23/05/2026
एक अखबार… एक तारीख… दो शहर… लेकिन दर्द एक जैसा
23 मई 2026 की सुबह जब अखबार का एक पन्ने सामने थे,तो सुर्खियाँ सिर्फ खबर नहीं थीं, बल्कि समाज के लिए एक आईना थीं।
एक कटिंग मुरैना की थी —
जहाँ ज़मीन के विवाद ने एक युवक की जान ले ली।
दूसरी कटिंग #भिंड/ #इंदौर की थी —
जहाँ 2024 की रंजिश ने 2026 में फिर गोलियों की आवाज बनकर एक और घर का चिराग बुझा दिया।
दो शहर अलग हैं,
घटनाएँ अलग हैं,
लेकिन कहानी एक ही है —
रंजिश, बदला और अंतहीन अंधेरा।
यह खबर इसलिए भी भीतर तक कचोट गई क्योंकि मैं भी भिंड जिले की उस पावन धरा से हूँ, जो वीरों की धरती है।
वह धरती जहाँ के युवा आज भी माँ भारती की सेवा में सदैव तत्पर रहते हैं।
चंबल संभाग की पहचान सिर्फ बीहड़ नहीं है।
यह वही भूमि है जहाँ से 15,000 से अधिक जवान भारतीय सेना और सुरक्षा बलों में देशसेवा कर रहे हैं।( यह आँकड़ा क्षेत्र की वीर परंपरा को दिखाता है।)
कई गाँव ऐसे हैं जहाँ हर घर से कोई न कोई वर्दी में देश की रक्षा कर रहा है।
यही तो हमारी असली पहचान है —
वीरता, अनुशासन और राष्ट्रभक्ति।
फिर क्यों कुछ घटनाएँ हमारी इस गौरवशाली पहचान पर दाग लगाने की कोशिश करती हैं?
2024 में चली गोली ने बदले की आग छोड़ी थी।
2026 में उसी आग ने फिर एक परिवार को जला दिया।
सोचिए…
क्या एक हत्या दूसरी हत्या का न्याय हो सकती है?
नहीं।
यह सिर्फ दो परिवारों के आँगन में मातम छोड़ती है।
एक माँ की गोद सूनी करती है,
एक बच्चे के सिर से पिता का साया छीनती है,
और समाज को फिर उसी अंधेरे में धकेल देती है,
जहाँ से निकलने में दशकों लगे।
आज का भिंड-मुरैना बदल रहा है।
नई पीढ़ी किताबों से रिश्ता जोड़ रही है,
सेना में जा रही है,
व्यापार कर रही है,
देश-दुनिया में अपना नाम रोशन कर रही है।
अब वक्त है कि हम अपनी विरासत बदलें।
बच्चों को बंदूक नहीं, किताब दें।
रंजिश नहीं, संवाद दें।
बदला नहीं, संस्कार दें।
भिंड-मुरैना की नई कहानी बंदूक से नहीं, बदलाव से लिखी जाएगी।
अब फैसला हमारा है—
विरासत में दुश्मनी देनी है या विकास?
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Dainik Bhaskar