29/09/2020
हाथरस गैंगरेप की घटना के बारे में पढने के बाद लगता ही नहीं कि मनुष्य इक्कीसवीं सदी में पहुचा है। प्रस्तर युग के आदिमानव भी किसी लड़की के साथ इतना वीभत्स व्यवहार नहीं करेंगे जैसे उस बेचारी लड़की के साथ किया गया।
नहीं नहीं। ये गैंगरेप भर नहीं है। ये उससे अधिक कुछ और है जिसको रोकने का कोई कानून कभी बन ही नहीं सकता। अभी भी इतने सारे कानूनी प्रावधानों के बाद इतनी दबंगई कि लड़की दलित है तो बस उसके साथ जैसा चाहेंगे सलूक करेंगे? ये किस बात का श्रेष्ठताबोझ है? आप दबंग है इस बात का? आप के पास दौलत है इस बात का? समाज ने मान दिया है इस बात का?
जरा दुस्साहस देखिए इन कमीनों का। गांव के एक दबंग परिवार के चार लौंडों ने सिर्फ गैंगरेप ही नहीं किया बल्कि ऐसा सुलूक किया कि उसे मरने के कगार पर पहुंचा दिया. ये है दबंगई? इसी दबंगई के लिए आप समाज में सम्मान पाना चाहते हैं?
थू है ऐसी दबंगई पर जो तुम्हें अपने ही समाज के लोगों के प्रति राक्षस बना देती है। डूब मरो कहीं चुल्लू भर पानी में। तुम समाज के लायक हो ही नहीं राक्षसों।
दोषियों की फांसी भी न्याय नहीं दे सकती ऐसी पीड़िता को. क्या ऐसा कोई न्याय है जो उस बेइंतेहा दर्द से छटपटाती लड़की की आत्मा को शांति दे सके? शायद नहीं! बिल्कुल नहीं!!