Dr. Deepak Acharya

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डॉ. दीपक आचार्य: शब्द-साधना एवं विचार क्रांति 🖋️
पूर्व संयुक्त निदेशक (सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग)। पुरातन सनातन परंपराओं और आधुनिक विचारों के समन्वय से 'नई दृष्टि, नई सृष्टि' के आकांक्षी। यहाँ आप पाएंगे बेबाक शोधपरक विमर्श।

बहुत जरूरी है दिमागी नक्सलों के लिए सोचना
16/08/2026

बहुत जरूरी है दिमागी नक्सलों के लिए सोचना

16/08/2026

महा बदलाव
ऊपर उठने के लिए अब ऊपर तक नहीं बल्कि नीचे तक पहुंच जरूरी हो चली है।

सच हमेशा कड़वा होता है, और यथार्थ हमेशा पूर्ण नग्न, सम्पूर्ण पारदर्शीसमाज-जीवन और परिवेशीय विद्रुपताओं का नग्न सत्य उद्घा...
16/08/2026

सच हमेशा कड़वा होता है,
और यथार्थ हमेशा पूर्ण नग्न, सम्पूर्ण पारदर्शी
समाज-जीवन और परिवेशीय विद्रुपताओं का नग्न सत्य उद्घाटित करता है आज से नौ वर्ष पूर्व सन् 2017 में प्रकाशित हो चुका मेरा यह आलेख। तसल्ली से पढ़ियें और बताइयें कि कैसा लगा?

शिवकृपा का महान चमत्कार ही है यह, 😄कम न आँकें इन समर्पित शिवभक्तों की ताकत,अपरिमित शक्तियों और दैवीय ऊर्जाओं से भरपूर है...
16/08/2026

शिवकृपा का महान चमत्कार ही है यह, 😄
कम न आँकें इन समर्पित शिवभक्तों की ताकत,
अपरिमित शक्तियों और दैवीय ऊर्जाओं से भरपूर हैं ये,
रग-रग में शिवत्व संचरित होता है इनमें,
धरती पर शिव के साक्षात् गण ही हैं ये समर्थ शैव साधक

पूरी दुनिया इनके चमत्कारों की कायल है। ये दिव्य आत्माएं जब ध्यान में होती हैं, दम भरती हैं, तब भगवान भोलेनाथ से सीधा साक्षात्कार होता है।
उस समय इनकी पांचभौतिक देह धरती पर जरूर होती है लेकिन आत्मा कैलास के शिखर पर रमण करते हुए भगवान भोलेनाथ के सान्निध्य में रहती है।
जब ये बम-बम भोले, अलख निरंजन, हर-हर महादेव, जय भोलेनाथ आदि के गगनभेदी उद्घोष करते हैं तब जहां तक इनकी आवाज पहुंचती है वहां तक सुनने वाले हर किसी भक्त को शिवजी की कृपा का अनुभव होता है।
इनके दर्शन करने मात्र से ही शिवजी की कृपा प्राप्त हो जाती है।
इसी तरह जो विप्रश्रेष्ठ शिवभक्त भंग आदि का प्रसाद ग्रहण कर रूद्राभिषेक या शिवार्चन करते हैं, उनमें भी शिवत्व का भरपूर समावेश रहता है।
ख़ासकर महाशिवरात्रि, श्रावण मास, सोमवार को इनके रोम-रोम से शिवत्व झरता है, लेकिन इस सत्य और तथ्य से अनभिज्ञ हम अज्ञानी लोग इनकी कृपा पाने से वंचित रह जाते हैं। यह हमारे पूर्वजन्मों के पापों और दुर्भाग्य का ही परिणाम है अन्यथा पारस पत्थर की खान होने के बावजूद हम लोहा ही बने हुए हैं, तो यह हमारी ही गलती है, किसी और को इसके लिए दोष नहीं देना चाहिए।
इन्हें सामान्य शिवभक्त समझने की भूल कभी न करें, ये साक्षात शिव अवतार ही होते हैं जब वैदिक ऋचाओं, शैव मंत्रों, रूद्रार्चन, स्तोत्र पाठ आदि में रमे हुए रहकर शिवार्चन करते हैं, शिव के भजनों में रमे रहते हैं और जब ये उच्चस्वर में गाते हैं - भोला ने भांग ज भावै है बिजू काईं काम न आवै रै....।
इस प्रकार के समस्त सिद्ध, तपस्वी शिवभक्तों के श्रीचरणों में कोटि-कोटि प्रणाम।

कुछ मिलेगा, तभी करेंगे, अन्यथा कुछ नहीं करेंगेआजकल जो दो शब्द समाज-जीवन से गायब हो गए हैं वे हैं - सेवा और परोपकार। इस म...
16/08/2026

कुछ मिलेगा, तभी करेंगे, अन्यथा कुछ नहीं करेंगे

आजकल जो दो शब्द समाज-जीवन से गायब हो गए हैं वे हैं - सेवा और परोपकार। इस मामले में अधिकांश लोग या तो भिखारी हैं, या कारोबारी मानसिकता में डूबे हुए धन्धेबाज, जो हमेशा हर कार्य यही सोच कर करते हैं कि - क्या मिलेगा?
कुछ मिलने की उम्मीद हो, तभी हम जगते हैं, हरकत में आते हैं, और जहां कुछ मिलने की उम्मीद न हो, वहां से किनारा कर लेते हैं।
हम हर जगह एवज में कुछ न कुछ चाहते हैं, और तभी पहल करते हैं।

जब तक देश में बिकाऊ लोग रहेंगे तब तक विकास, शान्ति और तरक्की की बातें बेमानी हैं। स्वाभिमान, आत्मगौरव और सम्मान को छोड़ क...
15/08/2026

जब तक देश में बिकाऊ लोग रहेंगे तब तक विकास, शान्ति और तरक्की की बातें बेमानी हैं। स्वाभिमान, आत्मगौरव और सम्मान को छोड़ कर चन्द टुकड़ों पर लोग बिकने लगे हैं। और आश्चर्य यह कि ये लोग पढ़े-लिखे, बुद्धिजीवी कहे जाते हैं।
बिकाऊ लोगों का सर्वे किया जाए तो यह सामने आएगा कि सर्वाधिक बिकने वालों में बुद्धिजीवियों का प्रतिशत कहीं अधिक है।

राष्ट्रीय पर्वों का है यह पावन प्रसाद, दशकों से गहरा रिश्ता है लड्डुओं का,जो पाए वो निहाल, इधर भी मिठास-उधर भी मिठास, हर...
15/08/2026

राष्ट्रीय पर्वों का है यह पावन प्रसाद,
दशकों से गहरा रिश्ता है लड्डुओं का,
जो पाए वो निहाल, इधर भी मिठास-उधर भी मिठास, हर तरफ मिठास ही मिठास

स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस पर बच्चों के लिए बांटे जाने वाले लड्डुओं के लिए गर्व और गौरव का विषय यह है कि आजादी पाने से लेकर अब तक उनका सम्मान व स्वाभिमान बना हुआ है और इतने दशकों से उनका नाम चल रहा है। मजाल है कि कोई दूसरी मिठाई पांव जमाने आ भी सके।
इन राष्ट्रीय पर्वों पर वितरित किए जाने वाले लड्डुओं के इतिहास में जाएंगे तो इन पर गहरी शोध हो सकती है, लेकिन लड्डुओं को मलाल इस बात का है कि उन्हें हमेशा हल्के में लिया जाता रहा है।
किसके लिए आते हैं, कौन बांटता है, क्या क्वालिटी है, किन तक पहुंचते हैं और इनके निर्माण से लेकर वितरण तक की प्रक्रिया किस तरह चलती है, इस बारे में किसी को कुछ बताने की आवश्यकता नहीं, सब जानते हैं।
इन लड्डुओं को इस बात से भी हैरानी और पीड़ा होती है कि जिन बच्चों के लिए बनते हैं, उनमें से काफी बच्चे समारोह पूरा होते ही अपने-अपने घरों के लिए भाग छूटते हैं, जो बचे रहते हैं उन्हें भी लड्डू रास आते ही हों, इसकी कोई पक्की वाली गारंटी नहीं।
फिर खूब सारे नैष्ठिक देशभक्त ऐसे भी हैं जो इन लड्डुओं को गणतंत्र या स्वाधीनता दिवस का प्रसाद मानकर खाना और अपने साथ ले जाना परम सौभाग्य और पुण्य का विषय मानते हैं।
क्यों न बच्चों के लिए बनने वाले इन लड्डुओं को समारोह के उपरान्त वीआईपी, गणमान्य, राजमान्य आदि के लिए होने वाले ‘एट होम’ के मीनू में भी शामिल किया जाए और बच्चों वाले लड्डू कुछ ज्यादा ही बनवाकर वहां परोसे जाएं, साथ में हरेक महानुभाव को प्रसाद के रूप में भी साथ दे दिए जाएं ताकि उनके घर वाले भी आजादी का स्वाद चखकर गौरवान्वित अनुभव कर सकें और सुशासन के झण्डों और नारों पर उछलकूद करने वाले शासन-प्रशासन के नुमाइन्दों द्वारा बच्चों के लिए किए गए मिठास के प्रबन्धों की सराहना कर सकें।
अपने-अपने इलाकों में भी इन दिवसों पर बंटने वाले लड्डुओं की हकीकत जानने का प्रयास करें। ऐसा होने पर लड्डुओं के कई रहस्य अपने आप अपने भीतर छिपी हुई मिठास से साक्षात् कराते नज़र आने लगेंगे।

लड्ड्ओं की अभिलाषा

चाहे नहीं मैं औरों के घर पहुंच मिठास बांटू
चाह नहीं मैं केवल बच्चों का मुंह मीठा करूं
चाह यह भी है कि अतिथियों को स्वाद चखाऊँ
‘एट होम’ का व्यंजन बनकर आजादी के गीत गाऊँ

लड्डू अमर रहें, लड्डूभक्षी जिन्दाबाद

15/08/2026
वे और थे, ये और हैं...ये भीड़-भाड़ वाले लोग हैं, जिन्हें न अपने आप पर भरोसा है, न किसी और परलोग आखिर लोग हैं, लोग ही तो है...
15/08/2026

वे और थे, ये और हैं...ये भीड़-भाड़ वाले लोग हैं, जिन्हें न अपने आप पर भरोसा है, न किसी और पर
लोग आखिर लोग हैं, लोग ही तो हैं, और लोग क्या-क्या नहीं कर सकते। इसे आप और हम सारे ही अच्छी तरह जानते हैं। नहीं जानने वाले सारे ही नासमझ लोगों से अपेक्षाओं में जीते हुए, भ्रमित रहते हुए लोगों से ही लोगों की शिकायतें करते हुए एक दिन लोगों से दूरी बनाते हुए वहां के लिए चल देते हैं जहां से आज तक कोई लौटा ही नहीं।

स्मृति गवाक्ष - 15 अगस्त 2003
15/08/2026

स्मृति गवाक्ष - 15 अगस्त 2003

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