17/05/2026
भारतीय संविधान में आदिवासियों (अनुसूचित जनजातियों या Scheduled Tribes) के जल, जंगल, जमीन, संस्कृति और स्वायत्तता (Self-governance) की रक्षा के लिए कई विशेष और मजबूत प्रावधान दिए गए हैं। संविधान निर्माताओं ने यह सुनिश्चित किया कि आदिवासियों की अनूठी पहचान बची रहे और उनका शोषण न हो।
संविधान के अनुसार आदिवासियों के मुख्य हक और अधिकार निम्नलिखित क्षेत्रों में बांटे जा सकते हैं:
1. जमीन और स्वायत्तता का अधिकार (पांचवीं और छठी अनुसूची)
यह आदिवासियों के लिए संविधान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है:
पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule): यह देश के अधिकांश आदिवासी बहुल क्षेत्रों (जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड आदि) पर लागू होती है। इसके तहत जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribal Advisory Council) का गठन किया जाता है। राज्यपाल को यह विशेष शक्ति होती है कि वह आदिवासियों के हित में किसी भी ऐसे कानून को रोक सकते हैं जिससे उनकी जमीन छीनी जा रही हो। इसके तहत गैर-आदिवासियों को आदिवासी जमीन बेचने पर कानूनी रोक है।
छठी अनुसूची (Sixth Schedule): यह उत्तर-पूर्वी राज्यों (असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम) के लिए है, जहां आदिवासियों को स्वायत्त जिला परिषदों (Autonomous District Councils) के माध्यम से खुद के नियम और कानून बनाने का अधिकार है।
2. स्वशासन का अधिकार: पेसा अधिनियम (PESA Act, 1996)
संविधान के भाग 9 (पंचायत राज) को और मजबूत करते हुए पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों के लिए 'पेसा कानून' (Provisions on the Panchayats - Extension to the Scheduled Areas Act) बनाया गया।
यह कानून ग्राम सभा को सर्वोपरि मानता है।
गांव की जमीन का अधिग्रहण करने, खनिजों के खनन (Mining) के लिए लाइसेंस देने या किसी भी विकास परियोजना को शुरू करने से पहले ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य है।
लघु वन उपज (Minor Forest Produce), स्थानीय बाजारों और शराब की बिक्री पर नियंत्रण का अधिकार भी ग्राम सभा के पास है।
3. जल, जंगल और जमीन का अधिकार (वन अधिकार अधिनियम)
हालांकि यह एक संसद का कानून है, लेकिन यह संविधान की मूल भावना से निकला है। वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act - FRA) आदिवासियों को निम्नलिखित अधिकार देता है:
व्यक्तिगत अधिकार: जो आदिवासी पीढ़ियों से वन भूमि पर खेती कर रहे हैं या रह रहे हैं, उन्हें उस जमीन का कानूनी पट्टा (अधिकार पत्र) मिलता है।
सामुदायिक अधिकार: जंगल के संसाधनों (जैसे महुआ, गोंद, सूखी लकड़ी) को इकट्ठा करने और उन्हें बेचने का पूरा हक आदिवासियों का है।
4. सांस्कृतिक और शैक्षणिक संरक्षण (अनुच्छेद 29 और 30)
अनुच्छेद 29 (Article 29): यह देश के हर नागरिक को, विशेषकर आदिवासियों को, अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति को बचाए रखने और उसका संरक्षण करने का मौलिक अधिकार देता है।
अनुच्छेद 30 (Article 30): आदिवासियों को अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उन्हें संचालित करने का अधिकार है।
5. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23)
अनुच्छेद 23 (Article 23): यह मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी (बेगार) को पूरी तरह से प्रतिबंधित करता है। ऐतिहासिक रूप से आदिवासियों को इस शोषण का सामना करना पड़ता था, जिससे यह अनुच्छेद उन्हें सुरक्षा देता है।
6. सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व
अनुच्छेद 46 (नीति निदेशक तत्व): राज्य (सरकार) का यह कर्तव्य है कि वह अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक और आर्थिक हितों की विशेष देखरेख करे और उन्हें सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण से बचाए।
आरक्षण (Reservation): लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में (अनुच्छेद 330 और 332 के तहत) तथा सरकारी नौकरियों व उच्च शिक्षा में आदिवासियों की जनसंख्या के अनुपात में सीटें आरक्षित की गई हैं ताकि शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी सुनिश्चित हो सके।