Anand Jat

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अँग्रेज़ों के मित्र सिंधियाने छोड़ी रजधानी थी।बुंदेले हरबोलों के मुँहहमने सुनी कहानी थी।ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तोझाँसी वाल...
18/06/2026

अँग्रेज़ों के मित्र सिंधिया
ने छोड़ी रजधानी थी।

बुंदेले हरबोलों के मुँह
हमने सुनी कहानी थी।

ख़ूब लड़ी मर्दानी वह तो
झाँसी वाली रानी थी॥

अदम्य वीरता और साहस की परिचायक वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।

17/06/2026

आज जब कोटा में Gen Z युवाओं की भीड़ के बीच “राहुल… राहुल…” के नारे गूंज रहे थे, तब मैं केवल एक राजनीतिक कार्यकर्ता की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की तरह भावुक हो गया था जिसने वर्षों तक एक विचार, एक व्यक्ति और एक राजनीति पर विश्वास बनाए रखा है।

मुझे आज भी वह समय याद है जब मैंने राहुल गांधी के विचारों पर ‘डरो मत’ पुस्तक लिखी थी। उस दौर में राहुल गांधी का समर्थन करना आसान नहीं था। कई रिश्तेदार, दोस्त और परिचित मेरी ओर तिरस्कार भरी मुस्कान के साथ देखते थे। कुछ लोग मज़ाक उड़ाते थे, कुछ व्यंग्य करते थे और कुछ मुझे यह समझाने की कोशिश करते थे कि मैं एक “हारती हुई राजनीति” के साथ खड़ा हूँ।

सामाजिक कार्यक्रमों में, शादियों में या किसी पारिवारिक आयोजन में लोग औपचारिकता निभाने के बाद अक्सर कोई न कोई ताना मार ही देते थे। कभी राहुल गांधी को लेकर, कभी कांग्रेस को लेकर और कभी मेरी वैचारिक प्रतिबद्धता को लेकर। लेकिन सच कहूँ तो अपनों की ऐसी हर हरकत ने मेरे भीतर की कांग्रेसियत को कम नहीं किया, बल्कि और अधिक मजबूत किया। क्योंकि विचारधारा का मूल्य तब नहीं पता चलता जब उसके साथ भीड़ खड़ी हो, उसका मूल्य तब पता चलता है जब आपको अकेले खड़े होकर भी उस पर विश्वास बनाए रखना पड़े।

राहुल गांधी को मैंने केवल एक नेता के रूप में नहीं देखा है। मैंने उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में देखा है जो राजनीति को सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का साधन मानते हैं। जो लगातार नफरत के सामने प्रेम, डर के सामने साहस और विभाजन के सामने भाईचारे की बात करते हैं।

उनके बारे में जितना पढ़ता हूँ, जितना सोचता हूँ और जितना उनके राजनीतिक व्यवहार को समझने का प्रयास करता हूँ, उतना ही मेरा मन उनके प्रति आदर से भर जाता है। ऐसे समय में जब राजनीति का बड़ा हिस्सा केवल चुनाव जीतने और विरोधियों को हराने तक सीमित होता जा रहा है, राहुल गांधी लगातार उन लोगों की बात कर रहे हैं जो सबसे पीछे छूट गए हैं—किसान, मजदूर, युवा, महिलाएँ और समाज के वंचित वर्ग।

मेरे लिए राहुल गांधी केवल कांग्रेस के नेता नहीं हैं। वे उस भारत की उम्मीद हैं जहाँ राजनीति का केंद्र सत्ता नहीं, बल्कि इंसान हो। जहाँ आख़िरी व्यक्ति के सम्मान, अधिकार और अवसर की बात हो। शायद यही कारण है कि मैं मानता हूँ कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद यदि किसी राष्ट्रीय नेता ने सर्वोदय की भावना—सबके उत्थान, सबके सम्मान और सबके अधिकार—को सबसे मजबूती से उठाया है, तो वह राहुल गांधी हैं।

आज कोटा के युवाओं के बीच गूंजते “राहुल… राहुल…” के नारों ने मुझे यह एहसास कराया कि विचारों की यात्रा लंबी जरूर होती है, लेकिन अगर वह ईमानदार हो तो एक दिन लोगों के दिलों तक अवश्य पहुँचती है।

और शायद इसी कारण, मेरा विश्वास राहुल गांधी और उनकी राजनीति में आज पहले से कहीं अधिक मजबूत है। ❤️🇮🇳✋🏻

17/06/2026

पता है, भारत की सिर्फ़ 5 परीक्षाओं - NEET, JEE, SSC, UPSC और RRB की तैयारी पर छात्र और उनके परिवार हर साल कितना ख़र्च करते हैं?

₹3.5 लाख करोड़।

यानी भारत सरकार के पूरे शिक्षा बजट का लगभग तीन गुना। शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रम, विज्ञान और महिला-बाल विकास - इन पाँच मंत्रालयों के कुल बजट के बराबर।

और बदले में करोड़ों युवाओं को क्या मिलता है? तनाव, अनिश्चितता, बेरोज़गारी, और टूटते सपने।

जो ख़र्च सरकार की ज़िम्मेदारी है, उसका बोझ आज परिवार उठा रहे हैं।

17/06/2026

मन्दिर से श्रीराम के चंपत हो गया माल,
चोर ही चौकीदार है, ये कैसा अमृतकाल?

चंदा चोरी के खुलासे के लिए अब बनेगी, ‘अयोध्या फाइल्स’!

16/06/2026

मेरे युवा और Gen Z साथियों,

एक बात मेरे मन में साफ़ है और आप भी इसे दिल में बैठा लीजिए: भारत के हर युवा का भविष्य सुरक्षित करना सरकार की ज़िम्मेदारी है।

पर ज़िम्मेदारी और ईमानदारी - दोनों मोदी सरकार की सोच से परे हैं।

पेपर लीक, परीक्षा कुप्रबंधन, रद्द होती भर्तियाँ, आसमान छूती फीस, निजीकरण, घोटाले - इन्हीं औज़ारों से वो हर दिन करोड़ों सपने तोड़ रही है।

याद रखिए, युवा का भविष्य ही देश का भविष्य तय करेगा। यही सब आपसे विस्तार से कहना है। इसलिए मैं आपको बुला रहा हूँ - देश की हर गली, हर कस्बे, हर शहर से उठती ‘छात्रों की गूंज’ को, आइए कोटा में हुंकार बनाएँ।

🗓️ 17 जून | छात्रों की गूंज | कोटा महारैली

एक नेता को थोड़ा किसान, थोड़ा मज़दूर, थोड़ा इंजीनियर, थोड़ा डॉ, थोड़ा खिलाड़ी, थोड़ा महिला, थोड़ा गृहिणी, थोड़ा विद्यार्...
16/06/2026

एक नेता को थोड़ा किसान, थोड़ा मज़दूर, थोड़ा इंजीनियर, थोड़ा डॉ, थोड़ा खिलाड़ी, थोड़ा महिला, थोड़ा गृहिणी, थोड़ा विद्यार्थी, थोड़ा वकील, थोड़ा प्रोफेशनल और थोड़ा ट्रक ड्राइवर भी होना चाहिये. कहने का अर्थ यह है कि उसे हर फ़ील्ड का ज्ञान, खूबी-कमियाँ और आवश्यकताओं के बारे में पता होना चाहिये. क्योंकि जो देश की नीतियाँ बनाता है, उसे देश की ज़मीन, सड़क, खेत, कारखाने, कॉलेज और घर—सबकी धड़कन सुननी चाहिए।

यही कारण है कि जब राहुल गांधी ट्रक ड्राइवरों के बीच बैठते हैं, उनके साथ सफ़र करते हैं, उनकी समस्याएँ सुनते हैं, तो वह कोई राजनीतिक स्टंट नहीं होता। वह उस नेतृत्व का प्रमाण होता है जो सत्ता के गलियारों से नहीं, जनता के बीच से सीखता है। भारत में ट्रक यात्रा हो या अमेरिका में ट्रक चालकों से संवाद, राहुल गांधी हर बार यह दिखाते हैं कि समाधान एयर कंडीशन्ड कमरों में नहीं, बल्कि उन लोगों के अनुभवों में छिपे होते हैं जो रोज़ इस देश को चलाते हैं।

90 लाख से अधिक ट्रक ड्राइवर भारत की अर्थव्यवस्था की धमनियों में रक्त की तरह बह रहे हैं। लेकिन उनकी समस्याएँ कौन सुनता है? राहुल गांधी सुनते हैं। वे पूछते हैं, समझते हैं और संवाद करते हैं। न्यूनतम वेतन, काम के निश्चित घंटे, सुरक्षित पार्किंग, भ्रष्ट चेकिंग से मुक्ति, डिजिटल सुविधाएँ—ये सब कोई असंभव सपने नहीं हैं। ये वही समाधान हैं जो जनता के बीच जाकर, जनता से बात करके निकलते हैं।

भट्टा-पारसौल के किसानों से लेकर बेरोज़गार युवाओं तक, दलितों से लेकर ट्रक ड्राइवरों तक, राहुल गांधी ने बार-बार साबित किया है कि राजनीति सिर्फ़ भाषण देने का नाम नहीं, बल्कि लोगों के जीवन को समझने का नाम है।

आज जब राजनीति का बड़ा हिस्सा इवेंट मैनेजमेंट और प्रचार में उलझा हुआ है, तब राहुल गांधी संवाद को राजनीति का केंद्र बना रहे हैं। वे “मन की बात” नहीं, “जन-जन के मन की बात” सुन रहे हैं।

सुज़ुकी के सहयोग से मारुति की भारत में शुरुआत और सफलता किसी उद्योगपति की नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व की इच्छाशक्ति और दूरदृष्टि का नतीजा थी. सार्वजनिक उपक्रम भी नेहरू जी की दूरदृष्टि के प्रकाश स्तंभ ही तो हैं. इसलिये राजनेता में उद्यमशीलता का भी कुछ भाव होना ज़रूरी है. राहुल गांधी जी में थोड़ा थोड़ा सबकुछ दिखाई देने लगा है. भट्टा परसौल में किसानों के हक़ में खड़े होने से लेकर ट्रक में सिद्धू मूसेवाला के गानों को सुनने की इच्छा ज़ाहिर करने तक, वे हर जगह, हर बार, बता रहे हैं कि न्याय की लड़ाई में वे सच्चाई के सबसे बड़े प्रतिनिधि के रूप में जगमगा रहें हैं.

नेता को सबका होना चाहिये उसमें सबका कुछ ना कुछ होना चाहिये. हमारे राहुल जी में थोड़ा थोड़ा सबकुछ है. न्याय, संवेदना, मानवता, सच्चाई, और जनपक्षधरता सबकुछ राहुल जी में है. नेता राहुल जी जैसा ही चाहिये.

राहुल गांधी में वही भारत दिखाई देता है—विविध, संवेदनशील, संघर्षशील और न्यायप्रिय।

नेता सबका होना चाहिए, इसलिए उसमें सबका कुछ न कुछ होना चाहिए।

और शायद यही वजह है कि करोड़ों लोगों के लिए आज एक ही संदेश है—

राहुल गांधी सिर्फ़ एक नेता नहीं, एक उम्मीद हैं।



15/06/2026

जावेद अख़्तर- बीजेपी जिन ताक़तों के साथ है क्या वे सत्ता में आने पर सेक्युलर भारत बनाये रखने देंगी?

अटल बिहारी- सेक्युलर हिंदुओं का स्वभाव है.

नोट:- बीजेपी सत्तावादी पार्टी है सत्ता के लिये कुछ भी करेगी. आज बीजेपी के समर्थक धर्मनिरपेक्षता को गाली देते हैं. इसीलिये इनका विश्वास करना कठिन है.

इंदिरा की गोद में खेलती वो छोटी सी प्रियंका,दादी की आँखों में चमकता था अनमोल प्यार का सागर।एक तरफ सख्त अनुशासन, दूसरी तर...
15/06/2026

इंदिरा की गोद में खेलती वो छोटी सी प्रियंका,
दादी की आँखों में चमकता था अनमोल प्यार का सागर।
एक तरफ सख्त अनुशासन, दूसरी तरफ अपार स्नेह,
इंदिरा ने सिखाया था — “बेटी, कभी मत झुकना, कभी मत हारना।”

प्रियंका बड़ी हुई तो वही जज्बा, वही आग दिखाई दी,
इंदिरा की तरह साहसी, इंदिरा की तरह संवेदनशील।
1971 की जंग की कहानियाँ सुनती, दादी की मजबूती सीखती,
आज वही प्रियंका खड़ी है, देश की आवाज़ बनकर।

दादी की विरासत में छिपा था वो अटूट संकल्प,
प्रियंका ने उसे अपने खून में उतार लिया।
जब प्रियंका मुस्कुराती है, लगता है इंदिरा जीवित हो उठीं,
जब बोलती है, तो इंदिरा की आवाज़ गूँजती महसूस होती।

पिता राजीव की यादों को संभाले, दादी इंदिरा की छाया में,
प्रियंका चल रही है उस राह पर जो कभी आसान नहीं थी।
ये रिश्ता सिर्फ दादी-पोती का नहीं,
ये तो भारतीय इतिहास की अनकही, अनमोल कहानी है।

समय की दीवारें पार कर, इंदिरा की आत्मा आज भी,
प्रियंका के कदमों में, उनके विचारों में, उनकी लड़ाई में बसती है।
एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक, चली आ रही है ये शक्ति,
ये प्रेम, ये साहस, ये देश के प्रति अटूट निष्ठा। ❤️


सरकार जिम्मेदार है, विपक्ष नहीं!हम सरकार चुनते हैं ताकि वह हमें बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और रोजगार दे; यह जिम्मे...
15/06/2026

सरकार जिम्मेदार है, विपक्ष नहीं!
हम सरकार चुनते हैं ताकि वह हमें बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षा और रोजगार दे; यह जिम्मेदारी विपक्ष की नहीं होती। आज अगर महंगाई आसमान छू रही है, बेरोजगारी बढ़ रही है, स्मार्ट सिटी का अता-पता नहीं है और 'मेक इन इंडिया' फ्लॉप है, तो इसके लिए सीधा सवाल सरकार से होगा। यह कहना कि "विपक्ष नाकारा है," खुद को धोखा देना है। विपक्ष कितना मजबूत होगा, यह जनता तय करती है; आपने खुद लोकसभा में कांग्रेस को सिर्फ 53 सीटें दीं। जब सत्ता, संसाधन और नीतियां सरकार के पास हैं, तो विफलता का ठीकरा विपक्ष पर फोड़ने की होशियारी सिर्फ 'जयकारा मीडिया' ही कर सकता है, क्योंकि उसे इस प्रोपेगैंडा के पैसे मिलते हैं।

मोदी का विकल्प: व्यक्ति नहीं, जनता है
यह नैरेटिव कि "मोदी का कोई विकल्प नहीं है," पूरी तरह फर्जी है। जब मोदी जी महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की बदहाली और चीनी-पाकिस्तानी घुसपैठ को रोकने में नाकाम हैं, तो फिर उनकी जरूरत ही क्या है? नेहरू के बाद शास्त्री, इंदिरा, राजीव, नरसिम्हा राव और डॉ. मनमोहन सिंह जैसे नेतृत्व इसी देश से निकले। ये नेता पहले से तय 'चेहरे' नहीं थे, बल्कि देश सेवा का जज्बा और विचारधारा इनका विकल्प बनी। यूपीए सरकार ने मनरेगा, आरटीआई (RTI) और शिक्षा का अधिकार देकर जनता को मालिक बनाया, जबकि 2014 में चुनी गई यह 'मजबूत सरकार' हक मांगने पर अपने ही नागरिकों को देशद्रोही, खालिस्तानी और मवाली का टैग दे देती है।

सूट-बूट की सरकार: किसान बनाम उद्योगपति
राहुल गांधी का यह कहना शत-प्रतिशत सच है कि यह 'सूट-बूट की सरकार' है। मोदी सरकार ने पिछले 8 सालों में अपने अरबपति मित्रों का ₹10.5 लाख करोड़ से ज्यादा का लोन राइट-ऑफ (माफ) कर दिया, लेकिन देश के अन्नदाताओं का ₹17.5 लाख करोड़ का कर्ज माफ करने से साफ मुकर गई। उद्योगपतियों का हितैषी होना गुनाह नहीं है, लेकिन किसान, मजदूर और छोटे व्यापारियों की लाश पर कॉर्पोरेटपरस्ती करना इस देश के संविधान का अपमान है। जब ₹400 का गैस सिलेंडर था, तब मोदी जी कहते थे कि सिलेंडर को प्रणाम करके वोट देना; आज ₹1100 के सिलेंडर पर क्या वे जनता से दंडवत होने की उम्मीद करते हैं?

'नोटा' (NOTA) और राजनीतिक उदासीनता: एक सुनियोजित साजिश
युवाओं के बीच जो यह नैरेटिव फैलाया जा रहा है कि "मेरा पॉलिटिक्स में इंटरेस्ट नहीं है" या "मैं नोटा दबाऊंगा", यह कोई संयोग नहीं है। यह पीआर (PR) एजेंसियों, बिकाऊ पत्रकारों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और सरकारी मशीनरी द्वारा फैलाया गया एक सुनियोजित प्रोपेगैंडा है। इसका एकमात्र मकसद सत्ता-विरोधी वोटों को बिखेरना और मोदी सरकार की महा-विफलताओं से ध्यान भटकाना है। आपका राजनीति से तौबा करना या नोटा का बटन दबाना, सीधे तौर पर इस नाकाम सरकार की मदद करना है। जो लोग नोटा दबाकर खुद को प्रगतिशील समझ रहे हैं, वे असल में सत्ता के बिछाए जाल में फंस रहे हैं।

निष्कर्ष: भारत एक भावुक देश है, जहाँ भावनाओं की अफीम चटाकर जनता के तर्कों को सुला दिया जाता है। ₹400 और ₹1100 के सिलेंडर का अंतर साफ है, लेकिन क्या हमारे दिमाग में कोढ़ हो गया है जो हमें यह महंगाई महसूस नहीं हो रही? याद रखिए, लोकतंत्र में जनता ही असली मालिक है। अपनी जेब, अपने बच्चों के भविष्य और अधिकारों को बचाने के लिए निराशा का नोटा नहीं, बल्कि जागरूक होकर बदलाव के लिए चोट करना ही एकमात्र रास्ता है।

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