13/05/2026
*इस्लाह करने वाले?*
सबसे खतरनाक दुश्मन वह नहीं जो बाहर से हमला करे, बल्कि वह है जो मुसलमान होने का दावा करके अंदर से इस्लाम की बुनियाद खोखली करे!
*और जब उनसे कहा जाता है कि ज़मीन में फसाद (बिगाड़) न पैदा करो, तो वे कहते हैं कि हम तो केवल इस्लाह (सुधार) करने वाले हैं।*
— सूरह अल-बकराह (2:11)
तफ़सीर और हकीकत:
अल्लाह तआला ने सूरह अल-बकराह की इस आयत में मुनाफ़िक़ों (दोगले लोगों) के उस खतरनाक रवैये को बेनकाब किया है, जो इस्लाम के नाम पर फसाद फैलाते हैं। *यह आयत काफ़िरों के बारे में नहीं,* बल्कि उन लोगों के बारे में नाज़िल हुई थी जो *ज़ाहिरी तौर पर मुसलमान होने का दावा करते थे, मगर उनका असल मक़सद दीन में बिगाड़ पैदा करना था।*
आज के दौर का आईना:
आज भी यह आयत उन गुमराह लोगों पर बिल्कुल फिट बैठती है जो खुद को मुसलमान कहते हैं, लेकिन उनका हर अमल दीन के खिलाफ है:
* कुरान में तहरीफ़ (बदलाव): जो लोग अल्लाह की किताब को झुठलाते हैं, और अलग क़ुरआन पर यकीन करते हैं!
* सहाबा (रज़ि.) पर लान-तान: जो लोग उन मुक़द्दस हस्तियों को निशाना बनाते हैं जिन्होंने इस्लाम की बुनियाद रखी।
* मुसलमानों पर हमले: जो मुसलमान होने का दावा करते हुए भी मासूमों और अपने ही भाइयों पर ज़ुल्म व सितम और मिसाइलें बरसा रहे हैं।
यह वही 'मुनाफ़िक़ाना' चाल है जिसका ज़िक्र 1400 साल पहले क़ुरआन ने किया था। जब उन्हें टोका जाता है, तो वे कहते हैं, "हम तो इस्लाह (सुधार) कर रहे हैं।" असल में, दीन के नाम पर बिगाड़ पैदा करने वाले ये लोग खुद को सुधारक बताकर लोगों को धोखे में रखते हैं।
अल्लाह हमें ऐसे फितनों से महफूज़ रखे।
आमीन