25/01/2026
पासी शिरोमणि महाराजा बिजली पासी
राजा बिजली पासी कन्नौज के राजा जयचन्द के समकालीन थे। इस तथ्य की पुष्टि लगभग सभी इतिहासकार करते हैं। कन्नौज के राजा जयचन्द का शासन काल सन् 1170-94 ई. तक था। इस प्रकार राजा बिजली पासी का शासन काल भी ग्यारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में था।
लखनऊ जिला मुख्यालय से आठ कि.मी. दक्षिण में स्थित बंगला बाजार को पार कर बिजनौर कस्बे की ओर जाने वाली सड़क के दाहिनी ओर एक विशाल किले के अवशेष मिट्टी और कहीं-कहीं लखौरी ईंटों के टीले के रूप में दिखाई देते हैं। यह ऐतिहासिक स्थान बारहवीं शताब्दी के पराक्रमी महाराजा बिजली पासी की कीर्ति का मूक साक्षी है। यह किला पूर्व से पश्चिम 210 मीटर और उत्तर से दक्षिण 280 मीटर परिसर में कुल 58800 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और अब एक संरक्षित क्षेत्र है।
उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग के द्वारा प्रकाशित अभिलेखों के अनुसार," महाराजा बिजली पासी का राज्य 148 वर्ग मील लखनऊ और उसके आसपास के क्षेत्रों में फैला हुआ था। उक्त क्षेत्र के प्रशासन के लिए उन्होंने पहले अपनी मां के नाम विजनागढ़ का निर्माण कराया जो कालान्तर में बिजनौरगढ़ हो गया। उनकी मां का नाम विजना और पिता का नाम नटवा था। विजनौर से लगभग 3 कि.मी. उत्तर की ओर उन्होंने अपने पिता के सम्मान में नटवागढ़ का निर्माण कराया। पुनः राज्य के विस्तार के साथ उन्होंने उस किले से 3 कि.मी. और उत्तर की ओर उस विशाल किले का निर्माण कराया जिसे अब महाराजा बिजली पासी का किला कहा जाता है। महाराजा बिजली पासी के उपर्युक्त तीन किलों के अतिरिक्त नौ किले और थे जिनके नाम थे, माती किला, परवर पश्चिम किला, कल्ली पश्चिम किला, पुराना किला, भटगांव किला, औरांव किला, दादूपुर किला, ऐन किला और पिपरसण्ड किला। इनमें नटवा, माती, परवर पश्चिम तथा कल्ली पश्चिम किलों के अवशेष आज भी टीलों के रूप में मौजूद हैं। महाराजा बिजली पासी के द्वारा बनवाये गये इन 12 किलों के निर्माण से यह ज्ञात होता है कि राजा बिजली पासी स्थापत्य कला में कितने निपुण थे। इन बारह किलों की श्रृंखला का निर्माण कर उन्होंने एक ऐसे चक्रव्यूह की रचना की थी कि कोई भी दुश्मन उनकी सत्ता को नुकसान न पहुंचा सके। महाराजा बिजली पासी के किले का चित्र अंग्रेज कर्नल डी.एस.हाडसन नें 1857 ई. में अपने हाथ से किले के पास बैठकर बनाया था। इस किले की भव्यता देखते ही बनती थी।
11वीं-12वीं शताब्दी में सम्पूर्ण उत्तरी भारत में अराजकता छाई हुई थी। एक ओर देशी राजे एक दूसरे से युद्ध लड़ने में अपनी शक्ति का क्षय कर रहे थे, दूसरी ओर यहाँ की आपसी फूट का लाभ उठाते हुए विदेशियों के आक्रमण तेज हो गये थे। ऐसा उल्लेख मिलता है कि कन्नौज के राजा जयचन्द ने महाराजा बिजली पासी से कर देने के लिए कहा। राजा बिजली पासी ने किसी प्रकार का कोई कर देने से साफ इंकार कर दिया। इससे रूष्ट होकर जयचन्द ने अपनी सेना महाराजा बिजली पासी को हराने और अपनी शर्तें मनवाने के लिए भेजी। लेकिन पराक्रमी राजा बिजली पासी की सेनाओं ने राजा जयचन्द की सेनाओं को परास्त कर खदेड़ दिया। यह वही क्षत्रिय राजा थे जिन्होंने अपने मतलब के लिए विदेशी आक्रमणकारी मुहम्मद गोरी को भारतवर्ष में अपने दुश्मनों को पराजित करने के लिए आमंत्रित किया था। महाराजा बिजली पासी के हाथों पराजित होने के बाद राजा जयचन्द अत्यन्त कुपित हुआ और उसने ऐन-केन-प्रकरणेन राजा बिजली पासी को पराजित करने की चाल चली। उसने महोबा के सरदार आल्हा-ऊदल, जो बानापार हीरोजै के रूप में मशहूर लड़ाकू थे, से सम्पर्क किया और उनसे राजा बिजली पासी के हाथों अपनी पराजय का बदला लेने की संधि की। आल्हा-ऊदल ने अपने साले जोगा आदि को महाराजा बिजली पासी को हराने के लिए एक विशाल सेना के साथ भेजा। महाराजा बिजली पासी और आल्हा-ऊदल की सेना जो जोगा के नेतृत्व में लड़ाई लड़ रही थी के मध्य घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में आल्हा-ऊदल के साले जोगा की भीषण पराजय हुई। इस पराजय से आल्हा-ऊदल तिलमिला गये और उन्होंने अपनी सेनाओं को संगठित कर महाराजा बिजली पासी पर हमला बोल दिया। लखनऊ से सटे गांजर के मैदान में ( यह स्थान आज गजरिया फार्म के नाम से प्रसिद्ध है।) राजा बिजली पासी और आल्हा-ऊदल की सेनाओं के मध्य लम्बे समय तक भयंकर युद्ध हुआ। कुछ विद्वान मानते है कि इसी गांजर की लड़ाई में वर्ष 1194 में महाराजा बिजली पासी वीरगति को प्राप्त हो गये थे।
जबकि कुछ का मानना है कि महाराजा बिजली पासी ने आल्हा-ऊदल को परास्त कर दिया था। आल्हा-ऊदल अपनी अवशेष सेना के साथ बाराबंकी की ओर पलायन कर गये। जहां से राजा देवामाती पासी ने आल्हा-ऊदल को खदेड़ा और वे भाग कर अपनी राजधानी महोबा पहुंच गये।