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02/12/2016

क्यों की जाती है पूजा के बाद आरती 🌷🌷🌷🌷🌷

घर हो या मंदिर, भगवान की पूजा के बाद आरती की जाती है। बिना आरती के कोई भी पूजा अपूर्ण मानी जाती है। इसलिए पूजा शुरू करने से पहले लोग आरती की थाल सजाकर बैठते हैं। पूजा में आरती का इतना महत्व क्यों हैं इसका उत्तर स्कंद पुराण में मिलता है। इस पुराण में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति मंत्र नहीं जानता, पूजा की विधि नहीं जानता लेकिन आरती कर लेता है तो भगवान उसकी पूजा को पूर्ण रूप से स्वीकार कर लेते हैं। आरती का धार्मिक महत्व होने के साथ ही वैज्ञानिक महत्व भी है। रुई शुद्ध कपास होता है इसमें किसी प्रकार की मिलावट नहीं होती है। इसी प्रकार घी भी दूध का मूल तत्व होता है। कपूर और चंदन भी शुद्घ और सात्विक पदार्थ है। जब रुई के साथ घी और कपूर की बाती जलाई जाती है तो एक अद्भुत सुगंध वातावरण में फैल जाती है। इससे आस-पास के वातावरण में मौजूद नकारत्मक उर्जा भाग जाती है और सकारात्मक उर्जा का संचार होने लगताहै। आरती में बजने वाले शंख और घड़ी-घंटी के स्वर के साथ जिस किसी देवता को ध्यान करके गायन किया जाता है उसके प्रति मन केन्द्रित होता है जिससे मन में चल रहे द्वंद का अंत होता है। हमारे शरीर में सोई आत्मा जागृत होती है जिससे मन और शरीर उर्जावान हो उठता है। और महसूस होता है कि ईश्वर की कृपा मिल रही है। जब रुई के साथ घी और कपूर की बाती जलाई जाती है तो एक अद्भुत सुगंध वातावरण में फैल जाती है। इससे आस-पास के वातावरण में मौजूद नकारत्मक उर्जा भाग जाती है और सकारात्मक उर्जा का संचार होने लगता है।
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01/12/2016

कलवा ( रक्षासूत्र )

पूजा-पाठ और शुभ अवसरों पर बहुत से लोग अपनी कलाई पर मौली यानी कलावा बांधते हैं। क्या कभी आपने सोचा है कि इसके पीछे क्या कारण हो सकता है? अगर आपको लगता है कि ऐसा करने के पीछे सिर्फ धार्मिक कारण है तो ऐसा नहीं है। बल्कि वैज्ञानिक कारणों से भी मौली बांधी जाती है। शास्त्रों के अनुसार मौली या कलावा बांधने की परंपरा की शुरुआत देवी लक्ष्मी और राजा बलि ने की थी। कलावा को रक्षा सूत्र भी कहते हैं। माना जाता है कि कलाई पर इसे बांधने से जीवन पर आने वाले संकट से रक्षा होती है। इसका कारण यह है कि कलावा बांधने से ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवों की कृपा प्राप्त होती है। साथ ही तीनों देवियों सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती की अनुकूलता का भी लाभ मिलता है।
वेदों में लिखा है कि वृत्रासुर से युद्ध करने जाते समय इंद्राणी शची ने इंद्र की दाहिनी भुजा पर रक्षासूत्र जिसे मौली या कलावा भी कहते हैं, बांधा था। जिससे वृत्रासुर को मारकर इंद्र विजयी हुए थे। तभी से रक्षासूत्र या मौली बांधने का चलन शुरू हुआ।
कहते हैं मौली में उक्त देवी या देवता अदृश्य रूप में विराजमान रहते हैं जिसकी पूजा करके यह कलावा या रक्षा सूत्र बांधा जाता है। मौली का धागा कच्चे सूत से तैयार किया जाता है और यह कई रंगों जैसे, लाल, पीला, सफेद या नारंगी रंगों का होता है। इसे हाथों पर बांधने से बरक्कत होती है शरीर विज्ञान के अनुसार शरीर के कई प्रमुख अंगों तक पहुंचने वाली नसें कलाई से होकर गुजरती हैं। कलाई पर मौली या कलावा बांधने से इन नसों की क्रिया नियंत्रित रहती है। इससे त्रिदोष यानी वात, पित्त और कफ का सामंजस्य बना रहता है। माना जाता है कि कलावा बांधने से रक्तचाप, हृदय रोग, मधुमेह और लकवा जैसे गंभीर रोगों से काफी हद तक बचाव होता है।पुरुषों और अविवाहित कन्याओं के दाएं हाथ में और विवाहित महिलाओं के बाएं हाथ में मौली बांधी जाती है।वाहन, बही-खाता, मेन गेट, चाबी के छल्ले और तिजोरी पर पवित्र कलावा बांधने से लाभ होता है। कलावे से बनी सजावट की वस्तुएं घर में रखने से नई खुशियां आती हैं।..

18/12/2014

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