26/08/2026
From the wall of @डॉ. पुरुषोत्तम मेघवाल
एक व्यवस्था जो साठ वर्ष से शिक्षा पर छह प्रतिशत खर्च का वचन दोहरा रही है और आज तक चार पर अटकी है — उसे भूलने की बीमारी नहीं है। उसे युवाओं की आवश्यकता ही नहीं है, केवल उनके वोट की है।
गणित देखिए। परिवहन का बजट आठ वर्षों में 5.2 से बढ़कर 12 प्रतिशत — क्योंकि उद्घाटन के फीते वहीं कटते हैं। शिक्षा में केंद्र का हिस्सा 0.47 से घटकर 0.33 प्रतिशत — क्योंकि कक्षा में बैठा बालक बीस वर्ष बाद नागरिक बनता है, और बीस वर्ष बाद की चिंता इस व्यवस्था के स्वभाव में नहीं है। जिन हवाई अड्डों पर विमान नहीं उतरते, वे राष्ट्रीय गौरव कहलाते हैं; जिन विद्यालयों में शिक्षक नहीं पहुँचते, वे किसी विमर्श में नहीं आते। अधोसंरचना आवश्यक है, पर खाली हवाई अड्डे और सूनी राजमार्गें राष्ट्र नहीं बनातीं। राष्ट्र बनता है शिक्षित मस्तिष्कों से, हुनरमंद हाथों से।
और जब सरकारी विद्यालय जानबूझकर सूखने छोड़ दिए गए, तो गरीब का बालक कहाँ गया? ट्यूशन के बाजार में। शहर में दस हजार, गाँव में साढ़े चार हजार — यह शुल्क नहीं है, यह व्यवस्था की विफलता पर लगाया गया कर है, जो सबसे निर्धन परिवारों से वसूला जा रहा है। जो शिक्षा संविधान में अधिकार थी, वह बाजार में उत्पाद बना दी गई — और इसे सुधार कहा जा रहा है।
परिणाम? छत्तीस करोड़ सत्तर लाख युवाओं में से पंद्रह से पच्चीस वर्ष के चालीस प्रतिशत बेरोजगार। यह आँकड़ा नहीं, अभियोगपत्र है। जनसांख्यिकीय लाभांश के भाषण देने वाली व्यवस्था ने ही उसे आपदा में बदलने की पूरी तैयारी कर ली है — अंतर केवल इतना है कि आपदा जब आएगी, तब भाषण देने वाले मंच पर नहीं होंगे, भुगतने वाले सड़क पर होंगे। जंतर मंतर पर खड़ी युवा पीढ़ी उसी भविष्य की पहली झलक है।
जिस राष्ट्र ने व्यक्ति गढ़ना छोड़ दिया, उसका पतन कोई सेना नहीं रोक सकती। वंचित के हाथ से शिक्षा छीनना उसे गुलामी में लौटाने का सबसे सभ्य तरीका है।
तो प्रश्न अब नीति का नहीं, नीयत का है — जो व्यवस्था कंक्रीट पर अरबों लुटा सकती है पर कक्षा के लिए उसके पास बजट नहीं, वह किसका भविष्य बना रही है? उत्तर आपके पास है, comment में लिखिए।
— डॉ. पुरुषोत्तम मेघवाल
Meghwal's IAS एवं Bhu-Gyan Consultancy Services, भोपाल