26/03/2026
—कुछ आपबीती, कुछ जगबीती—
साप्ताहिक स्तंभ— याज्ञवल्क्य
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कठिन परिश्रम, त्याग और प्रयासों की निरन्तरता का परिणाम होती है सफलता
एक पत्रकार और जिज्ञासु के रूप में जब हम समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों से मिलते हैं—चाहे वे सफल हों, असफल हों या सफलता की ओर अग्रसर—तो उनके जीवन के अनुभव हमें एक गहरी सीख देते हैं। इन अनुभवों का सार यही होता है कि सफलता किसी एक दिन की उपलब्धि नहीं, बल्कि निरंतर किए गए प्रयासों, कठिन परिश्रम और अनेक त्यागों का संगठित परिणाम होती है।
सफल व्यक्तियों से बातचीत करने पर यह स्पष्ट होता है कि उनकी यात्रा कभी सरल नहीं रही। उनके जीवन में भी संघर्ष, असफलताएँ और निराशा के क्षण आए, परन्तु उन्होंने हार नहीं मानी। वे अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहे और हर बाधा को सीख में बदलते गए। उनके भीतर एक अदम्य विश्वास होता है कि यदि प्रयास लगातार जारी रखे जाएँ, तो सफलता अवश्य मिलेगी।
वहीं, जो लोग असफल रहे या अभी संघर्ष कर रहे हैं, उनकी कहानियाँ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। उनसे यह समझने को मिलता है कि केवल इच्छा या योजना पर्याप्त नहीं होती, बल्कि निरंतरता और धैर्य भी उतने ही आवश्यक हैं। कई बार लोग प्रारंभिक असफलताओं से निराश होकर प्रयास करना छोड़ देते हैं, जबकि सफलता उन्हीं के पास आती है जो बार-बार गिरकर भी उठते हैं।
त्याग भी सफलता की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। समय, आराम, और कई बार निजी इच्छाओं का त्याग किए बिना बड़े लक्ष्य हासिल नहीं किए जा सकते। सफल लोग अपने वर्तमान सुखों का त्याग करके भविष्य की सफलता की नींव रखते हैं। यह त्याग ही उनके प्रयासों को सार्थक बनाता है।
एक जिज्ञासु मन के लिए इन सभी अनुभवों से जुड़ना और समझना अत्यंत प्रेरणादायक होता है। यह हमें सिखाता है कि सफलता कोई संयोग नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है—जिसमें मेहनत, धैर्य, अनुशासन और निरंतरता का विशेष महत्व है। लोगों से मिलने— समझने के क्रम में यह मानने लगा हूं कि सफलता उन लोगों को ही मिलती है, जो अपने लक्ष्य के प्रति अडिग रहते हैं, निरंतर प्रयास करते हैं और कठिनाइयों से घबराकर पीछे नहीं हटते। इसलिए, यदि किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करनी है, तो हमें भी उसी दृढ़ता और समर्पण के साथ अपने मार्ग पर आगे बढ़ना होगा।
शक्ति की साधना से मिलती है सिद्धि
शक्ति की आराधना का पावन पर्व नवरात्रि अपने समापन की ओर अग्रसर है, लेकिन यह केवल नौ दिनों का अनुष्ठान नहीं—यह जीवन की एक स्थायी साधना का संकेत है। इन दिनों में हम जिस “शक्ति” की पूजा करते हैं, वह केवल देवी के रूपों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे भीतर विद्यमान उस ऊर्जा, साहस और संकल्प का प्रतीक है, जो हमें जीवन के संघर्षों में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
सफलता का कोई भी शिखर बिना शक्ति के प्राप्त नहीं किया जा सकता। परंतु यह समझना आवश्यक है कि शक्ति केवल शारीरिक सामर्थ्य का नाम नहीं है। यह मानसिक दृढ़ता, आत्मविश्वास, धैर्य, सकारात्मक सोच और निरंतर प्रयासों का सम्मिलित रूप है। महादेवी के विविध स्वरूप—दुर्गा, काली, लक्ष्मी, सरस्वती—हमें यही सिखाते हैं कि शक्ति बहुआयामी है। कभी वह साहस बनकर सामने आती है, कभी ज्ञान बनकर मार्गदर्शन करती है, तो कभी धैर्य बनकर हमें कठिन परिस्थितियों में स्थिर रखती है।
इतिहास ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहाँ लोगों ने शारीरिक सीमाओं के बावजूद अपनी आंतरिक शक्ति के बल पर असंभव को संभव कर दिखाया। इससे यह स्पष्ट होता है कि वास्तविक शक्ति बाहरी नहीं, बल्कि हमारे भीतर की चेतना में निहित होती है। जब मन मजबूत होता है, तो परिस्थितियाँ स्वतः ही छोटी लगने लगती हैं।
वास्तव में, शक्ति की साधना का अर्थ है—अपने मन, वचन और कर्म में एकरूपता लाना। जब हमारे विचार, हमारी वाणी और हमारे कार्य एक दिशा में चलते हैं, तब हमारे प्रयासों में अद्भुत प्रभाव उत्पन्न होता है। यही एकाग्रता और समर्पण हमें अपने लक्ष्य के करीब ले जाता है। बिना समर्पण के की गई साधना केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाती है, जबकि पूर्ण निष्ठा के साथ किया गया प्रयास ही सच्ची आराधना कहलाता है।
आज के युग में, जब प्रतिस्पर्धा और चुनौतियाँ निरंतर बढ़ रही हैं, तब शक्ति की साधना और भी आवश्यक हो जाती है। यह साधना केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि अपने कार्य के प्रति ईमानदारी, अनुशासन और निरंतरता बनाए रखने में भी निहित है। हर दिन अपने लक्ष्य की ओर एक छोटा कदम बढ़ाना, असफलताओं से सीखना और पुनः प्रयास करना—यही वास्तविक साधना है।
अंततः, जब हम किसी भी रूप में शक्ति का अर्जन करते हैं—चाहे वह ज्ञान की शक्ति हो, आत्मबल की हो या कर्मशीलता की—तो सफलता का मार्ग स्वतः ही प्रशस्त होने लगता है। शक्ति हमें केवल लक्ष्य तक पहुँचने का साधन नहीं देती, बल्कि उस यात्रा को भी सार्थक बना देती है।
इसलिए, नवरात्रि का संदेश केवल आराधना तक सीमित न रखकर, उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाना ही सच्ची साधना है। जब हम भीतर की शक्ति को पहचान लेते हैं और उसे सही दिशा में प्रयुक्त करते हैं, तभी हमें वास्तविक “सिद्धि” प्राप्त होती है।