04/06/2026
सच कहूँ तो मुझे खान सर, रौशन आनंद सर या किसी भी कोचिंग से कोई व्यक्तिगत मतलब नहीं है।
लेकिन जब भी शिक्षा के क्षेत्र में विवाद, तोड़फोड़ या आरोप-प्रत्यारोप की खबरें सुनता हूँ, तो सबसे पहले उन बच्चों का चेहरा याद आता है जो बिहार के गाँवों से एक सपना लेकर पटना आते हैं।
वह लड़का जो सुबह 4 बजे उठकर पढ़ता है... वह लड़की जो घर के काम के बाद किताब खोलती है... वह पिता जो खुद फटे जूते पहन लेता है लेकिन बेटे की फीस समय पर भरता है... वह माँ जो हर मंगलवार व्रत रखती है और भगवान से सिर्फ एक नौकरी माँगती है।
उन्हें नहीं पता कि कौन सही है, कौन गलत। उन्हें सिर्फ इतना पता है कि उनका भविष्य दाँव पर नहीं लगना चाहिए।
आज सोशल मीडिया पर लोग पक्ष चुन रहे हैं। कोई खान सर के साथ है, कोई रौशन आनंद सर के साथ।
लेकिन मैं उस छात्र के साथ हूँ, जिसके पिता ने फोन पर कहा होगा— "बेटा, बस पढ़ाई पर ध्यान देना, बाकी सब ठीक हो जाएगा।"
उस बच्चे के लिए शिक्षक सिर्फ एक नाम नहीं होते, उम्मीद होते हैं।
और जब उम्मीदों के बीच टकराव की खबरें आती हैं, तो भरोसा थोड़ा कमजोर पड़ जाता है।
शिक्षा का क्षेत्र ऐसा होना चाहिए जहाँ विचार टकराएँ, लोग नहीं। जहाँ प्रतियोगिता हो, लेकिन मर्यादा भी हो। जहाँ जीत किसी व्यक्ति की नहीं, छात्रों के सपनों की हो।
बाकी कौन सही है, कौन गलत— यह कानून और सच तय करेगा।
लेकिन एक बात तय है...
जिस दिन शिक्षक छात्रों की उम्मीदों से बड़े हो जाएँगे, उस दिन शिक्षा हार जाएगी।
और जिस दिन छात्र सबसे ऊपर रखे जाएँगे, उस दिन सभी जीत जाएँगे।
यह पोस्ट किसी के पक्ष या विरोध में नहीं, उन लाखों छात्रों के पक्ष में है जो आज भी अपनी किस्मत बदलने के लिए किताबों से लड़ रहे हैं।