Shri Narmada Prakashan

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"असम का मारवाड़ी समाज : कुछ सवाल कुछ सुझाव" (पुस्तक)लेखक : उमेश खंडेलियाप्रकाशक: श्री नर्मदा प्रकाशनसमाज केवल व्यक्तियों...
17/02/2026

"असम का मारवाड़ी समाज : कुछ सवाल कुछ सुझाव" (पुस्तक)

लेखक : उमेश खंडेलिया
प्रकाशक: श्री नर्मदा प्रकाशन

समाज केवल व्यक्तियों का समूह नहीं होता, बल्कि वह साझा संस्कृति, संघर्ष और विकास की एक जीवंत गाथा होता है। वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक आदरणीय उमेश खंडेलिया जी की नई पुस्तक "असम का मारवाड़ी समाज: कुछ सवाल कुछ सुझाव" इसी गाथा को एक नई दृष्टि प्रदान करती है।

इस पुस्तक की विशेषताएँ:
- गहन विश्लेषण: असम की माटी में मारवाड़ी समाज के योगदान और वहां के सामाजिक ताने-बाने का गहरा विमर्श।
- साहसिक लेखन: यह पुस्तक केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि समाज के सामने 'सवाल' खड़े करने और 'सुझाव' देने का एक निर्भीक प्रयास है।
- अनुभव का निचोड़: 35 वर्षों की सक्रिय पत्रकारिता और सामाजिक सरोकारों से उपजे विचार।

'लेखन वही सार्थक है जो समाज को आईना दिखाए—सहज भी और आवश्यक भी।'

यह पुस्तक न केवल असम के मारवाड़ी समाज के लिए, बल्कि सामाजिक समन्वय में रुचि रखने वाले हर पाठक के लिए पठनीय है। आइए, इस वैचारिक यात्रा का हिस्सा बनें और साहित्य के माध्यम से समाज को और बेहतर समझने का प्रयास करें।

जब कोई हृदय अपनी गहराइयों से बोलने की कोशिश करता है, तो शब्द अक्सर रुक जाते हैं। वे थम जाते हैं उस कोमल सीमा पर जहाँ मौन...
14/02/2026

जब कोई हृदय अपनी गहराइयों से बोलने की कोशिश करता है, तो शब्द अक्सर रुक जाते हैं। वे थम जाते हैं उस कोमल सीमा पर जहाँ मौन ही सबसे सच्ची भाषा बन जाता है। कवयित्री मीनू लोढ़ा जी का काव्य-संग्रह ‘कचनार ...और गुलाबी खामोशी’ हिंदी कविता की उस परंपरा का एक नवीन, संवेदनशील और आंतरिक आयाम प्रस्तुत करता है जहाँ व्यक्तिगत अनुभूति सार्वजनिक सत्य बन जाती है। यह संग्रह न केवल भावों का संकलन है, बल्कि आत्मा की उन कोमल परतों का उद्घाटन है जहाँ शब्द सीमा पर खड़े होकर मौन को ही भाषा बना लेते हैं।
पुस्तक का शीर्षक स्वयं एक काव्यात्मक सूत्र है। ‘कचनार’ वह गुलाबी-लाल फूल जो वसंत में खिलकर प्रकृति की नाजुक सौंदर्य-भावना को व्यक्त करता है- स्त्रीत्व, कोमलता, जीवन-ऊर्जा और नई आशा का प्रतीक है। ‘गुलाबी खामोशी’ उस मौन की व्याख्या करती है जो लज्जा, गहराई और अनकही भावनाओं से भरा होता है। एक ऐसा मौन जो चुप रहकर भी बोलता है, जो पीड़ा को स्वीकार करता है और प्रेम को निभाने की शक्ति देता है। यह शीर्षक संग्रह की द्वंद्वात्मकता को रेखांकित करता है, बाहरी रंगीन खिलावट और भीतरी शांत गहराई।
इस संग्रह की कविताएँ लिखी नहीं गईं, जी गईं। ये उन रातों से निकली हैं जब आँसू शब्द बनने से पहले तकिए पर गिरते हैं। ये उन सुबहों से आई हैं जब सूरज उगने से पहले भीतर ही रोशनी जलती रहती है। ये प्रेम हैं- जो पाने से कहीं अधिक निभाने का है, जो दूर रहकर भी पास रहता है। ये पीड़ा हैं- जो टूटने से अधिक स्वीकार करने की है, जो घावों को फूल बनाने की कला सिखाती है। और ये उम्मीद हैं- वह छोटी-सी, काँपती हुई लौ जो अंधेरे में भी नहीं बुझती, बस जलती रहती है, धीरे-धीरे, लेकिन अटूट।
कविताएँ- जैसे ‘अंतर्नाद’, ‘खामोशी’, ‘अधूरी मुहब्बत’, ‘सुकून की बात’, ‘मैं मुक्त कविता होती’ -प्रेम की सात्विकता, पीड़ा की स्वीकृति, आशा की अटूट लौ, आत्मिक जागरण और अदृश्य शक्ति के प्रति समर्पण जैसे विषयों पर केंद्रित हैं। कवयित्री स्पष्ट कहती हैं कि ये कविताएँ ‘लिखी नहीं गईं’ ये भीतर की चुप्पियों, अधूरी मुस्कानों और आत्मा के गहन संवादों से स्वतः उभरी हैं। यह स्वाभाविकता संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। भाषा सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण है- न कोई अतिरेकी अलंकार, न जटिल छंदबद्धता फिर भी प्रत्येक पंक्ति में गहन अनुभूति का स्पंदन है। यह आधुनिक हिंदी कविता की मुक्त छंद शैली को अपनाते हुए भी भावों की शुद्धता और आध्यात्मिक गहराई को बनाए रखती है।
मीनू लोढ़ा जी की कृति में प्रेम ‘पाने से अधिक निभाने’ का है, पीड़ा ‘टूटने से अधिक समझ’ की है, और आशा ‘अंधकार में जलती छोटी-सी लौ’। यहाँ जीवन एक आंतरिक यात्रा है- मन की यात्रा, आत्मिक जागरण के क्षण और उस अदृश्य शक्ति के प्रति समर्पण जो स्वयं से और जीवन से जोड़ती है। संग्रह उन संवेदनशील हृदयों को समर्पित है जो गहराई से महसूस करते हैं किंतु शब्दों में व्यक्त नहीं कर पाते। यदि कोई पाठक इन पंक्तियों में अपनी कोई चुप्पी, स्मृति, प्रार्थना या अनकहा भाव पा ले, तो यही इस संग्रह की सार्थकता है।
समकालीन हिंदी काव्य में यह संग्रह एक नई आवाज़ है- व्यक्तिगत होते हुए सार्वभौमिक, स्त्री-दृष्टि से लिखी गई परंतु मानवीय अनुभूति की सार्वत्रिकता को छूती हुई। यह मौन की भाषा में बोलने वाली कविता है, जो पाठक को भीतर की यात्रा पर आमंत्रित करती है।
यह संग्रह उन सभी के लिए है जिनके भीतर एक गुलाबी खामोशी बसती है... और जो उस खामोशी में भी संपूर्ण प्रेम, पीड़ा और आशा को जीते हैं। मीनू लोढ़ा ने इस खामोशी को शब्द दिए हैं। अब बारी हमारी है, उन्हें सुनने की, महसूस करने की, और शायद... थोड़ा-सा जीने की।

- सत्यम सिंह बघेल

वंदना 'विनम्र' का रचना संसार'अहल्या विषाद' (महाकाव्य) -वंदना 'विनम्र' की यह रचना 'अहल्या विषाद' एक महाकाव्य है जो प्राची...
13/02/2026

वंदना 'विनम्र' का रचना संसार
'अहल्या विषाद' (महाकाव्य) -

वंदना 'विनम्र' की यह रचना 'अहल्या विषाद' एक महाकाव्य है जो प्राचीन पौराणिक कथा को नई दृष्टि से प्रस्तुत करती है। अहल्या, जो ब्रह्मा की पुत्री, गौतम ऋषि की पत्नी और इंद्र के छल की शिकार बनी, इस काव्य में अपनी आंतरिक पीड़ा, विषाद और अंततः मोक्ष की यात्रा को व्यक्त करती है। लेखिका ने विभिन्न छंदों का उपयोग कर अहल्या की मनोदशा को जीवंत किया है, जो न केवल स्त्री की अस्मिता पर प्रश्न उठाती है बल्कि पुरुष-प्रधान समाज की विसंगतियों पर भी प्रकाश डालती है। यह काव्य धार्मिक कथानक से आगे बढ़कर मानवीय भावनाओं की गहराई को छूता है, जहां श्राप और मुक्ति के बीच की संघर्षमय यात्रा पाठक को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती है। वंदना जी की सरल भाषा और भावपूर्ण शैली इस महाकाव्य को सभी आयु वर्ग के पाठकों के लिए सुलभ बनाती है, जो स्त्री विमर्श का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

'यह ठीक नहीं' (नाटक) -
'यह ठीक नहीं' वंदना 'विनम्र' का एक सामाजिक नाटक है जो पारिवारिक संबंधों की जटिलताओं और नैतिक दुविधाओं को उजागर करता है। नाटक के पात्र जैसे बनवारी लाल, मोहन, राघव आदि एक सामान्य परिवार की कहानी बुनते हैं, जहां धन, विवाह और सामाजिक दबाव जैसे मुद्दे केंद्रीय हैं। लेखिका ने संवादों के माध्यम से समाज की उन गलत प्रथाओं पर प्रहार किया है जो परिवारों को विघटित करती हैं, जैसे दहेज, झूठ और स्वार्थ। यह नाटक न केवल मनोरंजन करता है बल्कि दर्शकों को आत्मावलोकन के लिए बाध्य करता है कि क्या हमारी दैनिक क्रियाएं वास्तव में 'ठीक' हैं? वंदना जी की लेखनी में सादगी और सशक्त संदेश का समन्वय इस नाटक को मंचन के लिए आदर्श बनाता है, जो युवा पीढ़ी को नैतिक मूल्यों की याद दिलाता है।

'देश पहले है' (बाल उपन्यास) -
वंदना 'विनम्र' का बाल उपन्यास 'देश पहले है' बच्चों में देशभक्ति की भावना जगाने का एक सराहनीय प्रयास है। कहानी दो भाइयों अंश और वंश की है, जो सेना में भर्ती होने का सपना देखते हैं और भिखारी के वेश में आतंकवादियों की साजिश को नाकाम करते हैं। लेखिका ने रोमांच, साहस और नैतिक शिक्षा का सुंदर संयोजन किया है, जो बच्चों को बताता है कि राष्ट्र की सुरक्षा में छोटी उम्र में भी बड़ा योगदान दिया जा सकता है। यह उपन्यास न केवल मनोरंजक है बल्कि देशप्रेम, सतर्कता और परिवार के महत्व को सरल भाषा में समझाता है। वंदना जी की कलम से निकली यह रचना बच्चों को प्रेरित करती है कि व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर राष्ट्रहित है, और यह बाल साहित्य में एक मूल्यवान योगदान है।

- सत्यम सिंह बघेल

संतोष मणि गुप्ता की साहित्यिक दुनिया'लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम' :काव्य संग्रह 'लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम' एक ऐसा अनमोल रत्न है...
12/02/2026

संतोष मणि गुप्ता की साहित्यिक दुनिया

'लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम' :
काव्य संग्रह 'लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम' एक ऐसा अनमोल रत्न है, जो जीवन की गहन दार्शनिकता को सरल और प्रभावशाली शब्दों में उकेरता है। संतोष मणि गुप्ता जी की यह कृति पारिवारिक मूल्यों से लेकर पर्यावरण संरक्षण, धार्मिक चेतना और सामाजिक जागरूकता तक के विविध आयामों को छूती है। 101 रचनाओं का यह संग्रह न केवल सौंदर्य का माध्यम है, बल्कि जीवन-दर्शन का सार्वभौमिक उपकरण भी बन जाता है। प्रत्येक पंक्ति में नैतिक शिक्षा का बीज अंकुरित होता है। रचनाओं की विशेषता उनकी प्रेरणादायी शक्ति में निहित है। गुप्ता जी का काव्य जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं को दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करता है।

'कथात्मक काव्य' :
'कथात्मक काव्य' एक ऐसी विधा रही है, जहाँ कवि शब्दों के माध्यम से जीवन की गहन कथाओं को न केवल बुनता है, बल्कि सामाजिक, भावनात्मक और दार्शनिक परतों को उकेरता भी है। संतोष मणि गुप्ता जी का काव्य संग्रह 'कथात्मक काव्य' इसी परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है। इस संग्रह में प्रस्तुत रचनाएँ कथा-काव्य के सिद्धांतों—जैसे घटना-चक्र, पात्र-विकास और भाव-संघर्ष को आधुनिक संदर्भों में पुनरुज्जीवित करती हैं, जहाँ पारंपरिक लोककथाओं से लेकर समकालीन सामाजिक विमर्शों तक का स्पर्श मिलता है। गुप्ता जी की रचनाएँ मात्र कथा नहीं, बल्कि एक दर्पण हैं जो पाठक को स्वयं की आंतरिक यात्रा पर विचार करने को बाध्य करती हैं। कुल मिलाकर, 'कथात्मक काव्य' पाठकों के लिए एक ऐसा आलय है, जहाँ शब्द जीवन के सूत्र बुनते हैं।

'मन एक चंचल परिंदा' :
'मन एक चंचल परिंदा' एक ऐसा संग्रह है, जो भावनाओं की उड़ान को शब्दों में कैद करता है। यह कृति ग़ज़ल की पारंपरिक छंदबद्धता को आधुनिक संवेदनाओं से जोड़ती है, जहाँ प्रेम, जीवन-संघर्ष, सामाजिक व्यंग्य और दार्शनिक चिंतन का अनूठा मिश्रण मिलता है। गुप्ता जी का काव्य मन की चंचलता को दर्पण की तरह प्रतिबिंबित करता है। संग्रह की विशेषता इसकी विविधता में है—प्रेम की मधुरता से लेकर सामाजिक कुरीतियों की टीका तक। यह ग़ज़लें न केवल मनोरंजक हैं, बल्कि प्रेरणादायी भी, जो पाठक को आत्म-चिंतन की ओर ले जाती हैं।

'महामृत्युंजय' :
खंड काव्य परंपरा में 'महामृत्युंजय' एक ऐसा महाकाव्यात्मक प्रयास है, जो पौराणिक कथा को आधुनिक संदर्भों में पुनर्जीवित करता है। यह कृति शिव की महिमा को केंद्र में रखकर जीवन, मृत्यु और अमरत्व के दार्शनिक आयामों को छूती है। खंड काव्य के रूप में यह पारंपरिक छंदों को भावपूर्ण वर्णनों से समृद्ध करता है, जहाँ घटना-चक्र और पात्र-विकास के माध्यम से गहन संदेश दिया गया है। कुल मिलाकर, 'महामृत्युंजय' एक ऐसा ग्रंथ है, जो अमरत्व की खोज में पाठक को डुबो देता है।

— सत्यम सिंह बघेल

11/02/2026

के.एल. महोबिया की साहित्यिक दुनिया

के.एल. महोबिया हिंदी साहित्य के एक उभरते हुए रचनाकार हैं, जिनकी कलम में जीवन की सूक्ष्म अनुभूतियों, सामाजिक सरोकारों और भावनात्मक गहराइयों का अनोखा संगम दिखाई देता है। एक शिक्षक के रूप में नवोदय विद्यालय में कार्यरत महोबिया जी की रचनाएँ उनकी व्यक्तिगत यात्रा, पारिवारिक मूल्यों और सांस्कृतिक चिंताओं से प्रेरित हैं। श्री नर्मदा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तकें, जो लेखक की रचनात्मकता को एक सशक्त मंच प्रदान करती हैं। इन कृतियों में महोबिया जी की लेखनी जीवन की जटिलताओं को सरल शब्दों में उकेरती है, जहाँ आत्म-चिंतन, प्रेम, विरह, सामाजिक विडंबनाएँ और नैतिक मूल्य प्रमुख रूप से उभरते हैं।

के.एल. महोबिया का जन्म और पालन-पोषण एक ऐसे परिवेश में हुआ, जहाँ पारंपरिक मूल्य और आधुनिक चुनौतियाँ साथ-साथ चलती हैं। महोबिया जी की लेखनी में हिंदी साहित्य की स्नातकोत्तर शिक्षा का प्रभाव स्पष्ट है, जो उन्हें शब्दों की बारीकियों और भावों की गहराई समझने में सहायक हुई। उनका लेखन न केवल व्यक्तिगत अनुभवों का दस्तावेज़ है, बल्कि समाज को सकारात्मक संदेश देने का माध्यम भी। वे कहते हैं कि शब्द मात्र अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि भावनाओं की लहरें हैं, जो पाठक के मन को स्पर्श करती हैं।

'वह मेरी भूल थी' -
यह कृति महोबिया जी की आत्मकथात्मक शैली में लिखी गई है, जो जीवन की छोटी-मोटी अनुभूतियों का संकलन है। यह संमरण पाठक को आत्म-निरीक्षण की ओर प्रेरित करता है, जहाँ गलतियाँ नहीं, बल्कि उनसे सीखने की प्रक्रिया महत्वपूर्ण है। पुस्तक में जीवन की चुनौतियों, सफलताओं और असफलताओं का वर्णन इतनी सहजता से किया गया है कि यह पाठक के हृदय को छू लेती है। साहित्यिक दृष्टि से यह कृति हिंदी संमरण साहित्य में एक सरल लेकिन गहन योगदान है, जो आधुनिक पाठक को अपनी जड़ों से जोड़ती है।

'कुछ मत कहिए' -
यह कृति हिंदी काव्य की विविधता को दर्शाती है। महोबिया जी भारतीय संस्कृति की क्षति पर चिंता व्यक्त करते हैं और नैतिक मूल्यों को बनाए रखने की अपील करते हैं। काव्य-संग्रह में देशभक्ति, जीवन मूल्य, सौंदर्य और मानवीय भावनाओं से जुड़े सरोकार प्रमुख हैं। लेखक की कविताएँ प्रश्नों के चक्रव्यूह से निकलकर पाठक को जोड़ने का प्रयास करती हैं। साहित्यिक रूप से यह संग्रह आधुनिक हिंदी कविता की परंपरा को आगे बढ़ाता है, जहाँ शब्दों की सादगी में गहन दर्शन छिपा है। यह पुस्तक उन पाठकों के लिए आदर्श है जो कविता में जीवन की सच्चाइयों को खोजते हैं, और यह हिंदी साहित्य में नैतिकता और भावुकता के संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करती है।

'कभी तो सुनोगे' -
महोबिया जी की यह कृति, ग़ज़लों का संकलन है। ग़ज़लें प्रेम, विरह, इंतजार, मिलन और जीवन की व्यथाओं को छूती हैं। साहित्यिक दृष्टि से यह संग्रह ग़ज़ल विधा की परंपरा को समृद्ध करता है, जहाँ रदीफ़ और काफ़िया के माध्यम से जीवन दर्शन उभरता है। यह पुस्तक हिंदी-उर्दू साहित्य के संगम को दर्शाती है, जो पाठक को आत्म-निरीक्षण और सकारात्मकता की ओर ले जाती है।

महोबिया जी की ये कृतियाँ हिंदी साहित्य में एक नई ऊर्जा का संचार करती हैं। वे न केवल व्यक्तिगत अनुभव साझा करती हैं, बल्कि समाज को नैतिकता, प्रेम और संस्कृति के प्रति जागरूक बनाती हैं। इन पुस्तकों में लेखक की कलम की सादगी और गहराई पाठक को बांधे रखती है। साहित्य प्रेमियों के लिए ये कृतियाँ एक मूल्यवान योगदान हैं, जो जीवन की सच्चाइयों को काव्य, संमरण और ग़ज़ल के माध्यम से उजागर करती हैं। महोबिया जी का लेखन हमें याद दिलाता है कि साहित्य मात्र मनोरंजन नहीं, बल्कि जीवन को बेहतर बनाने का साधन है।

- सत्यम सिंह बघेल

एस.पी. जायसवाल 'निश्छल' का काव्य संसार एस.पी. जायसवाल 'निश्छल' हिंदी साहित्य के एक संवेदनशील और बहुमुखी रचनाकार हैं, जिन...
10/02/2026

एस.पी. जायसवाल 'निश्छल' का काव्य संसार

एस.पी. जायसवाल 'निश्छल' हिंदी साहित्य के एक संवेदनशील और बहुमुखी रचनाकार हैं, जिनकी कृतियां जीवन के विविध रंगों को काव्य की मधुरिमा से सजाती हैं। एक सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य और शिक्षक के रूप में उनका जीवन अनुभवों से परिपूर्ण रहा है, जो उनकी कविताओं में गहन भावुकता और सामाजिक जागरूकता के रूप में प्रकट होता है। वे हिंदी के अलावा सरगुजा (छत्तीसगढ़ी) में भी लेखन करते हैं, और उनकी रचनाएं रामायण, हनुमान चालीसा, दाई सीता, भगवद्गीता जैसे धार्मिक एवं सांस्कृतिक विषयों पर आधारित हैं। उनकी प्रमुख हिंदी काव्य संग्रहों— 'निश्छल के दोहे', काव्य मंजरी, 'काव्यांजलि', 'काव्य कुंज' और 'मधुरिमा' — पर आधारित है, जो श्री नर्मदा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हैं। जो विविध रसों और विषयों को छूती हैं। जायसवाल जी की कविताएं सरल, प्रवाहपूर्ण भाषा में लिखी गई हैं, जो पाठक के हृदय को स्पर्श करती हैं और समकालीन समाज की विसंगतियों पर प्रहार भी करती हैं।

'निश्छल' जी की काव्य शैली में सहजता और सरलता का अद्भुत समन्वय है। वे छंदबद्ध कविताओं के भंवर में नहीं पड़ते, बल्कि मुक्तछंद, दोहे, गीत और आल्हा जैसी लोकप्रिय शैलियों का उपयोग करते हैं। उनकी भाषा बोलचाल की है, जो ग्रामीण और शहरी जीवन दोनों को प्रतिबिंबित करती है। उनकी रचनाएं आत्मकथात्मक नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक अनुभवों को व्यक्त करती हैं, जो पाठक को अपने से जोड़ती हैं। वे राजनीतिक व्यंग्य और सामाजिक विडंबनाओं पर भी कलम चलाते हैं, लेकिन बिना उपदेशात्मक हुए।

'निश्छल' जी की कृतियां हिंदी काव्य को लोकजीवन से जोड़ती हैं। वे सरगुजा जैसे क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर को हिंदी में लाते हैं, जो क्षेत्रीय साहित्य को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करती है। उनकी 27 से अधिक प्रकाशित कृतियां (हिंदी और सरगुजा में) उन्हें बहुभाषी रचनाकार बनाती हैं। जायसवाल जी का काव्य जगत एक कुंज है, जहां मधुरिमा की सुगंध फैली है। उनकी रचनाएं पाठकों को जीवन की सच्चाइयों से जोड़ती हैं, और हिंदी साहित्य में एक 'निश्छल' योगदान हैं।

- सत्यम सिंह बघेल

लेखक विजय बेशर्म की साहित्यिक दुनिया : एक परिचयसमकालीन हिंदी साहित्य में विजय बेशर्म एक ऐसा नाम है जो सामाजिक संवेदनाओं ...
09/02/2026

लेखक विजय बेशर्म की साहित्यिक दुनिया : एक परिचय

समकालीन हिंदी साहित्य में विजय बेशर्म एक ऐसा नाम है जो सामाजिक संवेदनाओं को सरल भाषा में उकेरते हुए पाठकों के मन को छू लेता है। उनकी रचनाएँ—'नई पीढ़ी', 'दोस्ती' और 'नजरिया'—न केवल बाल साहित्य की समृद्धि बढ़ाती हैं, बल्कि वयस्क पाठकों को भी जीवन की गहराइयों पर विचार करने को मजबूर करती हैं। बेशर्म जी की लेखनी में एक अनोखी मिठास है; वह सामान्य जीवन की जटिलताओं को इतनी सहजता से बयान करती है कि कथा पढ़ते हुए लगता है जैसे हम अपनी ही दुनिया में विचरण कर रहे हों।

'नई पीढ़ी' एक पूर्ण उपन्यास है जो पारिवारिक संबंधों की पड़ताल करता है। इसमें बुजुर्गों की उपेक्षा, पीढ़ीगत अंतराल और अंततः मोचन की कहानी है। लेखक ने अपनापन और करुणा के माध्यम से दिखाया है कि कैसे एक अनजान व्यक्ति परिवार का हिस्सा बन सकता है। यह रचना 2024 में प्रकाशित हुई, जिसमें डॉ. विकास देव की प्रशंसा भरी भूमिका है, जो लेखक की सृजनशीलता को रेखांकित करती है।

इसी प्रकार, 'दोस्ती' बाल उपन्यास के रूप में दोस्ती की शक्ति और शिक्षा के महत्व पर केंद्रित है। कबीर जैसा पात्र माता-पिता के विरोध के बावजूद शहर जाकर पढ़ाई करता है, लेकिन जीवन की अनिश्चितताएँ उसे नए मोड़ देती हैं। 2025 में प्रकाशित यह कृति दोस्ती को जीवन का दर्पण बताती है, जहाँ सच्चा मित्र विपत्ति में साथ निभाता है।

अंत में, 'नजरिया' भी 2025 की बाल उपन्यास है, जो गरीबी और अमीरी के बीच की खाई को पाटने की कोशिश करती है। इसमें एक प्रधानाचार्य का परिवर्तन दिखाया गया है, जो गरीबों को तुच्छ समझता है, लेकिन एक बच्चे की सहायता से अपना नजरिया बदलता है। यह रचना सामाजिक असमानताओं पर करारा प्रहार करती है।

विजय बेशर्म जी की सभी कृति रचनाएँ एक सूत्र में बंधी हैं: मानवीय मूल्यों की खोज। वे पारिवारिक बंधन, मित्रता और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को छूती हैं, जो आज की भागदौड़ भरी दुनिया में प्रासंगिक हैं। उनकी भाषा सरल है, लेकिन भाव गहन; बाल पाठकों के लिए नैतिक शिक्षा और वयस्कों के लिए आत्मचिंतन। इन पुस्तकों में लेखक का संदेश स्पष्ट है—जीवन में रिश्ते और संवेदना ही सच्ची संपदा हैं। बेशर्म जी की लेखनी नई पीढ़ी को दिशा देती है, दोस्ती की मिठास सिखाती है और नजरिए को बदलने की प्रेरणा देती है। यह साहित्यिक परिचय उनकी रचनाओं को पढ़ने का निमंत्रण है, जहाँ हर पृष्ठ पर जीवन की सच्चाई छिपी है।

- सत्यम सिंह बघेल

पुस्तक : गीत सरिता लेखिका : सिद्धेश्वरी सलाफ 'शीलू'प्रकाशक श्री नर्मदा प्रकाशन हिंदी साहित्य की परम्परा में छंद विधा एक ...
07/02/2026

पुस्तक : गीत सरिता

लेखिका : सिद्धेश्वरी सलाफ 'शीलू'

प्रकाशक श्री नर्मदा प्रकाशन

हिंदी साहित्य की परम्परा में छंद विधा एक ऐसा अवलम्ब है, जो काव्य की लयबद्धता को न केवल संगीतमय बनाती है, अपितु भावों की गहनता को भी परिमापित करती है। छंद, संस्कृत से उद्भूत यह विधा, मात्रा, वर्ण, यति और गति के सख्त नियमों पर आधारित है, जहाँ शब्दों का संयोजन मात्र ध्वनि-सौन्दर्य तक सीमित न रहकर, अर्थ की परतों को उकेरने का माध्यम बन जाता है। यह काव्य का वह कंकाल है, जो भावों को आकार देता है- जैसे नदी का तट, जो जल को दिशा प्रदान करता है। हरिगीतिका और गीतिका जैसे छंदों में यह विधा विशेष रूप से उभरती है, जहाँ हरिगीतिका की चार चरणों वाली संरचना में प्रकृति और भक्ति का मिश्रण होता है, तो गीतिका की सरलता में प्रेम, करुणा और जीवन-दर्शन का सरल प्रवाह। छंद विधा साहित्यिक रूप से काव्य को ‘रसानुभूति’ का वाहक बनाती है, जहाँ लय भावों को गहन बनाती है और गहनता लय को अमर। यह न केवल कवि की शिल्प-कुशलता का प्रमाण है, अपितु पाठक के हृदय में अनुगूंज पैदा करने वाली शक्ति भी।

ऐसी ही छंद-कुशलता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत है ‘गीत सरिता’ छंद-संग्रह, जिसमें हरिगीतिका और गीतिका छंदों का सुंदर संकलन है। इस संग्रह की रचयिता छंद-विज्ञ कवयित्री सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी हैं, जिनकी कलम सहज भावों के साथ गहरे अर्थों को समेटने वाली सुमधुर सृष्टि रचती है। कवयित्री सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की छंद-कौशलता तो उनकी विद्वता का प्रमाण है ही, परन्तु उनकी सृजनशीलता में ऐसी अद्भुत शक्ति है, जो सामान्य शब्दों को भी काव्य के सागर में विलीन कर मोती बना देती है। वे छंदों के नियमों को बंधन न मानकर, उन्हें भावों की उड़ान का पंख बनाती हैं- जैसे हरिगीतिका में प्रकृति की कोमलता को भक्ति की गहराई से जोड़कर, या गीतिका में दैनिक जीवन की सरलता को दार्शनिक ऊँचाई प्रदान कर। उनकी रचनाएँ न केवल मात्रा-विन्यास की दृष्टि से परिपूर्ण हैं, अपितु रसों की विविधता- शृंगार, करुणा, वीर और भक्ति आदि से ओतप्रोत हैं। कवयित्री की यह रचनाधर्मिता हिंदी छंद-परम्परा को समृद्ध करती है, जहाँ प्रत्येक छंद एक सरिता की भाँति बहता है- सहज, मधुर और अर्थपूर्ण।

‘गीत सरिता’ संग्रह पाठकों को छंदों की उस दुनिया में ले जाता है, जहाँ शब्द लयबद्ध होकर हृदय को स्पर्श करते हैं। विदूषी कवयित्री की यह देन न केवल छंद-प्रेमियों के लिए आनंद का स्रोत है, अपितु उभरते साहित्यकारों के लिए प्रेरणा भी। आशा है, यह संग्रह पाठकों के मन में गीतों की सरिता बहाएगा, और छंद-विधा की महत्ता को नई ऊँचाई प्रदान करेगा।

- सत्यम सिंह बघेल

पुस्तक: "संवेदन सूखे-टूटे प्रतिमान" लेखिका : प्रमिला भारतीप्रकाशक : श्री नर्मदा प्रकाशन वरिष्ठ कवयित्री प्रमिला भारती जी...
06/02/2026

पुस्तक: "संवेदन सूखे-टूटे प्रतिमान"
लेखिका : प्रमिला भारती
प्रकाशक : श्री नर्मदा प्रकाशन

वरिष्ठ कवयित्री प्रमिला भारती जी की काव्य-संग्रह "संवेदन सूखे-टूटे प्रतिमान" एक ऐसा दस्तावेज़ है जो समकालीन हिंदी कविता में संवेदना की सूखी और टूटी हुई मूर्तियों को नए सिरे से गढ़ने का प्रयास करता है। श्री नर्मदा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह संग्रह, जिसमें मुख्य रूप से मुक्तक, गीत और छंदमुक्त कविताएँ शामिल हैं, लेखिका की व्यक्तिगत अनुभूतियों को सामाजिक, आध्यात्मिक और पर्यावरणीय संदर्भों से जोड़ता है। पुस्तक का शीर्षक ही अपने आप में एक रूपक है—संवेदनाएँ जो सूखकर टूट गई हैं, लेकिन फिर भी प्रतिमान (आदर्श) के रूप में जीवित रहने की कोशिश कर रही हैं। लेखिका का आत्मकथ्य और प्रस्तावनाएँ (रवींद्र नाथ सिंह एवं ममता सिंह द्वारा) इस संग्रह को एक गहन वैचारिक आधार प्रदान करती हैं, जहाँ महादेवी वर्मा की परंपरा का प्रभाव स्पष्ट दिखता है।

प्रमिला भारती जी की काव्य शैली सरल, प्रवाहपूर्ण और भावपूर्ण है। उन्होंने संग्रह में मुख्य रूप से मुक्त छंद का प्रयोग किया है, लेकिन कुछ में गीतात्मकता और छंदबद्धता है, दोहे-चौपाइयों का प्रभाव। कविताएँ छोटी-छोटी पंक्तियों में हैं, जो पाठक को सोचने पर मजबूर करती हैं। हालांकि, कुछ स्थानों पर भावुकता अतिरेक लग सकती है, लेकिन यह लेखिका की ईमानदार अभिव्यक्ति का हिस्सा है।

"संवेदन सूखे-टूटे प्रतिमान" एक संवेदनशील काव्य-संग्रह है, जो सूखी संवेदनाओं को फिर से हरा करने की कोशिश करता है। प्रमिला भारती की कलम में जीवन की पीड़ा, आशा और संघर्ष जीवंत हो उठते हैं। यह उन पाठकों के लिए आदर्श है जो कविता में सौंदर्य से ज्यादा सच्चाई और संदेश तलाशते हैं।

- सत्यम सिंह बघेल

राग-अनुराग-संवेदना में पगी कविताओं के प्रथम संग्रह के साथ हिंदी-भोजपुरी जगत में पदार्पण बलिया की निवासी युवा हिंदी-भोजपु...
05/02/2026

राग-अनुराग-संवेदना में पगी कविताओं के प्रथम संग्रह के साथ हिंदी-भोजपुरी जगत में पदार्पण

बलिया की निवासी युवा हिंदी-भोजपुरी कवयित्री श्वेता पांडे मिश्र खुशबू का प्रथम पूर्ण काव्य संग्रह पढ़ने को मिला है। अभी पिछले दिनों पुस्तक का बलिया की एक पुस्तक प्रदर्शनी में अनौपचारिक लोकार्पण हुआ जबकि वहीं इसके औपचारिक विधिवत लोकार्पण के लिए शीघ्र ही एक कार्यक्रम अपेक्षित है।
इस संग्रह का शीर्षक बड़ा मनमोहक है: “मेरे अनुरागी स्वर”! पुस्तक खोलने और पढ़ने पर शीर्षक वास्तव में सार्थक होता दिखायी देता है क्योंकि कवयित्री की कविताओं में हर तरह के अनुराग, रूमानी प्रेम-प्रणय, स्नेह-वात्सल्य और श्रद्धा की प्रचुर अभिव्यक्ति हुई है।
जहाँ अनुराग का यह व्यापक स्वर इस संग्रह की कुल 76 कविताओं में बहुतायत से दिखता है, वही पारिवारिक और सामाजिक संबंधों तथा विसंगत शैक्षणिक-सामाजिक-राजनैतिक स्थितियों से जुड़ा उनका सजग लेखकीय सरोकार भी बराबर रेखांकित हुआ है।
संग्रह में संकलित श्वेता की कविताएँ लगभग पिछले एक से दो बरस में लिखी गई हैं। इनमें से बहुत सी कविताएँ उन्होंने हिंदी साहित्य मंडल के फेसबुक पटल पर साझा कीं और फिर सुधी पाठकों और अन्य वरिष्ठ लेखकों की प्रतिक्रियाओं से परिमार्जित इन कविताओं के अंतिम रूप को उन्होंने संकलन में स्थान दिया। इस मायने में कवयित्री जहाँ मंडल की इस प्रक्रिया से हुई गुज़र को अपने लिए महत्वपूर्ण मानती हैं, वहीं बलिया की हिंदी प्रचारिणी सभा, शिक्षा शक्ति संस्थान और भोजपुरी ई पत्रिका दियाबाती रूपी तीन महत्वपूर्ण मंचों से अपने जुड़ाव और इनके माध्यम से नगर के वरिष्ठ साहित्यकारों के प्रोत्साहन, काव्यपाठ, कार्यक्रम संचालन और काव्य प्रकाशन के अवसरों आदि को भी अपनी समूची विकास और रचना प्रक्रिया के प्रेरक तत्वों के रूप में पूरा श्रेय देती हैं।
यह तथ्य इस बात से भी सिद्ध होता है कि श्वेता के इस काव्य संग्रह की सटीक भूमिका दियाबाती के संपादक और बलिया क्षेत्र के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राजेंद्र भारती द्वारा लिखी गई है और कवयित्रि ने अपने दो शब्द में अपने परिवार सहित अपने सभी स्थानीय मार्गदर्शकों के प्रति विशेष आभार प्रकट किया है।
श्वेता ने अपने इस काव्य संग्रह की कविताओं को उनके मुख्य भाव, भाषा या शिल्प के आधार पर बड़ी स्पष्ट परिकल्पना के अंतर्गत पाँच खंडों में विभक्त करके प्रस्तुत किया है। इन खंडों में समकालीन सृजन खंड में उनकी 40 कविताएँ सम्मिलित हैं; क्षणिकाएँ खंड में १६ क्षणिकाएं-लघु कविताएँ हैं; अभ्यर्थना खंड में कवयित्रि के इष्टदेव शिव, सरस्वती और गंगा नदी समेत देव-देवियों की अभ्यर्थना स्वरूप लिखी गई 6 कविताएँ हैं; देश की सर्वाधिक लोकचर्चित शहीद त्रयी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव पर, वीरांगना लक्ष्मीबाई, आध्यात्मिक गुरु विवेकानंद, देश को संगठित करनेवाले लौह पुरुष सरदार पटेल और प्रेमचंद तथा निराला जैसे नामचीन साहित्यकारों के अवदान के प्रति वन्दन खंड में 6 कविताएँ संकलित की हैं।
अंतिम खंड में भोजपुरी में लिखित और अनुरागी संवेदना के स्वरों से लबरेज़ अपनी ८ कविताएँ सम्मिलित करके श्वेता ने अपने पहले संग्रह से ही अपनी काव्यानुभूति और अभिव्यक्ति की द्विभाषिक क्षमता की सामर्थ्य दर्ज करा दी है।
विषय, भाव और विचार की दृष्टि से उनकी 40 समकालीन कविताओं में एक ओर आयु सुलभ प्रवृत्तियों को देखते हुए प्रणय कविताएँ, विरह-विलगाव-प्रेम के दायरे में रिक्ति-अभाव, लोगों के मशीनी व्यवहार और संबंधों में युवतर विक्षोभ की कविताएँ हैं तो दूसरी ओर माँ के वात्सल्य भाव और पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता भाव तथा छोटे परिवार से समाप्त होते नातों-रिश्तों को लेकर बड़ी सुंदर कविताएँ सामने आई हैं। “सुई धागा से लेकर बनूँ तेरी पाती, क्या बात हो, तन्हाई का सफ़र, दुविधा, मातृत्व, पिता, यह टूटते रिश्ते” जैसी काफ़ी कविताएँ इस संदर्भ में अत्यंत पठनीय और उल्लेखनीय हैं। इनमें से कुछ कविताएँ जम्मू से प्रकाशित अनियतकालिक ई पत्रिका मधुरिमा में भी पहले प्रकाशित हुई हैं।
तीसरी ओर सामाजिक सरोकार को रेखांकित करती इनकी कविताओं में शैक्षणिक और आजीविका के अवसरों में आरक्षण के दुष्प्रभाव, निर्धनता और वंचित वर्ग के लोगों की दयनीय दशा, लड़कियों के वैवाहिक जीवन में व्याप्त असमानता और इसी पक्ष में पिता के सम्मान की क्षण भंगुरता, नारी सशक्तिकरण और नारी के स्वाभिमान के रक्षण संबंधी अत्यंत सधे स्वर कविताओं में अभिव्यक्त हुए हैं। “वीर है वही, तू वार कर, बाप की पगड़ी” और कुछ अन्य कविताओं में समानता और सम्मान के लिए संघर्ष करने और जीवन से हार न मानने का प्रभावी आह्वान है।
इन्हीं कविताओं में शरद पूनम और कार्तिक मास के चाँद के प्रति श्रृंगारिक भाव रचते हुए, बसंत और पावस ऋतु पर भी लिखी गई रचनाओं के माध्यम से प्रकृति के प्रति श्वेता का प्रचुर लगाव भी अभिव्यक्त हुआ है।
क्षणिकाओं में मानवीय व्यवहार की छोटी-बड़ी स्थितियों में विसंगतियों पर कटाक्ष करने का प्रयास हुआ है।
भोजपुरी खंड में श्वेता ने छठ अवसर की कविता, भाई दूज संबंधी एक लोक कविता के संवर्धित रूप और बेटी की विदाई के अवसर के मनोविज्ञान को खोइछा नामक कविता में अत्यंत उपयुक्त संवेदना के साथ अभिव्यक्त किया है। भोजपुरी की उनकी कुछ कविताएँ दियाबाती ई पत्रिका में पहले प्रकाशित भी हुई है।
उचित बिम्ब विधान में रचते हुए कवयित्रि की भाषा सहज रही है और शिल्प में अधिकांशतः मुक्त छन्द का प्रयोग होने से कविताएँ बहुत पठनीय बन पड़ी हैं, कहीं कहीं तो पूरी गेयता संभव है जैसे कि अभ्यर्थना खंड की प्रयागराज संबंधी कविता।
यह बताना प्रासंगिक होगा कि नवंबर 2025 में आए श्वेता के इस स्वतंत्र एकल संग्रह से पहले 2025 में ही उन्हें देश के अलग अलग भागों से प्रकाशित हुए चार काव्य संकलनों महक शब्दों की (माँडा पब्लिशर्स, दिल्ली); गागर बनी सागर (उदयपुर); तवी की धारा (हिंदी साहित्य मंडल, जम्मू) तथा एक अन्य संकलन कल्पलता (श्री नर्मदा प्रकाशन) में इन अन्य भागों के कवि/कवयित्रिओं के साथ स्थान मिला है। इस मायने में कहना गलत न होगा कि यह बीता वर्ष प्रकाशन जगत में ४ संकलन और एक स्व संग्रह में श्वेता की प्रथम उपस्थिति दर्ज करते हुए उनके लिए बहुत सार्थक समय सिद्ध हुआ है।
संदर्भ अधीन संग्रह को भोपाल-लखनऊ के प्रतिष्ठान श्री नर्मदा प्रकाशन द्वारा बड़ी ख़ूबसूरती से प्रकाशित किया गया है। एक झील और रिट्रीटनुमा एक घर के चित्र के साथ संग्रह का सुंदर मुखपृष्ठ बना है (जोकि स्वयं लेखिका ने इंटरनेट से चुना) और पार्श्व पृष्ठ लेखिका का पूर्ण परिचय दिया गया है।
पुस्तक के अंदर कविताओं के भावों की अनुपूर्ति और श्रीवृद्धि हेतु प्रयुक्त कहीं कहीं सटीक-स्पष्ट और कहीं कहीं सटल परंतु सर्वथा उपयुक्त रेखाचित्रों के लिए पुस्तक प्रकाशक और डिज़ाइनर सत्यम सिंह बघेल को भी साधुवाद देना बनता है।
पेपरबैक रूप में प्रकाशित इस काव्य संग्रह का मूल्य 280/- रू रखा गया है और यह सीधे प्रकाशक के साथ साथ बलिया में प्रमुख पुस्तक विक्रेता “पुस्तक सम्राट” के पास से उपलब्ध है।
रोचक तथ्य है कि प्रतिभाशाली युवा कवयित्री एडवोकेट श्वेता पांडे मिश्र शुरू से ही अपने नाम के साथ उपनाम ‘खुशबू’ का प्रयोग करती हैं। हमारी शुभकामनाएँ कि सार्थक रचनात्मकता का अभ्यास करने की उनकी सामर्थ्य सतत बढ़ती रहे और उनकी रचनात्मकता की ख़ुशबू बलिया ही नहीं पूरे हिंदी और भोजपुरी साहित्य जगत में सफलता से प्रसार पाये!

'ललिता के लीलाधर' : एक भक्तिमय काव्य संग्रह की समीक्षालेखिका : ललिता यादव प्रकाशक : सत्यम सिंह बघेल डॉ. ललिता यादव 'कृषु...
04/02/2026

'ललिता के लीलाधर' : एक भक्तिमय काव्य संग्रह की समीक्षा

लेखिका : ललिता यादव

प्रकाशक : सत्यम सिंह बघेल

डॉ. ललिता यादव 'कृषु' द्वारा रचित 'ललिता के लीलाधर' रचित काव्य संग्रह है जो भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं, उनके प्रेम, ज्ञान और करुणा को शब्दों के माध्यम से जीवंत करता है। श्री नर्मदा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में 80 से अधिक छंदबद्ध रचनाएँ शामिल हैं। कवयित्री ने अपनी कलम से कृष्ण-भक्ति के भावों को इतनी सहजता से उकेरा है कि पाठक स्वयं को ब्रज की गलियों, यमुना तट या गोवर्धन की छाया में पाता है। जिसमें वंदनाएँ, कृष्ण की बाल लीलाएँ, राधा-कृष्ण प्रेम, सुदामा-कृष्ण मित्रता और गीता के उपदेश जैसे विषय प्रमुख हैं।

डॉ. ललिता यादव बिलासपुर (छत्तीसगढ़) की निवासी हैं और शासकीय स्कूल में शिक्षिका के रूप में कार्यरत हैं। उनकी रचनाएँ बालपन से कृष्ण के प्रति लगाव को दर्शाती हैं, जहाँ वे गोपी, राधा या ललिता सखी बनकर भाव व्यक्त करती हैं।
कवयित्री की भाषा सरल, भावपूर्ण और लयबद्ध है। छंदों का चयन विषय के अनुरूप है – बाल लीलाओं में दोहा की सहजता, प्रेम में विधाता की गहराई। पुस्तक में कृष्ण को लीलाधर, गिरधारी, मोहन आदि नामों से पुकारा गया है, जो भक्ति रस को बढ़ाता है।

'ललिता के लीलाधर' भक्ति साहित्य की एक मूल्यवान कृति है, जो कृष्ण-प्रेमियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनेगी। यह न केवल मनोरंजन करती है, बल्कि आत्मिक शांति प्रदान करती है। कृष्ण की लीलाओं को आधुनिक संदर्भ में जोड़कर, पुस्तक युवा पाठकों को भी आकर्षित कर सकती है। यदि आप भक्ति, प्रेम या छंदबद्ध कविता के शौकीन हैं, तो यह संग्रह अवश्य पढ़ें।

- सत्यम सिंह बघेल

पुस्तक : ‘प्रेम पथिक’ (उपन्यास)लेखिका : डॉ. पुष्पा सिंह ‘प्रेरणा’प्रकाशक : श्री नर्मदा प्रकाशनडॉ. पुष्पा सिंह ‘प्रेरणा’ ...
03/02/2026

पुस्तक : ‘प्रेम पथिक’ (उपन्यास)

लेखिका : डॉ. पुष्पा सिंह ‘प्रेरणा’

प्रकाशक : श्री नर्मदा प्रकाशन

डॉ. पुष्पा सिंह ‘प्रेरणा’ द्वारा लिखित हिंदी उपन्यास ‘प्रेम पथिक’ एक ऐसी कृति है जो प्रेम की यात्रा को एक "पथिक" (यात्री) के रूप में चित्रित करती है। यह उपन्यास हिंदी साहित्य की उस परंपरा में महत्वपूर्ण योगदान देता है जहाँ प्रेम को केवल व्यक्तिगत या शारीरिक आकर्षण तक सीमित नहीं रखा जाता, बल्कि इसे एक "उच्चतर आध्यात्मिक स्तर" तक ले जाया जाता है।

उपन्यास की मूल संरचना प्रेम की उस यात्रा पर आधारित है जो शुरू में दो व्यक्तियों के बीच साधारण आकर्षण से आरंभ होती है, लेकिन धीरे-धीरे यह व्यक्तिगत सीमाओं को पार कर "सार्वभौमिक प्रेम", करुणा और आध्यात्मिकता की ओर बढ़ती है। लेखिका ने प्रेम को एक "जीवंत पथिक" के रूप में व्यक्त किया है – जो निरंतर चलता रहता है, विभिन्न अनुभवों से गुजरता है, चुनौतियों का सामना करता है और अंततः आत्म-साक्षात्कार या उच्चतर चेतना तक पहुँचता है।

यह कथ्य हिंदी साहित्य में भक्ति काव्य की परंपरा (जैसे कबीर, मीरा, सूरदास आदि में प्रेम की आध्यात्मिक व्याख्या) से जुड़ता नजर आता है, लेकिन आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। व्यक्तिगत प्रेम से शुरू होकर यह "मानवता के प्रति प्रेम", प्रकृति से जुड़ाव और ईश्वरीय प्रेम तक फैलता है।

डॉ. पुष्पा सिंह ‘प्रेरणा’ की भाषा सहज, भावपूर्ण और पाठक से सीधे संवाद करने वाली है। जटिल दार्शनिक विचारों को भी वे आम बोलचाल की भाषा में व्यक्त करती हैं, जिससे उपन्यास आम पाठक के लिए भी सुलभ रहता है।
- भावुकता और दार्शनिकता का संतुलन : कहीं भावुकता हावी नहीं होने दी गई है; बल्कि प्रेम की गहराई को तर्कसंगत और आध्यात्मिक ढंग से समझाया गया है।

मुख्य पात्र (प्रेम पथिक के रूपक में) के अलावा सहायक पात्र भी प्रेम की विभिन्न अवस्थाओं को दर्शाते हैं, जो कथा को बहुआयामी बनाते हैं।
‘प्रेम पथिक’ उन उपन्यासों में गिना जा सकता है जो 'प्रेम को केवल रोमांस' नहीं, बल्कि 'जीवन दर्शन' के रूप में देखते हैं। यह 'आधुनिक हिंदी साहित्य' में प्रेम की आध्यात्मिक व्याख्या की दिशा में एक सार्थक प्रयास है। जहाँ अधिकांश समकालीन उपन्यास सामाजिक यथार्थ, स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलताओं या मनोवैज्ञानिक गहराई पर केंद्रित रहते हैं, वहीं यह उपन्यास प्रेम को 'उद्धार का मार्ग' बनाता है।

कुछ पाठकों को यह 'अति आदर्शवादी' या 'भावुक' लग सकता है, लेकिन जो आध्यात्मिक साहित्य पसंद करते हैं, उनके लिए यह एक 'प्रेरणादायक और चिंतनशील' रचना सिद्ध होगी।

यदि आप प्रेम को केवल प्रेम-कहानी के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की एक गहन साधना के रूप में देखना चाहते हैं, तो ‘प्रेम पथिक’ निश्चित रूप से पढ़ने योग्य है।

- सत्यम सिंह बघेल

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