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07/06/2026

आपको क्या लगता है? मोदी सरकार को उखाड़ फेंकने के प्रयास आज से थोड़े न चल रहे हैं। सत्ता सँभालने के तुरंत बाद ही ये उपक्रम शुरू कर दिया गया था।

2015 में जब मोदी सरकार ने विराट अनुभव वाले गजेंद्र चौहान को FTII का अध्यक्ष बनाया 4 महीने से भी अधिक समय तक विरोध प्रदर्शन किया गया। एक तरह से ये धमकी थी कि आप संस्थानों में अपनी विचारधारा के लोग नहीं बिठा सकते, और विशेषकर फ़िल्मी दुनिया में तो हस्तक्षेप नहीं ही कर सकते।

उसी वर्ष भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के बहाने किसानों को भड़काने की कोशिश की गई। यानी, किसानों को भड़काने की साज़िश भी पुरानी थी। अन्ना हजारे से लेकर मेधा पाटकर जैसों को जोड़ा गया। 2015 में ही भारतीय सेना में बगावत की ज़मीन तैयार करने का कुटिल प्रयास हुआ। OROP के बहाने सेना-इकोसिस्टम में घुसपैठ की कोशिश हुई।

अंत में थक-हारकर इन्होंने सोचा कि गुजरात भाजपा का पुराना गढ़ है और मोदी-शाह इसी प्रयोगशाला से निकले हैं तो सबसे पहले घर में वार किया जाए। पाटीदार आंदोलन भड़का दिया गया। एक 21 साल का लड़का यूँ ही आंदोलन का चेहरा नहीं बन गया। बाद में हार्दिक पटेल कांग्रेस में शामिल हो गए। अब भाजपा में हैं।

2016 आते-आते ये रोहित वेमुला नाम का शिगूफा लेकर आ गए और एक ऐसा व्यक्ति जो दलित नहीं था उसके बहाने दलितों को सरकार के ख़िलाफ़ करने की कोशिश की गई। फिर JNU में कन्हैया कुमार और उमर खालिद जैसों को पैदा करके अफजल गुरु को कल्ट साबित करने की कोशिश हुई। फिर ये राष्ट्रीय राजधानी को घेरने की साज़िश में लग गए। अंततः इन्हें जाट आरक्षण का मुद्दा मिला और पंजाब-हरियाणा में आग लगाने का तानाबाना बुना गया। यशपाल मलिक जैसों को खड़ा किया गया।

फिर इन्होंने सोचा कि भारत की कमज़ोर नस कश्मीर को छुआ जाए। वहाँ आतंकी बुरहान वानी के एनकाउंटर के बाद जमकर युवाओं को भड़काया गया। हिज़्बुल-हुर्रियत से लेकर तमाम अलगाववादियों को सक्रिय कर दिया गया। पाकिस्तान से समर्थन आ ही गया। इन्हें अंदाज़ा नहीं था कि इसी कश्मीर में अनुच्छेद-370 और 35A के हटने के बाद पूर्ण लोकतंत्र लागू होगा और पाकिस्तान में घुस-घुसकर ऑपरेशंस होंगे।

पाटीदार आंदोलन की भीड़ देखकर और गुजरात में आने वाले चुनाव को देखकर इन्होंने फिर मोदी-शाह के गढ़ में दलित आंदोलन भड़काया और जिग्नेश मेवाणी को पैदा किया। इस तरह इनका 2016 ख़त्म हुआ और ये मोदी सरकार का कुछ नहीं उखाड़ पाए।

फिर इन्हें लगने लगा कि भाजपा को उसी की पिच पर परास्त किया जाए और उस क्षेत्र को चुना जाए जहाँ पार्टी अबतक पाँव नहीं जमा पाई है। ये पहुँचे तमिलनाडु। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के ख़िलाफ़ जल्‍लीकट्टू को लेकर माहौल बनाया गया। PETA खुलकर शामिल हुआ। फिर ये अलग-अलग जगह अलगाववाद भड़काने की कुटिल योजना में लग गए। पश्चिम बंगाल में दार्जीलिंग में गोरखालैंड के लिए आंदोलन भड़काया गया।

2018 आते-आते ये समझ चुके थे कि मोदी सरकार और मजबूत हो रही है। ऐसे में इन्होंने 2019 की तैयारी शुरू कर दी। भीमा-कोरेगाँव के बहाने फिर से दलित-वामपंथी गठबंधन बनाने की कोशिश हुई, अर्बन नक्सलियों को काम पर लगाया गया। प्रकाश आंबेडकर से लेकर 'एल्गर परिषद' तक सब बुद्धिजीवी वर्ग में मोदी सरकार के विरुद्ध माहौल बनाने में लग गए। सरकार ने धर-पकड़ शुरू की तो एमनेस्टी-CIVICUS जैसी संस्थाएँ अर्बन-नक्सलियों के समर्थन में उतर आईं।

गुजरात, रोहित वेमुला और भीमा-कोरेगाँव के बाद दलितों को भड़काने की एक और कोशिश हुई और इस बार भी जल्लिकट्टु की तरह सुप्रीम कोर्ट के आदेश को बहाना बनाया गया। SC/ST एक्ट को लेकर ख़िलाफ़ देशभर में आग लगाई गई। मोदी सरकार ने क़दम पीछे लिए और जिस तरह से भूमि अधिग्रहण वाले अध्यादेश को लैप्स हो जाने दिया था वैसे ही इस बार एक्ट के कड़े प्रावधानों को पुनः स्थापित किया। तमिलनाडु के थूथुकुडी में एंटी-स्टरलाइट प्रोटेस्ट्स हुए।

फिर इन्हें लगा कि हमला सीधे हिन्दू धर्म पर करना पड़ेगा। सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला में महिलाओं की एंट्री पर से शर्त हटा दिया। तृप्ति देसाई और रेहाना फातिमा जैसे नास्तिकों व हिन्दू विरोधियों की चाल सफल हुई। पूरे केरल में हिन्दू सड़क पर उतर आए, लेफ्ट सरकार ने जमकर लाठियाँ बरसाईं और केस पर केस दर्ज किए।

खैर... इतना कुछ होने के बावजूद 2019 में एक बार फिर से भाजपा पहले से भी अधिक बहुमत के साथ सत्ता में आ गई तो विदेश में बैठी ताक़तों के कान खड़े हो गए। तबतक दुनियाभर में मोदी की जन-कल्याणकारी व जन-उत्थान की योजनाओं का डंका बज चुका था। विदेश में मोदी के जाते ही गर्वित भारतीय प्रवासी समुदाय उत्साहित हो जाता था। तख़्तापलट की साज़िश रचने वाली शक्तियों ने इस बार कुछ बड़ा करने की सोची।

किसान और मुसलमान - दो वर्ग चुने गए। किसानों में भी पंजाब-हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शक्तिशाली किसान। बिहार-बंगाल वाले मेहनती किसान नहीं। शाहीन बाग़ में CAA के ख़िलाफ़ तम्बू लग गया और दिल्ली की सीमाओं पर किसानों का। साल भर ड्रामा चलता रहा, AAP सरकार दोनों को दाना-पानी देती रही। तबतक मोदी सरकार भी समझ चुकी थी कि बल-प्रयोग से मामला बिगड़ेगा। किसानों की बात मानते हुए तीनों कृषि क़ानून स्वयं प्रधानमंत्री ने TV पर आकर वापस लेने की घोषणा की। शाहीन बाग़ उपद्रव दिल्ली दंगों में परिवर्तित हुआ और हिन्दुओं का नरसंहार हुआ, तब दंगाइयों पर कार्रवाई शुरू हुई। हिकेन्स नेक को काटकर भारत के टुकड़े-टुकड़े करने की मंशा रखने वाला शरजील इमाम जेल गया।

2020-21 में इन दोनों उपद्रवों के विफल होने के बाद विदेश में बैठी ताक़तों को बहुत बड़ा झटका लगा। वो समझ नहीं पा रहे थे कि करें क्या। उन्होंने कोरोना महामारी को ही औजार बनाने की ठानी। लॉकडाउन के बीच प्रवासी मजदूरों में भय पैदा करने की कोशिश हुई। उनसे प्रदर्शन करवाए गए। इसी बीच हाथरस में एक लड़की की मौत के बहाने दलितों को फिर से भड़काया गया। इन्हें योगी में मोदी से भी बड़ा ख़तरा नज़र आने लगा। चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' जैसे खिलाड़ी उभरे। योगी के ख़िलाफ़ षड्यंत्र रचे जाने लगे। 2022 में योगी की वापसी हुई। गैंग को झटका लगा, ये कन्फ्यूज्ड हो गए।

कांग्रेस पार्टी परेशान हो गई। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कौन सा मुद्दा चुनें। पत्रकारों को अपने पाले में करके सड़क से लेकर संसद तक पेगासस जैसे जासूसी सॉफ्टवेयर के ख़िलाफ़ माहौल बनाया गया और इज़रायल के साथ सम्बन्ध ख़राब करने की कोशिश की गई।

2022 में इन्हें अग्निपथ का मुद्दा मिल गया। इन्हें लगने लगा कि अग्निवीर योजना से भारतीय सेना और अधिक ऊर्जावान व युवा हो जाएगी। इनके लिए ख़तरे की घंटी बज गई और इन्होंने देशभर में युवाओं को भड़काकर सार्वजनिक संपत्तियों का जमकर नुक़सान करवाया। FTII के समय इन्होंने फ़िल्म जगत को चुना था, आख़िरकार 2022 में ये खेल जगत पर पहुँचे। फिर से हरियाणा की एक लॉबी को सक्रिय किया गया और बृजभूषण शरण सिंह को बलि का बकरा चुना गया। पहलवानों ने जमकर आंदोलन किया, बृजभूषण WFI अध्यक्ष नहीं रहे और उन्हें सांसदी का टिकट नहीं मिला। विनेश फोगाट विधायक बन गईं। हालाँकि, ये आंदोलन भी विफल हुआ। बृजभूषण के बेटे सांसद बने और WFI अध्यक्ष पद पर उन्होंने अपने वफादार को बिठाया।

अंततः ये अम्बानी-अम्बानी करके भी थक चुके थे तो इन्होंने सोचा कि अडानी पर वार करते हैं। हिंडेनबर्ग को लाया गया। अडानी के ख़िलाफ़ रिपोर्ट पब्लिश करवाकर कंपनी के शेयर्स गिरा दिए गए। अमेरिका में केस करवा दिए गए। अंत में हुआ क्या? हिंडेनबर्ग बंद हो गया। पिछले ही दिनों अमेरिका ने अडानी के विरुद्ध चल रहे सारे मुक़दमों को बंद करने का ऐलान किया।

गुजरात, तमिलनाडु, कश्मीर, केरल और पश्चिम बंगाल के बाद इन्होंने नॉर्थ-ईस्ट को चुना। एक हिन्दू समाज को जनजातीय का दर्जा न मिल पाए, इसके लिए पूरे मणिपुर को जला दिया गया। फिर से कोर्ट के एक फ़ैसले को पकड़ा गया। जमकर विदेश से फंड आए, सारे चर्च आग लगाने में जुट गए और भाजपा को अपनी ही चुनी हुई सरकार को बरख़ास्त करना पड़ा। सैकड़ों लोग मारे गए। मैतेई हिन्दुओं के लिए किसी को सहानुभूति नहीं रही, ईसाई कुकी के लिए दुनियाभर से आवाज़ें आने लगीं।

मणिपुर के साथ-साथ महाराष्ट्र में भी इनका गेम चल रहा था। वहाँ मनोज जरांगे को पैदा करके मराठा आरक्षण को फिर से उभार दिया गया। जगह-जगह समाजों को लड़ाया जाने लगा। तबतक जाति जनगणना और आंबेडकर का मुद्दा उठाया ही जा चुका था। आरक्षण और संविधान ख़त्म करने के शिगूफे को चुनावी माहौल में ढाला गया। NEET पेपर लीक के कारण सरकार घिरी ही हुई थी, इस बहाने इन्हें बांग्लादेश और नेपाल में Gen Z प्रदर्शनों को भारत में दोहराने के सपने आने लगे। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले किसानों को भी फिर से एक्टिव किया गया और किसान आंदोलन वापस शुरू करवा दिया गया।

फिर... 2024 में BJP अकेले दम पर बहुमत से दूर रह गई और उसकी 240 सीटें आईं। विपक्षी खेमे में जमकर जश्न मनाया गया। हालाँकि, TDP-JDU ने सरकार तो बनवा दी लेकिन नीतीश-नायडू पर दबाव बनाया जाने लगा। मोदी सरकार संघ परिवार की पुरानी नीतियों पर ज़ोर-शोर से आगे बढ़ने लगी तब इन्हें समझ आया कि इतनी आसानी से मोदी-शाह को मात नहीं दी जा सकती। सारे उपक्रम फेल हुए।

सोनम वांगचुक को पालपोसकर बड़ा किया गया कि कम से कम लद्दाख में तो आग लगे और चीन को ही ख़ुश किया जाए। इस बार सरकार होशियार थी, तुरंत जेल में पटक दिया। लद्दाख में ये मणिपुर दोहरा नहीं पाए। तमाम विदेशी NGO बंद होने और NGOs को विदेशी फंडिंग बंद होने के कारण पूरा इकोसिस्टम दबाव में है। ये बहुत कुछ करने की औक़ात नहीं रखते हैं अब। ये नरेंद्र मोदी के लिए तैयारियाँ कर रहे

थे, अमित शाह आउट ऑफ सिलेबस आ गए इनके लिए।

पूरा विश्व युद्ध के झोंके महसूस कर रहा है। पेट्रोल-डीजल की किल्लत है। विपक्ष अब इधर ही उम्मीद भरी निगाहों से देख रहा है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समस्या के आने से पूर्व ही देशवासियों को आगाह करके रखते हैं। Gen Z को फिर से NEET के बहाने भड़काने की कोशिश चल रही है, सुगम परीक्षाएँ संचालित करवाना सरकार के लिए चुनौती है और ये समस्या जायज भी है। सरकार को इसपर काम करना होगा। एक बार फिर से खालिस्तानी किसानों को भड़काने की कोशिश हो रही है।

फिर आ गए ये कॉकरोच! तिलचट्टों से सबको बहुत उम्मीदें थीं। सोशल मीडिया पर जमकर फॉलोवर्स मिले, ज़मीन पर डफली गैंग के अलावा कोई नहीं पहुँचा। दिल्ली में AAP और पश्चिम बंगाल में TMC की हार ने ऐसा सदमा दिया है कि बड़े से बड़े रिजीम चेंज एक्सपर्ट्स भी भारत आकर पानी माँग रहे थे। कॉकरोचों वाली तैयारी बड़ी थी, लेकिन देश की मनोरंजन-पसंद जनता ने इन जोकरों को भाव नहीं दिया और जमकर मजे लिए। अभिजीत दीपके तो वृंदा करात का चेला निकला और सौरव दास से गर्मी नहीं बर्दाश्त हो रही।

हमें सजग रहना है। विदेशी ताक़तें सामान्यतः हार नहीं मानतीं लेकिन कोरोना से लेकर युद्ध जैसी स्थितियों में भी भारत ने जिस तरह के धैर्य का परिचय दिया है और यहाँ के नेतृत्व ने जिस तरह की इच्छाशक्ति का प्रदर्शन किया है, उसने भारत विरोधी शक्तियों को अपनी रणनीतियों पर पुनर्विचार करने को विवश कर दिया है। जो श्रीलंका से लेकर पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल तक में सफल हो गया, वो भारत में मनोरंजन का मसाला बनकर रह गया।


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एक आदमी शोरूम जाता है, वहां पर  सेल्समैन से पूछता है, भाई ये छोटी टीवी कितने की है.. वो बोलता है जाओ भाईसाब आपके काम की ...
04/06/2026

एक आदमी शोरूम जाता है, वहां पर सेल्समैन से पूछता है, भाई ये छोटी टीवी कितने की है.. वो बोलता है जाओ भाईसाब आपके काम की नहीं है..आदमी को बड़ा गुस्सा आता है..

अगले दिन सूट-बूट पहनकर जाता है और भाव पूछता , वो फिर मना कर देता है..आदमी उसे अब ईगो पर ले लेता है..

अगले दिन साड़ी पहनकर, बिंदी-लाली लगाकर औरत बनकर जाता है और भाव पूछता है वो उसे देख हँसता है और फिर मना कर देता है...

अब उस इंसान का पारा गरम हो जाता है अगले दिन बुर्का पहनकर जाता है और फिर भाव पूछता है..सेल्समेन बोलता है तुम फिर आ गए मना किया न तुमको...आदमी बड़े आश्चर्य से आज तो शक्ल तक न देखी फिर कैसे पहचान लिया.
.सेल्समेन हँसते हुए बोलता है...आप इतने दिनों जिस छोटी टीवी का भाव पूछ रहे हैं, दरअसल वो "माइक्रोवेव है" ..............

बस यही हाल इनका है, ये कुर्ता पहनकर बोले या टीशर्ट या सूट पहनकर इंटरव्यू दे..जनता को पता है वो #पप्पू ही है !!
👇





02/06/2026

ये रील पूरी देखो कितना सुन्दर नज़ारा है।
वायरल रील



#वायरल #ट्रेंडिंग #भारत #इंडिया #देशकीबात #हिंदीरील #फेसबुकरील #वायरलरील #आजकीखबर #मजेदारवीडियो #ज्ञानकीबात #दिलचस्प #देखतेरहो #शेयरकरो #फॉलोकरो

31/05/2026

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काँच कैसे बनाया जाता है और यह पारदर्शी क्यों होता है?काँच हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी की बहुत आम चीज़ है। घर की खिड़की, गि...
31/05/2026

काँच कैसे बनाया जाता है और यह पारदर्शी क्यों होता है?

काँच हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी की बहुत आम चीज़ है। घर की खिड़की, गिलास, बोतल, मोबाइल स्क्रीन, चश्मा, कार का शीशा—इन सबमें काँच का इस्तेमाल होता है। लेकिन यह सवाल बहुत रोचक है कि काँच बनता कैसे है और यह पारदर्शी क्यों होता है?

सबसे पहले एक बात समझ लें:
काँच कोई धातु नहीं है। यह मुख्य रूप से रेत से बनने वाला एक विशेष पदार्थ है, जो न पूरी तरह क्रिस्टल जैसा होता है और न ही साधारण पत्थर जैसा।

काँच बनाने के मुख्य पदार्थ

काँच बनाने के लिए सामान्य रूप से तीन चीज़ें सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती हैं:

1. सिलिका रेत
यह काँच का मुख्य पदार्थ है। इसे साधारण भाषा में बहुत शुद्ध रेत कह सकते हैं। इसमें सिलिकॉन डाइऑक्साइड होता है।

2. सोडा ऐश
यह रेत को कम तापमान पर पिघलाने में मदद करता है। अगर केवल रेत को पिघलाया जाए, तो बहुत ज्यादा तापमान चाहिए।

3. चूना पत्थर
यह काँच को मजबूत और टिकाऊ बनाता है। इससे काँच पानी और नमी से जल्दी खराब नहीं होता।

इसके अलावा जरूरत के हिसाब से रंग, मजबूती या खास गुण देने के लिए कुछ और पदार्थ भी मिलाए जा सकते हैं।

काँच बनाने की प्रक्रिया

काँच बनाने की प्रक्रिया कई चरणों में होती है।

1. कच्चे पदार्थ मिलाए जाते हैं

सबसे पहले सिलिका रेत, सोडा ऐश और चूना पत्थर को सही मात्रा में मिलाया जाता है। यह मिश्रण बहुत साफ होना चाहिए, क्योंकि थोड़ी-सी अशुद्धि भी काँच का रंग या पारदर्शिता बदल सकती है।

2. भट्टी में बहुत तेज गर्म किया जाता है

इस मिश्रण को बड़ी भट्टी में लगभग 1400°C से 1600°C तक गर्म किया जाता है। इतनी गर्मी में रेत और बाकी पदार्थ पिघलकर गाढ़े तरल जैसे बन जाते हैं।

यही पिघला हुआ पदार्थ आगे चलकर काँच बनता है।

3. पिघले हुए काँच को आकार दिया जाता है

अब इस गर्म और पिघले हुए काँच को जरूरत के अनुसार आकार दिया जाता है।

जैसे:

खिड़की का शीशा बनाने के लिए इसे सपाट शीट में फैलाया जाता है।
बोतल बनाने के लिए इसे साँचे में डालकर या फूँककर आकार दिया जाता है।
गिलास, बल्ब, लेंस और सजावटी चीजें भी इसी तरह अलग-अलग तकनीकों से बनाई जाती हैं।

आजकल खिड़की और इमारतों में लगने वाला सपाट काँच अक्सर फ्लोट ग्लास प्रक्रिया से बनाया जाता है। इसमें पिघले हुए काँच को पिघली हुई टिन धातु की सतह पर फैलाया जाता है। इससे काँच की सतह बहुत चिकनी और सपाट बनती है।

4. धीरे-धीरे ठंडा किया जाता है

काँच को अचानक ठंडा नहीं किया जाता। अगर गर्म काँच को जल्दी ठंडा कर दें, तो उसमें अंदरूनी तनाव पैदा हो सकता है और वह टूट सकता है।

इसलिए काँच को धीरे-धीरे ठंडा किया जाता है। इस प्रक्रिया को एनीलिंग कहा जाता है। इससे काँच मजबूत और टिकाऊ बनता है।

काँच पारदर्शी क्यों होता है?

अब सबसे रोचक सवाल आता है: काँच पारदर्शी क्यों होता है?

किसी भी चीज़ को देखने के लिए प्रकाश जरूरी है। जब प्रकाश किसी वस्तु पर पड़ता है, तो तीन बातें हो सकती हैं:

1. प्रकाश वस्तु से टकराकर वापस लौट जाए

2. प्रकाश वस्तु के अंदर ही अवशोषित हो जाए

3. प्रकाश वस्तु के आर-पार निकल जाए

काँच में तीसरी बात होती है। यानी ज्यादातर प्रकाश काँच के आर-पार निकल जाता है। इसलिए हमें काँच के दूसरी तरफ रखी चीजें दिखाई देती हैं।

लेकिन ऐसा होता क्यों है?

काँच की अंदरूनी बनावट ऐसी होती है कि वह दिखाई देने वाली रोशनी यानी visible light को बहुत ज्यादा अवशोषित नहीं करता।

लकड़ी, पत्थर या लोहे जैसी चीजों में प्रकाश अंदर जाकर रुक जाता है या बिखर जाता है। इसलिए वे पारदर्शी नहीं दिखतीं।

लेकिन साफ काँच में प्रकाश को रोकने या बिखेरने वाली अशुद्धियाँ बहुत कम होती हैं। इसलिए प्रकाश सीधा या लगभग सीधा निकल जाता है और हमें दूसरी तरफ की वस्तु साफ दिखाई देती है।

काँच रंगीन कैसे हो जाता है?

अगर काँच में कुछ खास पदार्थ मिला दिए जाएँ, तो वह रंगीन हो सकता है।

जैसे:

लोहे की अशुद्धि से काँच हल्का हरा दिखाई दे सकता है।
कोबाल्ट मिलाने से नीला रंग आ सकता है।
क्रोमियम से हरा रंग बन सकता है।
सोना या तांबे के यौगिकों से लाल रंग भी बनाया जा सकता है।

इसका मतलब है कि काँच का पारदर्शी होना उसकी शुद्धता और अंदरूनी संरचना पर बहुत निर्भर करता है।

काँच और मिरर में अंतर

कई लोग काँच और मिरर को एक ही समझ लेते हैं, लेकिन दोनों अलग हैं।

साधारण काँच प्रकाश को आर-पार जाने देता है।
मिरर में काँच के पीछे चाँदी या एल्युमिनियम की चमकदार परत लगाई जाती है।

जब प्रकाश मिरर पर पड़ता है, तो वह पीछे लगी धातु की परत से टकराकर वापस लौट आता है। इसी कारण मिरर में हमारा चेहरा दिखाई देता है।

काँच टूटता क्यों है?

काँच कठोर तो होता है, लेकिन लचीला नहीं होता। जब उस पर तेज चोट लगती है, तो वह झुकने की बजाय टूट जाता है। इसलिए काँच को भंगुर पदार्थ कहा जाता है।

हालाँकि आजकल टेम्पर्ड ग्लास, लैमिनेटेड ग्लास और बुलेटप्रूफ ग्लास जैसे मजबूत रूप भी बनाए जाते हैं।

निष्कर्ष

काँच मुख्य रूप से सिलिका रेत, सोडा ऐश और चूना पत्थर को बहुत तेज तापमान पर पिघलाकर बनाया जाता है। पिघले हुए काँच को आकार देकर धीरे-धीरे ठंडा किया जाता है। काँच पारदर्शी इसलिए होता है क्योंकि इसकी संरचना दिखाई देने वाली रोशनी को ज्यादा रोकती या अवशोषित नहीं करती। इसलिए प्रकाश इसके आर-पार निकल जाता है और हमें दूसरी तरफ की चीजें दिखाई देती हैं।

31/05/2026

समुद्री जीवन एक मछली हजारों मछलियों को एक साथ खा गई


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ये बात बिल्कुल सटीक लगती है।
29/05/2026

ये बात बिल्कुल सटीक लगती है।

उम्र सिर्फ एक नंबर है, और असली नंबर स्कोरबोर्ड पर दिख रहा है! 👑💯13 मैच, 574 रन और 237 का स्ट्राइक रेट! वैभव सूर्यवंशी ने...
28/05/2026

उम्र सिर्फ एक नंबर है, और असली नंबर स्कोरबोर्ड पर दिख रहा है! 👑💯
13 मैच, 574 रन और 237 का स्ट्राइक रेट! वैभव सूर्यवंशी ने तो पूरे IPL 2026 को ही हिला कर रख दिया है। ये लड़का रुकने वाला नहीं है! 💥👀




“जब सपने बड़े हों, तो कॉन्ट्रैक्ट नहीं… इतिहास बनता है 🔥📜सलमान खान के संघर्ष के दिनों की ये यादें दिल जीत लेती हैं ❤️”Ju...
27/05/2026

“जब सपने बड़े हों, तो कॉन्ट्रैक्ट नहीं… इतिहास बनता है 🔥📜
सलमान खान के संघर्ष के दिनों की ये यादें दिल जीत लेती हैं ❤️”
Just for Fun 😊 😃


27/05/2026

बच्चों में संस्कार देने चाहिए, लेकिन लोग घर आते हैं अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त हो जाते हैं। कोई किसी से बात नहीं करता।

- डॉ मोहन भागवत जी
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