19/05/2026
# # सत्यनाम धर्म की विजय: जब दिल्ली दरबार में चमकी कोटवा धाम की ज्योति
**जय हो समर्थ स्वामी जगजीवन दास साहब!**
**जय हो श्री कोटवा धाम की!**
**श्री कोटवा धाम जगत से न्यारा...**
यह पावन प्रसंग उस ऐतिहासिक काल का जीवंत प्रतीक है, जब सत्यनाम धर्म की कीर्ति और उसकी आत्मिक शक्ति का डंका दिल्ली सल्तनत के राजदरबार में बजा था।
# # # दिल्ली सल्तनत की चुनौती
यह उस समय की बात है जब दिल्ली के सिंहासन पर मुगल शासक औरंगजेब का शासन था। वह अपनी धार्मिक कट्टरता के लिए जाना जाता था और अक्सर विभिन्न धर्मावलंबियों, संतों और फकीरों की परीक्षाएं लेता रहता था। जरा सा भी आडंबर या पाखंड दिखने पर वह उन्हें कठोर दंड देता था।
इसी क्रम में, महाप्रभु जगन्नाथ स्वामी के साक्षात अवतार, **समर्थ सरकार स्वामी जगजीवन दास साहब** की ख्याति जब दिल्ली तक पहुंची, तो औरंगजेब ने उन्हें एक संदेश भेजा। संदेश में एक बड़ी चुनौती और प्रस्ताव था: *“या तो दिल्ली दरबार में आकर कुछ शर्तों के साथ अपने सतनाम धर्म को सिद्ध करो, या फिर हमारी शरण में आ जाओ।”*
# # # गुरु का आदेश और शिष्य का संकोच
शांति और परमार्थ के प्रतीक स्वामी जगजीवन दास साहब ने इस संदेश पर गंभीर विचार किया। उन्होंने स्वयं जाने के बजाय अपने बड़े भाई के पुत्र और परम प्रिय शिष्य, **साहब अहलाद दास जी** को दिल्ली भेजने का निर्णय लिया।
जब यह आदेश हुआ, तो युवा अहलाद दास जी के मन में स्वाभाविक संकोच और संशय जाग उठा। उन्होंने अत्यंत विनम्रतापूर्वक अपने गुरुदेव के चरणों में शीश नवाकर कहा:
“हे प्रभु! दिल्ली दरबार में बड़े-बड़े सिद्ध और फकीर बैठे हैं। मैं एक बालक, भला उस शाही दरबार में उन नामचीन फकीरों के सामने अपने धर्म को कैसे सिद्ध कर पाऊंगा?”
समर्थ साहब ने मंद-मंद मुस्कुराते हुए उनके सिर पर अपना वरदहस्त रखा और सांत्वना देते हुए कहा:
“पुत्र! तुम जरा सी भी चिंता न करो। वह परमपिता परमेश्वर हम सबकी रक्षा करता है। तुम केवल सत्य के मार्ग पर अडिग रहो और मेरी आज्ञा मानकर वहां प्रस्थान करो।”
गुरु के इन वचनों ने अहलाद दास जी के भीतर अदम्य साहस और अटूट विश्वास फूंक दिया। वे बिना किसी भय के दिल्ली दरबार की ओर चल पड़े।
# # # दिल्ली दरबार और फकीर की करामात
जब साहब अहलाद दास जी दिल्ली दरबार में पहुंचे, तो वहां का दृश्य अत्यंत वैभवशाली और गंभीर था। तत्कालीन मुगल शासक अपने ऊंचे सिंहासन पर विराजमान था। उसके पास ही ईरान से आया एक अत्यंत अभिमानी और चमत्कारी फकीर भी बैठा था।
शासक ने अहलाद दास जी की ओर इशारा करते हुए उस फकीर से कहा, “यह बालक सरदहा धाम से आया है और 'सत्यनाम' का उच्चारण करता है। आपको इसकी और इसके धर्म की परीक्षा लेनी चाहिए।”
राजा का संकेत पाते ही, उस ईरानी फकीर ने अपने अहंकार और सिद्धियों का प्रदर्शन करना शुरू किया। उसने अपनी झोली से एक चादर निकाली और उसे हवा में लहराते हुए ऊपर फेंक दिया। वह चादर किसी जादुई कालीन की तरह हवा में तैरने लगी। फकीर हवा में उछला और उस उड़ती हुई चादर पर जा बैठा।
वहां मौजूद सभी दरबारी आश्चर्यचकित रह गए। हवा में तैरती चादर से फकीर ने नीचे खड़े साहब अहलाद दास जी को हीन भावना से देखा और चुनौती देते हुए बोला:
“अगर तुम्हारे सतनाम धर्म में जरा सी भी सच्चाई है, तो अपनी शक्ति दिखाओ और ऊपर आकर मेरे बराबर बैठो!”
# # # सत्यनाम का स्मरण और आडंबर का अंत
दरबार में सन्नाटा छा गया। सब कौतूहल से अहलाद दास जी को देखने लगे। लेकिन कोटवा धाम के इस सच्चे सिपाही के चेहरे पर जरा सा भी भय नहीं था। उन्होंने शांत मन से अपने गुरुदेव, समर्थ स्वामी जगजीवन दास साहब का ध्यान किया और हृदय से 'सत्यनाम' का महामंत्र जपा।
जैसे ही अहलाद दास जी ने अटूट गुरु-भक्ति के साथ अपनी दृष्टि ऊपर आकाश की ओर उठाई, वैसे ही एक चमत्कार हुआ! गुरु कृपा की दिव्य ऊर्जा से वह हवा में उड़ती हुई चादर धू-धू कर जलने लगी।
अहंकार की वह चादर देखते ही देखते राख में बदलने लगी और वह अभिमानी फकीर अपनी जान बचाने के लिए चिल्लाता हुआ सीधे जमीन पर आ गिरा। उसने संभलकर दोबारा प्रयास किया, अपनी सिद्धियां लगाईं, किंतु हर बार गुरु-कृपा की उस अदृश्य अग्नि के सामने उसकी कला निष्प्रभ रही और वह बार-बार जमीन पर गिरता रहा।
# # # सत्य की विजय और हृदय परिवर्तन
अंततः, उस फकीर का सारा अभिमान चूर-चूर हो गया। उसने अपनी पराजय स्वीकार की और साहब अहलाद दास जी के चरणों में शीश झुकाकर भरे दरबार में कहा:
“तुम सचमुच सत्य के सच्चे अनुयायी हो, और तुम्हारा यह सतनाम धर्म भी पूर्णतः सच्चा और अडिग है।”
यह केवल एक चमत्कार की हार नहीं थी, बल्कि आडंबर पर शाश्वत सत्य की विजय थी। इस घटना के बाद, वह ईरानी फकीर स्वामी जगजीवन दास साहब की महिमा से इतना प्रभावित हुआ कि वह बार-बार उनसे मिलने और आशीर्वाद लेने स्वयं **सरदहा धाम (कोटवा धाम)** आया। इस दिव्य शक्ति को देखकर फिर कभी किसी विदेशी आक्रमणकारी या सल्तनत ने कोटवा धाम की ओर आंख उठाने का दुस्साहस नहीं किया।
**साहेब सतनाम, सतनाम, सतनाम!**
**कोटवा धाम की जय!**
जय हो समर्थ स्वामी जगजीवन दास साहब की