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डॉ. दीपक आचार्य: शब्द-साधना एवं विचार क्रांति 🖋️
संयुक्त निदेशक(रि.), - सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, राजस्थान। पुरातन सनातन परंपराओं और आधुनिक विचारों के समन्वय से 'नई दृष्टि, नई सृष्टि' के आकांक्षी। यहाँ आप पाएंगे बेबाक,पूर्ण सत्य] शोधपरक विमर्श।

नेताओं की दुर्गति के लिए कसूरवार हैं ये उठाईगिरे दल्ले और चमचेकई बार कुछ नेताओं के लिए कहा जाता है कि वे बहुत अच्छे हैं,...
19/09/2026

नेताओं की दुर्गति के लिए कसूरवार हैं ये उठाईगिरे दल्ले और चमचे

कई बार कुछ नेताओं के लिए कहा जाता है कि वे बहुत अच्छे हैं, स्वभाव के धीर-गंभीर एवं शालीन हैं। लेकिन जब ये नेता किसी चुनाव में हार जाते हैं तब हर किसी समझदार के मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर ये कैसे हार गए?
इसके पीछे छिपे कारणों का अनुसंधान करें तो साफ तौर पर सामने आता है कि कोई कितना ही अच्छा हो, अच्छा मानने-मनवाने वाला क्यों न हों, अपने आस-पास और साथ वालों की वजह से ही इनका आकस्मिक पराभव हो जाता है।
इस बारे में गहन शोध का निष्कर्ष यह निकल कर सामने आया कि ये लोग अपने इर्द-गिर्द रहने, जयगान, परिक्रमा करते रहने वालों की वजह से ही डूब जाते हैं।
लोग इन आस-पास वालों के चाल, चलन और चरित्र को देखकर व्यक्ति का आकलन करते हैं।
बड़े लोगों की सबसे बड़ी कमी यह होती है कि वे कान के कच्चे होते हैं। कोई बिरला ही नेता ऐसा होता है जो कान का कच्चा न हो अन्यथा अधिकतर के बारे में सुना जाता है कि ये वे ही काम करते हैं जो उनके चमचे कान भरते हैं।
अक्सर बड़े लोगों के आस-पास उन लोगों का घेरा होता है जो अपनी कमाई, अपराधों और अवैध कामों में सुरक्षा कवच या आश्रय-प्रश्रय तलाशने में माहिर होते हैं।
इनमें किसम-किसम के माफिया, अपराधी, दलाल, कमीशनखोर और उठाईगिरे किस्म के दल्ले होते हैं जिनकी करतूतों, हरकतों और करामातों से लोग अच्छी तरह वाकिफ होते हैं, इसलिए इनकी मौजूदगी का कलंक बड़े लोगों पर पड़ता है और इन्हीं की वजह से उन्हें पराजय या अपयश का मुंह देखना पड़ता है।
बड़े लोग इन लल्लो-चप्पो करने वाले छुटभैयों की गतिविधियों से अनजान रहते हैं और इनका पूरा पाप इन बड़े लोगों पर लग जाता है।
इस बारे में एक पुरानी कहावत भी है जिसका सार भावार्थ यह है कि गोयरों के पाप से पीपल जल जाता है। फिर बड़े लोगों के पास केवल गोयरे ही नहीं होते बल्कि तमाम किस्मों के जहरीले सरिसृपों का डेरा बना रहता है।
और दुर्भाग्य यह कि जिन लोगों को उनके अपने घर वाले, नाते-रिश्तेदार और मित्र नाकारा, छिद्रान्वेषी और नकारात्मक व्यक्तित्व वाले मानते हैं, ऐसे सारे ही लोग बड़े लोगों की मांद और सुरक्षा कवच के साथ आशीर्वाद, स्नेह और अनुकंपा प्राप्त कर अपने आपको महान समझते हुए वे सारे काम करते रहते हैं जिनसे इन बड़े लोगों की जड़ें खोखली होती रहती हैं और अपयश की दीमक चाटती रहती है।
इन चमचों और चापलूसों की यह मजबूरी रहती है कि ये ऐसा न करें तो इनका जीवन निर्वाह करना तक मुश्किल हो जाए क्योंकि न पढ़े-लिखे होते हैं, न कोई हुनर जानते हैं। इन्हें सब कुछ मुफ्त में पाने की ऐसी आदत होती है जो कि उनके राम नाम सत्य होने तक बनी रहती है।
देश भर में हर जगह ऐसे नाकारा नुगरों की भारी भीड़ बड़े लोगों के इर्द-गिर्द रहकर उन्हंे घेरे रहकर दिन-रात भ्रमित करती रहती है और ये बड़े लोग इन नाकारा, नुगरे, मूर्ख, भौन्दू और परजीवी चमचों के प्रशस्तिगान से मुग्ध होकर इन पर वरदान लुटाते रहते हैं।
और यही वजह है कि जनता इन आस-पास और साथ वाले उठाईगिरों की वजह से अच्छे कहे जाने वाले बड़े-बड़े लोगों को फर्श पर ला देती है।
इस सत्य को समझते हुए सारे बड़े लोगों को चाहिए कि इस विषय पर गंभीरतापूर्वक चिन्तन करें और अपनी छवि को साफ-सुथरा रखते हुए समाजसेवा और राजनीति के मैदान में आजमाईश करें अन्यथा उठाईगिरों की बढ़ती जा रही संख्या कभी भी चुनौती बन सकती है।
सभी बड़े लोगों को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि - ये पब्लिक है सब जानती है।
इस शोध अध्ययन के निष्कर्ष पर आपका क्या कहना है, कमेंट कर जरूर बताएं।

19/09/2026
दक्षिणांचल में गणपति उपासना -  रोचकताओं का दिग्दर्शन कराती हैं मुग्धकारी परम्पराएँमंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश सबसे पहले प...
18/09/2026

दक्षिणांचल में गणपति उपासना - रोचकताओं का दिग्दर्शन कराती हैं मुग्धकारी परम्पराएँ

मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश सबसे पहले पूजित होने वाले देवता हैं जो विघ्नों का शमन तो करते ही हैं, कार्य सिद्धि में भी आशीर्वाद एवं सहयोग प्रदान करते हैं।
भगवान गणेश की देश भर में विविध उपचारों से पूजा-अर्चना की जाती है। राजस्थान के दक्षिणांचल (बांसवाड़ा एवं डूंगरपुर क्षेत्र) में गणपति पूजन की पुरातन परिपाटियां सदियों से विद्यमान रही हैं। यहां के निवासियों में भगवान गणेश के प्रति अगाध आस्था के भाव विद्यमान हैं। वागड़ में हर सम्प्रदाय एवं मत के धर्मावलम्बियों द्वारा गणेशजी की पूजा-अर्चना की जाती है।
वाग्वर प्रदेश में भगवान गजानन की पूजा घर-घर में श्रद्धापूर्वक की जाती है। आमतौर पर यहां लगभग सभी पुराने घरों में मुख्य द्वार के ऊपरी भाग में काष्ठ या घीया पत्थर की बनी गणेश मूर्ति अवश्य ही मिलती है।
पुराने मकानों में द्वार या काष्ठ पर उकेरी हुई गणेश की प्रतिमाएं कलात्मक वैशिष्ट्य लिये होती हैं। ज्यादातर पुराने मकानों में तो ऐसी गणेश प्रतिमाएं बारीकी के साथ खुदी होती हैं कि उनका शिल्प निखर ही आता है।
कई मकानों में मूर्ति के अभाव में दरवाजे पर मध्य में भगवान गणेश का स्थान मान कर प्रतीकात्मक पूजा की जाती है। हर वर्ष गणेश चतुर्थी और विशेष अवसरों पर श्रद्धालु भक्तिपूर्वक सिन्दूर-पानीये चढ़ाकर पूजा करते हैं।
वर्षा ऋतु में आने वाला गणेश चतुर्थी पर्व प्रकृति की पूजा का पर्व भी होता है जब गणेशजी की पूजा फल-फूल-पत्तियों आदि से की जाती है। गणेश पूजा के लिए वागड़ में वानस्पतिक पूजन सामग्री का रिवाज चला आ रहा है, इसे स्थानीय भाषा में ‘वाड़ी’ कहा जाता है। इसमें दूर्वा घास से लेकर कदली, पान, पुष्प, विभिन्न पेड़ों की फूल-पत्तियों युक्त टहनियां आदि होती हैं।
शादी-ब्याह के अवसरों पर तोरणद्वारों में भी सिन्दूरी गणेश का अपना विशिष्ट स्थान निर्धारित होता है वहीं दीवारों पर गणेशजी की प्रतिमा भी बनायी जाती है। इसके अलावा छोटा गणेश और बड़ा गणेश की स्थापना के साथ ही लोक गीतों में ‘सा लो गजानन....’ लोक गीत पुराने समय से लोकप्रिय रहा है।
भगवान गणेश जीवन पद्धति के सभी सूत्रों में सर्वप्रथम ही हैं। घर में कैसा भी कार्यक्रम हो, वाग्वर प्रदेश में यह परिपाटी चली आ रही है कि सबसे पहली निमंत्रण पत्रिका गणेशजी को समर्पित की जाती है और भगवान के सम्मुख पीले चावल रख कर ‘गणपति बावसी’ को न्यौता जाता है।
विश्वास है कि इससे सारी बाधाएं अपने आप दूर हो जाती हैं और सब कार्य निर्विघ्न एवं सहज स्वाभाविक तौर पर सम्पन्न हो जाते हैं।
हर मन्दिर में गणेशजी का स्थान अहम् होता है। शिव परिवार का सदस्य होने की वजह से शिवालय में उनका स्थान दाहिनी ओर निर्धारित है और गणेशजी की विशिष्ट पूजा वहां होती है। क्षेत्र के जैन मन्दिरों में भी गणेश मूर्तियां प्रमुखता से पूजी जाती हैं।।
यहां कई सिद्ध साधक हुए हैं जिन्होंने अर्क की गणेश प्रतिमा की साधना की और प्राप्त शक्तियों का उपयोग लोक कल्याण के कार्यों में किया। गणेश मूर्ति के अभाव में सुपारी या मिट्टी के ढेले में गणेशजी का आवाहन कर पूजन किया जाता है। वनवासियों में गणेश जी को ‘तोन्दिया बावसी’ भी कहा जाता है।
‘कलौ चण्डी विनायकौ’ की शास्त्रीय उक्ति के अनुसार कलियुग में गणपति उपासना सद्यः फलदायी मानी गई है। अपने मनोरथ सिद्ध करने के लिए समूचे वाग्वर प्रदेश में विनायक पूजा की पुरातन परम्पराएं विद्यमान रही हैं।
इनमें सूर्यग्रहण काल में महानदियों में कमर तक पानी में खड़े रहकर गणपति अथर्वशीर्ष के जप के अलावा दूर्वांकुरों, लाजा, मोदक आदि अर्पित कर अभिषेकादि क्रियाएं की जाती हैं।
क्षेत्र के पशुपालक आज भी जब-जब मक्खन मथ कर घी निकालते हैं, सबसे पहले इस घी से भगवान श्री गणेश का अभिषेक करते हैं और इसके बाद ही घी को उपयोग में लेते हैं। ऐसा विश्वास है कि इससे पशुधन की अभिवृद्धि और स्वास्थ्य रक्षा होती है तथा विघ्नराज प्रसन्न रहते हैं। ऐसी ही अनेकानेक परम्पराएं यहां चली आ रही हैं।
वाग्वर प्रदेश में गणेश उपासना देश भर में अपना विशिष्ट स्थान रखती हैं। गणेश उपासना की सनातन परम्पराओं के साथ विघ्नराज को रिझाने की परिपाटी वनांचल में जाने कितनी सदियों से चली आ रही हैं।

सिद्धि प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम गणेश उपासना अनिवार्यलौकिक एवं पारलौकिक लक्ष्यार्जन में सहायक है गणपति साधनासाधना के जरि...
18/09/2026

सिद्धि प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम गणेश उपासना अनिवार्य

लौकिक एवं पारलौकिक लक्ष्यार्जन में सहायक है गणपति साधना

साधना के जरिए ईश्वर की कृपा प्राप्ति और साक्षात्कार के मुमुक्षुओं के लिए गणेश उपासना नितान्त अनिवार्य है। इसके बगैर न तो जीवन में सफलता पाई जा सकती है और न ही साधना में कोई सिद्धि पाना संभव हो पाता है।

श्रीगुरु चरणों की अनुकम्पा प्राप्त कर साधना-पथ की ओर अग्रसर होने वाले साधकों के लिए महागणपति की साधना नितान्त आवश्यक है, क्योंकि जिस मार्ग पर चलकर हमें अपने लक्ष्य तक पहुँचना है, उसमें आने वाले विघ्नों, अपसारण तथा कण्टकाकीर्ण पथ को कुसुम-कोमल बनाने के लिए भगवान गणपति का मंगलमय आशीर्वाद प्राप्त कर लेना साधक का सर्वप्रथम कर्तव्य बन जाता है।

सर्वप्रथम पूजे जाने वाले मंगलमूर्ति भगवान श्रीगणेश के पूजन-अर्चन से ही सभी प्रकार की गतिविधियों की शुरुआत आदिकाल से होती रही है। किसी भी प्रकार की साधना हो, गणेशजी का स्मरण करने के बाद ही उसकी सारी प्रक्रिया आरम्भ होती है।

साधक को साधना-काल में भी किसी प्रकार के आकस्मिक विघ्न उपस्थित हो जाने पर भगवान गणपति की मामूली साधना और स्मरण कर लेना चाहिए।

गणपति केवल विघ्न दूर करने वाले देव ही नहीं हैं, वरन् ऋद्धि-सिद्धि के दाता, विद्याप्रदाता, मांगलिक कार्यों के पूरक, संग्राम-संकट के निवारक तथा सर्वविध मंगलकारी हैं। योगिक साधना की पूर्ति में भी महागणपति की कृपा प्राप्ति अत्यावश्यक है।

गणेश उपासना पुरातन काल से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण रही है और इसीलिए सभी प्रकार की उपासना-पद्धतियों में गणेशजी पर विस्तार से जानकारी का समावेश है।

गणेश उपासना के पुरातन महत्त्व और उपासना-पद्धति पर विचार करें तो रुद्रयामल सहित अनेक तन्त्रग्रन्थों में गणेश उपासना के अनेक प्रकार वर्णित हैं। स्वतंत्र देव के अतिरिक्त इन्हें षट्कुमार, पंचबालक, सप्तबालक आदि गणों में भी सम्मिलित माना गया है।

गणपति की साधना के अनेक प्रकार हैं। पार्थिव गणेश प्रयोग 42 दिन तक किया जाता है। गणपति तर्पण प्रयोग भी अपने आप में अनेक कामनाओं की पूर्ति करने वाला है।

गणेश उपासना के अन्य प्रयोगों में एकाक्षर गणेश, हरिद्रा गणेश, विरिञ्चि विघ्नेश, शक्ति गणेश, चतुरक्षर सिद्धि गणेश, लक्ष्मी गणेश, क्षिप्रप्रसादन गणेश, हेरम्ब गणेश, सुब्रह्मण्यम् गणेश, वक्रतुण्ड गणेश, उच्छिष्ट गणेश आदि के प्रयोग अति महत्त्वपूर्ण हैं।

इन मन्त्रों के जाप, हवन और तर्पण के प्रयोगों के माध्यम से षट्कर्म-सिद्धि, तिलक-सिद्धि, अणिमादि अष्टसिद्धि तथा स्वर्ण, यश, लक्ष्मी आदि की प्राप्ति के उपाय भी बताए गए हैं। इन्हीं में चूर्ण-साधन, धूप-साधन, यन्त्र-धारण एवं निर्माण आदि विद्याएँ भी सम्मिलित हैं।

पृथक-पृथक कार्य-साधन के लिए गणेशजी की विविध पदार्थों की मूर्तियों के निर्माण का विधान है। गणपति उपासना में तर्पण पर विशेष ध्यान दिया जाता है, क्योंकि गणपति को तर्पण प्रिय है।

पौराणिक उक्ति ‘कलौ चण्डी विनायकौ’ के अनुसार कलियुग में गणेश साधना का खास महत्त्व है। कलियुग में गणेशजी एवं चण्डी की साधना तत्काल कार्य सिद्ध करने वाली मानी गई है।

गणपति की साधना गुरु या विद्वान ब्राह्मण से पूर्ण रूप से समझकर करने से सभी कार्यों की शीघ्र सिद्धि होती है। किसी भी प्रकार की कोई साधना करनी हो, उसमें सबसे पहले गणपति साधना का अवलम्बन जरूरी है। इसके बगैर सिद्धि या कामनापूर्ति होना संभव है ही नहीं।

विशिष्ट साधनाओं के लिए पृथक-पृथक गणेश हैं, जिनसे होकर ही उस विशिष्ट देवी या देवता के मार्ग तक पहुँचा जा सकता है। सामान्य स्थितियों में सनातन परम्परा के अन्तर्गत पंचदेवोपासना में भी गणेश उपासना अनिवार्य है।

गणेशजी की कृपा प्राप्ति के इच्छुक व्यक्ति को चाहिए कि वह गणेशजी के किसी भी छोटे से नाम, मन्त्र या स्तोत्र का अधिक से अधिक जप करे तथा मूलाधार चक्र में गणेशजी के विराजमान होने का स्मरण हमेशा बनाए रखे। इससे कुछ ही दिनों में गणेशजी की कृपा का स्वतः अनुभव होने लगेगा।

वर्तमान का बहुत बड़ा सच-  भरोसेकाबिल नहीं हैं ये मूर्तियाँ, कब तक ढोते रहें इन्हें, जितना जल्द हो इनका विसर्जन करोमूर्तिय...
18/09/2026

वर्तमान का बहुत बड़ा सच- भरोसेकाबिल नहीं हैं ये मूर्तियाँ, कब तक ढोते रहें इन्हें, जितना जल्द हो इनका विसर्जन करो

मूर्तियाँ दर्शनीय रही हैं, आज भी हैं और रहेंगी। इनमें ईश्वर तत्त्व किस मात्रा में है या नहीं, यह उनकी प्राण-प्रतिष्ठा की सफलता पर निर्भर करता है। इनमें मूर्ति होने के गुणधर्म हों या न हों, ये दर्शनीय तो हैं ही।
लोग श्रद्धा और आस्था के साथ इनके पास आते हैं, चढ़ावा चढ़ाते हैं, आरती उतारते हैं, परिक्रमा करते हैं और इन्हें खुश करने के लिए छप्पन भोग, समस्त विलास और जात-जात के नैवेद्य चढ़ाते हैं, प्रसाद बाँटते हैं और आत्म मुग्ध होते हैं, जैसे कि उन्होंने सब कुछ पा लिया।
यह तो देवी-देवता हैं जो कि किसी का कुछ भी ऋण अपने पास नहीं रखते। इनके प्रति श्रद्धा हो तो ‘भावो हि विद्यते देव’ को साकार करते हुए श्रद्धालुओं के भीतर अपार आत्मविश्वास जगाते हुए संकल्प और मनोकामनाओं को पूर्ण कर देने में कभी पीछे नहीं रहते।
भक्तों और दर्शनार्थियों की ही बात नहीं, उन सभी की सुनते हैं जो उनके करीब होते हैं। जो उनके पास नहीं आकर भी उनके प्रति दूरवर्ती श्रद्धा रखते हैं और उन्हें मानते हैं।
यह तो बात हुई देवी-देवताओं की। इन्हीं की तरह सिद्ध, यक्ष, गंधर्व, भूत-प्रेत, पिशाच, पितर और दूसरी दिव्य योनियों वाले भी सबकी सुनते हैं। लेकिन इन सभी से इतर हजारों-लाखों मूर्तियाँ ऐसी भी हैं जो भगवान की तरह पूजने-पूजवाने, भोग-विलास पाने, जमाने भर का सुख लूटने और अपने आपको महा प्रतिष्ठ मानकर जिन्दगी जीने के आदी होते हैं। अपनी छद्म महानता भरी छवि को हर क्षण बनाए रखने के लिए ये हमेशा सारी ताकत झोंकते रहते हैं।
हर समाज, क्षेत्र और देश में इन मूर्तियों की अपार भरमार है जिन्हें लोग बड़ी ही श्रद्धा और आदर देते हैं, सम्मान, अभिनंदन, पुरस्कार, शाल, साफों से नवाजते हैं, उनके आगे-पीछे घूमते हैं और जयगान करते हैं, मंचों पर अतिथियों के रूप में सुशोभित करते हैं और वह सब कुछ करते हैं जो इन्हें पसंद आता है।
और यह सब कुछ लोग इस उम्मीद से करते हैं कि कभी ये हमारे किसी काम आएंगे अथवा हमारे किसी काम में कभी बाधक नहीं बनेंगे। कुछ लोग इनके श्वेत-श्याम व्यक्तित्व से अनभिज्ञ होते हैं इस कारण इनके प्रति भ्रमित रहकर बहुत बड़े-बड़े भ्रम पाल लिया करते हैं।
इनके अलावा बहुत सारे लोग भोले और सरलमना होते हैं इस कारण इनके कृत्रिमता से भरे मोहक आभा मण्डल के मोह पाश में बंधे रहते हैं।
इन बेचारों को पता भी नहीं होता कि ये जिनके भक्त बने हुए फिर रहे हैं, अपने घी-तेल और बाती से आरती उतार रहे हैं, अपना डिजल-पेट्रोल फूंक कर जिनके पीछे-पीछे चलते हुए पागल हुए जा रहे हैं, जिनके दावों, वादों और आश्वासनों से इनके आत्मीय और करीबी होने का भरम पाले हुए इतरा रहे हैं, वे मूर्तियां केवल और केवल दर्शनीय हैं और खुद के लिए ही सभी प्रकार के भोग-उपभोग, विलास-महाविलास, रास-रंग और आनंद के लिए समर्पित हैं।
इन्हें अपने सिवा कोई दिखता ही नहीं। ज्यों-ज्यों इनकी महिमा गान करने वालों की भीड़ बढ़ती जाती है, चरण स्पर्श करने वाली भेड़ों की रेवड़ की लम्बाई बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों इनका अहंकार सातवें आसमान से ऊपर चढ़ने लगता है।
और इसी अनुपात में ये और अधिक शोषक,पाखण्डी, आडम्बरी और कृत्रिम होते जाते हैं तथा लोगों को भरमाने के अभिनय में पारंगत होते चले जाते हैं। कहना न होगा कि इस मामले में इन लोगों ने बहुरूपियों, स्वांगियों और वृहन्नलाओं को भी काफी पीछे छोड़ दिया है।
कुल मिलाकर हम बात कर रहे हैं उन इंसानों की जो अपने आपको भगवान से कम नहीं समझते और खुद किसी कल्पवृक्ष की तरह सब कुछ दे डालने का भ्रम पैदा किए रखते हैं। दूसरे क्षेत्रों को छोड़ भी दिया जाए, तो आजकल सामाजिक क्षेत्रों में ऐसे लोगों की भरमार है जो स्वयंभू हैं और चाहते हैं कि जब तक जीयें तब तक उन्हीं की तूती बोलती रहे।
विभिन्न समाजों में ऐसी मूर्तियाँ असंख्य हैं। सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक मंचों से लेकर रचनात्मक समाज सेवा का कोई सा क्षेत्र ऐसा नहीं बचा है जहाँ इन मूर्तियों का जबर्दस्त प्रभुत्व नहीं हो।
इन लोगों के सामाजिक सरोकार सिर्फ प्रतिष्ठा पाने, समाजजनों को भ्रमित करने, मंचों पर अतिथियों के रूप में फबे रहने और अपनी छवि की सर्वश्रेष्ठता बरकरार रखने तक ही सीमित रहते हैं।
इनकी सामाजिक सेवाओं और समाज निर्माण में भागीदारी का निरपेक्ष मूल्यांकन किया जाए तो यही बात सामने आएगी कि ये केवल मूर्तियां हैं जिन्हें अच्छे मंच, आदर-सम्मान और अभिनंदन की दरकार है, इसके सिवा समाज के लिए योगदान के नाम पर ये न कुछ करते हैं, न कुछ कर पाने का माद्दा या उदारता ही इनमें होती है।
ये मूर्तियाँ केवल दर्शनीय हैं और रहेंगी। किसी के लिए उपयोगी नहीं हो सकती। बावजूद इसके भोले-भाले या भ्रमित लोग इन्हें नियंता, भाग्यविधाता, मार्गदर्शक और सहयोगी मानकर पूजते रहते हैं।
हमारी बहुत सारी पीढ़ियाँ ऐसी मूर्तियों के कारण भ्रमित होती रहकर बिना किन्हीं उपलब्धियों के काल-कवलित हो गई, बहुत सारी प्रतिभाएं इनसे प्रोत्साहन, मार्गदर्शन और सहयोग की आशा-आकांक्षाएं लिए अपने अरमानों को दफन होते देखती रहकर अन्ततोगत्वा समाप्त हो गई।
समाज के नवनिर्माण, विकास और कुरीतियों के उन्मूलन के स्वप्नों को लेकर इनसे आशान्वित खूब सारे लोग इनसे निराश होकर चुपचाप बैठ गए और असंख्य लोग ऐसे हैं जो इन मूर्तियों की उदासीनता, नालायकी और निकम्मेपन को कोसते हुए जीने को विवश हैं।
ढेरों ऐसे भी हैं जो दूसरों की देखादेखी इन मूर्तियों के पीछे पागल हुए जा रहे हैं। मतलब यही कि ये मूर्तियाँ न किसी काम की हैं, न पूजने लायक। बावजूद इसके हम इनके पीछे दीवाने होकर पड़े हुए हैं। और वह भी केवल इसलिए कि इनसे किसी न किसी प्रकार का स्वार्थ या भय का संबंध होता है।
इन निकम्मी मूर्तियों की वजह से समाज की असली प्रतिभाएँ, श्रेष्ठ व्यक्तित्व और दिव्य विचारधाराओं वाले रचनात्मक लोग हाशिये पर हैं क्योंकि जब तक ये नाकारा मूर्तियाँ भस्मीभूत नहीं हो जाएंगी तब तक पूरे समाज को इन्हें झेलना ही पड़ेगा।
समाज के लिए कुछ कर सकने का माद्दा रखने वाले नए और बहुआयामी प्रतिभाशाली लोग कभी भी आगे नहीं आ पाएंगे। और जब तक ये ढपोड़शंखी मूर्तियाँ मर नहीं जाती, तब तक कुछ बदलाव आ नहीं आ सकता।
फिर कुर्सियों, मंचों और अभिनंदन के इन भूखे भेड़िया छाप और सियार ब्राण्ड लोगों का क्या भरोसा, मरने के बाद भी कहीं ये प्रेत योनि पाकर हमारे बीच न आ धमकें, यह आशंका भी अब बलवती होती जा रही है क्योंकि नाम, तस्वीरों और मंच पिपासुओं का मोक्ष सौ जन्मों में भी नहीं हो सकता, इस बात की पक्की गारंटी है।
इन सभी बातों पर यकीन न हों तो अपने समाज के उन लोगों के सामाजिक योगदान को देख लें जो स्वयंभू एवं स्वघोषित लोकप्रिय मूर्तियां हैं और हर मंच पर सुशोभित हो जाती हैं।
ये मूर्तियाँ केवल भाषण देना और समाजजनों को भ्रमित करना जानती हैं और इनके जीवन का एकसूत्री एजेण्डा यही है कि ये किसी न किसी तरह लच्छेदार बातें कर मनमोही सब्जबाग दिखा कर अपने आपको शिखर पर प्रतिष्ठित किए रहें।
समाज के प्रति इनके योगदान को देखें तो ये लोग अपनी ओर से न पर्याप्त समय दे पाते हैं न वित्तीय मदद। ये लोग समाज के समृद्धजनों में गिने जाते हैं लेकिन समाज के लिए धेला भर सहयोग नहीं करते।
जो समय नहीं दे सकते हैं उन सभी धन कुबेरों को चाहिए कि वे समाज के लिए अपेक्षित धनराशि का सहयोग दें, लेकिन वे ऐसा कभी नहीं कर पाते।
इन लोगों को केवल पद-प्रतिष्ठा, मंच-लंच-डिनर और अभिनंदन से ही मोह होता है, समाज के लिए कुछ भी देने की उदारता के बीज इनके डीएनए में नहीं होते।
जिन लोगों के पास समय है उन्हें समाज के लिए पर्याप्त समयदान करना चाहिए लेकिन इन आलसी और दरिद्री लोगों को फालतू की चर्चाओं, सोने-सुस्ताने और आलस्य में ही समय गँवाने से फुर्सत नहीं है।
बहुत से स्वयंभू लोग अपने आप में कुछ नहीं होते मगर किसी न किसी का पिछलग्गू हो जाते हैं, दुम हिलाजे हुए बड़े लोगों की चरण वन्दना और जयगान में रम जाते हैं और उन्हीं के आगे-पीछे रहते हैं। पर ये वहां भी किसी के काम नहीं आ सकते। ये अपने ही स्वार्थ पूरे करने में लगे रहते हैं।
ये तमाम दर्शनीय मूर्तियाँ दिखती बड़ी सुन्दर, भव्य और आकर्षक हैं लेकिन इन सभी के भीतर चतुराई, स्वार्थ, शातिरी, आडम्बर, पाखण्ड, स्वाँग और उच्चाकांक्षाओं के जाने कितने ऐसे शैतान छिपे हुए रहते हैं जिनकी थाह पाना हर किसी के बस में नहीं होता।
यों देखा जाए तो ये सारी मूर्तियाँ पुरातत्व संग्रहालय के शो केस में नजरबंद कर दिये जाने लायक हैं। पता नहीं हम इन्हें ढोये रहकर क्यों अपने समाज, क्षेत्र और देश का बंटाढार करने में तुले हुए हैं। समस्त स्वयंभू और नाकारा मूर्तियों के प्रति कृत्रिम श्रद्धा और आस्था भाव से नमन।

महापाप और देशद्रोह ही है दुष्टों को क्षमा करना...आखिर क्यों किया जाए क्षमा ? औपचारिकता का निर्वाह मात्र होकर रह गया है क...
18/09/2026

महापाप और देशद्रोह ही है दुष्टों को क्षमा करना...
आखिर क्यों किया जाए क्षमा ? औपचारिकता का निर्वाह मात्र होकर रह गया है क्षमा मांगना

गलती या दुष्टता नहीं दोहराने की शर्त पर ही क्षमा किया जा सकता है। एक दिन क्षमा मांग लो। और फिर साल के लिए अक्षम्य अपराध करते रहो, इस तरह किसी को भी दुष्टताओं की गारंटी नहीं दी जा सकती।
क्षमा पश्चाताप के साथ प्रायश्चित भी है। इस देश में जब-जब भी दुष्टों को क्षमा किया गया, तब-तब समाज और देश को पीढ़ियों तक इसका खामियाजा भुगतना पड़ा है। पृथ्वीराज चौहान का मामला हो या फिर और कोई सा ऎतिहासिक कालचक्र।
अगर हम बिना किसी गलती के क्षमा मांगने की नौटंकी करते हैं तो इसका सीधा सा अर्थ है कि हम औपचारिकता का निर्वाह कर रहे हैं, सामने वालों को उल्लू समझ रहे हैं।
क्षमा मांगने का दूसरा अर्थ यह भी है कि हमें अपने बारे में भान ही नहीं है कि हम कौनसी गलती कर चुके हैं या किस गलती के लिए क्षमा मांग रहे हैं।
बहुत से हैं जो क्षमा मांगने के उपरान्त गलतियों के दोहरान से बचते रहते हैं किन्तु इनसे अधिक संख्या में वे लोग हैं जो क्षमा मांग लेने के उपरान्त भी वही की वही गलतियाँ बार-बार दोहराते रहते हैं।
एक दिन या एक बार क्षमा मांग लेंगे और फिर साल भर के लिए गलतियां करते रहेंगे, जैसे कि उन्हें गारंटी ही मिल गई हो। एक दिन क्षमा मांग लेने के बाद दूसरे दिन से ही दुष्टताओं का सिलसिला दिखने लग जाता है।
दुष्टों को क्षमादान देने के कारण ही समाज और देश का सदियों से जो नुकसान होता रहा है उसका खामियाजा हम भी भुगत रहे हैं और हमारी आने वाली पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ेगा।
ईश्वर उन सभी को क्षमा करे जो यह नहीं जानते कि अपनी किन-किन गलतियों के लिए क्षमा मांग रहे हैं।
ईश्वर उन लोगों को भी क्षमा करे जो यह तक नहीं जानते कि सामने वाला किस गलती के लिए क्षमा मांग रहा है।
और ईश्वर उन सभी को क्षमा करे जो क्षमा मांगने और देने की औपचारिकताओं का निर्वाह करने के आदी हो चुके हैं।
वे सभी लोग धन्यवाद, बधाई और सराहना के पात्र हैं जो एक बार क्षमा मांग लेने के बाद जीवन पर्यन्त कोई दूसरी गलती नहीं करते।
असल में ये ही लोग हैं जिन्हें क्षमा किया जाना चाहिए। अन्यथा.....।

गंभीर चिन्तन - कितने फीसदी इंसान रह गए हैं हम?किसी जमाने में हम इंसान थे, अब केवल इंसानी खोल ही नज़र आता है, इंसानियत के ...
18/09/2026

गंभीर चिन्तन - कितने फीसदी इंसान रह गए हैं हम?

किसी जमाने में हम इंसान थे, अब केवल इंसानी खोल ही नज़र आता है, इंसानियत के कतरे गायब होते जा रहे हैं।
हमारे भीतर अब बीते युगों के तमाम राक्षस और सभी हिंसक जानवरों के लक्षण दिखने लगे हैं।
एक तरह से हम सारे ही अघोषित पिशाच होते जा रहे हैं जिनमें आधे गुण असुरों के हैं, और आधे असुरों के।

इंसानों की विस्फोटक भीड़ से गायब होती जा रही है इंसानियत ...अक्सर सुनने को मिलता है - बाप-दादा, पूर्वज कैसे थे, और इनकी य...
18/09/2026

इंसानों की विस्फोटक भीड़ से गायब होती जा रही है इंसानियत ...

अक्सर सुनने को मिलता है - बाप-दादा, पूर्वज कैसे थे, और इनकी ये संतति कैसी है।
नालायक, भ्रष्ट, मुफ्तखोर, झूठी, झूठन चाटने, खुरचने और चूसने वाली संतति की हरकतों, अधर्माचरण और पैशाचिक वृत्तियों को देखकर पितर भी हैरान-परेशान हैं कि आखिर कहां क्या गड़बड़ी हुई।
खान-पान का असर है या मैन्युफेक्चरिंग डिफैक्ट, या फिर भिखारियों, पराश्रितों और परजीवियों की तरह रहकर हरामखोरी, लूट, खसोट और भ्रष्टाचार से परिपृष्ट हो रहा शरीर।
पता नहीं डीएनए में मूर्खता, अंधानुचरी और मुफ्तखोरी कैसे आती जा रही है।
हमारे आस-पास और साथ वालों में भी खूब सारे हैं जो चोर-डकैतों और भिखारियों की तरह बर्ताव करते रहे हैं, सब कुछ होते हुए भी रोते रहते हैं, नीच भिखारियों जैसी जिन्दगी जी रहे हैं।

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