27/04/2026
मेवाड़ की पन्ना धाय सा ही महान था मारवाड़ की रानी बाघेली का बलिदान! इतिहास के पन्नों में गुम एक महानायिका... 🚩
हम सभी ने मेवाड़ की स्वामिभक्त 'पन्ना धाय' का नाम सुना है, जिन्होंने अपने कलेजे के टुकड़े (पुत्र चंदन) का बलिदान देकर चित्तौड़ के राजकुमार उदयसिंह की रक्षा की थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ठीक ऐसा ही अकल्पनीय बलिदान मारवाड़ (जोधपुर) की एक वीरांगना ने भी दिया था?
आज कहानी उस महानायिका की, जिसे इतिहासकारों ने वो सम्मान नहीं दिया जिसकी वह हकदार थीं। यह कहानी है बलुन्दा ठिकाने की रानी बाघेली की।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
28 नवम्बर 1678 को अफगानिस्तान के जमरूद में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह का निधन हो गया। उस समय उनकी दो रानियाँ गर्भवती थीं। वीर दुर्गादास राठौड़ और अन्य सरदारों ने रानियों को सती होने से रोका और उन्हें लाहौर लाए, जहाँ 19 फरवरी 1679 को दो राजकुमारों का जन्म हुआ। बड़े राजकुमार का नाम अजीतसिंह रखा गया।
जब यह दल दिल्ली पहुँचा, तो कुटिल मुगल बादशाह औरंगजेब ने पूरे मारवाड़ पर कब्जा कर लिया था और वह शिशु राजकुमार अजीतसिंह को जोधपुर का उत्तराधिकारी मानने में आनाकानी कर रहा था। मारवाड़ के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा था।
रानी बाघेली का अदम्य बलिदान:
औरंगजेब के षड्यंत्र को भांपकर दुर्गादास राठौड़ और अन्य सरदारों ने राजकुमार को गुप्त रूप से दिल्ली से बाहर निकालने की योजना बनाई, लेकिन चारों तरफ कड़ा पहरा था।
उसी समय, बलुन्दा के ठाकुर मोहकम सिंह की रानी बाघेली भी अपनी नवजात बेटी के साथ दिल्ली में मौजूद थीं। मारवाड़ के भविष्य को बचाने के लिए उन्होंने एक ऐसा कठोर निर्णय लिया जिसे सुनकर रूह कांप जाए।
रानी बाघेली ने राजकुमार अजीतसिंह के जीवन की रक्षा के लिए उन्हें अपनी नवजात दूध पीती राजकुमारी से बदल लिया। उन्होंने राजकुमार को अपनी बेटी के कपड़ों में छिपाकर खिंची मुकंददास व कुंवर हरीसिंह के साथ दिल्ली से सुरक्षित बाहर निकालकर बलुन्दा भिजवा दिया।
सालों का गुप्त जीवन और त्याग:
यह कार्य इतना गोपनीय था कि रानी ने अपनी दासियों तक को भनक नहीं लगने दी। छह महीने तक वह स्वयं राजकुमार को अपना दूध पिलाती रहीं और पालती रहीं। जब खतरा बढ़ा, तो वह मायके जाने का बहाना कर राजकुमार को सिरोही के कालिंद्री गाँव में एक निष्ठावान पुष्करणा ब्राह्मण जयदेव के घर सौंप आईं, जहाँ उन्हें सुरक्षित पाला गया।
यही राजकुमार अजीतसिंह बड़े होकर मारवाड़ के महाराजा बने।
हमारा नमन:
यदि उस नाज़ुक वक्त में रानी बाघेली अपनी कोख सूनी करके अपनी पुत्री का बलिदान न देतीं, तो शायद मारवाड़ का इतिहास कुछ और ही होता।
आज नमन है ऐसी वीरांगना को, जिनके अकल्पनीय त्याग ने जोधपुर के 'सूर्य' को अस्त होने से बचा लिया। पन्ना धाय की तरह ही रानी बाघेली का नाम भी स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाना चाहिए।
जय राजपूताना! जय मारवाड़!
#वीर_दुर्गादास_राठौड़