03/04/2026
गुस्ताखी माफ
त्योहारों की वो खुशबू अब कहाँ खो गई।
कभी त्योहार सिर्फ तारीख़ नहीं होते थे।
वो एहसास होते थे, अपनापन होते थे, रिश्तों की गर्माहट होते थे।
याद है वो समय, जब घर में त्योहार आने से पहले ही रौनक शुरू हो जाती थी। माँ रसोई में पकवान बनाती थीं, बच्चे सजावट में लगे रहते थे, और पड़ोसी वो तो जैसे परिवार का ही हिस्सा होते थे।
*ईद हो या दीपावली,*
किसी ने कभी ये नहीं पूछा कि तुम कौन हो, किस धर्म के हो, बस इतना मायने रखता था कि तुम हमारे अपने हो। सेवइयां भी साथ खाई जाती थीं,
और पटाखे भी साथ जलाए जाते थे।
गले मिलना, मुस्कुराना, खुशियाँ बाँटना यही असली त्योहार हुआ करते थे।
लेकिन आज सब कुछ बदल गया है।
अब त्योहार आते हैं, तो उनके साथ एक अजीब सा डर भी आता है,
एक खामोश सवाल कहीं कुछ गलत न हो जाए। अब खुशियों से पहले खबरें आती हैं, और मिठास से पहले मन में कड़वाहट भर दी जाती है।
हर त्योहार में जैसे कोई अदृश्य दीवार खड़ी कर दी गई हो जहाँ पहले दिल मिलते थे, अब लोग बंटने लगे हैं।
आखिर ऐसा क्या हुआ?
क्यों अब त्योहारों में साजिश की बू आने लगी है?
क्यों हर खुशी के मौके पर नफरत की आग भड़काई जाती है?
क्यों धर्म, जो जोड़ने के लिए था
उसी को तोड़ने का हथियार बना दिया गया?
सच तो ये है त्योहार नहीं बदले हैं, हम बदल गए हैं।
हमने दूसरों की बातों में आकर
अपने रिश्तों पर शक करना शुरू कर दिया।
हमने इंसानियत से ज्यादा पहचान को अहमियत दे दी।
लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है। अगर हम चाहें, तो फिर से वही पुराना दौर लौटा सकते हैं। फिर से किसी के घर जाकर बिना सोचे मिठाई खा सकते हैं,फिर से गले मिलकर कह सकते हैं
तुम मेरे अपने हो बस इतना काफी है। क्योंकि असली त्योहार वही है,
जहाँ दिलों में नफरत नहीं,
बल्कि मोहब्बत की रोशनी जलती है।
चलो इस बार से शुरुआत हम करें।
नफरत नहीं रिश्ते फैलाएँ।
ताकि आने वाली पीढ़ी ये न कहे
त्योहार तो है पर वो बात नहीं रही।
मेरे इस लेख से अगर किसी के दिल को ठेस पहुंची हो तो एक बार फिर कहता हूं गुस्ताखी माफ
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