07/08/2026
खबर लखनऊ :विश्व स्तनपान सप्ताह(1-7 अगस्त) पर विशेष
परिवार और कार्यालय का साथ मिला तो छह माह तक करा सकीं केवल स्तनपान
जतिन कुमार चतुर्वेदी
30 वर्षीय शगुन (परिवर्तित नाम), जो एक निजी कॉलेज में शिक्षिका हैं, ने बेटे के जन्म के बाद पहले छह माह तक केवल माँ का दूध (एक्सक्लूसिव ब्रेस्टफीडिंग-ईबीएफ) पिलाने का संकल्प लिया था लेकिन मातृत्व अवकाश समाप्त होने का समय नजदीक आते ही परिवार ने शिशु को बोतल से दूध देने की सलाह देनी शुरू कर दी। बच्चे के बार-बार रोने को माँ के दूध की कमी समझा जाने लगा, जिससे उनका आत्मविश्वास प्रभावित हुआ।
शगुन ने चिकित्सक डॉ. गीतांजलि से सलाह ली। उन्होंने परिवार को समझाया कि पहले छह माह तक माँ के दूध के अलावा किसी अन्य आहार या पानी की जरूरत नहीं होती तथा आवश्यकता पड़ने पर स्तनदूध निकालकर सुरक्षित रखा जा सकता है। इसके बाद पति ने बच्चे की देखभाल में जिम्मेदारी निभाई, सास ने केवल स्तनपान का समर्थन किया और कार्यालय ने फ्लेक्सिबल वर्किंग आवर्स की सुविधा दी। शगुन कहती हैं, "जब परिवार, डॉक्टर और कार्यालय तीनों ने साथ दिया, तब मुझे लगा कि यह सिर्फ मेरी नहीं, बल्कि पूरे सहयोगी तंत्र की जिम्मेदारी है।"
शगुन की कहानी बताती है कि पहले छह माह तक केवल स्तनपान तभी संभव है, जब माँ को परिवार, स्वास्थ्यकर्मियों और कार्यस्थल का पूरा सहयोग मिले।
विश्व स्तनपान सप्ताह (1–7 अगस्त) की इस वर्ष की थीम "Breastfeeding for a Sustainable Start in Life: Strengthen What Works" इसी सहयोगी तंत्र को मजबूत करने का संदेश देती है। वहीं इन्फैंट मिल्क सब्स्टीट्यूट्स (IMS) अधिनियम, 1992 शिशु पोषण से जुड़ी सही और वैज्ञानिक जानकारी परिवारों तक पहुँचाने तथा फार्मूला मिल्क के भ्रामक प्रचार पर रोक लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश के बाद केवल स्तनपान जारी रखना आसान नहीं होता। कार्यस्थल पर सहयोग की कमी, घरेलू जिम्मेदारियाँ और परिवार से मिलने वाली अलग-अलग सलाह इसे चुनौतीपूर्ण बना देती हैं। ऐसे में जरूरत माँ को दोष देने की नहीं, बल्कि उसे आवश्यक सहयोग देने की है।
निजी कंपनी की प्रमुख कीर्ति बताती हैं कि उनकी कंपनी में कई महिलाएँ कार्यरत हैं, जिनमें कुछ छोटे बच्चों की माताएँ भी हैं। ऐसी महिलाओं को आवश्यकता के अनुसार लचीले कार्य घंटे दिए जाते हैं, ताकि वे शिशु की देखभाल और काम के बीच बेहतर संतुलन बना सकें। कई माताएँ घर से निकलने से पहले स्तनदूध निकालकर उसे रेफ्रिजरेटर में सुरक्षित रखती हैं, जिसे उनकी अनुपस्थिति में परिवार का कोई सदस्य शिशु को पिला देता है। वह कहती हैं, "यदि कार्यस्थल माताओं की जरूरतों को समझते हुए सहयोगी माहौल उपलब्ध कराए, तो वे बिना तनाव के केवल स्तनपान जारी रख सकती हैं। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और कार्य के प्रति उनका जुड़ाव भी मजबूत होता है।"
क्वीन मेरी अस्पताल की स्त्री एवं प्रसूति रोग विभागाध्यक्ष डॉ. अंजू अग्रवाल बताती हैं कि अधिकांश माताएँ छह माह तक केवल स्तनपान कराना चाहती हैं, लेकिन चुनौती उनकी इच्छा नहीं बल्कि परिस्थितियाँ होती हैं। उनका कहना है कि जब परिवार और कार्यस्थल दोनों का सहयोग मिलता है, तो माताओं के लिए पहले छह माह तक केवल स्तनपान कराना संभव हो जाता है। यदि पति और परिवार के अन्य सदस्यों को भी परामर्श का हिस्सा बनाया जाए, तो सही सलाह व्यवहार में उतरना आसान हो जाता है। उनके अनुसार IMS Act परिवारों तक शिशु पोषण से जुड़ी प्रमाण-आधारित और निष्पक्ष जानकारी पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
वीरांगना अवन्तीबाई जिला महिला अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सलमान खान कहते हैं कि यदि कोई माँ केवल स्तनपान नहीं करा पा रही है, तो उसकी परिस्थितियों को समझना जरूरी है। उनके अनुसार क्रेच, स्तनपान या स्तनदूध निकालने के लिए सुरक्षित स्थान, दूध सुरक्षित रखने की सुविधा, लचीले कार्य घंटे और स्तनपान अवकाश जैसी व्यवस्थाएँ कामकाजी माताओं के लिए बेहद मददगार हैं। उन्होंने बताया कि यूपीटीएसयू जैसे संस्थानों में क्रेच की व्यवस्था है, जिससे माताएँ कार्य के दौरान भी आवश्यकता पड़ने पर शिशु को स्तनपान करा सकती हैं।
वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. पियाली भट्टाचार्य बताती हैं कि जन्म के पहले घंटे में स्तनपान शुरू करना और पहले छह माह तक केवल माँ का दूध पिलाना शिशु के लिए सबसे लाभकारी है। इससे शिशु को संपूर्ण पोषण मिलता है, संक्रमण का खतरा कम होता है और उसके शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक विकास की मजबूत नींव पड़ती है। साथ ही माँ में प्रसवोत्तर रक्तस्राव तथा स्तन और डिम्बग्रंथि कैंसर का खतरा भी कम होता है।
विश्व स्तनपान सप्ताह का संदेश स्पष्ट है कि पहले छह माह तक केवल स्तनपान सुनिश्चित करना केवल माँ की नहीं, बल्कि परिवार, समुदाय, स्वास्थ्य व्यवस्था और कार्यस्थल की साझा जिम्मेदारी है। जब परिवार का साथ, कार्यस्थल का सहयोग, स्वास्थ्य सेवाओं का मार्गदर्शन और सही जानकारी एक साथ मिलती है, तभी हर शिशु को जीवन की सबसे स्वस्थ शुरुआत माँ के दूध से मिल पाती है।