19/05/2026
राजनीति में विरोध का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी मर्यादा भी होती है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि केवल अपनी बात रखने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह समाज के लिए एक उदाहरण भी होता है। ऐसे में बाड़मेर कलेक्ट्रेट परिसर में शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी द्वारा विरोध प्रदर्शन के दौरान स्वयं पर पेट्रोल छिड़कना एक गंभीर, गैर-जिम्मेदाराना और चिंताजनक घटना के रूप में देखा जाना चाहिए।
राजस्थान के युवाओं के बीच अपनी अलग पहचान रखने वाले एक युवा विधायक से समाज संयमित नेतृत्व, संघर्ष की सकारात्मक दिशा और जिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा करता है। लेकिन जिस प्रकार सार्वजनिक रूप से पेट्रोल लेकर आना, भीड़ के बीच खुद पर उसे छिड़कना और भावनात्मक उग्रता का प्रदर्शन करना सामने आया, वह लोकतांत्रिक राजनीति की स्वस्थ परंपराओं के अनुकूल नहीं कहा जा सकता।
विरोध करना हर जनप्रतिनिधि का अधिकार है। जनता के मुद्दों के लिए संघर्ष करना भी आवश्यक है। लेकिन संघर्ष और आत्मघाती संदेश — दोनों में बड़ा अंतर होता है। जब कोई जनप्रतिनिधि सार्वजनिक मंच पर इस प्रकार का कदम उठाता है, तो उसका असर केवल राजनीतिक नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी पड़ता है। विशेषकर युवा वर्ग ऐसे दृश्यों को भावनात्मक साहस नहीं, बल्कि आक्रोश और आवेश की राजनीति के रूप में ग्रहण कर सकता है।
सबसे गंभीर बात यह है कि एक विधायक स्वयं पेट्रोल लेकर आए और भीड़ के बीच ऐसा कदम उठाने की स्थिति तक पहुँच जाए। यह केवल व्यक्तिगत आवेश नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा विषय भी है। ऐसे हालातों में एक छोटी सी चूक भी बड़ा हादसा बन सकती थी। कलेक्ट्रेट जैसा संवेदनशील सार्वजनिक परिसर, बड़ी संख्या में मौजूद लोग, प्रशासनिक माहौल और उस बीच इस प्रकार का प्रदर्शन — यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।
जनप्रतिनिधि का दायित्व परिस्थितियों को नियंत्रित करना होता है, उन्हें विस्फोटक बनाना नहीं। राजनीति यदि केवल सुर्खियाँ बटोरने और भावनात्मक नाटकीयता तक सीमित होने लगे, तो लोकतंत्र की गंभीरता कमजोर पड़ने लगती है। लोकतंत्र में सबसे प्रभावशाली विरोध वही माना जाता है, जो तर्क, संयम और संवैधानिक दायरे में रहकर जनता की आवाज़ बने।
आज देश और समाज का युवा पहले ही भावनात्मक दबाव, बेरोजगारी, सामाजिक तनाव और असंतोष से गुजर रहा है। ऐसे समय में नेताओं का व्यवहार बेहद जिम्मेदार होना चाहिए। उन्हें संघर्ष का रास्ता दिखाना चाहिए, लेकिन ऐसा संघर्ष जो समाधान की ओर ले जाए, न कि उत्तेजना और आत्मघाती प्रतीकों की ओर।
राजनीतिक परिपक्वता का अर्थ केवल भाषण देना नहीं होता, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने व्यवहार से समाज को संतुलन और धैर्य का संदेश देना होता है। लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन असहमति का तरीका उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं से सभी जनप्रतिनिधि सीख लेंगे और विरोध की राजनीति को संवैधानिक मर्यादा, सामाजिक जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक शालीनता के साथ आगे बढ़ाएंगे।