15/12/2025
सिर्फ 10 मिनट नहीं थे वो
आज मेरे घर में चायपत्ती खत्म हो गई थी
सोचा, बाहर जाने से अच्छा है
Blinkit से ऑर्डर कर दूँ।
मोबाइल उठाया,
दो क्लिक किए,
और स्क्रीन पर चमक उठा
10 मिनट में डिलीवरी।
मन में सुकून आ गया।
काम में लग गया।
लेकिन आज वो 10 मिनट
हम सब अब इसी के आदी हो गए हैं।
एक बटन दबाया,
और मान लिया
अब सामने वाला इंसान नहीं,
एक मशीन काम करेगी।
समय पर आए तो ठीक,
और अगर दो-चार मिनट भी देर हो जाए
तो गुस्सा,
शिकायत,
या ऑर्डर कैंसल।
आज भी दरवाज़े पर दस्तक हुई
लेकिन समय से थोड़ी देर बाद।
दरवाज़ा खोला तो सामने एक लड़का खड़ा था।
उम्र बहुत ज़्यादा नहीं,
लेकिन चेहरे पर ज़िम्मेदारियों की झुर्रियाँ थीं।
उसकी साँसें तेज़ थीं,
हाथ हल्के काँप रहे थे,
और आँखें
जैसे कुछ कहती-कहती रुक गई हों।
मैंने सामान लिया।
लेकिन जाने क्यों
मुँह से बस एक ही सवाल निकला
सब ठीक है?
आप बहुत परेशान लग रहे हो
बस
यहीं वो टूट गया।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
बिना आवाज़ के।
जैसे किसी ने सालों से
रोने की इजाज़त ही नहीं दी हो।
थोड़ी देर बाद बोला
सर
आज तक किसी ने ये नहीं पूछा।
लेट होने पर लोग सिर्फ गुस्सा करते हैं।
कभी सामान लौटा देते हैं,
कभी ऑर्डर कैंसल।
वो रुक गया।
साँस संभाली।
फिर बहुत धीमी आवाज़ में बोला
मेरी पत्नी हॉस्पिटल में है।
अभी उसकी डिलीवरी है।
फोन आ रहा है
जल्दी आ जाओ
उस पल जैसे समय थम गया।
मेरे सामने कोई डिलीवरी बॉय नहीं खड़ा था।
मेरे सामने एक पति था
जो पिता बनने वाला था।
उसने आगे कहा
रास्ते में ही हॉस्पिटल पड़ता है।
सोचा एक बार देख आऊँ।
बस एक पल
लेकिन उसी पल में देर हो गई।
वो शर्मिंदा था।
जैसे उसने कोई गुनाह कर दिया हो।
लेकिन सच्चाई ये थी
वो गुनहगार नहीं,
मजबूर था।
एक तरफ उसकी पत्नी
दर्द से जूझ रही थी।
दूसरी तरफ काम
जिससे घर चलता है।
अगर वो ड्यूटी छोड़ देता
तो शायद नौकरी चली जाती।
और अगर देर करता
तो लोगों का गुस्सा झेलना पड़ता।
आज वो बीच में फँसा था
परिवार और पेट के बीच।
मैं पूरी तरह निशब्द था।
आँखें भर आईं।
दिल भारी हो गया।
हम जिन 10 मिनट के लिए
लड़ते हैं, चिल्लाते हैं,
कभी-कभी वही
किसी की ज़िंदगी के
सबसे अनमोल पलों को छीन लेते हैं।
आज मैंने एक बात समझी
हर देर लापरवाही नहीं होती।
हर इंसान लापरवाह नहीं होता।
कुछ लोग चुपचाप
अपनी खुशियाँ
अपने आँसू
और अपने सपने
दूसरों की सुविधाओं के लिए कुर्बान कर रहे होते हैं।
हम कमरे में बैठकर
समय गिनते हैं।
और कोई सड़क पर
अपनी ज़िंदगी समेटे
भाग रहा होता है।
एक छोटी-सी अपील
अगली बार अगर कोई
थोड़ा देर से आए
तो गुस्सा करने से पहले
बस एक बार पूछ लीजिए
सब ठीक है?
हो सकता है सामने खड़ा इंसान
किसी का पति हो,
किसी का पिता हो,
या किसी का बेटा
जो अपनी ज़िम्मेदारियों के नीचे दबा
बस थोड़ी सी इंसानियत चाहता हो।
क्योंकि हम ग्राहक हैं
लेकिन वो भी इंसान हैं।
इंसान पहले।
सुविधा बाद में।
Good morning everyone