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एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के नेता जयपुर में किसानों को इकठ्ठा कर बड़ी बड़ी फेंकते हैं जैसे 2014 से पहले मोदीजी बोलते थे वै...
13/06/2026

एक तरफ भारतीय जनता पार्टी के नेता जयपुर में किसानों को इकठ्ठा कर बड़ी बड़ी फेंकते हैं जैसे 2014 से पहले मोदीजी बोलते थे वैसे बड़ी बड़ी बातें कर रहें कि आने वाले समय में लोग कलेक्टर की नौकरी छोड़ खेती करेंगे किसानों की आय दुगुनी करने सहित बड़ी बड़ी फेंकते हैं दूसरी तरफ एक किसान ने करोड़ो रूपये लगाकर खेती की पौधे लगाए अब ग्राहक नहीं मिलने से उन पर कुल्हाड़ी चलाने की नौबत आ चुकी हैं... क्योंकि सरकार से अपेक्षित सहयोग के बिना किसान अपनी फसल मार्केट में या अंतरर्राष्ट्रीय बाजार में बेच नहीं पा रहा हैं... इन नेताओं का झुठ फेकने और वोट लेकर सत्ता का सुख भोगने के अलावा किसानों के लिए क्या किया इन्होंने... आज किसान कड़ी मेहनत कर खून के आंसू रोने को मजबूर हैं दूसरी तरफ बोला जाता हैं की आने वाले समय में युवा कलेक्टर की नौकरी छोड़ खेती करेगा करेंगे। ऐसी सरकारे रही तो जो कर रहें हैं वो भी छोड़ देंगें ऐसे हालात बने हुए हैं...

हाल ही में दो बड़े आंदोलन चर्चाओं में हैं.. एक बाड़मेर गिरल माइंस  में मजदूरों का आंदोलन दूसरी तरफ जयपुर का भैराणा धाम बचा...
28/05/2026

हाल ही में दो बड़े आंदोलन चर्चाओं में हैं.. एक बाड़मेर गिरल माइंस में मजदूरों का आंदोलन दूसरी तरफ जयपुर का भैराणा धाम बचाओ आंदोलन..
एक आंदोलन जिसको एक युवा विधायक जो सोशल मिडिया पर बेहद लोकप्रिय हैं वो लीड कर रहे हैं दूसरी तरफ एक सांसद भैराणा धाम आंदोलन जो संतो को न्याय दिलाने के लिए हाथ में लेते हैं... अब स्ट्राइक रेट समझिए युवा विधायक जी ने अपनी मांगे मनवाने के लिए सबकुछ किया कूच भी किया बोतल भी अपने ऊपर उड़ेली, खून से पत्र भी लिखें प्रेशर पॉलिटिक्स में कोई कमी नहीं रखी लेकिन करीब 25-30 दिन बाद भी आंदोलन बेनतीजा रहा दूसरी तरफ एक सांसद को धरना स्थल से संतो ने पुकारा तो सांसद ने आंदोलन को अपने हाथ लिया और महापंचायत काम आंदोलन का ऐलान कर दिया और परिणाम देखिए एक ही दिन में आंदोलन में संतो की जीत हुई सरकार ने सभी मांगे मान ली... युवा विधायक जी के समर्थक विधायक जी की तुलना सांसद से कर रहें हैं और उस न्याय योद्धा के बराबर विधायक जी से कर रहें हैं... हाँ विधायक जी सोशल मिडिया पर खर्चा कर रहें हैं तो फॉलोअर और रिल्स तो ज्यादा चल सकती हैं लेकिन सांसद की स्ट्राइक रेट की बराबरी विधायक साहब अभी 50 वर्ष तक भी नहीं कर पायेंगे...

साहब की रील की स्क्रिप्ट लिखने वाला व्यक्ति वाकई अनुभवी राइटर था... पहली बार कूच किया और स्क्रिप्ट के आधार पर रील देशभर ...
19/05/2026

साहब की रील की स्क्रिप्ट लिखने वाला व्यक्ति वाकई अनुभवी राइटर था... पहली बार कूच किया और स्क्रिप्ट के आधार पर रील देशभर में वायरल हो गई... आमतौर पर ऐसा टेलेंटेड क्रिएटर ही कर पाते हैं जिनकी रील वायरल हो जाती हैं जिस रील की कोई वायरल स्क्रिप्ट नहीं वो रील कभी वायरल नहीं हो जाती...इस स्क्रिप्ट के पीछे मनोवैज्ञानिक तथ्य समझिए बैग में बोलत और....नहीं....यानि स्क्रिप्ट में जनता को मैसेज देना था आपके लिए कोई नेता खुद की जान दांव पे लगा रहा हैं..लेकिन पता था 30 सेकंड की इस स्क्रिप्ट में अंतिम परिणाम देश भर में ट्रेंडिग में आ जाना था.. वहीं हुआ जो स्क्रिप्ट में लिखा था... खैर बेचारी जनता... ये स्क्रिप्ट आगामी चुनावों के लिए लिखी गई क्योंकि इस कार्यकाल का आधा समय चला गया कूछ हुआ नहीं तो जनता जवाब तो मांगेगी.. इसलिए जनता को ये बताया जायेगा की नेताजी ने आपके लिए जान दांव पर लगाई थी...

19/05/2026

राजनीति में विरोध का अधिकार जितना महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण उसकी मर्यादा भी होती है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि केवल अपनी बात रखने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह समाज के लिए एक उदाहरण भी होता है। ऐसे में बाड़मेर कलेक्ट्रेट परिसर में शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी द्वारा विरोध प्रदर्शन के दौरान स्वयं पर पेट्रोल छिड़कना एक गंभीर, गैर-जिम्मेदाराना और चिंताजनक घटना के रूप में देखा जाना चाहिए।

राजस्थान के युवाओं के बीच अपनी अलग पहचान रखने वाले एक युवा विधायक से समाज संयमित नेतृत्व, संघर्ष की सकारात्मक दिशा और जिम्मेदार व्यवहार की अपेक्षा करता है। लेकिन जिस प्रकार सार्वजनिक रूप से पेट्रोल लेकर आना, भीड़ के बीच खुद पर उसे छिड़कना और भावनात्मक उग्रता का प्रदर्शन करना सामने आया, वह लोकतांत्रिक राजनीति की स्वस्थ परंपराओं के अनुकूल नहीं कहा जा सकता।

विरोध करना हर जनप्रतिनिधि का अधिकार है। जनता के मुद्दों के लिए संघर्ष करना भी आवश्यक है। लेकिन संघर्ष और आत्मघाती संदेश — दोनों में बड़ा अंतर होता है। जब कोई जनप्रतिनिधि सार्वजनिक मंच पर इस प्रकार का कदम उठाता है, तो उसका असर केवल राजनीतिक नहीं रहता, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी पड़ता है। विशेषकर युवा वर्ग ऐसे दृश्यों को भावनात्मक साहस नहीं, बल्कि आक्रोश और आवेश की राजनीति के रूप में ग्रहण कर सकता है।

सबसे गंभीर बात यह है कि एक विधायक स्वयं पेट्रोल लेकर आए और भीड़ के बीच ऐसा कदम उठाने की स्थिति तक पहुँच जाए। यह केवल व्यक्तिगत आवेश नहीं, बल्कि सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा विषय भी है। ऐसे हालातों में एक छोटी सी चूक भी बड़ा हादसा बन सकती थी। कलेक्ट्रेट जैसा संवेदनशील सार्वजनिक परिसर, बड़ी संख्या में मौजूद लोग, प्रशासनिक माहौल और उस बीच इस प्रकार का प्रदर्शन — यह किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।

जनप्रतिनिधि का दायित्व परिस्थितियों को नियंत्रित करना होता है, उन्हें विस्फोटक बनाना नहीं। राजनीति यदि केवल सुर्खियाँ बटोरने और भावनात्मक नाटकीयता तक सीमित होने लगे, तो लोकतंत्र की गंभीरता कमजोर पड़ने लगती है। लोकतंत्र में सबसे प्रभावशाली विरोध वही माना जाता है, जो तर्क, संयम और संवैधानिक दायरे में रहकर जनता की आवाज़ बने।

आज देश और समाज का युवा पहले ही भावनात्मक दबाव, बेरोजगारी, सामाजिक तनाव और असंतोष से गुजर रहा है। ऐसे समय में नेताओं का व्यवहार बेहद जिम्मेदार होना चाहिए। उन्हें संघर्ष का रास्ता दिखाना चाहिए, लेकिन ऐसा संघर्ष जो समाधान की ओर ले जाए, न कि उत्तेजना और आत्मघाती प्रतीकों की ओर।

राजनीतिक परिपक्वता का अर्थ केवल भाषण देना नहीं होता, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने व्यवहार से समाज को संतुलन और धैर्य का संदेश देना होता है। लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन असहमति का तरीका उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।

उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं से सभी जनप्रतिनिधि सीख लेंगे और विरोध की राजनीति को संवैधानिक मर्यादा, सामाजिक जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक शालीनता के साथ आगे बढ़ाएंगे।

12/03/2026

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