27/09/2026
बारिश का मौसम था, अमावस की काली रात थी, आसमान से गिरते बारिश की तेज आवाज खिड़कियों से टकराकर पूरे कमरे में पहुंच रही थी। आसमान में बादल की गड़गड़ाहट और बिजली की चमक रुह कपा देने वाली थी।
इस वक्त रात के 2:00 बजे थे, पूरा शहर सो चुका था लेकिन मंजीत नहीं।
उसके कमरे में टेबल पर रखे लैंप की हल्की पीली रौशनी से दीवारों पर पड़ती परछाइयां कांप रही थी। टेबल पर फैले 2 डायरी, एक काफी पुरानी थी और एक डायरी ओपन थी, पेन स्टैंड, जिस पर काफी सारे पेन रखे हुए थे, काॅफी का ठंडा कप, पेपर के बंडल, और अनगिनत अधूरी कहानियां...
खुली हुई डायरी के हर पन्नों पर लिखा हुआ था "मैं लोगों की सच्चाई लिखता हूं या फिर उसकी मौत"
मंजीत 25 साल का, जवान हैंडसम सा लड़का है, लिखना उसका जुनूनी हाॅबी है, उसे सस्पेंस थ्रिलर लिखना बहुत पसंद है, वो हमेशा कहानियों की दुनिया में ही खोया रहता था।
उसकी ज़िंदगी पहले तो संघर्ष में फिर साफ और स्मूथ चल रही थी, पर जब से उसे वो रहस्यमई डायरी मिली है उसकी जिंदगी का रुख ही जैसे बदल गया।
जितनी कहानियां लिखता उतना ही मौत उसकी आंखों के सामने हकीकत में हो जाता। एक नजर वह कभी खुली हुई डायरी पर डालता, तो कभी उस रहस्यमई डायरी पर जिस पर सुनहरे अक्षरों में लिखा हुआ था, जो लिखोगे वही होगा।
जब उसे वो डायरी मिली थी, वह काफी खुश हो गया था, पर समय के साथ उसकी खुशी निराशा और दुख में बदलने लगी।
उसने एक लंबी गहरी सांस ली, उसने खुद से ही कहा :- अब बस और नहीं । आज मैं कुछ नया लिखूंगा , कुछ अच्छा सा। उसने पेन उठाया और जैसे ही कागज पर लिखने वाला था, कि
तभी उसके कानों में जैसे किसी के हंसने की भारी आवाज आई:-कितना भी कुछ भी कर लो, होगा वहीं जो मैं चाहूंगी।
मंजीत एकदम से ठिठक गया, तभी उसकी नजर खिड़की पर पड़ी, बारिश के पीछे अंधेरे में भी उसे लगा जैसे कि कोई खड़ा है । उसका दिल जोर से धड़कने लगा।
"कोई नहीं है- कोई नहीं है" यह सिर्फ मेरा डर है, मेरा वहम है ये कहते हुए खुद को समझा ही रहा था, कि तभी आसमान में तेज बारिश में एक बार फिर से जोरदार बिजली चमकी और इस बार उसे एक चेहरा दिखा- एक आदमी का ।
उसकी आंखों में डर था, चेहरा खून से सना हुआ था जैसे वह मदद मांग रहा हो, फिर अचानक जैसे उसने कहा:- तुम खूनी हो, तुम खूनी हो।
नहीं ईईईईई..., चीखते हुए मंजीत अपनी आंखों के सामने अपना हाथ रखकर पीछे हट गया। वह खुद में ही बुदबुदाते हुए बोला :-नहीं- नहीं , ये फिर से नहीं, और उसने जैसे खुद को ही संभालते हुए दिल पर हाथ रखा।
लेकिन वह चेहरा उसके दिमाग में और भी साफ होते गया। फ्लैश... आने लगा।
एक सुनसान सड़क पर रात के घने अंधेरे में किसी के कदमों की आवाज आई और फिर एक जोरदार धक्का लगा ।
वह आदमी गिर पड़ा।
मंजीत हांफते हुए जमीन में बैठ गया ।
उसने खुद से ही कहा:- ये कौन है? मैंने इससे पहले कभी नहीं देखा। उसकी सांसे तेज हो गई ।
यह पहली बार नहीं था, बचपन से ही उसे ऐसे दृश्य दिखते थे, अजनबी लोग अजनबी जगह और अजीब सी बातें ।
जो कुछ भी वो अपने परिवार और दोस्तों को बताता सब उसे पागल कहते।
उससे कोई दोस्ती करना भी नहीं चाहते थे, उसकी अजीबो गरीब बातें सबको डरा देती थी। पहले तो उसे बहुत बुरा लगता था, पर धीरे-धीरे उसे अकेले रहने की आदत पड़ गई ,और अब उसे अकेले रहने में ही सुकून मिलता है।
अब तक उसका कोई अच्छा दोस्त भी नहीं बन पाया है। अगर कोई उसका अच्छा दोस्त बना है तो उसकी डायरी और पेन। जिसमें वो अपने मन की सारी बातें, सारे दृश्य डायरी में लिख देता। बिल्कुल किसी कहानी की तरह। पर वह रहस्यमई डायरी ने जैसे उसके जिंदगी का रुख ही बदल दिया।
जो कुछ भी लिखता, वही घटनाएं सब सच हो जाती ।
सबने कहा था, यह तुम्हारी कल्पना है लेकिन सिर्फ वही जानता था कि ये सच है। कैसे हो रहा था, उसका रिश्ता क्या है क्यों हो रहा है कुछ भी नहीं पता।
अगली सुबह ,
मंजीत खुद को शांत करने की कोशिश किया और काफी बनाकर कॉफी पीते हुए उसने टीवी चालू किया ।
और फिर उसने जो देखा उसके हाथ से उसका कॉफी का कप गिर गया।
समाचार चल रहा था, कल रात शहर के बाहरी इलाके में उसे संदिग्ध व्यक्ति की मौत। स्क्रीन पर वही चेहरा, वही आदमी ,वही डर ।
मंजीत की आंखें फैल गई ।
उसके कानों में आवाज गूंजने लगी :- तुम खूनी हो , तुम खूनी हो ।
उसने खुद की जोर से धड़कते दिल से पूछा:- मैं लोगों की सच्चाई लिखता हूं या फिर उसकी मौत?
उसने डरते हुए, टीवी बंद कर दिया और दोबारा अपने आप पर ही शक करते हुए बोला:- क्या मैं सच में खूनी हूं ?
अगर मैं नहीं लिखता तो यह सब नहीं होता।
उसके होठ सूख गए थे ।
उसी समय दरवाजे पर घंटी बजी। ट्रिन ट्रिन
उसका दिल जैसे एक सेकंड के लिए वही रुक ही गया था ।
वह खुद से ही बोला:- सुबह-सुबह कौन है ? वह धीरे कदम से दरवाजे की तरफ गया और जैसे ही उसने दरवाजा खोला :- उसका शरीर में सिहरन से दौड़ गई। उसका गला सूख गया था ।
सामने एक अजनबी लड़की पुलिस यूनिफॉर्म में खड़ी थी। और उसके हाथ में पुलिस का डंडा भी था।
उसकी आंखों में अजीब सी गंभीरता थी।
उसने गंभीर लहजे कहा :- हेलो मिस्टर मंजीत , मैं इंस्पेक्टर अधिरा। मुझे तुमसे कुछ पूछताछ करनी है ।
मंजीत का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था । उसने धीरे से हकलाते हुए ही पूछा:- क्.. क्यों ?
अधिरा के चेहरे पर चतुर मुस्कान और भी गहरी हो गई ।
उसने कड़क टोन में कहा:- क्योंकि आप जो लिखते हैं वह सच हो जाता है ।
चल बता कैसे करता है यह सब ? पहले कहानी लिखकर हमें चैलेंज करता है।
तुम्हें क्या लगता है किसी को पता नहीं चलेगा ? क्राइम चाहे कितना भी सफाई से क्यों न कर ले? इंसान कोई ना कोई सबूत छोड़ ही देता है।
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बारिश का मौसम था, अमावस की काली रात थी, आसमान से गिरते बारिश की तेज आवाज खिड़कियों से टकराकर पूरे कमरे में पहुंच रही ....