15/06/2026
बारहमासी झरनों का क्या कहना?
खुद भी निहाल, आस-पास और साथ वालों पर भी साल भर सुकून की बरसात,
यहां हमेशा रहता है सुकाल, इनकी डिक्शनरी में नहीं है ‘अकाल’ शब्द
ऐसे कद्दावर नेता अब कहाँ रहे? अब तो खुद्दारी की बजाय उगाही और जमाखोरी से लेकर अपनी-अपनी समृद्धि के पहाड़ों की ऊँचाई से कद नापा जाता है। खोटी चवन्नियों के चलने और खनकार की ध्वनियों से मापी जाती है प्रतिष्ठा। धौंस और धींगामस्ती, ट्रांसफर-पोस्टिंग की क्षमताओं और एकतरफा आवक के वेग से तय होता है वजूद।
#