11/01/2026
आज नदी के किनारे बैठा था...
गहराई से उसे देखता रहा।
वो कितनी शांत है, कितनी उदासीन।
लोग उसमें कचरा फेंकते हैं, गंदगी उड़ेलते हैं,
उसके सीने पर जख्म देते हैं हर रोज़...
फिर भी वो कभी चीखती नहीं, कभी गुस्सा नहीं करती।
वही लोग, शाम ढलते ही उसके किनारे आते हैं,
माथा टेकते हैं, फूल चढ़ाते हैं, अगरबत्ती जलाते हैं,
उससे मनौतियाँ मांगते हैं, आँखें बंद करके प्रार्थना करते हैं।
और वो... वो चुपचाप उनकी मनोकामना पूरी कर देती है।
तब समझ आया...
उसकी ये शांति कोई साधना नहीं है,
ये तो वो गहरा दर्द है जो इतना गहरा हो गया
कि अब कोई चोट उसे छू भी नहीं पाती।
किसी ने उसका दिल तोड़ा होगा...
शायद बहुत पहले, बहुत बेरहमी से।
शायद तब जब वो पहली बार बह रही थी,
नन्ही-सी, मासूम, भरोसे भरी।
और तब से... वो दर्द इतना गहरा हो गया
कि अब सारी दुनिया मिलकर भी उसे और दुख नहीं दे सकती।
अब वो बस बहती है...
शांत, उदासीन, और अपार दया लिए।
क्योंकि जिसका दिल एक बार पूरी तरह टूट चुका हो,
वो अब किसी की चोट से डरता नहीं।
वो बस बहता रहता है...
दूसरों को जीवन देता हुआ,
खुद को कभी न पूछते हुए कि "मुझे कौन पूछेगा?