05/06/2026
'पीटरहाफ' में एक पूरी सुबह, शिमला से संवाद न्यूज़ के साथी शरद मौर्य का डिस्पैच...
मेरे फोन की घड़ी में सुबह के पांच बजकर तीन मिनट हो रहे हैं. प्राणेश जी के खर्राटे कमरे में अब भी गूंज रहे हैं. मेरी नींद तो 2:05 पर ही खुल गई थी. उनके खर्राटों की वजह से नहीं. किसी गुजरी और नापसंद सी याद ने मुझे झकझोरा था. वह घटना, वह याद ... मैं उबरने या उससे पीछा छुड़ाने की कोशिश कहिए, फोन पर स्क्रोल करता रहा. यह मैं कभी बहुत देर कर नहीं पाया. आज भी नहीं. होटल पीटरहाफ के नीम अंधेरे कमरे में इस छोर से उस छोर तक भटकती मेरी निगाह ने अचानक पाया कि बिस्तर के ठीक सामने की खिड़की से उजाला सा मुझे घूर रहा है. मेरा चौंकना लाजिम था. क्योंकि कुछ पल पहले उसी खिड़की के पार दूर पहाड़ी तक का शून्य अंधेरे से भरा था. तस्दीक या शायद तसल्ली के लिए मैंने दाएं उस खिड़की की ओर नजर दौड़ाई जो छोटी सी बाल्कनी में खुलती है. खिड़की से लगा बाल्कनी में जाने के लिए दरवाजा भी है. आधे खुले परदों की वजह से नजर ने पाया उजाले की वही आंखें मुझे वहां से भी घूर रही हैं. उजाले की इतनी भी आंखें हो सकती हैं ....मुझे अपनी सोच ने हैरान किया. असमय उठा देने वाली कुरूप सी वह याद अब कुतूहल में बदल चुकी थी. दूर पहाड़ी पर टिमटिमाते बिजली के बल्ब अब भी रोशन बिंदुओं की तरह चमक रहे थे. जैसे उन पहाड़ियों का श्रृंगार कर रहे हों. कुतूहल मुझे बाल्कनी में ले जाने पर आमादा थी पर मैं जानता था जरा भी खटपट प्राणेश जी के खर्राटों में खलल बन सकती है. उनकी आंख भी खुल सकती है. फिर भी खिड़कियों से झांकती उजली आंखों के आकर्षण से भला कब तक बचता. नींद तो पहले ही तिरोहित हो चुकी थी. प्राणेश जी को भनक न लगे इस एहतियात के साथ बिस्तर से उठा. दबे पांव दरवाजे तक पहुंचा. दरवाजे के खुलने में बाधक उसके बिल्कुल करीब रखे हीटर को धीरे से कुछ और दूर किया. दरवाजे की सिटकनी कम से कम आवाज करे, भरपूर सावधानी के साथ नीचे खिसकाई. सिटकनी थी, उसे किसी के सोने-जागने की परवाह तो थी नहीं, सो धीमी आवाज में ही आखिर उसकी चीख निकल ही पड़ी. यही कौशल अब मुझे बाहर की जाली वाले दरवाजे के साथ दिखाना पड़ा. बहरहाल, मैं बाल्कनी में आ चुका था. सारा राज खुल गया. वह आंखें भर न थीं, भोर के उजाले का अस्तित्व दूर पहाड़ी से लेकर होटल की जड़ तक फैला था. उजाले से ऊपर घने काले और कहीं ग्रे कलर के बादलों की मोटी परत छाई थी. सिहरा देने वाली बयार भी गुनगुना रही थी. कल दिन में एक घंटे में हुई करीब 33 मिलीमीटर बारिश जो हुई थी. मौसम विभाग के अनुमान में तो आज भी बादलों का मूड वैसा ही रहने का है. प्रकृति की अनन्य सुंदरता हर ओर फैली है. अब तक तो अनजानी चिड़ियों की आवाजें भी बैकग्राउंड म्यूजिक की तरह बजने लगी थीं. मंत्रमुग्ध मन किसी रंगमंच पर मानो हर पल बदल रहे रंगदीपन के कौशल का चितेरा बना हुआ था.
सारी दुनिया में मशहूर सुबहे-बनारस को सालों देखते और जीती आईं आंखें हिमाचल की धरती पर उतरती इस सुबह की मादक चाल पर सम्मोहित थीं. यह तंद्रा टूटी तो फोन फोटो और वीडियो बनाने के काम आ गया.
हां, मुझे लगा कि बनारस में रहते हम इतने मस्त क्यों थे. राजेंद्र प्रसाद घाट से नाव लेकर गंगा पार जाना, तैरना और निकलने से पहले वापस घाट पर आकर प्रणाम के साथ सूरज के स्वागत के लिए मौजूद रहना. यह सब इतनी ऊर्जा से भर देता था कि सारे काम करते हुए भी पूरा दिन हंसी-ठिठोली से भरा रहता. शायद प्रकृति से दूरी ही बुरी यादों को इतना साहस दे जाती है कि वे गहरी नींद में भी हमें झकझोर कर उठा पाती हैं. काश! कंक्रीट के जंगलों में रहते हुए भी हम सुबह के स्वागत के गीत गा सकते.... शायद शहरी अवसादों का यह इलाज प्रकृति ने हम सभी के लिए उपलब्ध करा रखा है. फिर भी हमारा हाल कुछ ऐसा है-
अब बू-ए-गुल न बादे- सबा मांगते हैं लोग
वो हब्स है कि लू की दुआ मांगते हैं लोग