Ganga Pravah

Ganga Pravah Bookworm by day, stargazing enthusiast by night. Always searching for magic in the mundane moments of life

बारिश में अपने ही बंगले के बाहर चोर की तरह खड़ी कर दी गई गरीब वारिस, लेकिन जब उसने भीगे कागज़ उठाकर कहा “यह घर तुम्हारा ...
22/06/2026

बारिश में अपने ही बंगले के बाहर चोर की तरह खड़ी कर दी गई गरीब वारिस, लेकिन जब उसने भीगे कागज़ उठाकर कहा “यह घर तुम्हारा कभी नहीं होगा”, तो 20 साल की रिश्वत, डर और जमीन का खेल खुल गया
PART 1

नवंबर की ठंडी बारिश में जब इंस्पेक्टर राठौड़ ने आयशा कुरैशी से उसके अपने बंगले के गेट के बाहर हाथ ऊपर करके खड़े होने को कहा, तब 14 पड़ोसी अपनी खिड़कियों से उसे ऐसे देख रहे थे जैसे वह किसी अमीर घर में चोरी करने घुसी हो।

आयशा के हाथ में सब्ज़ियों का थैला था और सीने से चिपकी हुई एक नीली फाइल। वह 41 साल की थी, दिल्ली के लोकनायक अस्पताल के ऑपरेशन थिएटर साफ करते-करते उसकी कमर हमेशा झुकी रहती थी। उसके चेहरे पर रातों की थकान थी, मगर आँखों में वही ज़िद थी जो उसकी मौसी सकीना बेगम की थी।

लुटियंस दिल्ली के शांत, महंगे और ऊँची दीवारों वाले “नीम विहार एन्क्लेव” में यह पुराना सफेद बंगला सकीना बेगम का था। 4 महीने पहले उनकी मौत हुई थी। उन्होंने यह घर, उसके गुलाब, पीतल के बर्तन, पुरानी अलमारी और एक आखिरी बात आयशा के नाम छोड़ी थी—चमकदार कपड़ों वाले लोग जब गंदे काम करें, तो चुप मत रहना।

— पहचान पत्र दिखाइए।

इंस्पेक्टर राठौड़ की आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसी में अपमान छिपा था।

— मैं यहीं रहती हूँ, आयशा ने कहा।

— शिकायत कुछ और है।

सड़क के उस पार, छज्जे के नीचे विकास मल्होत्रा खड़ा था। बड़ा बिल्डर, एन्क्लेव एसोसिएशन का अध्यक्ष, सफेद कुर्ता, महंगी घड़ी और चेहरे पर ऐसा सभ्य मुस्कान जैसे हर झूठ को नियम बना सकता हो। पिछले 20 सालों से वही इस कॉलोनी का मालिक जैसा व्यवहार करता था।

आयशा ने फाइल आगे बढ़ाई।

— ये रजिस्ट्री के कागज़ हैं। मौसी की वसीयत है। कोर्ट का प्रोविजनल ऑर्डर है।

राठौड़ ने कागज़ ऐसे पकड़े जैसे वे गंदे हों।

— नकली भी हो सकते हैं।

आयशा का चेहरा जल उठा।

— ये तिस हजारी कोर्ट और नोटरी से प्रमाणित हैं।

तभी विकास सड़क पार करके आया।

— इंस्पेक्टर साहब, हम बस सुरक्षा चाहते हैं। इतने महंगे इलाके में अचानक कोई पुरानी कार लेकर खाली बंगले में रहने लगे, तो लोगों को चिंता तो होगी।

आयशा ने अपनी पुरानी वैगनआर देखी, फिर विकास की चमकती हुई बीएमडब्ल्यू।

— खाली बंगला? मेरी मौसी 32 साल यहाँ रहीं।

विकास ने सिर झुकाया।

— सकीना आंटी का सब सम्मान करते थे। लेकिन उनकी याद को विवादों से जोड़ना ठीक नहीं।

“विवाद।” यह शब्द आयशा के सीने में चाकू की तरह लगा। उसका साधारण सलवार-कुर्ता, उसका सांवला चेहरा, उसका अस्पताल वाला काम, उसकी पुरानी गाड़ी—सबको इस घर से बड़ा अपराध बना दिया गया था।

राठौड़ ने भीगे हुए कागज़ वापस किए।

— हम नज़र रखेंगे। कहीं जाइएगा मत।

— अपने घर से?

कोई जवाब नहीं आया। विकास ने बस मुस्कुराकर कहा—

— नीम विहार की अपनी मर्यादा है।

उस रात आयशा मौसी की रसोई में बैठकर चुपचाप रोई। घर में अब भी इलायची वाली चाय, पुराने इत्र और दवाइयों की हल्की गंध थी। दीवार पर सकीना बेगम की तस्वीर टंगी थी—सफेद नर्सिंग यूनिफॉर्म में, सख्त मगर दयालु आँखों वाली।

तभी दरवाज़े के नीचे से एक लिफाफा अंदर सरका।

उसमें सिर्फ 1 लाइन छपी थी।

“बेच दो, इससे पहले कि समझो सकीना 20 साल क्यों टिकी रही।”

अगली सुबह मौसी की पुरानी सहेली कमला आंटी आईं। हाथ में सूजी का हलवा था और आँखों में छिपा डर।

— मल्होत्रा आया था?

आयशा ने सिर हिलाया।

— पुलिस के साथ।

कमला आंटी ने गहरी साँस ली।

— यही होगा।

— वह यह घर क्यों चाहता है?

कमला आंटी ने पर्स से पीतल की पुरानी चाबी निकाली।

— सकीना ने कहा था, अगर गिद्ध फिर मंडराएँ, तो यह आयशा को देना।

वह चाबी महिपालपुर के एक स्टोरेज गोदाम की थी। उसी दिन आयशा वहाँ पहुँची। रास्ते में उसे एसोसिएशन का नोटिस मिला—₹95000 का जुर्माना। कारण था “बदसूरत पार्किंग”, “गैर-अनुरूप रंग”, और “संपत्ति पर अवैध कब्जे का संदेह।”

गोदाम में क्रिसमस की पुरानी झालरों और लोहे के संदूकों के पीछे एक स्टील की अलमारी थी। उसके अंदर नक्शे, चिट्ठियाँ, बैंक स्टेटमेंट, सरकारी नोटिंग, ईमेल प्रिंटआउट और फाइलें थीं। एक काली फाइल पर सकीना ने लिखा था—

“यमुना रिवरफ्रंट कॉरिडोर — 20 साल का झूठ।”

आयशा की धड़कन तेज हो गई। नक्शों में एक बड़ा बिजनेस कॉरिडोर दिख रहा था। कई प्लॉट, कई कंपनियाँ, कई करोड़ों का प्रोजेक्ट। और उस रास्ते के बीच में, काँटे की तरह, सकीना बेगम का बंगला खड़ा था।

तभी बाहर गाड़ी रुकी।

कदमों की आवाज़ पास आई।

— आयशा कुरैशी?

आवाज़ इंस्पेक्टर राठौड़ की थी।

अस्पताल के कमरे में नवजात को सीने से लगाए कमजोर माँ सोच रही थी बेटी जल रही है, मगर 9 साल की बच्ची ने टैबलेट चलाकर कहा “इ...
22/06/2026

अस्पताल के कमरे में नवजात को सीने से लगाए कमजोर माँ सोच रही थी बेटी जल रही है, मगर 9 साल की बच्ची ने टैबलेट चलाकर कहा “इसे घर मत ले जाना”, और पिता की बीमा वाली साजिश ने सबको जमा दिया
PART 1

“मम्मा, प्लीज़ इस बच्चे को घर मत ले जाना, वहाँ कोई तुम्हें मार देगा।”

9 साल की निशा ने यह बात अपनी माँ अनन्या के अस्पताल के कमरे में घुसते ही कही, और कमरे की सारी खुशबू अचानक डर में बदल गई।

अनन्या मेहरा दक्षिण दिल्ली के साकेत के एक बड़े निजी अस्पताल के कमरे में लेटी थी। कुछ ही घंटे पहले उसने बेटे को जन्म दिया था। शरीर टूट रहा था, टाँकों में जलन थी, आँखों के नीचे थकान की नीली परत थी, और नवजात आरव उसकी छाती से लगा दूध की गंध में गहरी नींद सो रहा था। बाहर बरसात के बाद की शाम शीशे पर चिपकी हुई थी। अंदर गेंदा और गुलाब के महँगे फूलों की टोकरी, पूजा की छोटी थाली और रिश्तेदारों के बधाई संदेश पड़े थे।

पहले पल में अनन्या को लगा, निशा जल रही है।

शायद 9 साल तक घर की इकलौती बच्ची रहने के बाद अचानक छोटे भाई को माँ की गोद में देखकर उसका दिल दुख गया था। शायद उसे डर लगा कि अब माँ का प्यार बँट जाएगा।

अनन्या ने होंठों पर दर्द भरी मुस्कान खींची।

“निशु, इधर आओ। अपने छोटे भाई से मिलो।”

लेकिन निशा एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी।

वह स्कूल की नीली यूनिफॉर्म में दरवाज़े के पास खड़ी थी। बालों की चोटी खुलकर बिखर गई थी। कंधे पर बैग टेढ़ा लटका था। दोनों हाथों से उसने नई टैबलेट को ऐसे पकड़ रखा था जैसे वह कोई ढाल हो। उसकी आँखें सूजी हुई थीं, चेहरा सफेद था, और होंठ इतने काँप रहे थे कि शब्द टूट-टूटकर बाहर आ रहे थे।

उस वक्त राघव कमरे में नहीं था।

राघव मेहरा, अनन्या का पति, कुछ देर पहले ही बोला था कि वह नीचे कैफेटेरिया से कॉफी लेकर आता है और कुछ ज़रूरी कॉल कर लेता है। वह हमेशा ज़रूरी कॉल करता था। हमेशा देर से आता था। हमेशा मोबाइल उल्टा रखता था। हमेशा किसी महँगे इत्र की हल्की गंध उसके कुर्ते या शर्ट पर रह जाती थी, जो अनन्या की नहीं होती थी।

कई महीनों से अनन्या ने बहुत कुछ देखा था, पर खुद को समझाती रही थी।

वह गुड़गाँव में एक सुंदर फ्लैट, नोएडा में अपनी इंटीरियर डिज़ाइन की छोटी कंपनी, और दिल्ली के पंजाबी परिवार में बहू की इज़्ज़त को बचाने की कोशिश में चुप रही थी। राघव एक सफल कॉरपोरेट वकील था। अंग्रेज़ी में धाराप्रवाह, परिवार के सामने संस्कारी, मंदिर में सिर झुकाने वाला, और घर के भीतर हर सवाल को “ड्रामा” कहकर कुचल देने वाला आदमी।

जब उसकी कॉलेज की दोस्त ने कहा था कि उसने राघव को खान मार्केट में कियारा नाम की एक औरत के साथ देखा है, तब अनन्या 8 महीने की गर्भवती थी। उसने आँसू निगल लिए थे।

वह लड़ाई नहीं चाहती थी।

बच्चा आने वाला था।

पिछली रात, प्रसव पीड़ा शुरू होने से कुछ घंटे पहले, राघव घर जल्दी आया था। उसके हाथ में निशा के लिए नई टैबलेट थी।

“मेरी राजकुमारी के लिए,” उसने मुस्कुराकर कहा था। “ताकि उसे कभी न लगे कि पापा उसे भूल गए।”

अनन्या को अजीब लगा था। न निशा का जन्मदिन था, न कोई त्योहार, न स्कूल में कोई बड़ा पुरस्कार। फिर भी उसने चुप रहना चुना। कमर में दर्द था, पैरों में सूजन थी, और मन में यह मूर्खतापूर्ण उम्मीद थी कि शायद राघव सच में बेहतर पिता बनने की कोशिश कर रहा है।

अब वही टैबलेट निशा की काँपती उँगलियों में थी।

“मम्मा,” निशा ने फुसफुसाकर कहा, “पापा आने से पहले आपको यह सुनना होगा।”

अनन्या की धड़कन अचानक तेज़ हो गई।

“क्या हुआ, बेटा?”

निशा ने गलियारे की तरफ देखा, जैसे उसे डर हो कि राघव किसी भी पल दरवाज़ा खोल देगा।

“टैबलेट पापा के फोन से जुड़ गई थी। उसमें मैसेज आए। फिर मैंने पापा को स्टडी रूम में बात करते सुना। मैं पर्दे के पीछे छिप गई। मैंने रिकॉर्ड कर लिया, क्योंकि मुझे लगा कोई मेरी बात नहीं मानेगा।”

अनन्या कुछ बोल पाती, उससे पहले निशा ने स्क्रीन पर उँगली रख दी।

पहले दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ आई।

फिर राघव की आवाज़।

“बच्चा पैदा होने के बाद प्लान आगे बढ़ाएँगे। सब कुछ हादसा लगना चाहिए।”

अनन्या का शरीर बर्फ हो गया।

फिर एक औरत की आवाज़ आई।

कियारा।

“अगर अनन्या को शक हो गया तो?”

राघव हँसा। वह हँसी शांत थी, थकी हुई नहीं, पछतावे वाली नहीं। जैसे कोई दफ्तर की फाइल पर बात कर रहा हो।

“उसे शक नहीं होगा। डिलीवरी के बाद वह कमजोर होगी। प्रेग्नेंसी में ब्लड प्रेशर और एंग्जायटी का रिकॉर्ड है। कुछ भी हुआ तो सब मेडिकल कॉम्प्लिकेशन समझेंगे।”

अनन्या की उँगलियाँ आरव की चादर पर कस गईं।

कियारा ने पूछा, “और बीमा?”

“अपडेट हो चुका है,” राघव बोला। “₹2 करोड़। उससे हम मुंबई शिफ्ट होंगे। नया घर, नया ऑफिस, तुम, मैं और बच्चा।”

उसने “बच्चे” कहा।

निशा का नाम नहीं लिया।

अनन्या को लगा, किसी ने उसके सीने में जलता हुआ लोहे का टुकड़ा रख दिया है।

फिर कियारा ने पूछा, “और लड़की?”

कुछ पल खामोशी रही।

राघव ने जवाब दिया, “बच्चे एडजस्ट कर लेते हैं।”

निशा की सिसकी कमरे में फट पड़ी।

अनन्या ने एक हाथ से बेटी को अपनी ओर खींचा, दूसरे हाथ से नवजात को थामे रखा। उसका शरीर कमज़ोर था, मगर मन अचानक साफ, ठंडा और खतरनाक हो गया।

राघव ने सोचा था कि प्रसव उसे बेबस कर देगा।

वह भूल गया था कि माँ तब नहीं टूटती, जब बच्चों पर खतरा हो।

वह जागती है।

अनन्या ने मुश्किल से हाथ बढ़ाकर नर्स कॉल बटन दबाया। 1 बार। 2 बार। 3 बार।

नर्स अंदर आई। उसने अनन्या का चेहरा देखा, निशा को रोते देखा, टैबलेट की खुली रिकॉर्डिंग देखी, और बिना एक शब्द कहे दरवाज़ा भीतर से बंद कर दिया।

“मैडम, क्या हुआ?”

अनन्या ने रिकॉर्डिंग चला दी।

नर्स का चेहरा पहले सख्त हुआ, फिर भय से भर गया।

“किसी को अंदर मत आने दीजिए,” उसने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा। “मैं सुरक्षा बुलाती हूँ।”

उसी समय अनन्या का मोबाइल काँपा।

राघव का संदेश था।

मैं ऊपर आ रहा हूँ। कोई तमाशा मत करना। आज ही डिस्चार्ज की बात करनी है।

निशा ने माँ की उँगलियाँ कसकर पकड़ लीं।

अनन्या समझ गई, यह रिकॉर्डिंग अंत नहीं थी।

यह तो उस रात की शुरुआत थी, जब एक 9 साल की बच्ची ने अपने ही पिता का चेहरा दुनिया के सामने खोल दिया।

पति ने यात्रा से लौटकर उसे महंगा हरा सूट दिया और कहा, “कल इसे पहनना, सबको मेरी पत्नी दिखनी चाहिए,” लेकिन बहन ने जैसे ही ...
22/06/2026

पति ने यात्रा से लौटकर उसे महंगा हरा सूट दिया और कहा, “कल इसे पहनना, सबको मेरी पत्नी दिखनी चाहिए,” लेकिन बहन ने जैसे ही सूट पहना, उसका गला बंद होने लगा और पत्नी को समझ आया कि यह उपहार नहीं, साजिश थी
PART 1

पन्ना-हरे रंग का वह महंगा अनारकली सूट उपहार नहीं था, वह मौत थी, जिसे रेशमी कागज और सुनहरी डोरी में लपेटकर उसके पति ने उसके हाथों में रख दिया था।

अंजलि मेहरा 38 साल की थी। दिल्ली के लाजपत नगर और दरियागंज में उसकी मां द्वारा शुरू की गई 3 छोटी दवा की दुकानों को अब वही संभालती थी। उसकी मां ने उन दुकानों को किसी बड़े कारोबार की तरह नहीं, बल्कि मोहल्ले की जरूरत की तरह खड़ा किया था। आधी रात को किसी बच्चे को बुखार हो, किसी बूढ़े को इंसुलिन चाहिए हो, किसी गरीब को दवा उधार लेनी हो—मेहरा मेडिकोज का शटर कभी सिर्फ पैसों के लिए नहीं खुलता था।

अंजलि का पति विक्रम खन्ना एक निजी वित्तीय कंपनी में काम करता था। साफ कपड़े, धीमी आवाज, नपा-तुला व्यवहार। वह हमेशा कहता था कि भावनाओं से घर नहीं चलता, हिसाब से चलता है। शादी के 11 साल में उसने अंजलि को कभी बिना वजह फूल तक नहीं दिए थे।

इसलिए जब वह बेंगलुरु के कथित व्यापारिक दौरे से लौटा और हाथ में सफेद डिब्बा लेकर बोला, “कल रात मेरे निवेशकों के साथ डिनर है। इसे पहनना। सबको दिखना चाहिए कि मेरी पत्नी कितनी शान से रहती है,” तो अंजलि के भीतर कुछ चुभ गया।

डिब्बे में गहरा हरा अनारकली सूट था। कपड़ा इतना चमकदार था कि रोशनी पड़ते ही जैसे पानी की लहरें उठती थीं। दुपट्टे पर महीन सुनहरी कढ़ाई थी। अंजलि ने टैग देखा।

₹42,000।

उसने चौंककर पूछा, “विक्रम, इतना महंगा?”

विक्रम ने मुस्कुराकर उसके माथे को छुआ। “कभी-कभी पत्नी के लिए खर्च करना चाहिए।”

अंजलि मुस्कुरा दी, लेकिन उसके मन में ठंडा डर बैठ गया। विक्रम ऐसा आदमी नहीं था जो अचानक प्रेम दिखाए। वह हर खर्च का कारण मांगता था। यहां तक कि अंजलि की मां की बरसी पर फूल खरीदने को भी उसने फिजूल कहा था।

अगली सुबह विक्रम जल्दी ऑफिस चला गया। अंजलि घर में बैठकर दवा की दुकानों के लाइसेंस नवीनीकरण के कागज देख रही थी। दोपहर करीब 2 बजे दरवाजे की घंटी बजी।

बाहर विक्रम की छोटी बहन नेहा खड़ी थी। 35 साल की, सरकारी स्कूल में शिक्षिका, हमेशा जल्दबाजी में, हमेशा किसी न किसी की चिंता लेकर।

“भाभी, भैया हैं?” उसने पूछा।

“ऑफिस गए हैं। अंदर आओ, चाय बनाती हूं।”

दोनों रसोई में बैठीं। नेहा ने स्कूल के बच्चों, महंगाई और अपने किराए के मकान की सीलन की बातें कीं। फिर उसकी नजर बैठक में रखे सफेद डिब्बे पर पड़ी।

“ये क्या है?”

“तुम्हारे भाई का उपहार,” अंजलि ने हल्की हंसी के साथ कहा।

नेहा ने सूट निकाला और उसकी आंखें चमक उठीं। “भाभी, बहुत सुंदर है। बस 1 मिनट पहनकर देख लूं?”

अंजलि ने मजाक में कहा, “फाड़ दिया तो आधी तनख्वाह तुम्हारी, आधी मेरी।”

नेहा हंसती हुई कमरे में गई। जब बाहर आई तो सचमुच किसी शादी की महफिल जैसी लग रही थी। हरा रंग उसके चेहरे पर खिल उठा था। वह आईने के सामने घूमी।

“भाभी, देखो ना, मैं तो फिल्मी लग रही हूं!”

अगले ही पल उसकी हंसी टूट गई।

नेहा ने गले पर हाथ रखा। फिर खांसी आई। फिर दूसरी। उसके चेहरे का रंग बदलने लगा।

“भाभी… सांस नहीं आ रही…”

अंजलि झटके से उठी। नेहा के गले पर लाल चकत्ते उभर रहे थे। वे चकत्ते तेजी से छाती और बाजुओं तक फैलने लगे।

“इसे उतारो… जल रहा है… भाभी, बचाओ!”

अंजलि के हाथ कांपने लगे। उसने पीछे की जिप खोली। सूट जमीन पर गिरा और नेहा उससे ऐसे दूर हट गई जैसे कपड़े में सांप छिपा हो।

अंजलि ने तुरंत एंबुलेंस बुलाई। घर में रखी एलर्जी की दवा नेहा को दी। उसकी अपनी सांस भी डर से अटक रही थी, क्योंकि वह इस हालत को पहचानती थी।

5 साल पहले एक सिंथेटिक रंग से उपचारित साड़ी पहनने के बाद अंजलि की हालत ऐसी ही हुई थी। उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ा था। डॉक्टर ने साफ कहा था कि वही रसायन दोबारा शरीर से छू गया तो जान जा सकती है।

विक्रम उस दिन अस्पताल में था। उसने डॉक्टर की बात सुनी थी।

विक्रम जानता था।

एंबुलेंस आई। पैरामेडिक ने नेहा को ऑक्सीजन लगाई। उनमें से एक ने दस्ताने पहनकर सूट उठाया और नाक सिकोड़ ली।

“इसमें बहुत तेज केमिकल की गंध है। सामान्य कपड़े में ऐसा नहीं होता।”

नेहा को ले जाया गया। घर अचानक खाली हो गया। अंजलि उस हरे सूट को देखती रही।

सुंदर।

महंगा।

जहरीला।

उसने सफाई वाले दस्ताने पहने और डिब्बे की तहें खंगालीं। रेशमी कागज के नीचे मोड़ा हुआ बिल मिला।

सूट बेंगलुरु से नहीं खरीदा गया था।

वह दिल्ली के खान मार्केट की एक डिजाइनर दुकान से खरीदा गया था, उसी गुरुवार को, जब विक्रम कथित रूप से शहर से बाहर था।

अंजलि ने विक्रम को फोन किया।

“नेहा ने सूट पहन लिया था। उसकी हालत बिगड़ गई। एंबुलेंस ले गई।”

दूसरी तरफ कुछ सेकंड की चुप्पी रही।

फिर विक्रम बोला, “शायद उसे कोई एलर्जी हो गई होगी।”

“वैसी ही एलर्जी, जैसी मुझे है। और बिल कह रहा है कि सूट दिल्ली से खरीदा गया।”

विक्रम की आवाज कठोर हो गई। “मैंने नहीं खरीदा। ऑफिस की एक सहकर्मी ने लिया था। रिया को कपड़ों की समझ है।”

“उसका नंबर दो।”

“नहीं।”

“क्यों?”

“क्योंकि तुम पागलपन कर रही हो। एक कपड़े को लेकर हत्या की कहानी मत बनाओ।”

उसने फोन काट दिया।

अंजलि के हाथ में बिल था। जमीन पर जहर था। और पहली बार उसे समझ आया कि उसके पति ने उसे प्रेम नहीं दिया था।

उसने उसे मरने की तैयारी भेजी थी।

उसी शाम उसके घर के कैमरे में कुछ ऐसा कैद हुआ, जिसे देखकर उसकी रीढ़ तक जम गई।

श्मशान में पति की चिता के सामने प्रसव पीड़ा से तड़पती बहू को सास ने कहा “ऑटो पकड़ो”, मगर 12 दिन बाद वही परिवार पोते का ह...
22/06/2026

श्मशान में पति की चिता के सामने प्रसव पीड़ा से तड़पती बहू को सास ने कहा “ऑटो पकड़ो”, मगर 12 दिन बाद वही परिवार पोते का हक मांगने आया तो दरवाजे पर ऐसा सच खुला कि घराना हमेशा के लिए टूट गया
PART 1

श्मशान घाट पर पति की चिता के सामने अनन्या का प्रसव पीड़ा में पानी टूट गया, और सास ने ठंडी आवाज़ में कहा, “आज मेरा बेटा जल रहा है, अपना नाटक लेकर बाहर चली जा।”

दिल्ली के निगम बोध घाट पर उस दोपहर बारिश ऐसी गिर रही थी जैसे आसमान भी अर्जुन मल्होत्रा की मौत पर रो रहा हो। सफेद चादरों, गीली लकड़ियों, भीगे फूलों और अगरबत्ती की गंध के बीच मल्होत्रा परिवार खड़ा था। सबके चेहरे पर शोक था, मगर अनन्या जानती थी कि उस घर के अधिकतर चेहरे बचपन से ही नकाब पहनना सीख चुके थे।

अर्जुन मल्होत्रा, उसके पति, गुरुग्राम की बड़ी निर्यात कंपनी के वारिस थे। घर में करोड़ों की बातें चाय के साथ होती थीं, पर दिल की कीमत कभी नहीं समझी गई। अर्जुन ही अलग था। उसने अनन्या को दहेज, खानदान, हैसियत और रिश्तेदारों की फुसफुसाहटों से ऊपर रखा था। उसी ने अपने परिवार के खिलाफ जाकर उससे शादी की थी।

अब वही अर्जुन बारिश में भीगी चिता पर लेटा था।

अनन्या 9 महीने की गर्भवती थी। काली सूती साड़ी पेट पर तनी हुई थी, पैरों में सूजन थी, माथे की बिंदी बारिश में धुंधली हो चुकी थी। वह बार-बार अपने पेट पर हाथ रखती और चिता की ओर देखती, जैसे अपने बच्चे से कह रही हो कि उसके पिता आखिरी बार यहीं हैं।

अर्जुन जयपुर से लौटते हुए सड़क हादसे में मारा गया था। फोन रात 2 बजे आया था। उसके बाद से अनन्या को ठीक से याद भी नहीं था कि किसने क्या कहा, किसने रोया, किसने सिर्फ संपत्ति की बात की।

तभी उसके पेट में तेज ऐंठन उठी। वह चीख भी नहीं पाई। कमर से नीचे गर्म तरल बहा और साड़ी भीग गई। उसके हाथ कांपने लगे।

“मम्मीजी…” उसने सास सावित्री मल्होत्रा की ओर देखा, “कृपा करके एम्बुलेंस बुला दीजिए। बच्चा… बच्चा अभी आने वाला है।”

सावित्री ने धीरे से चेहरा घुमाया। उनके सफेद रेशमी दुपट्टे पर बारिश की बूंदें मोतियों जैसी चमक रही थीं, पर आंखों में ज़रा भी नमी नहीं थी।

“अनन्या, यहां सब लोग मेरे बेटे को अंतिम विदाई देने आए हैं। तू अपनी तरफ ध्यान खींचना बंद कर।”

अनन्या दर्द से दोहरी हो गई।

“मम्मीजी, मैं सच कह रही हूं… बहुत दर्द हो रहा है…”

पास खड़ा अर्जुन का छोटा भाई रोहन मोबाइल पर किसी से धीमी आवाज़ में बात कर रहा था। अनन्या ने उसका हाथ पकड़ लिया।

“रोहन, प्लीज… एक बार अस्पताल फोन कर दो।”

रोहन ने उसका हाथ झटक दिया।

“भाभी, ड्रामा मत करो। भैया गए हैं, और आपको अभी भी खुद को बीच में लाना है?”

“मेरा बच्चा…”

“ऑटो पकड़ो और चली जाओ।”

फिर उसने अनन्या की बांह पकड़ी और उसे भीड़ से अलग धकेल दिया। इतनी जोर से कि उसका पैर गीली मिट्टी में फिसला और वह लोहे की रेलिंग से टकरा गई। रिश्तेदारों ने देखा, पर किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया। बुआओं ने सिर झुका लिया। चचेरे भाइयों ने छतरियां ठीक कर लीं। पंडित मंत्र पढ़ता रहा।

सावित्री ने सिर्फ इतना कहा, “इसे बाहर छोड़ आओ। अशुभ समय में बच्चा पैदा होने लगा है।”

अनन्या की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। वह किसी तरह गेट तक पहुंची। बारिश, दर्द और अपमान तीनों मिलकर उसके शरीर को तोड़ रहे थे। सड़क पर खड़े ऑटो वाले ने पहले मना कर दिया, फिर जब उसने अपने कानों की छोटी बालियां उतारकर हथेली पर रखीं, तब उसने अस्पताल चलने को हामी भरी।

सरकारी अस्पताल के प्रसूति वार्ड में उस रात अनन्या ने अकेले बच्चे को जन्म दिया। कोई पति नहीं था, कोई सास नहीं, कोई देवर नहीं, कोई रिश्तेदार नहीं। सिर्फ एक नर्स थी, जिसने उसके माथे से भीगे बाल हटाते हुए कहा, “हिम्मत रखो बहन, बेटा हुआ है।”

बच्चे को जब उसके सीने पर रखा गया, अनन्या फूटकर नहीं रोई। उसके आंसू चुपचाप तकिए में गुम हो गए। बच्चे की आंखें बंद थीं, मगर मुट्ठियां कसी हुई थीं। जैसे वह दुनिया से लड़ने की तैयारी लेकर आया हो।

उसने उसका नाम कबीर रखा, क्योंकि अर्जुन ने महीनों पहले मुस्कुराकर कहा था, “हमारा बेटा आएगा तो नाम ऐसा रखना जो सच से कभी न डरे।”

12 दिन बाद, जब अनन्या अभी ठीक से चल भी नहीं पा रही थी, उसके छोटे से किराए के घर की घंटी बजी।

दरवाजे की स्क्रीन पर सावित्री खड़ी थीं। सफेद साड़ी, मोती की माला, माथे पर हल्का चंदन। पीछे रोहन था, हाथ में महंगा खिलौना और चेहरे पर वही घमंड।

अनन्या ने दरवाजा खोला।

सावित्री ने बिना अपराधबोध के कहा, “हम अपने पोते को देखने आए हैं।”

अनन्या ने उनकी आंखों में सीधा देखा।

“कौन सा पोता?”

और उसी पल सावित्री मल्होत्रा का चेहरा राख जैसा सफेद पड़ गया।

अपने ही अंतिम संस्कार में ताबूत के भीतर जिंदा पड़ा पति सब सुनता रहा, पत्नी फुसफुसाई “सूर्यास्त से पहले जला दो”, लेकिन कू...
22/06/2026

अपने ही अंतिम संस्कार में ताबूत के भीतर जिंदा पड़ा पति सब सुनता रहा, पत्नी फुसफुसाई “सूर्यास्त से पहले जला दो”, लेकिन कूड़े में मिली छोटी शीशी ने ऐसा सच खोला कि पूरा परिवार कांप उठा और श्मशान की आग रुक गई
PART 1

—अगर सूर्यास्त से पहले इनका दाह संस्कार नहीं हुआ, तो हमारी पूरी योजना खत्म हो जाएगी —काव्या ने अपने पति के ताबूत के पास खड़े होकर बहुत धीमी आवाज़ में कहा।

लकड़ी के उस बंद बक्से के भीतर आरव मल्होत्रा ने हर शब्द सुन लिया।

उसकी आंखें नहीं खुल रही थीं। उंगलियां नहीं हिल रही थीं। छाती में सांस जैसे किसी ने पत्थर के नीचे दबा दी थी। शरीर ठंडा, भारी और पराया लग रहा था, मगर दिमाग पूरी तरह जाग रहा था। गेंदे और चमेली की मालाओं की गंध उसके गले में चुभ रही थी। पास बैठी औरतों का राम नाम सत्य का धीमा जाप उसके सिर में हथौड़े की तरह बज रहा था।

पहले उसे लगा, यह कोई डरावना सपना है।

फिर उसने अपनी मां की टूटी हुई आवाज़ सुनी।

—मेरा बेटा ऐसे नहीं जा सकता था… भगवान ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया…

आरव चीखना चाहता था, मां, मैं जिंदा हूं।

लेकिन उसके होंठों से हवा तक नहीं निकली।

उसे आखिरी बात याद थी। जयपुर के सिविल लाइंस वाले घर में रात के करीब 10 बजे काव्या उसके कमरे में आई थी। हाथ में केसर वाला दूध था। पिछले 3 हफ्तों से आरव बहुत कमजोर महसूस कर रहा था। अचानक चक्कर आना, पसीना, धीमी धड़कन, हाथ-पैर सुन्न होना। काव्या हर बार कहती, काम का तनाव है। डॉक्टर बत्रा कहते, शायद दिल की लय बिगड़ रही है। और समीर, वही फिटनेस कोच जिसे काव्या ने “आरव की सेहत के लिए” रखा था, हमेशा मुस्कुराकर कहता, भाई साहब, शरीर को आराम चाहिए।

उस रात काव्या ने दूध उसके होंठों तक लाकर कहा था—

—पी लीजिए, जान। इससे नींद अच्छी आएगी।

दूध मीठा था, मगर नीचे कहीं हल्की कड़वाहट छिपी थी।

फिर नींद आई।

फिर अंधेरा।

और अब वह अपने ही अंतिम संस्कार की तैयारी सुन रहा था।

घर के आंगन में सफेद चादरें बिछी थीं। रिश्तेदारों के चेहरे दुख से ज्यादा औपचारिकता से भरे थे। पड़ोस की औरतें धीरे-धीरे फुसफुसा रही थीं। उसके ऑटो पार्ट्स के शोरूम के कर्मचारी आंखें झुकाए खड़े थे। मां, शकुंतला देवी, ताबूत के पास बैठी थीं, जैसे किसी ने उनकी रीढ़ से जीवन खींच लिया हो।

काव्या का रोना बिल्कुल सही जगह पर शुरू होता था और बिल्कुल सही जगह पर रुकता था।

जब कोई उसके पास आता, वह पल्लू आंखों पर रखकर कहती—

—सब कुछ अचानक हो गया… आरव तो कल रात तक ठीक थे…

लेकिन जैसे ही लोग दूर जाते, उसकी आवाज़ बदल जाती।

—मुझे यह नाटक और नहीं झेलना —उसने दांत भींचकर कहा।

एक पुरुष की धीमी आवाज़ आई—

—बस कुछ घंटे। इलेक्ट्रिक शवदाह गृह में 6:30 बजे का समय मिल गया है।

आरव ने उस आवाज़ को पहचान लिया।

समीर।

वही आदमी जो घर में दोस्त बनकर आता था। वही जो काव्या के बहुत पास खड़ा रहता था। वही जिसे देखकर आरव का छोटा भाई निखिल कई बार तमतमा उठा था।

—भाभी उसे तुम्हारी पत्नी जैसी नहीं देखतीं —निखिल ने एक बार साफ कहा था— वह तुम्हें संपत्ति की तरह देखती हैं।

आरव ने उस दिन गुस्से में निखिल से बात बंद कर दी थी।

अब लकड़ी के भीतर कैद पड़ा वह समझ रहा था कि सच देखने वाला अकेला वही था।

दोपहर तक निखिल आया। उसके कदम भारी थे, मगर उनमें घबराहट से ज्यादा आग थी। वह ताबूत के पास झुका।

—भैया, कुछ तो गड़बड़ है। मैं कसम खाकर कहता हूं, यह मौत सीधी नहीं है।

काव्या तुरंत पास आ गई।

—निखिल, आज के दिन तमाशा मत करो। तुम्हारे भैया दिल के दौरे से गए हैं।

—दिल का दौरा? —निखिल की आवाज़ कांपी नहीं— 1 महीने पहले आदमी दुकान संभाल रहा था। फिर हर रात तुम्हारे हाथ का दूध पीकर बुझने लगा।

काव्या ने आंखें फैलाकर देखा।

—तुम मुझ पर इल्जाम लगा रहे हो?

—मैं पूछ रहा हूं कि इतनी जल्दी जलाने की क्या पड़ी है?

आंगन में अचानक चुप्पी गिर गई। यहां तक कि मंत्र पढ़ता पंडित भी रुक गया।

काव्या ने आंसू बहाए।

—यह आरव की इच्छा थी।

झूठ।

आरव ने कभी ऐसा नहीं कहा था। वह हमेशा कहता था कि उसे अपने पिता के पास पुरानी हवेली वाले श्मशान में ही विदा करना।

निखिल को भी यह बात पता थी।

करीब 2 बजे निखिल ने कहा कि वह आरव का सफेद कुर्ता लेने घर जा रहा है। काव्या के चेहरे पर पल भर के लिए डर चमका, फिर उसने चाबी उसकी हथेली पर रख दी।

—जल्दी लौटना। 6 बजे निकलना है।

निखिल बिना कुछ बोले घर पहुंचा।

घर डरावनी तरह से साफ था। सिंक खाली, बिस्तर खिंचा हुआ, दवा की शीशियां गायब। जैसे किसी ने एक बीमार आदमी के सारे निशान मिटा दिए हों।

वह सीधे रसोई में गया। मसालों के डिब्बे, आयुर्वेदिक चूर्ण, प्रोटीन पाउडर, दूध का भगोना, सब देखा। कुछ नहीं मिला। फिर उसकी नजर पीछे की सर्विस बालकनी में रखे काले कूड़े के थैले पर पड़ी। थैला बांधकर कोने में छिपाया गया था।

उसने हाथ में रूमाल लपेटा और कूड़ा खोलना शुरू किया।

संतरे के छिलकों, गीले टिशू और चायपत्ती के बीच उसे कांच की एक छोटी शीशी मिली। उस पर कोई नाम नहीं था। अंदर तल में पारदर्शी, चिपचिपी सी एक बूंद बची थी।

निखिल की गर्दन के पीछे ठंड उतर गई।

उसने तुरंत डॉ. मीरा सेन को फोन किया, जो फॉरेंसिक केमिस्ट्री विभाग में काम करती थीं और कॉलेज के दिनों से उसे जानती थीं।

—मीरा, आज ही एक चीज़ जांचनी है।

—निखिल, प्रयोगशाला कोई फिल्म नहीं है।

—मेरा भाई शायद मरा नहीं है। उसे सुन्न करके जलाने ले जा रहे हैं।

दूसरी तरफ सन्नाटा छा गया।

—अभी आओ।

उधर ताबूत के भीतर आरव अपनी पत्नी की चूड़ियों की खनक सुन रहा था। फिर काव्या उसके सिर के पास झुकी। उसका इत्र लकड़ी की दरारों से भीतर आया।

—माफ करना, आरव —वह फुसफुसाई— मगर जिंदा पति से ज्यादा काम का मरा हुआ पति होता है।

इसके बाद ढक्कन पर तेज आवाज़ हुई।

ताबूत बंद कर दिया गया।

और आरव समझ गया कि उसे आग की तरफ ले जाया जा रहा है।

"बेटी के रोने और भूख से तड़पने का खौफनाक सच: क्या एक आलीशान कोठी और 'परफेक्ट' मां के पीछे छुपा था मासूमियत का गला घोंटने...
21/06/2026

"बेटी के रोने और भूख से तड़पने का खौफनाक सच: क्या एक आलीशान कोठी और 'परफेक्ट' मां के पीछे छुपा था मासूमियत का गला घोंटने वाला काला साया?"
कमरे के दरवाज़े के बाहर खड़ा था मैं। मेरी सांसें जैसे रुक गई थीं। अंदर से मेरी पत्नी माया की आवाज़ आ रही थी। बहुत शांत, बहुत ठंडी आवाज़।

"अगर किताब गिरी, तो फिर से शुरू करोगी।"

और उसके ठीक सामने मेरी चार साल की बेटी प्रिया खड़ी थी। उसके पैर बुरी तरह कांप रहे थे। वह फुसफुसा रही थी।

"मम्मा, माफ कर दो... पूरा नहीं हुआ..."

उस सुबह मुझे घर लौटना ही नहीं था।

मैं सुबह-सुबह गुरुग्राम के अपने घर से मुंबई की फ्लाइट पकड़ने के लिए निकला था। टेक्सटाइल एक्सपोर्ट का मेरा काम है। महीनों की मेहनत के बाद एक बहुत बड़ी डील होने वाली थी। लाखों का निवेश था, मेरे बिजनेस की साख का सवाल था। लेकिन दिल्ली के इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पहुंचते ही मौसम खराब हो गया। तेज आंधी और भारी बारिश की वजह से मेरी फ्लाइट रद्द हो गई।

एयरपोर्ट पर बाकी लोग गुस्सा कर रहे थे, एयरलाइन के स्टाफ पर चिल्ला रहे थे। लेकिन मेरे अंदर एक अजीब सी बेचैनी थी। मुझे एक तरह की राहत महसूस हुई।

पिछले कुछ हफ्तों से जब भी मैं काम के सिलसिले में घर से बाहर जाता था, मेरा मन भारी रहता था।

पहले प्रिया ऐसी नहीं थी। जब मैं घर से निकलता था, तो वह दौड़कर आती थी, मेरे जूतों से लिपट जाती थी, मेरे बैग में चोरी-छिपे अपने बनाए रंग-बिरंगे कागज रख देती थी। लेकिन पिछले कुछ समय से वह बहुत शांत हो गई थी। वह धीरे-धीरे चलती थी, जैसे हर कदम फूंक-फूंक कर रख रही हो। उसकी हंसी गायब हो चुकी थी। रात को वह सोते हुए भी अचानक चौंक कर 'सॉरी' बोलने लगती थी।

जब भी मैं माया से पूछता, वह मुस्कुराकर कहती, "अमित, बच्ची बहुत नाजुक है।"

"अपनी सगी मां के जाने के बाद यह बहुत जिद्दी हो गई है।"

"आप हमेशा बिजनेस के काम में बाहर रहते हैं। घर संभालना मेरा काम है। बच्चों को ज्यादा ढील दोगे, तो वह बिगड़ जाएगी।"

प्रिया की सगी मां, मेरी पहली पत्नी नेहा, तीन साल पहले एक कार एक्सीडेंट में मुझे छोड़कर चली गई थी। उस सदमे के बाद मैंने खुद को पूरी तरह काम में झोंक दिया। मुझे लगता था कि एक आलीशान कोठी, बड़ा स्कूल, महंगे खिलौने और सुरक्षा देना ही एक पिता का फर्ज है।

माया एक साल पहले मेरी जिंदगी में आई थी। पढ़ी-लिखी, संस्कारी, लखनऊ के एक बड़े और रईस खानदान से। उसने आते ही घर को बहुत अच्छे से व्यवस्थित कर दिया था। मुझे लगा था कि मेरा बिखरा हुआ घर अब फिर से संभल जाएगा।

लेकिन उस सुबह जब मैं घर से निकल रहा था, मैंने प्रिया को डाइनिंग टेबल पर देखा था। उसके सामने दलिया का एक छोटा सा कटोरा रखा था। उसके होंठ सूखे थे और आंखों के नीचे काले घेरे थे।

"पापा, आज स्कूल नहीं जाना। पेट में दर्द है," प्रिया ने मुझसे धीरे से कहा था।

माया ने तुरंत उसके सिर पर हाथ रखा और मुझसे कहा, "आप जाइए अमित, मैं संभाल लूंगी। आज इसे घर पर ही थोड़ा डिसिप्लिन सिखाऊंगी।"

उसी वक्त रसोई में काम कर रही विमला दी के हाथ से चम्मच गिर गया था। विमला दी नेहा के समय से हमारे घर में थीं। उनके चेहरे पर एक अजीब सा डर था, जैसे वह मुझसे कुछ कहना चाहती हों। पर मैं जल्दी में था। मैंने सिर्फ इतना पूछा, "सब ठीक है ना?" विमला दी ने माया की तरफ देखा और चुप हो गई थीं।

निकलते समय प्रिया ने मुझे एक मुड़ा हुआ कागज दिया था। उस पर उसने एक बड़ा सा घर बनाया था, जिसकी सारी खिड़कियां काली थीं। बीच में एक छोटी बच्ची थी, जिसका मुंह ही नहीं बना था।

वह चित्र अब भी मेरी कोट की जेब में था। और मैं अपने ही घर की दूसरी मंजिल पर खड़ा था।

मैं बिना कोई आवाज किए अंदर आया था। मेरे हाथ में प्रिया के लिए खरीदी हुई एक गुलाबी गुड़िया थी। मैं उसे सरप्राइज देना चाहता था। लेकिन सीढ़ियों के पास आते ही मुझे एक आवाज सुनाई दी।

टक... टक... टक...

यह एक मेट्रोनोम की आवाज थी, जो टिक-टिक कर रही थी।

फिर माया की आवाज आई। कोई गुस्सा नहीं था उसमें, पर वह पत्थर जैसी ठंडी थी।

"पीठ सीधी रखो। आंखें सामने। रोने से कोई मजबूत नहीं बनता।"

प्रिया की रोती हुई आवाज आई, "मम्मा... पैर दुख रहा है..."

मैंने बर्दाश्त नहीं किया और धक्का देकर दरवाजा खोल दिया।

जो नजारा मैंने देखा, उसने मेरे होश उड़ा दिए। कमरे के बीच में प्रिया लकड़ी के एक छोटे से ब्लॉक पर एक पैर के सहारे खड़ी थी। उसके सिर पर एक बहुत भारी धार्मिक किताब रखी थी। उसके दोनों हाथ नीचे की तरफ सीधे चिपके हुए थे। उसका पूरा शरीर कांप रहा था।

जैसे ही दरवाजा खुला, प्रिया का ध्यान भटका और वह किताब नीचे गिर गई।

प्रिया का चेहरा पूरी तरह सफेद पड़ गया। वह अपनी जगह पर जम गई और डरते हुए फुसफुसायी।

"माफ कर दो मम्मा... पूरा नहीं हुआ..."

माया आराम से कुर्सी पर बैठी थी। उसकी गोद में एक नोटबुक खुली थी।

उसने बेहद शांत आवाज में कहा, "अगर किताब गिरी, तो फिर से शुरू करोगी।"

मेरा खून खौल उठा। मैंने चिल्लाकर कहा, "यह क्या बकवास हो रही है यहाँ?!"

प्रिया ने मेरी तरफ देखा भी नहीं। वह डर के मारे और सिकुड़ गई। उसे देखकर ऐसा लगा जैसे मैं उसे बचाने नहीं आया, बल्कि वह मुझसे भी डर रही थी।

मुझे समझ आ गया कि मेरे घर में कुछ बहुत भयानक चल रहा था, लेकिन असली खौफनाक सच तो अभी सामने आना बाकी था।

(आगे जो हुआ उसने मेरी रूह कंपा दी... भाग 2 में पढ़िए)

"दिवाली की रात बेटे ने घर से निकाला, पर खिड़की से जो देखा उसने होश उड़ा दिए—पोते की गुलामी और बहू का खौफनाक राज जानकर दं...
21/06/2026

"दिवाली की रात बेटे ने घर से निकाला, पर खिड़की से जो देखा उसने होश उड़ा दिए—पोते की गुलामी और बहू का खौफनाक राज जानकर दंग रह जाएंगे!"
आरव की वह चीख मेरे कानों में शीशे की तरह चुभी। मेरे घुटने से खून रिस रहा था, लेकिन उस वक्त मुझे कोई दर्द महसूस नहीं हो रहा था। मेरे अंदर एक अजीब सी ताकत आ गई थी। मैं उठ खड़ा हुआ।

विकास ने मुझे फिर से धक्का देने के लिए हाथ बढ़ाया, लेकिन इस बार मैंने उसका हाथ हवा में ही पकड़ लिया।

“दूर हट जाओ विकास, वरना आज मैं भूल जाऊंगा कि तुम मेरे बेटे हो।” मेरी आवाज़ में ऐसी कड़वाहट थी कि वह एक पल के लिए ठिठक गया।

टीना पीछे से चिल्लाई, “विकास! क्या देख रहे हो? धक्के मारकर बाहर निकालो इस बूढ़े को! हमारे मेहमान आते ही होंगे।”

मैंने टीना की तरफ देखा। उसकी आँखों में डर था, जो वह गुस्से के पीछे छिपाने की कोशिश कर रही थी। मैंने बिना कुछ कहे ड्राइंग रूम का शीशे का एक भारी गुलदस्ता उठाया और उसे पूरी ताकत से फर्श पर दे मारा।

कड़कड़ाकर शीशा टूटा।

पार्टी के म्यूज़िक के बीच वह आवाज़ इतनी तेज़ थी कि अंदर हॉल में मौजूद कुछ मेहमान बाहर गलियारे की तरफ भागते हुए आए। विकास के कुछ रईस दोस्त और टीना की सहेलियां वहाँ खड़ी हो गईं।

“यह क्या बदतमीज़ी है पापा? आप पागल हो गए हैं क्या?” विकास ने दांत भींचते हुए धीरे से कहा, ताकि मेहमान पूरी बात न सुन सकें।

“पागल मैं नहीं, पागल तुम दोनों हो चुके हो। अंदर चलो और सब लोग देखो कि इस आलीशान घर के पीछे क्या छुपा है!” मैंने ज़ोर से कहा, ताकि वहाँ खड़े सारे मेहमान सुन सकें।

टीना ने बात संभालने की कोशिश की, “अरे कुछ नहीं, यह विकास के दूर के रिश्तेदार हैं। दिमागी हालत ठीक नहीं है इनकी। आप लोग प्लीज अंदर चलिए।”

“कोई अंदर नहीं जाएगा!” मैं चिल्लाया। “अगर किसी को सच देखना है, तो मेरे साथ पीछे आओ।”

मैंने रुकने का इंतज़ार नहीं किया। मैं तेज़ी से लॉन के रास्ते घर के पिछले हिस्से की तरफ भागा। मेरे पीछे विकास, टीना और उनके तीन-चार मेहमान भी कौतूहल में दौड़े।

DADI KE NEELE NISHAN DEKH POTI NE LAGAYA CHHUPA CAMERA, CARETAKER NAHI BALKI SAGE BETE KA CROREON KI PROPERTY KE LIYE KH...
21/06/2026

DADI KE NEELE NISHAN DEKH POTI NE LAGAYA CHHUPA CAMERA, CARETAKER NAHI BALKI SAGE BETE KA CROREON KI PROPERTY KE LIYE KHAUFNAK CHEHRA SAMNE!
मेरी 80 साल की दादी के शरीर पर हर हफ्ते नीले निशान मिलते थे, मैंने कमरे में छुपाकर कैमरा लगाया और जो सच सामने आया उसने मेरे होश उड़ा दिए!

मैं मुंबई के दादर वाले उस पुराने घर के हॉल में खड़ी थी। सामने मेरी दादी अपनी पुरानी आरामकुर्सी पर बैठी थीं। टीवी पर कोई पुराना शो बहुत कम आवाज में चल रहा था। रसोई से ठंडी हो चुकी चाय की महक आ रही थी। मेज पर बिस्कुट की प्लेट रखी थी जिसे किसी ने छुआ तक नहीं था।

तभी केयरटेकर विमला बाई रसोई से बाहर आईं। उनके हाथ में एक ट्रे थी जिसमें दवाइयां और पानी का ग्लास था। उन्होंने हल्का बैंगनी रंग का यूनिफॉर्म पहना हुआ था, बालों का जूड़ा बंधा था। उनके चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी। यह शांति उस घर के लिए बहुत अजीब थी जहां एक बुजुर्ग महिला को हर हफ्ते कोई न कोई चोट लग जाती थी।

उन्होंने ट्रे मेज पर रखी और कहा, "वह सुबह थोड़ा फिसल गई थीं, लेकिन अब सब ठीक है।"

मैंने धीरे से अपना चेहरा उनकी तरफ घुमाया।

"कहाँ फिसली थीं वह?"

विमला बाई ने चादर को ठीक करते हुए कहा, "वही गलियारे के पास। आपको तो पता ही है, पुराना फर्श है और उनकी चप्पल भी ढीली है।"

दादी ने अपनी टांगों पर रखी कम्बल को कसकर पकड़ लिया। उनका यह कदम बहुत छोटा था, शायद कोई और ध्यान भी न देता। लेकिन मैं बचपन से उन हाथों को जानती थी। ये वही हाथ थे जो बचपन में मेरे लिए पराठे बनाते थे, स्कूल जाने से पहले मेरे बाल संवारते थे और जब मां गुजरी थी तो जिन्होंने मेरा हाथ थामा था। जब भी दादी डरी होती थीं, उनके हाथ इसी तरह कांपते थे। मेरे दिल में एक अजीब सा डर बैठ गया। मुझे लगा कि कुछ बहुत गलत हो रहा है।

मैंने दादी के पास जाकर पूछा, "दादी, क्या सच में यही हुआ था?"

दादी ने मेरी तरफ नहीं देखा। वह लगातार टीवी की तरफ देखती रहीं।

"हां बेटा, बुढ़ापे का शरीर है। ऐसा होता रहता है।"

उनकी यह बात मुझे उनकी चोट से भी ज्यादा चुभी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वह मुझसे क्या छुपा रही हैं।

मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं 34 साल की हूं और एक बड़े प्राइवेट अस्पताल में सीनियर एडमिनिस्ट्रेटर के पद पर काम करती हूं। मैं रोज़ एक्सीडेंट के मामले देखती हूं। मैं एक सामान्य गिरावट और किसी के जोर से पकड़ने के निशान के बीच का अंतर अच्छी तरह समझती हूं। दादी की बांह पर सिर्फ चोट नहीं थी। साफ दिख रहा था कि किसी ने उसे बहुत ताकत से भींचा था।

पिछले कुछ हफ्तों से ऐसे निशान लगातार दिख रहे थे। कभी गर्दन पर खरोंच, कभी कोहनी के पास काला निशान, तो कभी माथे पर छोटी सी चोट। और हर बार विमला बाई के पास एक कहानी तैयार होती थी। कभी मेज का कोना, कभी अलमारी का दरवाजा, तो कभी फर्श का कालीन।

और विमला बाई हमेशा वहां बहुत शांत, मददगार और एकदम परफेक्ट बनकर खड़ी रहती थीं।

वह जरूरत से ज्यादा परफेक्ट थीं। मुझे उन पर गहरा शक होने लगा था। अंदर ही अंदर एक खौफ बढ़ रहा था कि कहीं मेरे ऑफिस जाने के बाद इस बंद घर में दादी के साथ कुछ बुरा तो नहीं हो रहा।

मैंने अपना बैग उठाया और कहा, "मैं डॉक्टर की बताई हुई मरहम लेकर आती हूं।"

तब दादी ने पहली बार अपनी आंखें उठाईं। उनकी आंखों में पानी भरा हुआ था।

"जल्दी आना बेटा।"

यह कोई सामान्य बात नहीं थी।

यह एक गुहार थी।

मैं बहुत भारी दिल से घर से बाहर निकली। मैं सीधे मेडिकल स्टोर नहीं गई। मैं वहां से तीन लेन दूर लैमिंगटन रोड की एक इलेक्ट्रॉनिक दुकान पर गई। मैंने वहां से माचिस की डिब्बी के आकार का एक छोटा काला कैमरा खरीदा। दुकानदार मुझे उसके फीचर्स, मोबाइल ऐप और नाइट विज़न के बारे में समझा रहा था, लेकिन मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था। मुझे बस एक ही बात जाननी थी कि मेरी दादी को उनके अपने ही घर में कौन डरा रहा है।

पैसे देते समय मुझे खुद पर बहुत शर्म आ रही थी।

शर्म इस बात की कि मैं उस केयरटेकर पर शक कर रही थी जिसे हमने इतने भरोसे पर रखा था।

शर्म इस बात की कि मैं उस औरत के कमरे में छुपा हुआ कैमरा लगाने जा रही थी जिसने मुझे पाल-पोसकर बड़ा किया था।

लेकिन तभी मुझे याद आया कि जब मैंने दादी की चोट को छूने की कोशिश की थी, तो उन्होंने कैसे डरकर अपना हाथ पीछे खींच लिया था। मेरी वह शर्म तुरंत गुस्से में बदल गई।

शाम को मैं घर लौटी। मेरे हाथ वाले थैले में मरहम, कुछ ब्रेड और उसी के बीच छुपा हुआ वह कैमरा था। मैंने रात होने का इंतजार किया। जब विमला बाई का जाने का समय हुआ, तो मैंने उन्हें विदा किया। फिर मैंने दादी को बिस्तर पर लिटाया और खुद को बिल्कुल सामान्य दिखाने की कोशिश की।

जब दादी सो गईं, तो मैं हॉल में आई। मैंने एक कुर्सी रखी, उस पर चढ़ी और दीवार पर टंगे भगवान कृष्ण के पुराने फ्रेम के पीछे उस कैमरे को सेट कर दिया। वहां से आरामकुर्सी, गलियारा और घर का मुख्य दरवाजा साफ दिखाई दे रहा था।

तभी पीछे से आवाज आई, "तुम वहां क्या कर रही हो, मीरा?"

मैं डरकर जल्दी से नीचे उतरी। दादी दरवाजे पर खड़ी थीं।

"कुछ नहीं दादी, वह फ्रेम थोड़ा टेढ़ा था।"

दादी ने मुझे बहुत गहरी उदासी से देखा।

जैसे उन्हें सब पता हो।

जैसे वह मुझे कुछ करने से रोकना चाहती हों।

उस रात मैं अपने घर लौट आई लेकिन सो नहीं सकी। मैंने अपना लैपटॉप बेड पर खुला रखा था, फोन पास में चार्ज हो रहा था और कैमरे का ऐप चालू था। रात के 9 बजे हॉल बिल्कुल शांत था। 10 बजे तक दादी टीवी देख रही थीं। 11 बजे उन्होंने बत्ती बंद कर दी और पूरे घर में अंधेरा हो गया। सिर्फ खिड़की से गली की हल्की रोशनी अंदर आ रही थी।

तभी रात के 11 बजकर 38 मिनट पर मेरे फोन की स्क्रीन चमकी। मोशन अलर्ट का नोटिफिकेशन था।

मैं बिस्तर पर उठकर बैठ गई। मेरा दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि मुझे अपनी छाती में दर्द महसूस होने लगा।

स्क्रीन पर इमेज साफ होने में कुछ सेकंड लगे। सबसे पहले विमला बाई कमरे में आती हुई दिखीं। लेकिन इस बार वह अपने यूनिफॉर्म में नहीं थीं। उन्होंने ढीला पजामा और गहरे रंग की टी-शर्ट पहनी थी, बाल खुले थे। वह दादी के पास गईं, उनका कम्बल ठीक किया, उन्हें पानी दिया और बहुत धीरे से कुछ कहा।

मैंने अपनी भौहें सिकोड़ीं।

यह कोई हमला नहीं लग रहा था।

यह तो देखभाल थी।

तभी रात के 11 बजकर 42 मिनट पर घर का मुख्य दरवाजा खुला।

एक आदमी बिना दस्तक दिए अंदर आया, जैसे वह घर उसी का हो।

वह लंबा था, उसकी शर्ट के ऊपर के बटन खुले थे, हाथ में महंगी घड़ी थी और उसके चलने का तरीका बहुत रोबीला था।

इससे पहले कि मेरा दिमाग इस सच को स्वीकार करता, मेरा पूरा शरीर ठंडा पड़ गया।

वह शख्स कोई और नहीं, मेरे सगे चाचा रमेश थे।

वह दादी के सबसे लाडले बेटे थे। वही बिजनेसमैन चाचा जो संडे के लंच पर बड़ी-बड़ी बातें करते थे। जो हमेशा कहते थे कि उनके पास मां से मिलने का समय नहीं है, लेकिन जब भी जायदाद या वसीयत की बात होती, वह सबसे पहले पहुंच जाते थे।

रमेश चाचा ने अंदर आते ही दरवाजे की कुंडी चढ़ा दी।

दादी आरामकुर्सी पर दुबक गईं।

विमला बाई तुरंत दादी के आगे आकर खड़ी हो गईं।

वह दर्दनाक मंजर देखकर मेरी सांसें थम गईं।

(कहानी का अगला हिस्सा नीचे जारी है...)

Address

3rd Floor, Prestige Shantiniketan, Whitefield, Bengaluru/
Bangalore
560048

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Ganga Pravah posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share