K K Vaishali Hindi News

K K Vaishali Hindi News समाज का बेहतरीन आईना दिखाने वाला न्यूज चैनल

29/09/2026

जिस सरकार का मुखिया अनपढ़-अपराधी है, उसके रहते बिहार में अपराधमुक्त शासन की बात बेईमानी

29/09/2026

कोशी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के प्रत्याशी रजनीश रंजन के लिए की वोट अपील, बोले- 5 अक्टूबर को होगा नामांकन, :- पीके

28/09/2026

ऐसे जानलेवा सड़क निर्माण कार्य के लिए संवेदक को मिलना चाहिए शाबाशी मिलना चाहिए यह कोई और सड़क नहीं बल्कि भगवानपुर थाना होते हुए टोटाहा को जाती हैं।

*जीवित्पुत्रिका व्रत के विवाद का मुख्य कारण* •••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••अनेक वर्षो से यह जीवित्पुत्रिका व्...
27/09/2026

*जीवित्पुत्रिका व्रत के विवाद का मुख्य कारण*
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
अनेक वर्षो से यह जीवित्पुत्रिका व्रत सप्तमी युक्त अष्टमी के संदर्भ में मनाने पर विवाद का विषय रहा है।
इस संबंध में जीवित्पुत्रिका व्रत कथा में उल्लेख एक वचन से है।
" *उपोष्य चाऽष्टमी राजन सप्‍तमी रहिता शिवा यस्यामुदयते भानुः पारण नवमीदिने l "* *वर्जनीया प्रयत्नेन अन्यथा फलहानिः। स्यात सौभाग्यं नश्यति ध्रुवम् ।।*
अर्थात सप्तमी रहित उदयाष्टमी में इस व्रत को करना चाहिए अन्यथा यह व्रत निष्फल तथा असौभाग्यशाली होगा।
अतः कथा अनुसार शुद्ध अष्टमी के ग्राह्य हेतु तथा सप्तमी युक्त अष्टमी में इस व्रत को त्याग देंने के विषय में लिखे जाने के कारण जीवित्पुत्रिका व्रत के निर्णय में यह वचन विवाद का विषय रहा है।
अतः अलग अलग पंचांगकारो द्वारा व्रत- पूजन तथा पारण हेतु सप्तमी युक्त अष्टमी तथा उदय अष्टमी के आधार पर अलग अलग दिनों को ग्रहण किया है तथा करते रहे हैं।
जिससे इस तरह की परिस्तिथियों में धर्म परायण जनता के समक्ष भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
अतः सरल शब्दों में अपने विचारों को धर्म परायण जनता के समक्ष रखना चाहूंगा। जिससे धर्म परायण जनता को जीवित्पुत्रिका व्रत करने हेतु स्वयं उचित निर्णय ले सके।

*जीवित्पुत्रिका व्रत की श्रेणी तथा पूजन काल और समय क्या है।*
••••••••••••••••••••••••••••••••••

'जीवित्पुत्रिका व्रत काम्य व्रत श्रेणी में आता है यह व्रत किसी विशेष तिथि में विशेष कामना द्वारा किया जाने वाला व्रत है. यह व्रत उसके कर्म योग्य चंद्र मास आश्विन कृष्ण पक्ष के अष्टमी तिथि में व्रत रखकर तथा धर्म शास्त्रों द्वारा निर्देशित मुख्यकाल प्रदोष काल में राजा जीमूत वाहन का पूजन करना चाहिए.

‘जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण काल कब होता हैl
**********************************
इस व्रत का पारण रात्रि नवमी तिथि में करने का निषेध है.
इस व्रत का पारण प्रदोष में अष्टमी पूजन उपरांत दूसरे दिन सूर्योदय नवमी में यदि वह उदय अष्टमी हो पश्चात नवमी प्राप्ति हो वही अष्टमीयुक्त नवमी में अथवा शुद्ध नवमी में पारण होगा (युग्म वाक्य आधारित) न कि दशमी युक्त नवमी में।
अतः जीवित्पुत्रिका व्रत में पारण हेतु नवमी तिथि की सूर्य उदय से व्याप्ति तथा अव्याप्ति के आधार पर अष्टमी तिथि से नवमी तिथि युक्त के युग्म वाक्यों के आधार पर जीवित्पुत्रिका व्रत के पारण का निर्णय करते हैं तथा पारण के निर्णय के आधार पर जीवित्पुत्रिका व्रत हेतु उपवास तथा पूजन का निर्णय होता है।
आगे लेख में इसे स्पष्ट किया गया है।

*व्रत त्योहारों को करने सम्बन्धित कुछ विषय*
••••••••••••••••••••••••••••••
*1-* व्रत त्योहारों में वृद्धिगामिनी(आगे बढ़ती हुई) तिथि का उसके शास्त्रों द्वारा निर्देशित मुख्य काल से स्पर्श ही ग्राह्य है।

*2-* किसी उपवास पूजन में पूजन मुख्य होता है उपवास उसका अंग होता है.

*3-* मानसिक, कायिक व वाचिक रूप से शुद्ध होकर पूजन करने हेतु उपवास किया जाता है.

*4-* व्रत-उपवास उस विशेष तिथि के लिए सूर्योदय से प्रारम्भ होता है तथा दूसरे सूर्योदय तक चलता है पश्चात उस व्रत-उपवास का शास्त्रों द्वारा निर्धारित तिथि में पारण द्वारा समाप्ति की जाती है.

*5-* *मध्याह्न स्पर्श तिथि का व्रत- पूजन , त्योहारों के विषय में महत्व -*
सूर्योदय से मध्याह्न स्पर्श तिथि का व्रत- पूजन , त्योहारों हेतु विशेष भूमिका है। तिथि का सूर्योदय से अथवा मध्याह्न से स्पर्श होकर मुख्य काल में रहना उस तिथि के गुणों में वृद्धि करता है तथा मध्याह्न स्पर्श वह तिथि व्रत- पूजन त्योहारों हेतु पूर्ण मानी जाती है।

*6-* यदि किसी व्रत- पर्व -उत्सव- पूजन को मनाने हेतु दोनो दिन मुख्य काल में वह विशेष तिथि नहीं प्राप्त होती तो युग्म वाक्य आधारित तिथि विषय को छोड़कर वह तिथि सूर्योदय से मध्याह्न स्पर्श होने के कारण उस व्रत- पर्व -उत्सव- पूजन के कृत्य हेतु प्रमुख मानी जाती है।

*7- युग्म वाक्य क्या है--* खंड तिथियों का पूर्व तथा बाद की तिथि से युक्त होने के आधार पर जब तिथि दोनों दिन मुख्य काल में न मिले भले ही दूसरे दिन सूर्योदय कालीन तिथि हो तब मुख्य काल में अप्राप्ति होने पर भी पूर्व दिन व्रत-उपवास हेतु निर्णय लेना युग्म वाक्यों पर आधारित निर्णय कहलाता है। जैसे-- तृतीया तिथि युक्त चतुर्थी व्रत, नवरात्रि में अष्टमी और नवमी तिथि, 6 तिथि युक्त सप्तमी तिथि आदि आदि।
•••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••

-- *विवादित व्रत-उपवास के विषय में ग्राह्य तिथि का निर्धारण--*

तिथि का प्रारम्भ तथा समाप्ति अहोरात्र (संपूर्ण दिन रात)में कभी भी हो सकता है. तिथि दो प्रकार की होती है

*(1)संपूर्ण तिथि ----* जिस तिथि का विस्तार पहले सूर्योदय से लेकर दूसरे सूर्योदय तक होता है वहीं संपूर्ण तिथि कहलाती है. इस तिथि में संपन्न होने वाले किसी धार्मिक कार्य में विवाद नहीं होता.

*(2)खंड तिथि ----* जो तिथि सूर्योदय के पश्चात दिन या रात मे कभी भी प्रारम्भ हो वह खंड तिथि कहलाती है. व्रत त्योहारों में यदि तिथि विस्तार हो कर उस व्रत त्योहारों के कर्मानुष्ठान योग्य काल अर्थात मुख्य काल को स्पर्श नहीं करती तब उस धार्मिक कृत्य को मनाने के संदर्भ में विवाद होता है. अन्यथा यदि वह तिथि खंड तिथि उस मुख्य काल में हो तो उसी में व्रत-उपवास और त्योंहारो को मनाया जाएगा.
यदि दोनों ही दिन मुख्य काल में व्रत उपवास हेतु ग्राह्य तिथि का अभाव हो तो उस विशेष तिथि का सूर्योदयकालीन से मध्याह्न स्पर्श हो तो वही ग्राह्य करेगे l

यहां खंड तिथि के वृद्धिगामिनी तिथि (आगे बढ़ती हुई)रूप पर विचार करेगे।
यदि दिनों ही दिन मुख्य काल में तिथि का अभाव हो तब सूर्योदय से मध्याह्न में व्याप्त तिथि के आधार पर निर्णय होता है।
*विशेष--* कुछ व्रतों के निर्धारण में दोनों दिन मुख्य काल में तिथि का अभाव हो तो युग्म वाक्य द्वारा निर्णय होता है।

*क)* यदि तिथि *उदयव्यापीनी* हो कर मध्याह्न से स्पर्श हो किन्तु मुख्यकाल को स्पर्श न करती हो(रात्रि कालीन व्रत उपवास पूजन हेतु ) इस दशा में यदि पूर्व दिन मुख्यकाल में हो तो पूर्व दिन।

*ख)* यदि तिथि दोनो दिन ही मुख्य काल से स्पर्श रहित हो तब दूसरे दिन उदय कालीन से मध्याह्न स्पर्श तिथि का ग्राह्य करेगे l

*ग)* *युग्म वाक्य के आधार पर ---* खंड तिथि अपने पूर्व और बाद की तिथि से विद्ध होती है अतः कुछ व्रत-उपवास पर्व हेतु युग्म वाक्य के आधार इसका निर्णय लिया जाता है। जेसे -- अष्टमी युक्त नवमी, 6 तिथि युक्त सप्तमी।

.. *हरिहर श्रीहृषिकेश पञ्चाङ्ग के अनुसार जीवित्पुत्रिका व्रत..*
**************************************************

*हरिहर श्रीहृषिकेश पञ्चाङ्ग* के अनुसार वर्ष 2026 संवत् 2083 में आश्विन कृष्ण अष्टमी दिनांक 3अक्टूबर 2026 दिन शनिवार को सूर्योदय स्पर्श सप्तमी युक्त होकर घटी 9/28 (दिन 9/54) पर लग जा रही है पश्चात दिनांक 4अक्टूबर 2026 दिन रविवार को घटी 3/22(प्रात 7/28) पर समाप्त हो रही है। पश्चात नवमी का प्रारम्भ हो जाता है.

*हरिहर पञ्चाङ्ग* के अनुसार 3 अक्टूबर 2026 शनिवार को अष्टमी तिथि प्रदोष कालीन पूजन हेतु व्याप्त है तथा दूसरे दिन 4 अक्टूबर 2026 रविवार को सूर्योदय से पूर्वाह्न में अष्टमी पश्चात नवमी मध्याह्न से स्पर्श है। अतः पारण हेतु युग्म वाक्य आधारित अष्टमी युक्त नवमी लेगे तथा पूर्व दिन मध्याह्न से स्पर्श प्रदोष अष्टमी में व्रत पूजन होगा।

*कथा में उल्लेख सप्तमी युक्त अष्टमी को त्याग करने का वचन के संदर्भ में---*
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
ये वचन शुद्ध उदयाष्टमी को ग्रहण करने के विषय में प्रशंसा हेतु कहा गया है।
लेकिन इसमें पूजन के मुख्यकाल प्रदोष का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। क्योंकि दिनांक 4 अक्टूबर 2026 दिन रविवार को अष्टमी तिथि उदय काल पूर्वाह्न तक है मुख्य काल पूजन काल प्रदोष से स्पर्श नहीं है। **अतः इस अष्टमी को पूर्ण तिथि नहीं मानी जा सकती है। अतः व्रत पूजन में यह अष्टमी ग्राह्य नहीं होगी*।
इस दिन क्षय नवमी पूर्वाह्न से मध्याह्न तथा आगे तक वृद्धि है। यदि उदया अष्टमी युक्त पश्चात नवमी तिथि मध्याह्न तक प्राप्ति हो तो उसमें पारण होगा न कि पूजन।
*इस आधार पर जीवित्पुत्रिका व्रत का अष्टमी तथा नवमी तिथि की व्याप्ति तथा अव्याप्ति के आधार पर इसके प्रारंभ तथा समाप्ति (पारण ) का निर्णय करते हैl*
********** ***************** *************** **********

*1-* यदि दोनों दिन अष्टमी तिथि जीवित्पुत्रिका व्रत पूजन हेतु इसके मुख्यकाल प्रदोष में अभाव हो तो उदयाष्टमी तिथि का ग्राह्य होगा(स्वाभाविक रूप से उदयाष्टमी तिथि वृद्धिगामिनी होकर मध्याह्न को स्पर्श करेगी)और यहां प्रदोष में नवमी तिथि का होना स्वाभाविक है। किंतु रात्रि नवमी में पारण का निषेध होने के कारण दूसरे दिन सूर्योदय उपरांत नवमी तिथि में पारण होगा।

*2-* यदि दोनों दिन प्रदोष में अष्टमी तिथि हो तब उदयाष्टमी तिथि का ग्राह्य होगा क्योकि यहां अष्टमी तिथि की संपूर्णता (सूर्योदय -मध्याह्न-प्रदोष से स्पर्श) है। यहां पूजन हेतु मुख्य काल प्रदोष में अष्टमी तिथि तथा दूसरे दिन सूर्योदय उपरांत नवमी तिथि पारण हेतु प्राप्ति होगी।

*3-* पूर्व दिन सप्तमी युक्त अष्टमी तिथि मुख्य काल प्रदोष में हो तथा दूसरे दिन उदयाष्टमी का प्रदोष काल में अष्टमी तिथि का अभाव हो तो पूर्व दिन प्रदोषव्यापीनि सप्तमी युक्त अष्टमी तिथि में व्रत तथा प्रदोष में पूजन तथा दूसरे दिन सूर्योदय उपरांत नवमी तिथि में पारण होगा। (स्वाभाविक है कि कुछ अष्टमी तिथि सूर्योदयकालीन के समय तथा कुछ बाद भी हो अतः मध्याह्न नवमी तिथि तक व्रत का पारण होगा। ) यहां पारण हेतु अष्टमी से युक्त नवमी तिथि( युग्मवाक्य आधारित) ग्राह्य होगी।

*4-* यदि अष्टमी तिथि की हानि हो तो प्रदोष काल में सप्तमी युक्त अष्टमी तिथि में पूजन तथा दूसरे दिन सूर्योदय उपरांत नवमी तिथि में पारण होगा। अष्टमी तिथि की हानि के दृष्टिकोण से भी यह व्रत सूर्योदय से स्पर्श सप्तमी युक्त अष्टमी तिथि ही ग्राह्य होगा लेकिन पारण दूसरे दिन सूर्योदय उपरांत नवमी तिथि में होगा।

*5-* यदि अष्टमी तिथि की वृद्धि हो तब अहोरात्र (संपूर्ण दिन रात्रि की अष्टमी) व्याप्त अष्टमी तिथि में प्रदोष अष्टमी तिथि में पूजन तथा दूसरे दिन सूर्योदय उपरांत नवमी तिथि में पारण होगा। ( युग्म वाक्य अष्टमी युक्त नवमी आधारित)

*6-* नवमी तिथि (पारण हेतु)की हानि वृद्धि में जीवित्पुत्रिका व्रत का निर्णय--- यदि नवमी तिथि की हानि हो तो उदय अष्टमी युक्त शेष नवमी तिथि होगी अतः पूर्व दिन प्रदोष अष्टमी में व्रत पूजन तथा दूसरे दिन सूर्योदय बाद नवमी में पारण होगा।
यदि नवमी तिथि की वृद्धि हो तो पूर्व दिन प्रदोष अष्टमी तिथि में व्रत पूजन तथा दूसरे दिन अहोरात्र नवमी (संपूर्ण दिन रात्रि) में पारण होगा।

*जीवित्पुत्रिका व्रत में नवमी तिथि (पारण हेतु)की भूमिका पर विचार*
‐-------------------------------------------------------------------------
उपर उल्लेखित निम्न बिंदुवो के आधार पर हम कह सकते है की
इस व्रत के निर्णय हेतु नवमी तिथि (पारण)की भूमिका निर्णायक होती है इस व्रत का पारण किसी भी परिस्तिथियों में सूर्योदय उपरांत नवमी तिथि रहते ही ग्राह्य होगा। सूर्योदय अष्टमी रहते अथवा शुद्ध नवमी मध्याह्न तक हो तब पारण हेतु इसी नवमी तिथि को ग्रहण करना उचित होगा। रात्रि नवमी तिथि में जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण नहीं होता है।
यहां वृद्धिगामिनी संपूर्ण अष्टमी तिथि उपवास तथा पूजन हेतु (सूर्योंदय से मध्यान्ह स्पर्श तक या मुख्यकाल) ग्राह्य है यदि अष्टमी प्रदोष काल में प्राप्त है तो अति उत्तम है अन्यथा पूजन तो प्रदोष में होगा यदि पूर्व दिन और दूसरे दिन अष्टमी तिथि प्रदोष में हो तो सूर्योदयकालीन से मध्याह्न स्पर्श प्रदोषव्यापिनी अष्टमी तिथि को उपवास तथा पूजन हेतु ग्राह्य करेगे क्योंकि दूसरे दिन पारण हेतु मध्याह्न तक नवमी तिथि प्राप्त होगी,यदि दोनों दिन प्रदोषव्यापिनी अष्टमी तिथि का अभाव हो तो सूर्योंदय से मध्याह्न स्पर्श तक अष्टमी तिथि को उपवास तथा पूजन हेतु ग्राह्य करेगे। क्योंकि दूसरे दिन पारण हेतु सूर्योदयकालीन नवमी तिथि प्राप्त होगी ।
अतः जीवित्पुत्रिका व्रत में पूजन हेतु प्रदोषव्यापिनी अष्टमी तिथि का उल्लंघन नहीं करना चाहिए(यदि अष्टमी तिथि मुख्य काल में व्याप्त हो) न ही व्रत के समाप्ति पारण हेतु नवमी तिथि का उल्लंघन करना चाहिए(पारण हेतु सूर्योदय उपरांत नवमी ग्राह्य है) रात्रि नवमी में पारण नहीं होता।अतः दोनों के लिए निर्देशित कर्म योग्य काल जिसे मुख्य काल कहते है उसका उल्लंघन नहीं करना चाहिए. क्योंकि प्रदोषव्यापिनीअष्टमी तिथि में पूजन उपरांत व्रत का पारण सूर्योंदय पश्चात मध्याह्न पूर्व नवमी तिथि में होना आवश्यक है.

------ *जीवित्पुत्रिका व्रत पर निष्कर्ष* -------
••••••••••○○•••○••••••••••○•••••••○••••
संपूर्ण विवेचना के आधार पर हम यह कह सकते है कि दिनांक दिनांक 4 अक्टूबर 2026 दिन रविवार को अष्टमी तिथि उदय से पूर्वाह्न मुख्य पूजन काल प्रदोष तक नहीं है । पश्चात नवमी तिथि है. अतः इस दिन अष्टमी को इस व्रत पूजन हेतु पूर्ण तिथि नहीं मानी जा सकती है। पूर्व दिन दिनांक 3 अक्टूबर 2026 शनिवार को उदय सप्तमी से युक्त मध्याह्न से स्पर्श अष्टमी तिथि प्रदोष काल में व्याप्त है। अतः यह अष्टमी तिथि जीवित्पुत्रिका व्रत के निर्धारण में पूर्ण तिथि मानी जाएगी। इसके अलावा पारण(नवमी तिथि के सूर्योदय से मध्याह्न तक व्याप्त होने के आधार पर) की विशेष भूमिका है। अष्टमी तिथि का प्रारम्भ काल कभी भी हो अष्टमी तिथि अपने पूजन के मुख्य काल में व्याप्त हो या न हो राजा जीमूतवाहन का पूजन प्रदोष काल में ही होगा। लेकिन जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण सूर्योदय काल से मध्याह्न काल में व्याप्त नवमी तिथि में होगा। यदि शुद्ध उदय नवमी हो तो उसका अथवा सूर्योदयकालीन अष्टमी से युक्त नवमी हो तो वही पारण हेतु ग्राह्य होगा।

अ के अनुसार *दिनांक 3 अक्टूबर 2026 शनिवार * को *जीवित्पुत्रिका व्रत और पूजन* होगा तथा *दिनांक 4 अक्टूबर 2026 रविवार* को *दिन 7 घं0 28 मि0* से नवमी तिथिमें *जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण* होगा।
अतः यह स्पष्ट है कि सूर्योदय उपरांत मध्याह्न तक व्याप्त नवमी तिथि अथवा शुद्ध उदया नवमी तिथि में पारण के आधार पर ही जीवित्पुत्रिका व्रत का निर्णय होना चाहिए।

27/09/2026

कुदार के द्वारा राजनेताओं के से भगवानपुर स्टेशन रोड पर बने वॉटर पार्क से आ रहे सारांध बदबू हो सकता हैं बड़ी बीमारी का खतरा

🕉️ गया में श्राद्ध एवं पिंडदान पर आचार्य सुजीत कुमार शास्त्री जी से बात करने पर उनके द्वारा जो बतलाया गया वो इस तरह है 🕉...
27/09/2026

🕉️ गया में श्राद्ध एवं पिंडदान पर आचार्य सुजीत कुमार शास्त्री जी से बात करने पर उनके द्वारा जो बतलाया गया वो इस तरह है 🕉️

आचार्य सुजीत कुमार शास्त्री:- गया जी में श्राद्ध-पिंडदान करने जाएँ, अपने पितरों से “पिंड छुड़ाने” नहीं।
गया श्राद्ध का भाव पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और उनके निमित्त किए जाने वाले पितृकर्म से जुड़ा है। वहाँ पिंडदान कर देने के बाद पितृकार्य की भावना समाप्त नहीं हो जाती।
अतः गया जी से लौटने के बाद भी अपनी परम्परा, कुलाचार और शास्त्रीय विधि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण एवं पितृस्मरण करते रहना चाहिए।
🌺 पितरों का स्मरण केवल एक स्थान या एक दिन तक सीमित नहीं, बल्कि श्रद्धा और कृतज्ञता का निरंतर भाव है। 🌺
🙏 “श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्।” 🙏

🌧️ हस्त नक्षत्र — ‘हथिया’ विशेष 🌧️आज 27 सितंबर 2026, रविवार को प्रातः 4:50 बजे से सूर्य का हस्त नक्षत्र में प्रवेश होगा।...
27/09/2026

🌧️ हस्त नक्षत्र — ‘हथिया’ विशेष 🌧️

आज 27 सितंबर 2026, रविवार को प्रातः 4:50 बजे से सूर्य का हस्त नक्षत्र में प्रवेश होगा।

ज्योतिषीय एवं पारंपरिक वर्षा-मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में सामान्य से अच्छी वृष्टि होने के योग बन रहे हैं। इस पक्ष में अच्छी वर्षा की संभावना है।

🌧️ हथिया बरसेगी — धरती हरियाली से भर उठेगी। 🌾

🙏 आचार्य सुजीत शास्त्री ‘मिट्ठू बाबा’
समस्त वैदिक यज्ञ-अनुष्ठान कर्मकांड विशेषज्ञ
📱 संपर्क सूत्र — 9525859555

26/09/2026

कल रघुनाथपुर इमादपुर पंचायत पर विशेष खबर

🕉️ पितृपक्ष विशेष पितृपक्ष पर विशेष चर्चा पंडित सुजित कुमार शास्त्री जी के साथ...🕉️ श्राद्ध का अन्न ग्रहण करना चाहिए या ...
26/09/2026

🕉️ पितृपक्ष विशेष

पितृपक्ष पर विशेष चर्चा पंडित सुजित कुमार शास्त्री जी के साथ...

🕉️ श्राद्ध का अन्न ग्रहण करना चाहिए या नहीं, साथ ही श्राद्ध में किस-किस को निमन्त्रित करें?

श्राद्ध केवल भोजन कराने की परम्परा नहीं, अपितु श्रद्धा, विधि और शास्त्रीय मर्यादा से सम्पन्न किया जाने वाला पितृकर्म है। अतः श्राद्ध में किसे निमन्त्रित किया जाए और किसे भोजन कराया जाए, इसका भी शास्त्रों में विशेष विधान बताया गया है।

📜 शास्त्रवचन—

मातामहं मातुलं च स्वस्रीयं श्वशुरं गुरुम्।
दौहित्रं जामातरं बन्धुमृत्विजं याज्य एव च॥

अर्थात्—
नाना, मामा, भानजा, श्वसुर, गुरु, दौहित्र, जामाता, बान्धव, ब्राह्मण तथा यज्ञकर्ता आदि को श्राद्ध में भोजन कराने का विधान बताया गया है।

श्राद्धकाल आने पर समीप रहने वाले दामाद, भानजे तथा बहन आदि सम्बन्धियों को केवल काम, क्रोध या भय के कारण न बुलाकर केवल अन्य लोगों को भोजन कराने की प्रवृत्ति उचित नहीं मानी गई है।

📜 शास्त्रवचन—

नाश्नन्ति तस्य वै गेहे पितरो विप्रवर्जिताः।
शापं दत्त्वा ततो यान्ति श्राद्धाद्विप्रं विवर्जितात्॥
महापापी भवेत्सोऽपि ब्रह्महा स च कथ्यते॥

अर्थ—
श्राद्ध में ब्राह्मण को निमन्त्रित करना शास्त्रीय विधान का महत्वपूर्ण अंग है। ब्राह्मण-विहीन श्राद्ध को शास्त्रों में दोषपूर्ण बताया गया है। इसलिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार विधिपूर्वक ब्राह्मण को आमन्त्रित कर श्राद्धकर्म सम्पन्न करना चाहिए।

---

🔱 श्राद्ध में कितने ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए?

📜 शास्त्रवचन—

द्वौ दैवे पितृकार्ये त्रीनेकैकमुभयत्र वा।
भोजयेत्सुसमृद्धोऽपि न प्रसज्जेत विस्तरे॥

अर्थात्—
देवकार्य में दो तथा पितृकार्य में तीन ब्राह्मण, अथवा दोनों कार्यों में एक-एक ब्राह्मण को भोजन कराने का विधान बताया गया है।

अत्यन्त सम्पन्न व्यक्ति को भी श्राद्धकर्म में अनावश्यक विस्तार नहीं करना चाहिए। श्राद्ध की महत्ता संख्या में नहीं, श्रद्धा और विधि में है।

---

❌ क्या श्राद्ध को मित्रता का साधन बनाना उचित हैं?

📜 शास्त्रवचन—

यस्य मित्रप्रधानानि श्राद्धानि च हविंषि च।
न प्रीणन्ति पितॄन् देवान् स्वर्गं च न स गच्छति॥

अर्थ—
जिस श्राद्ध में मित्रों की प्रधानता हो जाती है, वहाँ श्राद्धकर्म की मूल भावना प्रभावित होती है। श्राद्ध को केवल मित्र-सम्मेलन अथवा सम्बन्ध बढ़ाने का साधन नहीं बनाना चाहिए।

शास्त्रीय दृष्टि से श्राद्ध में ऐसे व्यक्ति को भोजन कराने की बात कही गई है जो न शत्रु हो, न अत्यन्त घनिष्ठ मित्र—अपितु मध्यस्थ भाव वाला हो।

अतः मित्रों को प्रसन्न करने के लिए श्राद्धभोज का आयोजन करना उचित नहीं माना गया है। मित्रों के प्रति स्नेह और सम्मान अपने स्थान पर है, परन्तु पितृकर्म की मर्यादा अपने स्थान पर।

---

🙏 पितृपूजन का क्या फल प्राप्त होता हैं

📜 शास्त्रवचन—

आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्॥

अर्थ—
पितरों का विधिपूर्वक पूजन करने से आयु, संतान, यश, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, सुख, धन और धान्य की प्राप्ति का शास्त्रों में वर्णन मिलता है।

---

❓ प्रश्न—श्राद्ध का अन्न ग्रहण करना चाहिए या नहीं?

✅ उत्तर—

घर के स्वजन श्राद्ध का अन्न ग्रहण करें तो सामान्यतः दोष नहीं माना जाता, क्योंकि श्राद्ध करने वाला और दिवंगत व्यक्ति परस्पर स्वजन होते हैं।

परन्तु अन्य लोगों को बिना आवश्यकता अथवा बिना उचित विधि के श्राद्ध का अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिए।

यदि श्राद्ध का अन्न बच जाए तो उसे मनमाने ढंग से वितरित करने के स्थान पर विधि जानने वाले ब्राह्मण से पूछकर उसका उचित उपयोग करना चाहिए।

विशेष रूप से मृत्यु के पश्चात् होने वाले प्रारम्भिक कर्मों के अन्न के सम्बन्ध में शास्त्रीय मर्यादाओं का पालन करना आवश्यक है। ऐसे अवसरों पर बचे हुए अन्न के विषय में कर्म की विधि और कुलाचार के अनुसार निर्णय करना चाहिए।

वार्षिक श्राद्ध एवं पितृपक्ष में भी श्राद्ध के अन्न को सामान्य भोज की तरह सबको, हर स्थान पर और बिना विचार के वितरित करना शास्त्रीय भावना के अनुरूप नहीं है।

---

🚩 विशेष स्मरण

श्राद्ध दिखावे का नहीं, श्रद्धा का विषय है।
श्राद्ध भोज का नहीं, पितृऋण के स्मरण और तर्पण का कर्म है।

इसलिए श्राद्ध में—

🔸 योग्य व्यक्ति को ही निमन्त्रित करें।
🔸 ब्राह्मण को शास्त्रीय विधि से भोजन कराएँ।
🔸 अनावश्यक विस्तार और दिखावे से बचें।
🔸 मित्रता अथवा सामाजिक प्रदर्शन को श्राद्ध का आधार न बनाएँ।
🔸 अन्न के विषय में अपने कुलाचार एवं शास्त्रीय विधि का पालन करें।

🙏 श्राद्ध की पवित्रता बनाए रखें—

श्राद्ध का भोजन सबको, सब स्थान पर नहीं करना चाहिए।

🙇 जयश्रीसीताराम 🙇

जन सुराज पार्टी ने तिरहुत शिक्षक स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से अपने प्रत्याशी के नाम की घोषणा कि
26/09/2026

जन सुराज पार्टी ने तिरहुत शिक्षक स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से अपने प्रत्याशी के नाम की घोषणा कि

Address

Bhagwanpur Vaishali
Bhabhua
844114

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when K K Vaishali Hindi News posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share