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17/04/2026

शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण होना चाहिए एक महान दार्शनिक, प्रखर शिक्षाविद और भारत के पूर्व राष्ट्रपति भारतरत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी को उनकी पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन ।

एक सच्चा शिक्षक हमेशा सीखने की प्रक्रिया में रहता है। उनकी शिक्षाओं और आदर्शो को कोटि-कोटि नमन।
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https://www.facebook.com/share/p/1AZ45kEoAw/
💫
Hare Krishna 💫🕉️🐚

शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण होना चाहिए एक महान दार्शनिक, प्रखर शिक्षाविद और भारत के पूर्व राष्ट्रपति भारतरत्न डॉ. ...
17/04/2026

शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण होना चाहिए एक महान दार्शनिक, प्रखर शिक्षाविद और भारत के पूर्व राष्ट्रपति भारतरत्न डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी को उनकी पुण्यतिथि पर कोटि-कोटि नमन ।

एक सच्चा शिक्षक हमेशा सीखने की प्रक्रिया में रहता है। उनकी शिक्षाओं और आदर्शो को कोटि-कोटि नमन।
💫
आप सभी देशवासियों को भक्ति ओर आस्था के पर्व "वैशाख अमावस्या की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं भगवान विष्णु आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें।
💫
खुशी तब नहीं आती जब सब कुछ परफेक्ट हो जाता है,
वो तो तब शुरू होती है जब तुम रुककर ये देखना सीखते हो कि अभी भी कितना कुछ सही है।

अपने मन को बार-बार छोटी-छोटी अच्छी चीज़ों पर ले जाओ—एक शांत पल, एक गहरी साँस, एक सच्ची मुस्कान।

जितना तुम अच्छा देखोगे,उतना ही मन कमी ढूंढना छोड़ देगा। और धीरे-धीरे, बिना किसी ज़ोर के,तुम भीतर से भरने लगोगे।

कृतज्ञता कोई एक बार की भावना नहीं,ये देखने का एक तरीका है—जिसे बार-बार अपनाने से खुशी खुद तुम्हारी आदत बन जाती है।


💫
इस भौतिक संसार में हम समाज, मैत्री और प्रेम द्वारा सुखी होने का प्रयास कर रहे हैं। किन्तु हमें प्राप्त होने वाला सुख रेगिस्तान में एक बूंद जल के समान है। हमारा हृदय सच्चा सुख, दिव्य सुख चाहता है। हम श्रीकृष्ण के लिए उत्कण्ठित हैं। वह हमारी आन्तरिक इच्छा है। हम शाश्वत सुख चाहते हैं।

(श्रील प्रभुपाद,वृन्दावन, 17 अप्रैल 1975 )
💫
आज त्रिकुटा पर्वत" से अद्भुत प्राकृतिक पावन दिव्य पिंडी स्वरूप जगजननी माँ वैष्णोदेवी जी के प्रात: काल श्रृंगार के आलौकिक दर्शन करे । दर्शन के लिए फोटो अंत तक देखें।
💫
ए. सी.भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद और हमारी गुरुपरंपरा की जय हो।"संदर्भ: भगवद् गीता 4.1- 4.3" क्या आपको पता है अर्जुन से भी पहले भगवत गीता का ज्ञान करोडो वर्ष पहले सूर्य देव को दिया गया था?
👉https://aimamedia.org/newsdetails.aspx?nid=392572
💫

Hare Krishna 💫🕉️🐚

इस्कॉन® कुलाई, मैंगलोर, मंगल आरती, जाप और गुरु पूजा मे आप सभी सादर आमन्त्रित है ।👇

🕗Time : Daily at 4.30 /7:10 A:M (IST),

🔗Zoom Link : Join the link below 👇🏻

https://t.ly/temple

Or

https://us02web.zoom.us/my/iskconnantoor?pwd=OE5mcnYzRFlUcE81aHNpT1EwMDNnQT09

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Meeting Id: 494 026 3157
Passcode : 108

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🔗 YouTube recording Link :👇

📅 Date : 17th April 2026
👉https://www.youtube.com/live/GZ_O6CVIR8A?si=dnby4d_0CGe4aWf0

कृपया इस लिंक 👆 का उपयोग करके जुड़ें और श्रवणम के इस अद्भुत अवसर का लाभ उठाएं।

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👉श्रीमद् भागवतम् (Multi lingual ) की दैनिक कक्षा सुबह 8 बजे समय - प्रतिदिन सुबह 8 बजे👇

🔗 Zoom Link : https://us02web.zoom.us/j/83155853450?pwd=pmWl5YVZyv5hRf17QggM5RgQn8POHD.1

Meeting ID: 83155853450
Passcode : 108

जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सूर्य से अभिन्न है, उसी प्रकार यह ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति भी... (परमेश्वर से भिन्न नहीं है)

श्रीमद्-भागवतम् (SB) 4.31.16 नारद मुनि द्वारा प्राचेताओं को दिया गया उपदेश है। यह श्लोक अचिंत्य-भेदाभेद-तत्व (एक साथ एक और भिन्न) को स्पष्ट करता है, जो बताता है कि कैसे भगवान और उनकी भौतिक/आध्यात्मिक शक्तियाँ भिन्न होते हुए भी अभिन्न हैं, जैसे सूर्य और उसका प्रकाश।

भागवतम की आज की कक्षा (SB 4.31.16) HG Nama Nistha Das Prabhuji द्वारा 👇

🕉️Shloka No. : 4️⃣.3️⃣ 1️⃣.1️⃣6️⃣
ⓥ Link : https://vedabase.io/en/library/sb/4/31/16/

🔗 YouTube recording Link:

👉https://www.youtube.com/live/3lzlMokuNEI?si=T-FNZS6tFKJh9jCj

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👉Bhagavad Gita Verse Of the Day:Chapter 6 Verse 11👇

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मन: |
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् || 11||

शुचौ-स्वच्छ; देशे-स्थान; प्रतिष्ठाप्य-स्थापित करके; स्थिरम्-स्थिर; आसनम् आसन; आत्मनः-जीव का; न-नहीं; अति-अधिक; उच्छ्रितम्-ऊँचा; न-न; अति-अधिक; नीचम्-निम्न; चैल–वस्त्र; अजिन-मृगछाला; कुश-घास; उत्तरम्-मृगछाला से ढक कर;

Translation👇

योगाभ्यास के लिए स्वच्छ स्थान पर भूमि पर कुशा बिछाकर उसे मृगछाला से ढककर उसके ऊपर वस्त्र बिछाना चाहिए। आसन बहुत ऊँचा या नीचा नहीं होना चाहिए।

Commentary👇

श्रीकृष्ण इस श्लोक में साधना के बाहरी क्रियाओं का वर्णन कर रहे हैं। 'शुचौ देशे' से तात्पर्य पवित्र या स्वच्छ स्थान है। प्रारम्भिक चरणों में बाहरी वातावरण मन को प्रभावित करता है लेकिन बाद के चरणों में कोई भी गंदे और अस्वच्छ स्थानों पर आंतरिक शुद्धता को प्राप्त करने के योग्य हो सकता है। स्वच्छ वातावरण मन को स्वच्छ रखने में अत्यधिक सहायता करता है। कुश (घास) की चटाई आजकल के योग मैट के समान ही तापमान रोधक होती है। मृगछाला विषैले कीटों जैसे सर्प और बिच्छुओं को साधना में लीन साधक के पास जाने से रोकती है। यदि आसन अधिक ऊँचा है तब वहाँ से गिरने का जोखिम बना रहता है और यदि आसन बहुत नीचा है तब भूमि पर रेंगने वाले कीटों से साधना में बाधा उत्पन्न होती है। इस श्लोक में आसन पर बैठने के दिशा-निर्देश कुछ सीमा तक आधुनिक समय से भिन्न हैं। प्राचीन और आधुनिक दोनों कालों के निर्देशों का लक्ष्य भगवान के चिन्तन में लीन होना है जबकि आंतरिक अभ्यास के निर्देश समान हैं।
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👉हरे कृष्ण इस्कॉन® कुलाई, मैंगलोर, की वेबसाइट पर रजिस्टर करें अपनी भाषा में ऑनलाइन माध्यम से मुफ़्त गीता सीखें 18 दिन मे ,नया बैच नियमित होता है। *मुफ़्त प्रमाणपत्र*👇

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👉भगवद् गीता (Hindi) Online Class YouTube रिकॉर्डिंग लिंक अनुराधा उपाध्याय माताजी द्वारा 👇

https://youtube.com/playlist?list=PL6qIHJWTBQ2xISwuuvidlf42bf9Od_5DH&si=5YfLG6j4TfSVZBhT

👉भगवद् गीता (English) Online Class YouTube रिकॉर्डिंग लिंक सिद्धार्थ प्रभुजी द्वारा 👇

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जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सूर्य से अभिन्न है, उसी प्रकार यह ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति भी... (परमेश्वर से भिन्न नहीं है)श्र...
17/04/2026

जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश सूर्य से अभिन्न है, उसी प्रकार यह ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति भी... (परमेश्वर से भिन्न नहीं है)

श्रीमद्-भागवतम् (SB) 4.31.16 नारद मुनि द्वारा प्राचेताओं को दिया गया उपदेश है। यह श्लोक अचिंत्य-भेदाभेद-तत्व (एक साथ एक और भिन्न) को स्पष्ट करता है, जो बताता है कि कैसे भगवान और उनकी भौतिक/आध्यात्मिक शक्तियाँ भिन्न होते हुए भी अभिन्न हैं, जैसे सूर्य और उसका प्रकाश।

भागवतम की आज की कक्षा (SB 4.31.16) HG Nama Nistha Das Prabhuji द्वारा 👇

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एक सच्चा शिक्षक हमेशा सीखने की प्रक्रिया में रहता है। उनकी शिक्षाओं और आदर्शो को कोटि-कोटि नमन।
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खुशी तब नहीं आती जब सब कुछ परफेक्ट हो जाता है,
वो तो तब शुरू होती है जब तुम रुककर ये देखना सीखते हो कि अभी भी कितना कुछ सही है।

अपने मन को बार-बार छोटी-छोटी अच्छी चीज़ों पर ले जाओ—एक शांत पल, एक गहरी साँस, एक सच्ची मुस्कान।

जितना तुम अच्छा देखोगे,उतना ही मन कमी ढूंढना छोड़ देगा। और धीरे-धीरे, बिना किसी ज़ोर के,तुम भीतर से भरने लगोगे।

कृतज्ञता कोई एक बार की भावना नहीं,ये देखने का एक तरीका है—जिसे बार-बार अपनाने से खुशी खुद तुम्हारी आदत बन जाती है।


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इस भौतिक संसार में हम समाज, मैत्री और प्रेम द्वारा सुखी होने का प्रयास कर रहे हैं। किन्तु हमें प्राप्त होने वाला सुख रेगिस्तान में एक बूंद जल के समान है। हमारा हृदय सच्चा सुख, दिव्य सुख चाहता है। हम श्रीकृष्ण के लिए उत्कण्ठित हैं। वह हमारी आन्तरिक इच्छा है। हम शाश्वत सुख चाहते हैं।

(श्रील प्रभुपाद,वृन्दावन, 17 अप्रैल 1975 )
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आज त्रिकुटा पर्वत" से अद्भुत प्राकृतिक पावन दिव्य पिंडी स्वरूप जगजननी माँ वैष्णोदेवी जी के प्रात: काल श्रृंगार के आलौकिक दर्शन करे । दर्शन के लिए फोटो अंत तक देखें।
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ए. सी.भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद और हमारी गुरुपरंपरा की जय हो।"संदर्भ: भगवद् गीता 4.1- 4.3" क्या आपको पता है अर्जुन से भी पहले भगवत गीता का ज्ञान करोडो वर्ष पहले सूर्य देव को दिया गया था?
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नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् || 11||

शुचौ-स्वच्छ; देशे-स्थान; प्रतिष्ठाप्य-स्थापित करके; स्थिरम्-स्थिर; आसनम् आसन; आत्मनः-जीव का; न-नहीं; अति-अधिक; उच्छ्रितम्-ऊँचा; न-न; अति-अधिक; नीचम्-निम्न; चैल–वस्त्र; अजिन-मृगछाला; कुश-घास; उत्तरम्-मृगछाला से ढक कर;

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श्रीकृष्ण इस श्लोक में साधना के बाहरी क्रियाओं का वर्णन कर रहे हैं। 'शुचौ देशे' से तात्पर्य पवित्र या स्वच्छ स्थान है। प्रारम्भिक चरणों में बाहरी वातावरण मन को प्रभावित करता है लेकिन बाद के चरणों में कोई भी गंदे और अस्वच्छ स्थानों पर आंतरिक शुद्धता को प्राप्त करने के योग्य हो सकता है। स्वच्छ वातावरण मन को स्वच्छ रखने में अत्यधिक सहायता करता है। कुश (घास) की चटाई आजकल के योग मैट के समान ही तापमान रोधक होती है। मृगछाला विषैले कीटों जैसे सर्प और बिच्छुओं को साधना में लीन साधक के पास जाने से रोकती है। यदि आसन अधिक ऊँचा है तब वहाँ से गिरने का जोखिम बना रहता है और यदि आसन बहुत नीचा है तब भूमि पर रेंगने वाले कीटों से साधना में बाधा उत्पन्न होती है। इस श्लोक में आसन पर बैठने के दिशा-निर्देश कुछ सीमा तक आधुनिक समय से भिन्न हैं। प्राचीन और आधुनिक दोनों कालों के निर्देशों का लक्ष्य भगवान के चिन्तन में लीन होना है जबकि आंतरिक अभ्यास के निर्देश समान हैं।
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SRI SRI RADHA GOVINDA TEMPLE, Kulai, Mangaluru"Bhagavad Gita Residential College"By the mercy of Srila Prabhupada, we have received the priceless gift of Bha...

16/04/2026

वाणी है अनमोल, इसे प्यार से बोल आपकी आवाज़ आपकी पहचान है, इसे सही और सकारात्मक तरीके से इस्तेमाल करें। सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

आवाज़ सिर्फ शब्द नहीं, दिल की भावनाओं का आईना होती है। मीठी और सच्ची आवाज़ हर दिल तक अपनी जगह बना लेती है।विश्व आवाज दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
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आवाज़ सिर्फ शब्द नहीं, दिल की भावनाओं का आईना होती है। मीठी और सच्ची आवाज़ हर दिल तक अपनी जगह बना लेती है।विश्व आवाज दिव...
16/04/2026

आवाज़ सिर्फ शब्द नहीं, दिल की भावनाओं का आईना होती है। मीठी और सच्ची आवाज़ हर दिल तक अपनी जगह बना लेती है।विश्व आवाज दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

वाणी है अनमोल, इसे प्यार से बोल आपकी आवाज़ आपकी पहचान है, इसे सही और सकारात्मक तरीके से इस्तेमाल करें। सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

सीबीएसई ने बुधवार को 10वीं का रिजल्ट जारी किया।DAV खगौल की छात्रा के 99.6%, बनी स्कूल टॉपर। पटना जोन का प्रदर्शन कमजोर रहा।

यहां रिजल्ट 89.33% रहा, जो पिछले साल 91.90% था। यानी 2.57% की गिरावट दर्ज की गई। पटना जोन में गिरावट का सिलसिला लगातार तीसरे साल से जारी है।
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धैर्य सिर्फ इंतज़ार नहीं है—यह विश्वास है। विश्वास कि भले ही कुछ बदलता न दिखे,अंदर ही अंदर सब सही हो रहा है।

तुम्हें हर चीज़ को जल्दी करने की ज़रूरत नहीं,न ही हर कदम को नियंत्रित करने की।

बस खुद को थामे रखो…और जीवन को अपने पक्ष में खुलने दो। अंधेरा हमेशा नहीं रहता—वह धीरे-धीरे छँटता है,
जब तुम डर की जगह विश्वास चुनते हो।


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हम कितने भी अस्त्र-शस्त्रों की खोज क्यों न कर लें, किन्तु मृत्यु के क्रूर हाथों से अपनी रक्षा नहीं कर सकते। विभिन्न वस्तुओं के निर्माण में आपने कितनी भी प्रगति क्यों न कर ली हो, आप ऐसा कुछ नहीं बना सकते जो आपको मृत्यु, बीमारी या वृद्धावस्था से रक्षा करे।

(श्रील प्रभुपाद,लॉस एन्जिलिस, 16 अप्रैल 1970 )
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श्रीमद्-भागवतम् के स्कंध 4, अध्याय 32, श्लोक 15 (SB 4.32.15) में भगवान शिव द्वारा सती के पार्थिव शरीर को देखकर दुखी होने का वर्णन है।

मूल श्लोक:
इत्युक्त्वा स रुरोदोच्चैस्तत्पार्श्वं दु:खपीडित:।
तदा तस्य यतेश्चित्ते करुणाभूद‍्गरीयसी॥ ३२.१५ ॥
हिन्दी अनुवाद:
यह कहकर (सती के पार्थिव शरीर को देखकर) वे (ऋषि/शिव) अत्यंत दुखी होकर जोर-जोर से रोने लगे। तब उस तपस्वी/योगी के चित्त में करुणा भाव अत्यंत प्रबल हो उठा।

भागवतम की आज की कक्षा (SB 4.31.15) HG Nama Nistha Das Prabhuji द्वारा 👇

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👉Bhagavad Gita Verse Of the Day:Chapter 13 Verse 18👇

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते |
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् || १८ ||

ज्योतिषाम् - समस्त प्रकाशमान वस्तुओं में; अपि - भी; तत् - वह; ज्योतिः - प्रकाश का स्त्रोत; तमसः - अन्धकार; परम् - परे; उच्यते - कहलाता है; ज्ञानम् - ज्ञान; ज्ञेयम् - जानने योग्य; ज्ञान-गम्यम् - ज्ञान द्वारा पहुँचने योग्य; हृदि - हृदय में; सर्वस्य - सब; विष्ठितम् - स्थित |

Translation👇

वे समस्त प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाशस्त्रोत हैं | वे भौतिक अंधकार से परे हैं और अगोचर हैं | वे ज्ञान हैं, ज्ञेय हैं और ज्ञान के लक्ष्य हैं | वे सबके हृदय में स्थित हैं |

Commentary👇

परमात्मा या भगवान् ही सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रों जैसी प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाशस्त्रोत हैं | वैदिक साहित्य से हमें पता चलता है कि वैकुण्ठ राज्य में सूर्य या चन्द्रमा की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि वहाँ पर परमेश्र्वर का तेज जो है | भौतिक जगत् में वह ब्रह्मज्योति या भगवान् का आध्यात्मिक तेज महत्तत्व अर्थात् भौतिक तत्त्वों से ढका रहता है | अतएव इस जगत् में हमें सूर्य, चन्द्र, बिजली आदि के प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन आध्यात्मिक जगत् में ऐसी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं होती | वैदिक साहित्य में स्पष्ट है कि वे इस भौतिक जगत् में स्थित नहीं हैं, वे तो आध्यात्मिक जगत् (वैकुण्ठ लोक) में स्थित हैं, जो चिन्मय आकाश में बहुत ही दुरी पर है | इसकी भी पुष्टि वैदिक साहित्य से होती है | आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् (श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् ३.८) | वे सूर्य की भाँति अत्यन्त तेजोमय हैं, लेकिन इस भौतिक जगत के अन्धकार से बहुत दूर हैं |
उनका ज्ञान दिव्य है | वैदिक साहित्य पुष्टि करता है कि ब्रह्म घनीभूत दिव्य ज्ञान है | जो वैकुण्ठलोक जाने का इच्छुक है, उसे परमेश्र्वर द्वारा ज्ञान प्रदान किया जाता है, जो प्रत्येक हृदय में स्थित हैं | एक वैदिक मन्त्र है (श्र्वेताश्र्वतर-उपनिषद् ६.१८) - तं ह देवम् आत्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये | मुक्ति के इच्छुक मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान् की शरण में जाय | जहाँ तक चरम ज्ञान के लक्ष्य का सम्बन्ध है, वैदिक साहित्य से भी पुष्टि होती है - तमेव विदित्वाति मृत्युमेति - उन्हें जान लेने के बाद ही जन्म तथा मृत्यु की परिधि को लाँघा जा सकता है (श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् ३.८) |
वे प्रत्येक हृदय में परम नियन्ता के रूप में स्थित हैं | परमेश्र्वर के हाथ-पैर सर्वत्र फैले हैं, लेकिन जीवात्मा के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता | अतएव यह मानना ही पड़ेगा कि कार्य क्षेत्र को जानने वाले दो ज्ञाता हैं-एक जीवात्मा तथा दूसरा परमात्मा | पहले के हाथ-पैर केवल किसी एक स्थान तक सीमित (एकदेशीय) हैं, जबकि कृष्ण के हाथ-पैर सर्वत्र फैले हैं | इसकी पुष्टि श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् में (३.१७) इस प्रकार हुई है - सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् | वह परमेश्र्वर या परमात्मा समस्त जीवों का स्वामी या प्रभु है, अतएव वह उन सबका चरम लक्ष्य है | अतएव इस बात से मना नहीं किया जा सकता कि परमात्मा तथा जीवात्मा सदैव भिन्न होते हैं |
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श्रीमद्-भागवतम् के स्कंध 4, अध्याय 32, श्लोक 15 (SB 4.32.15) में भगवान शिव द्वारा सती के पार्थिव शरीर को देखकर दुखी होने...
16/04/2026

श्रीमद्-भागवतम् के स्कंध 4, अध्याय 32, श्लोक 15 (SB 4.32.15) में भगवान शिव द्वारा सती के पार्थिव शरीर को देखकर दुखी होने का वर्णन है।

मूल श्लोक:
इत्युक्त्वा स रुरोदोच्चैस्तत्पार्श्वं दु:खपीडित:।
तदा तस्य यतेश्चित्ते करुणाभूद‍्गरीयसी॥ ३२.१५ ॥
हिन्दी अनुवाद:
यह कहकर (सती के पार्थिव शरीर को देखकर) वे (ऋषि/शिव) अत्यंत दुखी होकर जोर-जोर से रोने लगे। तब उस तपस्वी/योगी के चित्त में करुणा भाव अत्यंत प्रबल हो उठा।

भागवतम की आज की कक्षा (SB 4.31.15) HG Nama Nistha Das Prabhuji द्वारा 👇
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सीबीएसई ने बुधवार को 10वीं का रिजल्ट जारी किया।DAV खगौल की छात्रा के 99.6%, बनी स्कूल टॉपर। पटना जोन का प्रदर्शन कमजोर रहा।

यहां रिजल्ट 89.33% रहा, जो पिछले साल 91.90% था। यानी 2.57% की गिरावट दर्ज की गई। पटना जोन में गिरावट का सिलसिला लगातार तीसरे साल से जारी है।
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धैर्य सिर्फ इंतज़ार नहीं है—यह विश्वास है। विश्वास कि भले ही कुछ बदलता न दिखे,अंदर ही अंदर सब सही हो रहा है।

तुम्हें हर चीज़ को जल्दी करने की ज़रूरत नहीं,न ही हर कदम को नियंत्रित करने की।

बस खुद को थामे रखो…और जीवन को अपने पक्ष में खुलने दो। अंधेरा हमेशा नहीं रहता—वह धीरे-धीरे छँटता है,
जब तुम डर की जगह विश्वास चुनते हो।


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आज त्रिकुटा पर्वत" से अद्भुत प्राकृतिक पावन दिव्य पिंडी स्वरूप जगजननी माँ वैष्णोदेवी जी के प्रात: काल श्रृंगार के आलौकिक दर्शन करे । दर्शन के लिए फोटो अंत तक देखें।
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हम कितने भी अस्त्र-शस्त्रों की खोज क्यों न कर लें, किन्तु मृत्यु के क्रूर हाथों से अपनी रक्षा नहीं कर सकते। विभिन्न वस्तुओं के निर्माण में आपने कितनी भी प्रगति क्यों न कर ली हो, आप ऐसा कुछ नहीं बना सकते जो आपको मृत्यु, बीमारी या वृद्धावस्था से रक्षा करे।

(श्रील प्रभुपाद,लॉस एन्जिलिस, 16 अप्रैल 1970 )
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ए. सी.भक्तिवेदांत स्वामी श्रील प्रभुपाद और हमारी गुरुपरंपरा की जय हो।"संदर्भ: भगवद् गीता 4.1- 4.3" क्या आपको पता है अर्जुन से भी पहले भगवत गीता का ज्ञान करोडो वर्ष पहले सूर्य देव को दिया गया था?
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👉Bhagavad Gita Verse Of the Day:Chapter 13 Verse 18👇

ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते |
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् || १८ ||

ज्योतिषाम् - समस्त प्रकाशमान वस्तुओं में; अपि - भी; तत् - वह; ज्योतिः - प्रकाश का स्त्रोत; तमसः - अन्धकार; परम् - परे; उच्यते - कहलाता है; ज्ञानम् - ज्ञान; ज्ञेयम् - जानने योग्य; ज्ञान-गम्यम् - ज्ञान द्वारा पहुँचने योग्य; हृदि - हृदय में; सर्वस्य - सब; विष्ठितम् - स्थित |

Translation👇

वे समस्त प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाशस्त्रोत हैं | वे भौतिक अंधकार से परे हैं और अगोचर हैं | वे ज्ञान हैं, ज्ञेय हैं और ज्ञान के लक्ष्य हैं | वे सबके हृदय में स्थित हैं |

Commentary👇

परमात्मा या भगवान् ही सूर्य, चन्द्र तथा नक्षत्रों जैसी प्रकाशमान वस्तुओं के प्रकाशस्त्रोत हैं | वैदिक साहित्य से हमें पता चलता है कि वैकुण्ठ राज्य में सूर्य या चन्द्रमा की आवश्यकता नहीं पड़ती, क्योंकि वहाँ पर परमेश्र्वर का तेज जो है | भौतिक जगत् में वह ब्रह्मज्योति या भगवान् का आध्यात्मिक तेज महत्तत्व अर्थात् भौतिक तत्त्वों से ढका रहता है | अतएव इस जगत् में हमें सूर्य, चन्द्र, बिजली आदि के प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन आध्यात्मिक जगत् में ऐसी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं होती | वैदिक साहित्य में स्पष्ट है कि वे इस भौतिक जगत् में स्थित नहीं हैं, वे तो आध्यात्मिक जगत् (वैकुण्ठ लोक) में स्थित हैं, जो चिन्मय आकाश में बहुत ही दुरी पर है | इसकी भी पुष्टि वैदिक साहित्य से होती है | आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् (श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् ३.८) | वे सूर्य की भाँति अत्यन्त तेजोमय हैं, लेकिन इस भौतिक जगत के अन्धकार से बहुत दूर हैं |
उनका ज्ञान दिव्य है | वैदिक साहित्य पुष्टि करता है कि ब्रह्म घनीभूत दिव्य ज्ञान है | जो वैकुण्ठलोक जाने का इच्छुक है, उसे परमेश्र्वर द्वारा ज्ञान प्रदान किया जाता है, जो प्रत्येक हृदय में स्थित हैं | एक वैदिक मन्त्र है (श्र्वेताश्र्वतर-उपनिषद् ६.१८) - तं ह देवम् आत्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये | मुक्ति के इच्छुक मनुष्य को चाहिए कि वह भगवान् की शरण में जाय | जहाँ तक चरम ज्ञान के लक्ष्य का सम्बन्ध है, वैदिक साहित्य से भी पुष्टि होती है - तमेव विदित्वाति मृत्युमेति - उन्हें जान लेने के बाद ही जन्म तथा मृत्यु की परिधि को लाँघा जा सकता है (श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् ३.८) |
वे प्रत्येक हृदय में परम नियन्ता के रूप में स्थित हैं | परमेश्र्वर के हाथ-पैर सर्वत्र फैले हैं, लेकिन जीवात्मा के विषय में ऐसा नहीं कहा जा सकता | अतएव यह मानना ही पड़ेगा कि कार्य क्षेत्र को जानने वाले दो ज्ञाता हैं-एक जीवात्मा तथा दूसरा परमात्मा | पहले के हाथ-पैर केवल किसी एक स्थान तक सीमित (एकदेशीय) हैं, जबकि कृष्ण के हाथ-पैर सर्वत्र फैले हैं | इसकी पुष्टि श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् में (३.१७) इस प्रकार हुई है - सर्वस्य प्रभुमीशानं सर्वस्य शरणं बृहत् | वह परमेश्र्वर या परमात्मा समस्त जीवों का स्वामी या प्रभु है, अतएव वह उन सबका चरम लक्ष्य है | अतएव इस बात से मना नहीं किया जा सकता कि परमात्मा तथा जीवात्मा सदैव भिन्न होते हैं |
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SRI SRI RADHA GOVINDA TEMPLE, Kulai, Mangaluru"Bhagavad Gita Residential College"By the mercy of Srila Prabhupada, we have received the priceless gift of Bha...

15/04/2026

गृह समेत 29 विभाग संभालेंगे CM सम्राट चौधरी:* JDU के पास 18 विभाग; मुख्यमंत्री से मिलने पहुंचे विजय सिन्हा समेत बीजेपी-जदयू के कई विधायक
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आज बिहार के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने पर श्री सम्राट चौधरी जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। मुझे विश्वा...
15/04/2026

आज बिहार के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण करने पर श्री सम्राट चौधरी जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। मुझे विश्वास है कि आपके नेतृत्व में बिहार और तेजी से विकसित होगा और देश के सर्वाधिक विकसित राज्यों की श्रेणी में शामिल होगा।

"कोई भी महान नहीं है... असामोर्ध्व। उनसे बड़ा कोई नहीं है। उनके बराबर कोई नहीं है। सब उनसे छोटे हैं। एकले ईश्वर कृष्ण आर...
15/04/2026

"कोई भी महान नहीं है... असामोर्ध्व। उनसे बड़ा कोई नहीं है। उनके बराबर कोई नहीं है। सब उनसे छोटे हैं। एकले ईश्वर कृष्ण आरा सब भृत्य। एकमात्र स्वामी कृष्ण हैं, भगवान; और सब उनके सेवक हैं।"

(श्रील प्रभुपाद,श्रीमद् भागवतम् 1.8.23 पर दिए गए एक व्याख्यान से, जो 15 अप्रैल 1973 को लॉस एंजिल्स स्थित इस्कॉन न्यू द्वारका में आयोजित किया गया था।)
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इस्कॉन मैंगलोर से L4 सर्टिफिकेट प्राप्त करने का एक वर्ष पूरा होने का जश्न।
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#ब्रेकिंगन्यूज़

कला वो भाषा है जो दिल से दिल तक पहुंचती है ।“हर रंग में एक नई दुनिया छुपी होती है” देश के सभी कलाकारों को विश्व कला दिवस...
15/04/2026

कला वो भाषा है जो दिल से दिल तक पहुंचती है ।“हर रंग में एक नई दुनिया छुपी होती है” देश के सभी कलाकारों को विश्व कला दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
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मासिक शिवरात्रि और बुध प्रदोष व्रत की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। देवों के देव महादेव और माता पार्वती की कृपा आप पर सदैव बनी रहे। इस पावन अवसर पर आपके जीवन से सभी विघ्न दूर हों और खुशियों का नया सवेरा हो।

सिख धर्म के संस्थापक और प्रथम गुरु गुरु नानक देव की जयंती पर उन्हें शत् शत् नमन।

ऐतिहासिक दस्तावेजों और ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार गुरु नानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल 1469 को तलवंडी में हुआ ।

दस सिख गुरुओं में से पांचवें गुरु व संस्कृति की रक्षा के लिए महान आत्म-बलिदान देने वाले शहीद शिरोमणि

गुरु अर्जुन देव जी की जयंती पर उन्हें बारंबार प्रणाम।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयः हे ईश्वर मेरे समस्त मित्रों व परिवार को सुखी रखना..। हरि अनंत हरि कथा अनंता । कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता ॥ आज त्रिकुटा पर्वत" से अद्भुत प्राकृतिक पावन दिव्य पिंडी स्वरूप जगजननी माँ वैष्णोदेवी जी के प्रात: काल श्रृंगार के आलौकिक दर्शन करे । दर्शन के लिए फोटो अंत तक देखें।
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जब मन अशांत होता है,तो वह हर जगह समाधान ढूंढता है।
लेकिन ईश्वर की स्मृति में,उत्तर अपने आप स्पष्ट हो जाता है।
सही समाधान सोचने से नहीं, परमात्मा से जुड़े शांत मन से मिलता है।


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जो व्यक्ति ईर्ष्यालु और द्वेष रखने वाले होते हैं, वे इस भौतिक जगत में संलिप्त रहते हैं और जो इस प्रकार की उद्विग्नता से परे होते हैं वे आध्यात्मिक जगत से संबंध रखने वाले होते हैं।

(श्रील प्रभुपाद,15 अप्रैल 1973, लॉस एंजेल्स)
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मेरे प्रिय शिष्यों, तुम श्रीकृष्ण के चरणकमलों की महिमाओं का प्रचार करने के लिए कितना कठिन परिश्रम कर रहे हो और इसलिए मेरे गुरु महाराज तुमसे बहुत प्रसन्न होंगे। निश्चित् ही मेरे गुरु महाराज मुझसे हजारों गुणा अधिक तुमपर अपना आशीर्वाद बरसायेंगे, और यही मेरी सन्तुष्टि है। सभी भक्तों की जय हो।

(श्रील प्रभुपाद,शिष्यों को पत्र, 15 अप्रैल 1973 )
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श्रीमद्-भागवतम् 4.31.14 (SB 4.31.14) भगवान कृष्ण की पूजा के महत्व को बताता है, जैसे वृक्ष की जड़ में जल देने से टहनियाँ और शाखाएं स्वतः ही तृप्त हो जाती हैं। यह श्लोक कहता है कि भगवान अच्युत (कृष्ण) की भक्ति से ही सभी देवताओं और जीवों की पूजा पूर्ण हो जाती है, वैसे ही जैसे पेट को भोजन देने से शरीर की सभी इंद्रियां संतुष्ट हो जाती हैं।

भागवतम की आज की कक्षा (SB 4.31.14) HG Nama Nistha Das Prabhuji द्वारा 👇

🕉️Shloka No. : 4️⃣.3️⃣ 1️⃣. 1️⃣4️⃣
ⓥ Link : https://vedabase.io/en/library/sb/4/31/14/

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👉Bhagavad Gita Verse Of the Day:Chapter 18 Verse 47👇

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् |
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् || ४७ ||

श्रेयान्– श्रेष्ठ; स्व-धर्मः– अपना वृत्तिपरक कार्य; विगुणः– भलीभाँति सम्पन्न न होकर; पर-धर्मात्– दूसरे के वृत्तिपरक कार्य से; सु-अनुष्ठितात् –भलीभाँति किया गया; स्वभाव-नियतम् – स्वभाव के अनुसार संस्तुत; कर्म– कर्म;कुर्वन्– करने से; न– कभी नहीं; आप्नोति– प्राप्त करता है; किल्बिषम्– पापोंको |

Translation👇

अपने वृत्तिपरक कार्य को करना, चाहे वह कितना ही त्रुटिपूर्ण ढंग सेक्यों न किया जाय, अन्य किसी के कार्य को स्वीकार करने और अच्छी प्रकार करने की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है | अपने स्वभाव के अनुसार निर्दिष्ट कर्म कभी भी पाप से प्रभावित नहीं होते |

Commentary👇

भगवद्गीता में मनुष्य के वृत्तिपरक कार्य (स्वधर्म) कानिर्देश है | जैसा कि पूर्ववर्ती श्लोकों में वर्णन हुआ है, ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य तथा शुद्र के कर्तव्य उनके विशेष प्राकृतिक गुणों (स्वभाव) के द्वारानिर्दिष्ट होते हैं | किसी को दूसरे के कार्य का अनुकरण नहीं करना चाहिए | जोव्यक्ति स्वभाव से शुद्र के द्वारा किये जाने वाले कर्म के प्रति आकृष्ट हो, उसेअपने आपको झूठे ही ब्राह्मण नहीं कहना चाहिए, भले ही वह ब्राह्मण कुल में क्यों नउत्पन्न हुआ हो | इस तरह प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि अपने स्वभाव के अनुसारकार्य करे; कोई भी कर्म निकृष्ट (गर्हित) नहीं है, यदि वह परमेश्र्वर की सेवा केलिए किया जाय | ब्राह्मण का वृत्तिपरक कार्य निश्चित रूप से सात्त्विक है, लेकिनयदि कोई मनुष्य स्वभाव से सात्त्विक नहीं है, तो उसे ब्राह्मण के वृत्तिपरक कार्य (धर्म)का अनुकरण नहीं करना चाहिए | क्षत्रिय या प्रशासक के लिए अनेक गर्हित बातें हैं –क्षत्रिय को शत्रुओं का वध करने के लिए हिंसक होना पड़ता है और कभी-कभी कूटनीति मेंझूठ भी बोलना पड़ता है | ऐसी हिंसा तथा कपट राजनितिक मामलों में चलता है, लेकिनक्षत्रिय से यह आशा नहीं की जाती कि वह अपने वृत्तिपरक कर्तव्य त्याग कर ब्राह्मणके कार्य करने लगे |

मनुष्य को चाहिए कि परमेश्र्वर को प्रसन्न करने के लिए कार्य करे |उदाहरणार्थ, अर्जुन क्षत्रिय था | वह दूसरे पक्ष से युद्ध करने से बच रहा था |लेकिन यदि ऐसा युद्ध भगवान् कृष्ण के लिए करना पड़े, तो पतन से घबराने की आवश्यकतानहीं है | कभी-कभी व्यापारिक क्षेत्र में भी व्यापारी को लाभ कमाने के लिए झूठबोलना पड़ता है | यदि वह ऐसा नहीं करे तो उसे लाभ नहीं हो सकता | कभी-कभी व्यापारीकहता है, “अरे मेरे ग्राहक भाई! मैंआपसे कोई लाभ नहीं ले रहा |” लेकिन हमें समझना चाहिए कि व्यापारी बिना लाभ केजीवित नहीं रह सकता | अतएव यदि व्यापारी यह कहता है कि वह कोई लाभ नहीं ले रहा है तोइसे एक सरल झूठ समझना चाहिए | लेकिन व्यापारी को यह नहीं सोचना चाहिए कि चूँकि वहऐसे कार्य में लगा है, जिसमें झूठ बोलना आवश्यक है , अतएव उसे इस व्यवसाय (वैश्यकर्म) को त्यागकर ब्राहमण की वृत्ति ग्रहण करनी चाहिए | इसकी शास्त्रों द्वारासंस्तुति नहीं की गई | चाहे कोई क्षत्रिय हो, वैश्य हो या शुद्र, यदि वह इस कार्यसे भगवान् की सेवा करता है, तो कोई आपत्ति नहीं है | कभी-कभी विभिन्न यज्ञों कासम्पादन करते समय ब्राह्मणों को भी पशुओं की हत्या करनी होती है, क्योंकि इनअनुष्ठानों में पशु की बलि देनी होती है | इसी प्रकार यदि क्षत्रिय अपने कार्य में लगा रहकर शत्रु का वध करता है,तो उस पर पाप नहीं चढ़ता | तृतीय अध्याय में इन बातों की स्पष्ट एवं विस्तृतव्याख्या हो चुकी है | हर मनुष्य को यग्य के लिए अथवा भगवान् विष्णु के लिए कार्यकरना चाहिए | निजी इन्द्रियतृप्ति के लिए किया गया कोई भी कार्य बन्धन का कारण है |निष्कर्ष यह निकलता है कि मनुष्य को चाहिए कि अपने द्वारा अर्जित विशेष गुण केअनुसार कार्य में प्रवृत्त हो और परमेश्र्वर की सेवा करने के लिए ही कार्य करने कानिश्चय करे |
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