11/06/2026
बहन ने पिता से वसीयत लिखवा ली
मैं उस दिन वकील अरोड़ा के दफ्तर में बैठा था।
मेरे सामने मेरी बहन सिमरन थी।
उसने सफेद सूती सलवार-कमीज़ पहनी थी। बाल पीछे बाँधे हुए। आँखों के नीचे हल्के काले घेरे। लोग कहते थे, पिता के जाने के बाद वह टूट गई है। सच कहूँ तो उस दिन उसे देखकर मुझे भी यही लगा।
मेरे हाथ में पगड़ी का कपड़ा था।
तेरहवीं को बस दो दिन हुए थे।
घर में अभी भी कपूर, धूपबत्ती, और भीगे फूलों की मिली-जुली गंध जैसे कपड़ों में अटकी हुई थी। द्वारका सेक्टर 6 का हमारा घर बड़ा था। तीन मंज़िल। चार कमरे। नीचे छोटा सा बरामदा। पिताजी की पुरानी लकड़ी की कुर्सी, जिस पर वह हर शाम बैठकर चाय पीते थे।
अब कुर्सी खाली थी।
मैं गुरप्रीत हूँ।
बयालीस साल का।
पिताजी के हिसाब से “कम आने वाला बेटा”।
यह बात गलत भी नहीं थी।
मैं गुरुग्राम में नौकरी करता था। पत्नी, दो बच्चे, घर का कर्ज़, दफ्तर का दबाव। हर सप्ताह पिता के पास नहीं जा पाता था। फोन करता था। पैसे भेजता था। डॉक्टर के बिल के लिए फोनपे करता था। पर जाना कम होता था।
सिमरन दीदी तीन महीने पहले अचानक पिता के घर रहने आ गई थीं।
तब सबने कहा था, “देखो, बेटी कैसी सेवा कर रही है।”
पड़ोस की चावला आंटी तो रोज कहती थीं, “हरबंस सिंह जी भाग्यशाली हैं। ऐसी बेटी सबको मिले।”
मैं भी यही सोचता था।
शायद मैं राहत में था।
किसी ने पिता की दवा देख ली। किसी ने खाना बना दिया। किसी ने डॉक्टर के पास ले गया। मैं अपनी नौकरी में लगा रहा। मुझे लगा, दीदी कर रही है तो अच्छा ही है।
पर मन के अंदर एक छोटा सा काँटा था।
जिसे मैंने नजरअंदाज किया।
पिता पचहत्तर के थे।
दिखने में कमजोर। हाथ काँपते थे। आवाज धीमी हो गई थी। पर आँखें वैसी ही थीं। बहुत शांत। बहुत देखने वाली।
दीदी जब पहली बार तीन महीने के लिए आईं, तो उन्होंने घर बदलना शुरू किया।
पहले रसोई।
“पापा, मसाले पुराने हो गए हैं।”
फिर दवा की अलमारी।
“पापा, यह सब मैं ठीक कर देती हूँ।”
फिर पिता की फाइलें।
“गुरप्रीत को तो समय नहीं मिलता, पापा। मैं रख देती हूँ।”
पिता मुस्कुराते रहते।
“रख दे बेटी।”
मैं एक रविवार गया था।
दीदी ने गरम पराठे बनाए थे। पनीर की सब्ज़ी। पिता के लिए दलिया अलग। मेरी प्लेट में अचार रखा।
“गुरप्रीत, तू भी खा ले। दफ्तर में क्या खाता होगा?”
मैं थोड़ा शर्मिंदा हुआ।
“दीदी, आप बहुत कर रही हो।”
वह बोलीं, “पिता हैं हमारे। सेवा करनी ही चाहिए।”
उनकी आवाज में शिकायत नहीं थी।
इसलिए बात और भारी लगी।
पिता कुर्सी पर बैठे हमें देख रहे थे।
मैंने पूछा, “पापा, दवा समय पर?”
दीदी ने तुरंत कहा, “मैं दे देती हूँ। सुबह सात, दोपहर दो, रात नौ। डॉक्टर माथुर ने जो नई दवा दी है, वह भी।”
पिता बोले, “तेरी दीदी सब देखती है।”
मैंने चैन की साँस ली।
पर उस दिन जब मैं जाने लगा, पिता ने मुझे दरवाजे तक बुलाया।
“गुरप्रीत।”
“जी पापा?”
उन्होंने मेरी तरफ देखा।
कुछ कहना चाहा।
फिर बोले, “बच्चे ठीक हैं?”
“हाँ पापा।”
“कभी उन्हें भी ले आ।”
“ज़रूर।”
मैंने देखा, उनके होंठ फिर हिले।
पर आवाज नहीं आई।
सिमरन दीदी पीछे से बोलीं, “पापा, ठंडी हवा लग जाएगी। अंदर आइए।”
पिता अंदर चले गए।
मैंने बात वहीं छोड़ दी।
शायद मुझे नहीं छोड़नी चाहिए थी।
एक शाम दीदी ने पिता से वसीयत की बात शुरू की थी। यह बात मुझे बाद में पिता के पुराने नौकर मोहन से पता चली।
मोहन बारह साल से घर में था। चाय बनाता, सफाई करता, बाजार से सब्जी लाता।
उसने बताया था, “साहब, सिमरन मैडम बहुत धीरे से बात कर रही थीं। मैं रसोई में था।”
उस रात पिता कुर्सी पर बैठे थे। दीदी उनके पैर दबा रही थीं।
“पापा, मैं एक बात कहूँ?”
“कह बेटी।”
“गुरप्रीत बुरा नहीं है। पर वह दूर है। उसकी अपनी जिंदगी है।”
पिता चुप रहे।
दीदी ने आगे कहा, “मैं यहाँ हूँ। आपकी सेवा कर रही हूँ। आगे भी करूँगी। पर कागज़ साफ होना चाहिए। बाद में घर को लेकर लड़ाई न हो।”
पिता ने पूछा, “कौन सी लड़ाई?”
“पापा, आप जानते हैं। संपत्ति की वजह से भाई-बहन अलग हो जाते हैं। मैं नहीं चाहती ऐसा हो।”
पिता ने कहा, “तो?”
“वसीयत बनवा लीजिए। घर मेरे नाम कर दीजिए। मैं आपको आखिरी साँस तक देखूँगी। गुरप्रीत को भी मैं समझा दूँगी। उसे जरूरत हो तो हिस्सा पैसे में दे देंगे।”
मोहन कहता है, पिता बहुत देर चुप रहे।
फिर बोले, “तू सच में मुझे देखेगी?”
दीदी ने उनके हाथ पकड़ लिए।
“पापा, मैं आपकी बेटी हूँ।”
पिता ने सिर हिला दिया।
“ठीक है। सोचता हूँ।”
दीदी ने यह बात मुझे नहीं बताई।
मैंने भी नहीं पूछा।
माँ के जाने के बाद से पिता अकेले थे। माँ परमजीत कौर अमृतसर की थीं। उनका नाम आते ही पिता की आँखें बदल जाती थीं। वह बहुत कम बोलते थे उनके बारे में। बस इतना कहते, “तेरी माँ ने घर बनाया था। मैंने सिर्फ ईंटें खरीदी थीं।”
माँ को गुज़रे दस साल हो चुके थे।
उनके बाद पिता और भी चुप हो गए।
सिमरन दीदी की शादी दिल्ली में ही हुई थी। पति का व्यापार ठीक था। दो बच्चे। बड़ा बेटा कॉलेज में, छोटी लड़की ग्यारहवीं में। वह पिता से मिलती रहती थीं, पर कभी लगातार नहीं रहीं। इसलिए जब वह अचानक आकर रहने लगीं, तो मुझे अजीब लगा था।
पर फिर मैंने खुद को डाँटा।
बहन सेवा कर रही है।
शक क्यों कर रहा है?
शायद मैं ही अपराधबोध में हूँ।
क्योंकि मैं पिता के पास नहीं रह पाया।
एक हफ्ते बाद दीदी ने मुझे फोन किया।
“गुरप्रीत, पापा वसीयत बनवा रहे हैं।”
मैंने कहा, “अच्छा।”
“तुझे बुरा तो नहीं?”
मैं चौंका।
“क्यों बुरा होगा?”
“घर मेरे नाम कर रहे हैं। क्योंकि मैं यहीं रहूँगी। पर चिंता मत कर। तू मेरा भाई है। जो जरूरत होगी, मैं देखूँगी।”
मेरे अंदर कुछ हिला।
पर मैंने शांत रहकर कहा, “दीदी, पापा जो चाहें।”
वह बोलीं, “तू सच में नाराज़ नहीं?”
“नहीं।”
फोन कट गया।
मैं देर तक स्क्रीन देखता रहा।
व्हाट्सऐप पर दीदी ने अगले ही मिनट लिखा—
“तू अच्छा भाई है।”
मैंने जवाब में सिर्फ हाथ जोड़ने वाला चिह्न भेज दिया।
संदेश देख लिया गया।
उसके बाद कोई जवाब नहीं आया।
यह भी एक चुप्पी थी।
पर मैंने मान लिया।
तीन दिन बाद वकील अरोड़ा घर आए।
मैं उस दिन नहीं था।
बाद में मोहन ने बताया।
दीदी ने चाय बनाई। मठरी रखी। पिता साफ कुर्ता पहनकर बैठे। वकील अरोड़ा मोटे चश्मे वाले शांत आदमी थे। पुराने परिवार के वकील। पिता उन्हें पच्चीस साल से जानते थे।
कागज़ मेज पर रखे गए।
दीदी बार-बार पूछती रहीं, “पापा, पढ़ लिया न? कोई दबाव नहीं है। मैं तो बस आपकी सुविधा के लिए कह रही हूँ।”
पिता ने कहा, “मुझे पता है।”
वकील अरोड़ा ने पिता को देखा।
बहुत छोटा सा देखना।
जैसे दोनों के बीच कोई पुरानी बात हो।
फिर पिता ने हस्ताक्षर किए।
दीदी ने राहत की साँस ली।
मोहन ने कहा, “मैडम ने उस दिन बहुत अच्छी चाय बनाई थी। खुद साहब के लिए बेसन का हलवा भी।”
रात को दीदी ने पिता की पीठ दबाई।
“पापा, अब आप चिंता मत कीजिए।”
पिता ने पूछा, “मनप्रीत कौन सी कक्षा में है?”
“ग्यारहवीं।”
“और अर्श?”
“कॉलेज का दूसरा साल।”
पिता मुस्कुराए।
“बड़े हो गए।”
दीदी बोलीं, “हाँ पापा। आप देखेंगे उनकी शादी भी।”
पिता ने धीरे से उनके हाथ पर हाथ रखा।
“बेटी, तू मेरा बहुत ध्यान रखती है।”
दीदी की आँखें भर आईं।
“मैं सच में रखूँगी पापा।”
उस पल शायद वह झूठ नहीं बोल रही थीं।
इंसान पूरी तरह बुरा नहीं होता।
यही बात धोखा कठिन बना देती है।
पिता तीन महीने बाद एक रात चले गए।
शांत।
मोहन ने सुबह देखा। वह कुर्सी पर नहीं, अपने बिस्तर पर थे। चश्मा मेज पर। पानी का गिलास आधा भरा। गुरुद्वारा साहिब की छोटी किताब तकिए के पास।
मुझे फोन आया।
मैं पहुँचा तो दीदी रो रही थीं। सच में रो रही थीं। उन्होंने पिता का सिर गोद में लिया हुआ था।
“गुरप्रीत, पापा चले गए।”
मैंने उनके पैर छुए।
मुझे लगा, मैं बहुत देर से आया।
फिर तेरह दिन की रस्में हुईं।
लोग आए।
रिश्तेदारों ने कहा, “सिमरन ने बहुत सेवा की।”
किसी ने मुझसे कहा, “बेटा, तुम भी अच्छा करते, पर बेटी ने घर संभाला।”
मैंने सिर झुका लिया।
क्योंकि बात पूरी गलत नहीं थी।
तेरहवें दिन के बाद दीदी ने कहा, “चलो, वसीयत पढ़ लेते हैं। कागज़ साफ हो जाएँ।”
मैंने कहा, “इतनी जल्दी?”
वह बोलीं, “बाद में लोग बात बनाते हैं।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
हम वकील अरोड़ा के दफ्तर पहुँचे।
छोटी सी जगह। दीवार पर कानून की डिग्रियाँ। एक कोने में भगवान गणेश की मूर्ति। मेज पर हरी फाइलें। पंखा पुराना, आवाज करता हुआ।
दीदी सीधी बैठी थीं।
मैं थोड़ा पीछे।
वकील अरोड़ा ने चश्मा लगाया।
“आप दोनों तैयार हैं?”
दीदी ने कहा, “जी।”
उन्होंने भूरा लिफाफा खोला।
अंदर से कागज़ निकाले।
मैंने देखा, दीदी की उँगलियाँ अपनी साड़ी के किनारे को मसल रही थीं।
वकील पढ़ने लगे।
“मैं, हरबंस सिंह, पुत्र स्वर्गीय करतार सिंह…”
सामान्य बातें।
पता।
स्वस्थ मानसिक स्थिति।
स्वेच्छा।
फिर वह पंक्ति आई।
वकील अरोड़ा ने आवाज साफ की।
“मेरी संपत्ति, मकान नंबर 47बी, द्वारका सेक्टर 6, तथा संबंधित चल-अचल संपत्ति, मैं हरलीन सिंह के नाम करता हूँ…”
दीदी ने तुरंत कहा, “रुकिए।”
वकील ने ऊपर देखा।
“जी?”
“नाम गलत पढ़ा आपने।”
“नहीं।”
“घर सिमरन सिंह के नाम था।”
वकील अरोड़ा ने कागज़ पर उँगली रखी।
“यहाँ हरलीन सिंह लिखा है।”
कमरे में हवा जैसे रुक गई।
मैं आगे झुका।
“कौन हरलीन सिंह?”
वकील ने कागज़ से पढ़ा।
“हरलीन सिंह, पुत्री हरबंस सिंह और परमजीत कौर, जन्म वर्ष 1981, अमृतसर।”
दीदी का चेहरा सफेद पड़ गया।
“पुत्री?”
वकील ने चश्मा उतारकर उन्हें देखा।
“जी। हरबंस सिंह जी की सबसे बड़ी बेटी।”
मेरे हाथ की पगड़ी का कपड़ा नीचे गिर गया।
दीदी ने फुसफुसाकर पूछा—
“पापा की सबसे बड़ी बेटी? हमें क्यों नहीं पता?”
वकील अरोड़ा चुप रहे।
और उस चुप्पी में पहली बार मुझे लगा, हमारे पिता की जिंदगी का एक पूरा कमरा बंद पड़ा था।
जिसकी चाबी अब खुलने वाली थी।