02/09/2026
शराबबंदी का सच और छोटे सरकार का ‘बकौध’—फौजी पत्रकार की नजर में बिहार का सिस्टम!
(पूर्व सैनिक सह पत्रकार संतोष राय)
हर बेबाक और शिक्षा से तराशे गए सवाल को खामोश कर देते हैं छोटे सरकार!
आज सोशल मीडिया में गजब का टीआरपी है। बिहार में हजारों क्रिएटर का बेस है, किसी की रोजी-रोटी है, किसी की पहचान है और किसी का भविष्य इसी सोशल मीडिया से जुड़ा हुआ है।
लेकिन मैं हमेशा माननीय विधायक अनंत सिंह के हाव-भाव का विश्लेषण करता हूं। क्योंकि जिस बात को लोग घंटों घुमा-फिराकर बोलते हैं, छोटे सरकार उसे दो शब्द में ऐसा बोल जाते हैं कि पूरा सिस्टम नंगा दिखाई देने लगता है।
एक अनंत सिंह ही हैं जो दो टूक कह सकते हैं—“तोय नाय जानोही कि केतना शराबबंदी है?”
एकदम ठेठ मगही।
मतलब—तुम नहीं जानते हो कि बिहार में कितनी शराबबंदी है?
अब मतलब समझ गए होंगे आप!
लेकिन जब अवैध शराब से चार लोगों की मौत के मामले में छोटे सरकार घटनास्थल पर पहुंचे तो उनके चेहरे पर वही पुराना तेवर नहीं था। वहां शायद हाव-भाव भी जवाब दे गया।
मगही में कहें तो—बकौध लग गया!
यहीं से फौजी पत्रकार की कल्पना शुरू होती है।
शहंशाह का कोमल हृदय आखिर मजबूर भी तो है।
जिस परिवार में आज चूल्हा नहीं जल रहा, जिस घर में चार लाशें पड़ी हैं, उसी समाज के कुछ लोग कल तक अवैध शराब की खरीद-बिक्री में सहयोग करते रहे होंगे।
गरीबी, लालच, मजबूरी और शराबबंदी के बीच पिसता हुआ एक समाज।
सरकार ने कह दिया—जान जहरीली शराब से गई।
अंग्रेजी शराब के साथ पांच जाम के संकेत भी मिल रहे हैं।
अब सवाल यह है कि अगर चार लोग मर गए और पांच लोगों ने जाम लगाया था, तो पांचवां कौन था?
और कहीं ऐसा न हो कि कल उसी पांचवें व्यक्ति का नाम साजिशन हत्या में सामने आ जाए!
क्योंकि बिहार में जांच की रफ्तार और न्याय की उम्र—दोनों पर सवाल उठते रहे हैं।
न कोई त्वरित फॉरेंसिक व्यवस्था।
न मौके पर वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य जुटाने की पर्याप्त व्यवस्था। न डॉग स्क्वायड की तत्काल कार्रवाई।
फिर जिसके साथ पुरानी दुश्मनी होगी, वही बली का बकरा बनेगा और मामला अदालत में जाएगा।
बेल के लिए तीन-चार साल की जद्दोजहद।
फिर गवाह बदलेंगे, साक्ष्य कमजोर होंगे, तारीख पर तारीख पड़ेगी और ऐसे मामलों में फैसला आएगा भी तो कब?
बीस साल बाद!
और तब तक क्या बचेगा?
कुछ कागज, कुछ बयान और एक परिवार की जिंदगी भर की तबाही।
फिर अदालत कहेगी—साक्ष्य के अभाव में बरी।
मामला दब जाएगा। लोग भूल जाएंगे।
लेकिन छोटे सरकार का वह बेबाक अंदाज और हाजिर जवाब शायद फिर किसी कैमरे के सामने सुनाई देगा—“तोय नाय जानोही कि केतना शराबबंदी है?”
यही बिहार है।
यहां शराबबंदी कागज पर कितनी है, यह सरकार जाने।
जमीन पर कितनी है, यह छोटे सरकार जाने।
और अवैध शराब से मरने वाले गरीब के घर का चूल्हा—वह परिवार जानता है।
फौजी पत्रकार बस इतना पूछता है—शराबबंदी अगर इतनी ही सख्त है, तो जहरीली शराब गरीब के घर तक पहुंचती कैसे है?