26/09/2026
🕉️ पितृपक्ष विशेष
पितृपक्ष पर विशेष चर्चा पंडित सुजित कुमार शास्त्री जी के साथ...
🕉️ श्राद्ध का अन्न ग्रहण करना चाहिए या नहीं, साथ ही श्राद्ध में किस-किस को निमन्त्रित करें?
श्राद्ध केवल भोजन कराने की परम्परा नहीं, अपितु श्रद्धा, विधि और शास्त्रीय मर्यादा से सम्पन्न किया जाने वाला पितृकर्म है। अतः श्राद्ध में किसे निमन्त्रित किया जाए और किसे भोजन कराया जाए, इसका भी शास्त्रों में विशेष विधान बताया गया है।
📜 शास्त्रवचन—
मातामहं मातुलं च स्वस्रीयं श्वशुरं गुरुम्।
दौहित्रं जामातरं बन्धुमृत्विजं याज्य एव च॥
अर्थात्—
नाना, मामा, भानजा, श्वसुर, गुरु, दौहित्र, जामाता, बान्धव, ब्राह्मण तथा यज्ञकर्ता आदि को श्राद्ध में भोजन कराने का विधान बताया गया है।
श्राद्धकाल आने पर समीप रहने वाले दामाद, भानजे तथा बहन आदि सम्बन्धियों को केवल काम, क्रोध या भय के कारण न बुलाकर केवल अन्य लोगों को भोजन कराने की प्रवृत्ति उचित नहीं मानी गई है।
📜 शास्त्रवचन—
नाश्नन्ति तस्य वै गेहे पितरो विप्रवर्जिताः।
शापं दत्त्वा ततो यान्ति श्राद्धाद्विप्रं विवर्जितात्॥
महापापी भवेत्सोऽपि ब्रह्महा स च कथ्यते॥
अर्थ—
श्राद्ध में ब्राह्मण को निमन्त्रित करना शास्त्रीय विधान का महत्वपूर्ण अंग है। ब्राह्मण-विहीन श्राद्ध को शास्त्रों में दोषपूर्ण बताया गया है। इसलिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार विधिपूर्वक ब्राह्मण को आमन्त्रित कर श्राद्धकर्म सम्पन्न करना चाहिए।
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🔱 श्राद्ध में कितने ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए?
📜 शास्त्रवचन—
द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे॥
अर्थात्—
देवकार्य में दो तथा पितृकार्य में तीन ब्राह्मण, अथवा दोनों कार्यों में एक-एक ब्राह्मण को भोजन कराने का विधान बताया गया है।
अत्यन्त सम्पन्न व्यक्ति को भी श्राद्धकर्म में अनावश्यक विस्तार नहीं करना चाहिए। श्राद्ध की महत्ता संख्या में नहीं, श्रद्धा और विधि में है।
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❌ क्या श्राद्ध को मित्रता का साधन बनाना उचित हैं?
📜 शास्त्रवचन—
यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हविंषि च।
न प्रीणन्ति पितॄन् देवान् स्वर्गं च न स गच्छति॥
अर्थ—
जिस श्राद्ध में मित्रों की प्रधानता हो जाती है, वहाँ श्राद्धकर्म की मूल भावना प्रभावित होती है। श्राद्ध को केवल मित्र-सम्मेलन अथवा सम्बन्ध बढ़ाने का साधन नहीं बनाना चाहिए।
शास्त्रीय दृष्टि से श्राद्ध में ऐसे व्यक्ति को भोजन कराने की बात कही गई है जो न शत्रु हो, न अत्यन्त घनिष्ठ मित्र—अपितु मध्यस्थ भाव वाला हो।
अतः मित्रों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्धभोज का आयोजन करना उचित नहीं माना गया है। मित्रों के प्रति स्नेह और सम्मान अपने स्थान पर है, परन्तु पितृकर्म की मर्यादा अपने स्थान पर।
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🙏 पितृपूजन का क्या फल प्राप्त होता हैं
📜 शास्त्रवचन—
आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्॥
अर्थ—
पितरों का विधिपूर्वक पूजन करने से आयु, संतान, यश, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, सुख, धन और धान्य की प्राप्ति का शास्त्रों में वर्णन मिलता है।
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❓ प्रश्न—श्राद्ध का अन्न ग्रहण करना चाहिए या नहीं?
✅ उत्तर—
घर के स्वजन श्राद्ध का अन्न ग्रहण करें तो सामान्यतः दोष नहीं माना जाता, क्योंकि श्राद्ध करने वाला और दिवंगत व्यक्ति परस्पर स्वजन होते हैं।
परन्तु अन्य लोगों को बिना आवश्यकता अथवा बिना उचित विधि के श्राद्ध का अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।
यदि श्राद्ध का अन्न बच जाए तो उसे मनमाने ढंग से वितरित करने के स्थान पर विधि जानने वाले ब्राह्मण से पूछकर उसका उचित उपयोग करना चाहिए।
विशेष रूप से मृत्यु के पश्चात् होने वाले प्रारम्भिक कर्मों के अन्न के सम्बन्ध में शास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करना आवश्यक है। ऐसे अवसरों पर बचे हुए अन्न के विषय में कर्म की विधि और कुलाचार के अनुसार निर्णय करना चाहिए।
वार्षिक श्राद्ध एवं पितृपक्ष में भी श्राद्ध के अन्न को सामान्य भोज की तरह सबको, हर स्थान पर और बिना विचार के वितरित करना शास्त्रीय भावना के अनुरूप नहीं है।
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🚩 विशेष स्मरण
श्राद्ध दिखावे का नहीं, श्रद्धा का विषय है।
श्राद्ध भोज का नहीं, पितृऋण के स्मरण और तर्पण का कर्म है।
इसलिए श्राद्ध में—
🔸 योग्य व्यक्ति को ही निमन्त्रित करें।
🔸 ब्राह्मण को शास्त्रीय विधि से भोजन कराएँ।
🔸 अनावश्यक विस्तार और दिखावे से बचें।
🔸 मित्रता अथवा सामाजिक प्रदर्शन को श्राद्ध का आधार न बनाएँ।
🔸 अन्न के विषय में अपने कुलाचार एवं शास्त्रीय विधि का पालन करें।
🙏 श्राद्ध की पवित्रता बनाए रखें—
श्राद्ध का भोजन सबको, सब स्थान पर नहीं करना चाहिए।
🙇 जयश्रीसीताराम 🙇