03/09/2026
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष |दिवस–3/4
"बाँसुरी वाला कान्हा और प्रेम का वृंदावन"
वृंदावन की कुंज गलियों में जब कान्हा की बाँसुरी बजती थी, तो केवल गोपियाँ ही नहीं, मानो वृक्षों की डालियाँ, यमुना की लहरें और हवा का हर झोंका भी उस स्वर में खो जाता था। कृष्ण का वृंदावन केवल एक स्थान नहीं, प्रेम की वह भूमि है जहाँ संबंधों में स्वार्थ नहीं, समर्पण है। राधा के प्रेम में कृष्ण के प्रति आकर्षण से अधिक आत्मा का परमात्मा में विलय दिखाई देता है। गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम भी सांसारिक सीमाओं से परे भक्ति का प्रतीक बन जाता है।
इसी वृंदावन में कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर प्रकृति और सामूहिक विश्वास की शक्ति का संदेश दिया। इंद्र के अहंकार को शांत कर उन्होंने समझाया कि पूजा केवल भय से नहीं, कृतज्ञता और श्रद्धा से होनी चाहिए। कृष्ण की बाँसुरी की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि उसमें कोई शब्द नहीं थे, फिर भी वह सबके हृदय तक पहुँचती थी। शायद इसलिए आज भी कृष्ण की बाँसुरी हमें पुकारती है कि_ "अपने भीतर के शोर को शांत करो और उस प्रेम को सुनो, जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है। क्रमशः...
#राधे_राधे