07/08/2026
लोकेशन, बस्ती
जिस बेटे को नौ महीने कोख में रखकर मां ने जिंदगी दी उसी बेटे के इंतजार में मां की आंखें जिंदगी की आखिरी सांस तक दरवाजे पर टिकी रहीं। जुबान पर आखिरी वक्त तक बेटे का नाम था दिल में बस एक उम्मीद थी कि बेटा आएगा, मां को अपने साथ ले जाएगा। लेकिन वक्त गुजरता गया और बेटा नहीं आया। बस्ती की इस मां ने जिंदगी में तो बेटे की राह देखी ही मौत के बाद भी पांच दिन तक मर्चरी में अपने वारिस का इंतजार करती रही। आखिरकार जब खून का रिश्ता नहीं पहुंचा, तो एक गैर ने बेटे का फर्ज निभाया मां को कंधा दिया और मुखाग्नि देकर अंतिम विदाई दी। ये कहानी सिर्फ एक मां की मौत की नहीं ये सवाल है उस रिश्ते से, जिसके लिए मां ने पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी।
बस्ती की ये तस्वीर सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की मौत की कहानी नहीं है, बल्कि बदलते रिश्तों और सामाजिक जिम्मेदारियों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। हर्रैया के आसरा आवास में बेहद दयनीय हालत में मिली करीब 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला को संस्था के लोगों ने अस्पताल पहुंचाया था। जिला अस्पताल में इलाज के दौरान महिला की मौत हो गई। बताया जा रहा है कि आखिरी वक्त तक महिला अपने बेटे दिलीप को याद करती रही। लेकिन बेटे के नहीं पहुंचने के बाद संस्था के प्रमुख दिलीप पाण्डेय ने ही बेटे का फर्ज निभाया और अंतिम संस्कार किया।
हर्रैया नगर पंचायत के आसरा आवास का एक छोटा सा कमरा जहां जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर पहुंच चुकी एक बुजुर्ग महिला और एक वृद्ध पुरुष बेहद दयनीय हालत में मिले। करीब 25 दिन पहले पड़ोसियों की सूचना पर ‘सेवा समर्पण भाव परिवार’ संस्था की टीम वहां पहुंची थी। संस्था के मुताबिक दोनों बुजुर्ग करीब 20 दिनों से भूख और बीमारी से बेहाल थे। हालात देखकर संस्था के कार्यकर्ताओं ने पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की मदद ली और दोनों को हर्रैया सीएचसी पहुंचाया। हालत गंभीर होने पर दोनों को जिला अस्पताल बस्ती रेफर कर दिया गया। जिला अस्पताल के बेड पर जिंदगी और मौत से जूझ रही बुजुर्ग महिला की आंखों में एक ही उम्मीद थी, शायद बेटा आएगा शायद मां को घर ले जाएगा।
संस्था के लोगों के मुताबिक महिला बार-बार अपने बेटे दिलीप का नाम लेती थी। अस्पताल के दरवाजे पर होने वाली हर आहट पर उसकी नजरें उठ जाती थीं।
लेकिन इंतजार खत्म नहीं हुआ।29 जुलाई को डॉक्टरों ने महिला को मृत घोषित कर दिया। इसके बाद संस्था के लोगों ने परिजनों और बेटे तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन कोई सामने नहीं आया।
बताया जा रहा है कि बुजुर्ग महिला का शव करीब पांच दिनों तक मर्चरी में रखा रहा। जिस बेटे की राह मां जिंदगी भर देखती रही, वही बेटा मां की अंतिम यात्रा में भी नहीं पहुंचा। आखिरकार एक गैर ने वह जिम्मेदारी उठाई, जिसे निभाने की उम्मीद अपने से होती है। ‘सेवा समर्पण भाव परिवार’ के प्रमुख दिलीप पाण्डेय आगे आए।उन्होंने बुजुर्ग महिला को अपना मानकर अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाई। बस्ती के पौराणिक मुड़घाट पर वैदिक मंत्रोच्चार के बीच दिलीप पाण्डेय ने महिला को मुखाग्नि दी।श्मशान घाट पर मौजूद लोगों की आंखें नम थीं। जिस मां को आखिरी वक्त में अपने बेटे के कंधे का इंतजार था, उसे आखिरकार एक गैर ने कंधा दिया।
अंतिम संस्कार के दौरान संस्था के सत्यम मिश्रा, राहुल गौतम, उमंग पाण्डेय समेत कई कार्यकर्ता मौजूद रहे। ये कहानी सिर्फ एक बुजुर्ग महिला की मौत की कहानी नहीं है। ये सवाल है उन रिश्तों से जिन्हें जन्म देने वाली मां के आखिरी सफर में भी वक्त नहीं मिला। और साथ ही ये उन लोगों के लिए उम्मीद भी है, जो बिना किसी खून के रिश्ते के किसी अनजान के लिए अपना सबकुछ समर्पित कर देते हैं। खून का रिश्ता साथ छोड़ गया लेकिन इंसानियत ने आखिरी वक्त तक साथ निभाया।
जिस बेटे के इंतजार में मां की आंखें आखिरी सांस तक दरवाजे पर टिकी रहीं वह नहीं आया।लेकिन एक गैर आया, जिसने मां को कंधा भी दिया और मुखाग्नि भी। बस्ती की ये कहानी शायद एक सवाल छोड़ जाती है, रिश्ते आखिर खून से बड़े होते हैं या इंसानियत से।
बाइट1 दिलीप पांडेय, समाज सेवी
बाइट2 उमंग, समाज सेवी
बाइट3 मृतिका की फाइल बाइट