लगा।

एक सुनसान सड़क पर रात के घने अंधेरे में किसी के कदमों की आवाज आई और फिर एक जोरदार धक्का लगा ।
वह आदमी गिर पड़ा।
मंजीत हांफते हुए जमीन में बैठ गया ।
उसने खुद से ही कहा:- ये कौन है? मैंने इससे पहले कभी नहीं देखा। उसकी सांसे तेज हो गई ।

यह पहली बार नहीं था, बचपन से ही उसे ऐसे दृश्य दिखते थे, अजनबी लोग अजनबी जगह और अजीब सी बातें ।
जो कुछ भी वो अपने परिवार और दोस्तों को बताता सब उसे पागल कहते।
उससे कोई दोस्ती करना भी नहीं चाहते थे, उसकी अजीबो गरीब बातें सबको डरा देती थी। पहले तो उसे बहुत बुरा लगता था, पर धीरे-धीरे उसे अकेले रहने की आदत पड़ गई ,और अब उसे अकेले रहने में ही सुकून मिलता है।

अब तक उसका कोई अच्छा दोस्त भी नहीं बन पाया है। अगर कोई उसका अच्छा दोस्त बना है तो उसकी डायरी और पेन। जिसमें वो अपने मन की सारी बातें, सारे दृश्य डायरी में लिख देता। बिल्कुल किसी कहानी की तरह। पर वह रहस्यमई डायरी ने जैसे उसके जिंदगी का रुख ही बदल दिया।

जो कुछ भी लिखता, वही घटनाएं सब सच हो जाती ।
सबने कहा था, यह तुम्हारी कल्पना है लेकिन सिर्फ वही जानता था कि ये सच है। कैसे हो रहा था, उसका रिश्ता क्या है क्यों हो रहा है कुछ भी नहीं पता।

अगली सुबह ,
मंजीत खुद को शांत करने की कोशिश किया और काफी बनाकर कॉफी पीते हुए उसने टीवी चालू किया ।
और फिर उसने जो देखा उसके हाथ से उसका कॉफी का कप गिर गया।
समाचार चल रहा था, कल रात शहर के बाहरी इलाके में उसे संदिग्ध व्यक्ति की मौत। स्क्रीन पर वही चेहरा, वही आदमी ,वही डर ।
मंजीत की आंखें फैल गई ।
उसके कानों में आवाज गूंजने लगी :- तुम खूनी हो , तुम खूनी हो ।

उसने खुद की जोर से धड़कते दिल से पूछा:- मैं लोगों की सच्चाई लिखता हूं या फिर उसकी मौत?

उसने डरते हुए, टीवी बंद कर दिया और दोबारा अपने आप पर ही शक करते हुए बोला:- क्या मैं सच में खूनी हूं ?
अगर मैं नहीं लिखता तो यह सब नहीं होता।
उसके होठ सूख गए थे ।
उसी समय दरवाजे पर घंटी बजी। ट्रिन ट्रिन

उसका दिल जैसे एक सेकंड के लिए वही रुक ही गया था ।

वह खुद से ही बोला:- सुबह-सुबह कौन है ? वह धीरे कदम से दरवाजे की तरफ गया और जैसे ही उसने दरवाजा खोला :- उसका शरीर में सिहरन से दौड़ गई। उसका गला सूख गया था ।

सामने एक अजनबी लड़की पुलिस यूनिफॉर्म में खड़ी थी। और उसके हाथ में पुलिस का डंडा भी था।
उसकी आंखों में अजीब सी गंभीरता थी।
उसने गंभीर लहजे कहा :- हेलो मिस्टर मंजीत , मैं इंस्पेक्टर अधिरा। मुझे तुमसे कुछ पूछताछ करनी है ।

मंजीत का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था । उसने धीरे से हकलाते हुए ही पूछा:- क्.. क्यों ?

अधिरा के चेहरे पर चतुर मुस्कान और भी गहरी हो गई ।
उसने कड़क टोन में कहा:- क्योंकि आप जो लिखते हैं वह सच हो जाता है ।
चल बता कैसे करता है यह सब ? पहले कहानी लिखकर हमें चैलेंज करता है।
तुम्हें क्या लगता है किसी को पता नहीं चलेगा ? क्राइम चाहे कितना भी सफाई से क्यों न कर ले? इंसान कोई ना कोई सबूत छोड़ ही देता है।
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बारिश का मौसम था, अमावस की काली रात थी, आसमान से गिरते बारिश की तेज आवाज खिड़कियों से टकराकर पूरे कमरे में पहुंच रही ....

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